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राज़ नवादवी: एक अंजान शायर का कलाम- ३५ (हस्रतें मरने लगी हैं घर बसानेकी हौले हौले)

निस्बतें यूँ बढ़ीं हमसे ज़माने की हौले हौले

खुलती गईं सब तहें अफ़साने की हौले हौले

 

हस्रतें मरने लगी हैं घर बसानेकी हौले हौले

कीमतें कुछ यूँ बढ़ीं आशियानेकी हौले हौले

 

बस्तियोंमें भी नशा-सा होने लगा है सरेशाम

दीवारें टूटने लगी हैं मयखाने की हौले हौले

 

फर्क मिट गए हस्पतालों और होटलोंके अब

सूरतें बदल गईं हैं शिफाखाने की हौले हौले

 

ये कोई प्यार नहीं हैकि दफअतन हो जाता

आदतें आईं दुनिया से निभाने की…

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Added by राज़ नवादवी on September 26, 2012 at 8:42am — 6 Comments

कवि का काम है

कवि का काम है।
जो नहीं कहा गया हो,
अब तक जमाने में,
वो कहा जाये।
पिछला कहा हुआ
सच रहे,बचा रहे।
उससे आगे कुछ कहा जाये।।
आदमी बोलता रहे
आदमी चुप न होने पाये।
पानी से पत्थर को काटा जाये।
खुद को बार-बार डाँटा जाये।।
दूसरों से प्यार किया जाये
आदमी को आदमी ही रहने दिया जाये।
आदमी बहुत बेहतर है।
मशीन भी बनाई जाये।
लेकिन ज्यादा न चलाई जाये।
अपनी आँखों में ही,
सबकी आँखों को लाया जाये।


।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।सुजान

Added by सूबे सिंह सुजान on September 25, 2012 at 11:30pm — 3 Comments

शीत करे राजनीति मनरेगा है हताश ........

शहरो के बीच बीच सड़कों के आसपास |

शीत के दुर्दिन का ढो रहे संत्रास , क्या करे क्या न करे फुटपाथ ||



सूरज की आँखों में कोहरे की चुभन रही

धुप के पैरो में मेहंदी की थूपन रही

शर्माती शाम आई छल गयी बाजारों को

समझ गए रिक्शे भी भीड़ के इशारों को

बच्चो के खेल सब कमरों में गए बिखर

ठिठक गए चौराहे भी खम्भों के इधर उधर

सुलग उठे हल्के हल्के बल्बों के मन उदास



शहरो के बीच बीच सड़कों के आसपास |

शीत के दुर्दिन का…

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Added by ajay sharma on September 25, 2012 at 11:30pm — No Comments

बाबु जी निबटा रहे अपना ओवर टाईम | |

मासिक वेतन मीत है पेंसन है सम्बन्ध |

जीवन अंधी खोह है न सूरज न चंद |



इअमाई लोन का है वेतन पर राज | |

टीडीएस इस कोढ़ को बना रहा है खाज|



कन्याये है कैजुअल लड़के अर्जित आवकाश | |

इक तरसती मोह को दूजा देता त्रास | |



काम सभी छोटे बड़े जब लगते है खास |

आकस्मिक की छुटिया करती है उपहास ||



आकस्मिक , अर्जित सभी जब हो गयी उपभोग |

मना रहे है छुटिया बना बना कर रोग | |



महगाई के बोझ से बोनस गया लुकाय |

ऐसे में एस्ग्रीसिया मरहम…

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Added by ajay sharma on September 25, 2012 at 10:30pm — 1 Comment

वो लोगों के दिलों में झाँकता है

वो लोगों के दिलों में झाँकता है |

वो कुछ ज्यादा ही लंबी हाँकता है ||

चला रहता है, वो कुछ खोजने को |

वो नाहक धुल-मिटटी, फाँकता है ||

न जाने, किस जहाँ में, है वो रहता |

वो अपनी, हद कभी न लाँघता है ||

परखता है, न जाने, किस तरह वो |

कसौटी कौन सी, पे जाँचता है ||

वो साँसों कि तरह, लेता है आहें ||

वो जब चादर, ग़मों कि, तानता है ||

वो कहता है कि, हर बन्दा, खुदा है |

खुदा को, कब खुदा, वो मानता है ||

'शशि' कुछ मशवरा, उस से ही ले लो |…

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Added by Shashi Mehra on September 25, 2012 at 8:30pm — 1 Comment

नशेमन है हमारा दिल जनाब हल्का हल्का सा

रखा जो आपने रुख पे नकाब हल्का हल्का सा

चमकता चाँद दिखता आफताब हल्का हल्का सा



झुकी पलकें उठी दीदाबराई करने के खातिर

हया छलकी बढाने को शबाब हल्का हल्का सा



दिया बोसा मेरे लब सिल गए सफाई जो मांगी

सवालों का हसीं आया जवाब हल्का हल्का सा…



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Added by SANDEEP KUMAR PATEL on September 25, 2012 at 11:34am — 2 Comments

आशियाना !

कभी कभी इस दिल में सिसक उठती थी,

की शायद वो दिन भी आयेंगे जब हम भी अपना घर बनायेंगे !

या फिर यूँ ही किराये के मकान में अपना सारा जीवन बिताएंगे !!



माता-पिता की जिम्मेदारियां  इतनी थी की ऐसा ख्वाब भी उन्हें नसीब न था..

कभी हम भी यही सोचा करते थे की क्या हम भी कभी उनका हाथ बटा पाएंगे !!



जिम्मेदारियों के साथ-साथ  बढ़ती महंगाई का साया था..

चाहते हुए भी कभी  घर का सपना बुनना शायद सपने की परछाई थी !

माँ की बीमारियों के साथ, पढाई का खर्च भी उठाना था…

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Added by Mukesh Sharma on September 24, 2012 at 11:06pm — 4 Comments

चट्टान

राह में पड़ी चट्टान ,
चढ़कर पार करूँ,या
इसे हटाकर नयी राह,
नया दस्तूर बना दूँ,
दोनी ही विकल्प,
खड़े सामने .......
...........................................
भविष्य की चिंता छोड़ ,
इतिहास बनाने हम .....
चले वर्तमान का ..
दामन थामने...
और जब चट्टान
हटा दी राह से ,
इतिहास पीछे खड़ा ,
सराह रहा था ..और
भविष्य सामने खड़ा
मुस्कुरा रहा था......!!!!!

रचनाकार -सतीश अग्निहोत्री

Added by Satish Agnihotri on September 24, 2012 at 10:30pm — 11 Comments

दिल्ली का हाल

दिल्ली का तुम हाल तो देखो

सरकार की,

जनता को दी

सौगात तो देखो

एक ओर है बढ़ी मंहगाई

उस पर फिर भ्रष्टाचार

की मार तो देखो

बिजली ने जो हल्ला बोला

छीन गया सबका

मुहँ निवाला

हो गया फिर डीजल,

पेट्रोल भी महँगा

सबके घर का

बजट बिगाड़ा,

केरोसीन फ्री जो

दिल्ली किया है

महँगा फिर

एल पी जी किया है

जोर का झटका

होले दिया है

सारी जनता को

बेहाल किया है

ऐसा तौहफा…

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Added by PHOOL SINGH on September 24, 2012 at 5:37pm — 3 Comments

"मन"

"मन"



सुबह सुबह

चिड़ियों का कलरव

झरने का कलकल

ठंडी हवाओं के झोंके लयबद्ध तान

कोयल की कूक

मुर्गे की बांग

ये सब संगीत है या शोर

प्रकृति का



ये सब मन की दशा पे निर्भर है

कभी ये सब संगीत लगता है

पटरी पे दौड़ती

सरपट लोहपथगामिनी का

चीखता निनाद भी

और कभी इक सुई का गिरना भी

कर्कश स्वर सा

शोर सा



मन स्वाभविक वृत्तियों में जकड़ा हुआ है

किन्तु है…

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Added by SANDEEP KUMAR PATEL on September 24, 2012 at 1:59pm — 10 Comments

नारी की महिमा

 
आड़े वक्त मिलता है, नारी का ही साथ 
आड़े वक्त पकडती है, नारी तेरा हाथ |
 
नारी के ही प्रेम से, होते सब दुख दूर,
नारी घर परिवार की, मदद करे भरपूर |
 
नारी से खिलता है, घर बगिया का…
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Added by लक्ष्मण रामानुज लडीवाला on September 24, 2012 at 11:30am — 24 Comments

छले गए जो अपनों से ......

जगते ही जिनको भोर मिली 

संघर्ष निशा का क्या जाने 

जो रहे समर से दूर 

मर्म इक बलिदानी का क्या जाने ...............


पर्वो में सिमट गयी यादे 

बलिदान शहीदों के सारे 

हो गए कैद किताबो में 

भारत माता के रखवारे 

जिस देश की खातिर खून दिया , वो देश नहीं अब पहचाने 

....जो रहे समर से दूर मर्म ...............



औरो की खातिर मर जाना 

जिनको केवल इक खेल लगे 

उनके ही त्याग…
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Added by ajay sharma on September 23, 2012 at 10:30pm — 9 Comments

सरकार नहीं यह चेत रही......

एक प्रयास 'मत्त सवैया' यानी 'राधेश्यामी छंद' का......



सरकार नहीं यह चेत रही, महँगाई जान जलाती है |

रोटी भी मुश्किल होय रही, दिन रात रुलाई आती है | |

हर पक्ष - विपक्ष नहीं अपना, सब अपना काम बनाते हैं |

हैं दुश्मन…

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Added by VISHAAL CHARCHCHIT on September 23, 2012 at 10:05pm — 10 Comments

तुम भी होगे शायद परिचित...

तुम भी होगे शायद परिचित

शब्द, मौन के इन झगड़ों से/

शब्द स्वयं को

मौन स्वयं को

किन्तु समर्पित

दोनों....तुमको



मौन कहे...तुम समझोगे

शब्द कहें...मैं समझा दूं

दोनों ही लेकिन ये चाहें...कैसे भी तुमको पा लूँ



मौन कहे तुम ना लौटोगे,

शब्द कहें आवाज़ तो दूं

दोनों ही पर चाह करें ये...हाथ तुम्हारा थाम तो लूँ



इसी शोक से, इसी शोर से

इन प्रश्नों के उठे जोर से

तुम भी व्यथित हुए तो होगे

मन भावों की इन रगड़ों… Continue

Added by Pushyamitra Upadhyay on September 23, 2012 at 9:53pm — 6 Comments

प्रलय

निश्चेष्ट धरा को

अपनी गोद में उठाए

समुद्र हाहाकार कर उठा

थरथराते होंठो से

अस्फुट से शब्द लहराए

अ...ब...और ...स...हा... न...हीं जा...ता..

वि...धा....ता!!

अशांत समुद्र ज्वार को

सम्भाल नहीं पा रहा था

फिर भी धरा को समझा रहा था

आओ सो जाते हैं

सब कुछ भूल जाते हैं

आदि से लेकर अंत तक

कहाँ रह पाए मर्यादित

मनुज की तृष्णा और लालसा से

सदैव रहे आच्छादित

आज जबकि काल की जिह्वा

लपलपा रही…

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Added by Gul Sarika Thakur on September 23, 2012 at 9:37pm — 5 Comments

राज़ नवादवी: एक अंजान शायर का कलाम- ३४ (न आइन्दा साथ जाए और न हाल साथ जाए )

न आइन्दा साथ जाए और न हाल साथ जाए

मैं जहां कहीं भी जाऊं तेरा ख्याल साथ जाए

 

न मग्रिबको देखता हूँ न मश्रिकको चाहता हूँ

न जनूब मेरी ज़मीं हो, न शिमाल साथ जाए

 

जो मज़ा है हमको तेरी फ़ुर्कत की सोजिशों में

वो मज़ा कहाँ मयस्सर जो विसाल साथ जाए

 

ये दुआ है मेरे दिल से कोई बद्दुआ न निकले

न कैदेहस्ती अजल हो कि मआल साथ जाए 

 

चलो इल्तेफात टूटी और गिले भी ख़त्म सारे

न जवाब कोई बाकी और न सवाल साथजाए…

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Added by राज़ नवादवी on September 23, 2012 at 4:36pm — 4 Comments

राज़ नवादवी: एक अंजान शायर का कलाम- ३३ (सिगरेटकी आदत सी अब खुद को जलाती है)

उम्र कब तलक गिराबांरेनफस को उठाती है

कमरेकी हवा भी अब खिड़कियों से जाती है 

 

माहोसाल गुज़रे दिलके अंधेरों में रहते रहते

तारीकियोंसे भी अब कोई रौशनीसी आती है 

 

तेरी चाहत हो गई बेजा किसी शगलकी तरह

सिगरेटकी आदत सी अब खुद को जलाती है

 

मुझमें भी हैं हसरतें इक आम इंसाँ की तरह

माना कि मैं एक बेमाया दिया हूँ पे बाती है

 

एक उज़लतअंगेज शाम तेरे गेसू में आ बसी  

एक अल्साई सुबह तेरी आँखोंमें मुस्कुराती है…

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Added by राज़ नवादवी on September 23, 2012 at 11:07am — 13 Comments

कवि , उसकी कविता और तुम !

कवि , उसकी कविता  और तुम !
 
हाँ उन कविताओं को भी रचा था उसने उसी वेदना के साथ
जिनपर तुमने तालियाँ नहीं बजायीं
औंर  कई कविताओं को रचकर वह देर तक हँसा था खुद पर
जिन्हें सुनकर तुम झूम उठे थे
जानते हो लिखना और सुनाना दो  अलग अलग विधाएं हैं
और …
Continue

Added by Abhinav Arun on September 23, 2012 at 9:30am — 18 Comments

पांच कवितायेँ

(नए मोड़) 



मोड़ राहो में नए अब जोड़ देता हूँ ,

कुछ पुराना कुछ नया सब छोड़ देता हूँ ,

चल रही यू ज़िन्दगी ज्यों पानी में लहरें हो उठी,

खुद को समझ अब एक लहर किनारे मोड़ देता हूँ ,

कुछ पुराना कुछ नया सब छोड़ देता हूँ ,

जो हैं समझते कुछ नहीं मैं वो बड़े नादान हैं,

नादानियो में एक समझ बस जोड़ देता हूँ ,

ना दिखे सूरत तुम्हारी लाख महंगा है तो…

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Added by Brajesh Kant Azad on September 23, 2012 at 12:00am — 5 Comments

दहलीज

जहाँ से यथार्थ की दहलीज

खत्म होती है

वहाँ से हसरतों का

सजा धजा बागीचा

शुरु होता है

जब भी कदम बढ़ाया

दहलीज फुफकार उठती है…

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Added by Gul Sarika Thakur on September 22, 2012 at 11:00pm — 11 Comments

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