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ग़ज़ल

======ग़ज़ल=======

 

मौसमे गुल से अदावत सीखी

कैसे ढाना है क़यामत सीखी

 

हर कोई चोर नज़र में जिनकी

उनकी नज़रों से नजारत सीखी

 

हम गरीबों के लिए दिल दौलत   

बेच के जिसको तिजारत सीखी

 

उसको हाथी से क्या डराते हो

जिसने चींटी से बगावत सीखी

 

वक़्त से तुम तो हुए संजीदा

हमने बस “दीप” शरारत सीखी

 

संदीप पटेल “दीप”

Added by SANDEEP KUMAR PATEL on February 23, 2013 at 11:36pm — 13 Comments

माटी कहे कुम्हार से

माटी कहे कुम्हार से,

मुझको दे ऐसा आकार,

फिर न चक्का चढू कभी,

मिलूं संग निराकार ...

मुझे रंग दे नाम के रंग में,

पकुं मै तप की अगन में ,

सांचा ऐसा लादे मुझको ,

ढल जाऊं मै सत्कर्म में...

चिकना इतना करदे मुझे,

माया टिके न कोई इसपे,

घट ही में अविनाशी सधे,

हो जोत अंदर परकाशी रे ...

जग तारन कारण देह धरे,

सत्कर्म करे जग पाप हरे, 

चित्त न डगमग मेरा डोले,

ध्यान तेरे…

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Added by Aarti Sharma on February 23, 2013 at 8:00pm — 22 Comments

प्रेम

मृतप्राय शिराओं में बहता हुआ

संक्रमण से सफ़ेद हो चुका खून

गर्म होकर गला देता है

तुम्हारी रीढ़ !

और तुम -

-अपनी आत्मा पर पड़े फफोलो से अन्जान

-रेंगते हुए मर्यादा की धरती पर

प्रेम कहते हो –

एक चक्रवत प्रवाहित अशुद्धि को !

 

तुम्हारी गर्म सांसों का अंधड़

हिला देता है जड़ तक ,

एक छायादार वृक्ष को !

और फिर कविता लिखकर

शाख से गिरते हुए सूखे पत्तों पर ,

तुम परिभाषित करते…

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Added by Arun Sri on February 23, 2013 at 8:00pm — 6 Comments

गज़ल

बुझा चिराग तूफान बताया होगा
अँधेरा मन ही मन मुस्कराया होगा

पतंग यूँ तो चाहे ऊँची उडारी
जिस के हाथ मर्जी से उडाया होगा

जला चिराग करें जो खुंजा रोशन,
उसको अँधेरी रात ने डराया होगा

जुर्म चाहे पेट से जन्मा नहीं,मगर
भूख पेट की ने जुर्म कराया होगा

अभी ये बस्ती उस को जानती नहीं
लगता हैं इंसान बन दिखाया होगा

Added by मोहन बेगोवाल on February 23, 2013 at 7:30pm — 2 Comments

छांव की आस है

तेज धूप में छांव की आस है

रेत के बीच बढ़ रही प्यास है

 

हाथ में तीर और तलवार है

वो जो मेरे दिल के पास है

 

कथन के अर्थ को समझ लेना

अपनों की अपनों से खटास है…

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Added by बृजेश नीरज on February 23, 2013 at 7:00pm — 22 Comments

जवानी धर्म से भटके, हुआ वह शर्तिया "भटकल"

मौलिक

अप्रकाशित

लगा ले मीडिया अटकल, बढ़े टी आर पी चैनल ।

जरा आतंक फैलाओ, दिखाओ तो तनिक छल बल ।।

फटे बम लोग मर जाएँ, भुनायें चीख सारे दल…

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Added by रविकर on February 23, 2013 at 4:19pm — 7 Comments

आज का दौर

दोस्तों देखे ग़ज़ल आप को कैसी लगी ....

आज के इस दौर में इन्सान चिन्तित है बड़ा, 

दरद सहता बेहिसाबा सेज पे भीष्म पड़ा।

तोड़ पिंजरा परिन्दा उड़ भी नही सकता अभी,

क्या करे जाये कहां ये सोच चौराहे खड़ा।

बैर भाई अब यूं करे गौना विभीषन हो गया,

खून के रिश्तें बड़े मतलब बिना है क्या भला।

आग जलती देख कर यूं हाथ सारे सेकते,

हम बुझाये आग क्यों फिर घर जला उसका जला।

इश्क में मतलब जमा शामिल हुआ अन्दाज…

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Added by rajinder sharma "raina" on February 23, 2013 at 4:00pm — 6 Comments

अनजान मंजिल

चला जा रहा हूँ इस निर्जन पथ पर

अनजानी डगर है मंजिल अनजान

फिर भी मै उस ओर पग बढ़ा रहा हूँ

...........................................

आँधियों के थपेड़ो ने डराया मुझको

गरजते बादलो ने दहलाया दिल को

फिर भी मै उस ओर पग बढ़ा रहा हूँ

..........................................

भटक रहा कब से पथरीली राहों पर

पथिक हूँ अनजान कंटीली राहों का

फिर भी मै उस ओर पग बढ़ा रहा हूँ

............................................

आसन नही चलना हो कर जख्मी…

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Added by Rekha Joshi on February 23, 2013 at 3:20pm — 7 Comments

शोर

जिसने खुद को ही, ज़माने से छुपा रखा है |

जाने किस शख्स ने नाम उसका, खुदा रखा है ||

सब बहाने से उसे, याद किया करते हैं |

दिल में दुनियाँ के, अजाब खौफ बिठा रखा है ||

हाथ तकदीर बनाने के ही, काम आते हैं |

क्या हथेली की लकीरों में, भला रखा है ||…

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Added by Shashi Mehra on February 23, 2013 at 2:02pm — 7 Comments

कटोरा

कटोरा

शादी मै लड़के के पिता ने दिखाया तेज,

माँगा भारी भरकम दहेज़,

गाड़ी एल इ डी सोना चाँदी की सूची थमाई,

डायमंड रिंग से होगी सगाई,

लड़की को ये बात न हुई गवारा,

चढ़ गया उसका पारा,

दहेज़ की बात ने उसको झकझोरा,

उसने लड़के के बाप को थमाया कटोरा,

कृपया रुखसत हों,,

इसी में समझदारी

आप रिश्ते योग्य नहीं,,

आप है भिखारी 

Dr.Ajay.Khare Aahat

Added by Dr.Ajay Khare on February 23, 2013 at 1:30pm — 9 Comments


सदस्य कार्यकारिणी
बेटियाँ (कुछ दोहे )

घर सूना कर बेटियाँ ,जाती हैं ससुराल| 

दूजे घर की बेटियाँ ,कर देती खुशहाल||

बेटा !बेटी मार मत ,बेटी है अनमोल|

बेटी से बेटे मिलें  ,बेटा आँखें खोल||

घर की रौनक…

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Added by rajesh kumari on February 23, 2013 at 10:33am — 15 Comments

हैदराबाद से - एक ग़ज़ल !!!

आँख जैसे लगी, ख़ाक घर हो गया

जुल्म का प्रेत कितना निडर हो गया ।



कुछ दरिन्दों ने ऐसी मचाई गदर

खौफ की जद में मेरा नगर हो गया ।



थी किसी की दुकाँ या किसी का महल

चन्द लम्हों में जो खण्डहर हो गया ।



है नजर में महज खून ही खून बस

आज श्मसान 'दिलसुखनगर' हो गया ।



थी ख़बर साजिशों की मगर, बेखबर !

ये रवैया बड़ा अब लचर हो गया ।



कौन सहलाये बच्चे का सर तब 'सलिल'

जब भरोसा बड़ा मुख़्तसर हो गया ।



------  आशीष 'सलिल'…

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Added by आशीष नैथानी 'सलिल' on February 22, 2013 at 10:00pm — 24 Comments

बोल क्या कमी रही....

हर राह पर तेरी रजा

तू ही सनम तू ही खुदा

तो क्यों ही तेरे फैसलों पे

धूल सी जमी रही

बोल क्या कमी रही



क्यों ही तेरे दिल में वो, गैर ही बसा रहा,

क्यों लचकती बांह में गुल वही कसा रहा|

मैं भी तो पलाश बन बिछा था तेरी राह में,

मैं भी तो बहार सब लुटा रहा था चाह में|

क्यों दुआ में जागती

फिर आँख में नमी रही

बोल क्या कमी रही?



कैसे तेरे दिल से मैं नाम उसका खींच लूं,

या कि अपनी चाहतों के मैं गले ही भींच दूं|

तू देख मेरे हाथ…

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Added by Pushyamitra Upadhyay on February 22, 2013 at 10:00pm — 12 Comments

राजनीति के सिलबट्टे पर घिसता पिसता आम आदमी

+++++++++++++++++++++++++++++++++++

राजनीति के सिलबट्टे पर घिसता पिसता आम आदमी 

मजहब के मंदिर मस्जिद पर बलि का बकरा आम आदमी ||

राजतंत्र के भ्रष्ट कुएं में पनपे ये आतंकी विषधर 

विस्फोटों से विचलित करते सबको ये बेनाम आदमी ||



क्या है हिन्दू, क्या है मुस्लिम क्या हैं सिक्ख इसाई प्यारे 

लहू एक हैं - एक जिगर है एक धरा पर बसते सारे 

एक सूर्य से रौशन यह जग , एक चाँद की…

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Added by Manoj Nautiyal on February 22, 2013 at 4:14pm — 4 Comments

काशीनामा - प्रसाद प्रतिमा , स्पंदन और हिंदी गौरव !

                    त बीस फरवरी २०१३ का दिन बनारस के लिए ख़ास रहा । कालजयी  "कामायनी" के रचनाकार महाकवि जयशंकर प्रसाद की काशी में अबतक कोई प्रतिमा नहीं थी , उसका अनावरण हुआ । काव्य केन्द्रित पत्रिका " स्पंदन " का प्रकाशन प्रारंभ…
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Added by Abhinav Arun on February 22, 2013 at 9:00am — 12 Comments

शीशे में देखकर चेहरा

शीशे  में देखकर चेहरा ;बार -बार लजाये हैं ।

 कभी काजल, कभी बिंदिया बार -बार सजाये हैं ॥ 

***********************************************

सोचते  अपने दिल से ;दुनिया की नजर रहे।

 बहुत मिहनत…

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Added by श्रीराम on February 22, 2013 at 8:30am — 4 Comments

मेरे प्रियतम!

हे मेरे प्रियवर,हे मेरे प्रियतम !

ये अद्भुत सृष्टि और तुम अनुपम।

 

स्वप्न सुन्दर,सुमन सुन्दर,

किन्तु तुम सबसे सुन्दरतम।

गगन सुन्दर,नयन सुन्दर,

किलोलें करते ये हिरन सुन्दर।

नेत्रों की ये प्यास मधुर ,

और तुम सबसे मधुरतम।

हे मेरे प्रियवर,हे मेरे प्रियतम!

ये अद्भुत सृष्टि और तुम अनुपम।

 

रैन प्यारी,बैन प्यारे,

प्यारे ये आकाश के तारे,

प्यारे ये जल के फुब्बारे ,

और तुम सबसे अधिकतम।

हे मेरे प्रियवर,हे मेरे…

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Added by Savitri Rathore on February 22, 2013 at 12:00am — 10 Comments

कुछ चट-पटॆ शेर

==========================

कुछ चट-पटॆ शेर = मगर बड़ॆ दिलॆर ,,,,,

==========================

एक मुशायरा कराया था,बाज़ कॆ बाप नॆ !!

नॆवलॆ की गज़ल पॆ,खूब दाद दी साँप नॆ !!१!!



शॆर की सदारत, निज़ामत थी बाघ की,

बकरॆ कॆ हाँथ पाँव लगॆ, खुद ही कांपनॆं !!२!!



मॆं-मॆं करता रहा वॊ,माइक पॆ बस खड़ा,

हिरण की नज़र लगी, हालत कॊ भाँपनॆ !!३!!



खरगॊश कॊ निमॊनिया, हॊ गया ठंड सॆ,

काला कुत्ता लगा उसॆ,कम्बल मॆं ढ़ाँपनॆ !!४!!



सियार कॊ सियासती,…

Continue

Added by कवि - राज बुन्दॆली on February 21, 2013 at 10:30pm — 13 Comments

लघुकथा - बंदर

आजादी के समय देश में हर तरफ दंगे फैले हुए थे। गांधी जी बहुत दुखी थे। उनके दुख के दो कारण थे - एक दंगे, दूसरा उनके तीनों बंदर खो गए थे। बहुत तलाश किया लेकिन वे तीन न जाने कहां गायब हो गए थे।

एक दिन सुबह अपनी प्रार्थना सभा के बाद गांधी जी शहर की गलियों में घूम रहे थे कि अचानक उनकी निगाह एक मैदान पर पड़ी, जहां बंदरों की सभा हो रही थी। उत्सुकतावश गांधीजी करीब गए। उन्होंने देखा कि उनके तीनों बंदर मंचासीन हैं। उनकी खुशी का ठिकाना…

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Added by बृजेश नीरज on February 21, 2013 at 7:30am — 21 Comments

'माँ'

माँ..

मैं परिणाम तुम्हारे त्यागों का

वरदान तेरे संघर्षों का

सम्मान तुम्हारे भावों का

निष्कर्ष तेरे कर्तव्यों का

कोरी है रसना की परिपाटी,

क्या शब्द बुनूं तेरी ममता में...

तेरे,

संघर्षों से अस्तित्व मिला

तेरे भावों से उर प्रेम खिला

कर्तव्यों से पथ-दर्श मिला

कुछ यूं हि मुझे आकार मिला,

क्या प्रतिफल दूं तेरी ममता में...

तूने,

सृजन किया है दृढ़ता से

पर पाला अति कोमलता से

मोह त्यागकर ममता से

खुद जल,सींचा शीतलता… Continue

Added by Vindu Babu on February 21, 2013 at 6:11am — 17 Comments

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