पुस्तक गुण की खान है,सीखें रखती गोय
जो उसका प्रेमी बना ,जग में जय जय होय॥
सखी भरी है ज्ञान से,उर में रखती भाव
पढ़-पढ़ के हासिल करो,रहे न ज्ञान अभाव॥
इस पूरे संसार की,जो रखती है थाह
दुनियाँ में कैसे मिली,किसको कहाँ पनाह॥
वर्ण-वर्ण मिल बन गई,सुंदर सुखद किताब
मनसा वाचा कर्मणा ,रख लो खूब हिसाब ॥
गुणी जनों ने बैठ कर,लिखे सुघर मंतव्य
रुचि जिसकी जिसमें रहे, खोजो वो…
Added by kalpna mishra bajpai on March 11, 2015 at 10:00am — 9 Comments
बद -गुमानी थी मुझे क़िस्मत पे , मगर
मैं अज़ीज़ सबका था , ज़रूरत पे , मगर
हज़ार बार मुझे टोंका उसने , सलाह दी ,
ख़याल आया मुझे उसका , ठोकर पे , मगर
सुबह से हो गयी शाम और अब रात भी
पैर हैं कि थकने का , नाम नहीं लेते , मगर
वो खरीददार है , कोई क़ीमत भी दे सकता है
अभी आया है कहाँ , वो मेरी चौखट पे , मगर
करो गुस्सा या कि नाराज़ हो जायो "अजय"
सितम जो भी करो , करो खुद पे , मगर
अजय कुमार…
ContinueAdded by ajay sharma on March 10, 2015 at 11:59pm — 9 Comments
करें कोशिश सभी मिलकर हसीं दुनिया बना दें फिर
चलो जन्नत से भी बढ़कर जहां अपना बना दें फिर
लगाकर रेत में पौधे पसीने से चलो सींचें
ये सहरा सब्ज़ था पहले यहाँ बगिया बना दें फिर
मेरी मानो रियाज़त से बदल जाती है तकदीरें
हथेली की लकीरों में कोई नक्शा बना दें फिर
जलाकर खेत मेरे गाँव के बोले सियासतदां
इन्हें रोटी नहीं मिलती इसे मुद्दा बना दें फिर
दिलों के दरमियां कोई रुकावट क्यों रहे यारो
गिराकर इन…
ContinueAdded by khursheed khairadi on March 10, 2015 at 11:00pm — 20 Comments
Added by amita tiwari on March 10, 2015 at 10:45pm — 8 Comments
1222 1222 1222 1222
तेरी आँखों में डूबा था यही अपराध था मेरा
जरा सी बात पर तूने सजा-ए-मौत लिख डाली--1
ये बिखरी जुल्फ मैं तेरी ,सँवारू हाथ से अपने
मेरे जज्बात पर तूने सजा-ए- मौत लिख डाली--2
सिले हैं होठ क्यों तूने शिकायत की बजह क्या है
मिलन की रात पर तूने सजा-ए-मौत लिख डाली--3
तेरे होठों से होठों को जलाकर देख लेता मैं
मगर हर-बात पर तूने सजा-ए-मौत लिखडाली--4
बडी मुश्किल से गुजरा था खिजाओं से भरा मौसम …
Added by umesh katara on March 10, 2015 at 9:00pm — 14 Comments
112 212 221 212
बस कर ये सितम के,अब सजा न दे
हय! लम्बी उम्र की तू दुआ न दे।
अपनी सनम थोड़ी सी वफ़ा न दे
मुझको बेवफ़ाई की अदा न दे।
गुजरा वख्त लौटा है कभी क्या?
सुबहो शाम उसको तू सदा न दे।
कलमा नाम का तेरे पढ़ा करूँ
गरतू मोहब्बतों में दगा न दे।
इनसानियत को जो ना समझ सके
मुझको धर्म वो मेरे खुदा न दे।
रखके रू लिफ़ाफे में इश्क़ डुबो
ख़त मै वो जिसे साकी पता न…
ContinueAdded by Krish mishra 'jaan' gorakhpuri on March 10, 2015 at 4:35pm — 25 Comments
हास्य-व्यंग्य गीत,
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बड़ॆ गज़ब का झॊल, रॆ भैया,,,बड़ॆ गज़ब का झॊल,
बड़ॆ गज़ब का झॊल, रॆ भैया,,,बड़ॆ गज़ब का झॊल !!
बन्दर डण्डॆ लियॆ हाँथ मॆं,अब शॆरॊं कॊ हाँकॆं,
भूखी प्यासी गाय बँधी हैं, गधॆ पँजीरी फाँकॆं,
कॊयल कॊ अब कौन पूछता,कौवॆ हैं अनमॊल !! रॆ भैया,,,,
बड़ॆ गज़ब का झॊल,
बड़ॆ गज़ब का झॊल,,रॆ भैया,,बड़ॆ गज़ब का झॊल,,,,,
साँप नॆवलॆ मिल कर खॆलॆं, दॆखॊ आज कबड्डी,
पटक पटक कर गीदड़ तॊड़ी,आज बाघ की हड्डी,
ताक-झाँक मॆं लगी…
Added by कवि - राज बुन्दॆली on March 10, 2015 at 2:00pm — 21 Comments
" फासला " (लघुकथा)
"कादिर मियाँ आप होश में तो है शेख सादी को रिहा करवाना चाहते है, वतन की अमन परस्ती का भी ख्याल करो।" वसीम साहब कुछ तेज आवाज में हैरानी से बोले। जबाब में कादिर मियाँ का लहजा भी उखड़ गया। "वसीम साहब। 'शेख' के रिहा होने से हमारा कारोबारी फायदा होगा, उसकी नजरबंदी से हम पहले ही बहुत नुक्सान उठा चुके है। रही बात हालात की तो उस पर नजर रखना आपकी हुकूमत का काम है।"
"ठीक है कादिर मियाँ मगर दहशतगर्दी का क्या जो फिर से..........।" वसीम साहब की…
Added by VIRENDER VEER MEHTA on March 10, 2015 at 1:01pm — 16 Comments
मिटा दूँ या मिट जाऊँ
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कब से भटक रहा हूँ
कभी पानी हुये
तो कभी खुद को नमक किये
कोई तो मिले घुलनशील
या घोलक
घोल लूँ या घुल जाऊँ ,
समेट लूँ
अपने अस्तित्व में या
एक सार हो जाऊँ , किसी के अस्तित्व संग
विलीन कर दूँ ,
खुद को उसमें
या कर लूँ ,
उसको खुद में
भूल कर अपने होने का अहम
और भुला पाऊँ किसी को
उसके होने को
ख़त्म हो जाये दोनों का ठोस…
ContinueAdded by गिरिराज भंडारी on March 10, 2015 at 10:44am — 23 Comments
दिन भर खाक छान कर वो वापस घर लौट रहा था | चारो तरफ अँधेरा , सुनसान गलियां और गूंजती हुई बूटों की आवाज़ एक अजीब सा माहौल पैदा कर रहीं थीं | आज भी निराशा हाथ लगी थी उसे , कई जगह उसे रिजेक्ट कर दिया गया था | गली में घुसते ही घर के सामने उसे भीड़ दिखाई पड़ी , उसका दिल जोर जोर से धड़कने लगा | लगभग दौड़ते हुए वो घर में घुसा , देखा एक किनारे माँ ज़मीन पर निढाल पड़ी थी |
उसने झकझोरते हुए पूछा " क्या हुआ माँ ", तभी पड़ोसी चाचा की आवाज़ आई " तुम्हारे भाई को पुलिस पकड़कर ले गयी है "|
उलटे पांव भागा…
ContinueAdded by विनय कुमार on March 10, 2015 at 2:30am — 16 Comments
Added by Dr. Vijai Shanker on March 9, 2015 at 8:43pm — 26 Comments
किस तरह रच रहे हो तुम ये संसार
हे ईश्वर...
तुम भी तो पुरुष ही हो...
जानते हो तुमसे, हम पुरुषों से
किस कदर खौफ खाती हैं स्त्रियाँ
एक अप्रत्याशित आक्रमण
कभी भी हो सकता है उन पर
इस डर से भयभीत होकर
रखती हैं पर्स में हथौड़ी
कोई सलाह देता तो रख लेतीं मिर्च-पाऊडर
और बाज़ार बनाकर बेचता
कोई स्प्रे, कोई धारदार छोटा चाकू
कोई करेंट पैदा करने वाला यंत्र
या सरकारें ज़ारी करतीं ढेर सारे हेल्पलाइन…
ContinueAdded by anwar suhail on March 9, 2015 at 7:30pm — 5 Comments
हर जिंदगी मे एक गीत है प्रीति है
पीड़ा है प्यार है
विरह है साथ है
संगीत है साज है
आक्रोश है संतोष है
संतुष्टि है विरोध है
तूफान है स्रोत है
संयम है क्रोध है
पहाड़ है पौंध है
कविता है कहानी है
पर हर जिंदगी सामने कहाँ आ पाती है
कही भाषा नहीं कहीं कलम नहीं है
कहीं हाथ नहीं कही पावँ नहीं हैं
कहीं आँखें नहीं कहीं कान नहीं हैं
कहीं बेबशी मे जबान नहीं है.
मौलिक व अप्रकाशित
श्याम…
Added by Shyam Mathpal on March 9, 2015 at 4:00pm — 6 Comments
जिन्दगी भर खुशी की कमी सी रही
इक परत सी गमों की जमी सी रही
....
ढोल बजते रहे शहर में हर तरफ
पर मेरे आशियाँ में गमी सी रही
....
चाहकर भी न भूला तेरे प्यार को
तू हमेशा ही मुझमें रमी सी रही
....
नींद आती भी आँखों में कैसे भला
आँखों में आसुओं की नमी सी रही
....
कोई दस्तक बजेगी मेरे द्वार पर
सोचकर साँस मेरी थमी सी रही
उमेश कटारा
मौलिक व अप्रकाशित
Added by umesh katara on March 9, 2015 at 9:00am — 22 Comments
कैसा यह ---
जिसे विश्व कहता है
बलात्कारो का देश
जिसकी राजधानी को
रेप सिटी कहते हैं
जिस देश में आंकड़े बताते है
हर बीस मिनट पर
होता है एक रेप
जहां के सांसद और विधायक
अभियुक्त है
अनेक हत्या और बलात्कार के
जिन पर होती नहीं कोई कार्यवाही
जहां बलात्कार के बाद होती है हत्या
जहाँ तंदूर में जलाई जाती है नारी
जहाँ रेप के बाद निकली जाती है आँखे
जहाँ निर्भया की चीखती है अतडियाँ
जहा प्रतिबन्धित…
ContinueAdded by डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव on March 8, 2015 at 6:30pm — 26 Comments
१२२२ १२२२ १२२२ १२२२
कुम्हलाए हम तो जैसे सजर से पात झड़ जायें
यु दिल वीरां कि बिन तेरे चमन कोई उजड़ जायें
मिरी आव़ाज में है अब चहक उसके आ जाने की
सितारों आ गले लूँ लगा कि हम तुम अब बिछड़ जायें
कि बरसों बाद मिलके आज छोड़ो शर्म एहतियात
लबों से कह यु दो के अब लबों से आ के लड़ जायें
न मारे मौत ना जींस्त उबारे या ख़ुदा खैराँ
बला-ए-इश्क़ पीछे जिस किसी के हाय पड़ जायें
बना डाला…
ContinueAdded by Krish mishra 'jaan' gorakhpuri on March 8, 2015 at 5:30pm — 26 Comments
दुनिया हँसेगी
ये कैसा भय है
मात्र इस भय से
तुम उस रिश्ते पर
पूर्ण विराम लगाना चाहते हो
जिसका जन्म हुआ है
पावन भावनाओं के गर्भ से
क्या हँसी बाँटना पाप है
नहीं !
तो फिर दुनिया के हँसने से
क्या परहेज है तुम्हें
हँसने से
ईश्वर प्रसन्न होता है
आत्मा प्रसन्न होती है
अगर तुम्हारे और मेरे मिलन से
दुनिया हँसती है
तो इससे भली बात क्या होगी
तुम्हारे और मेरे लिये
आओ हम मिल जाते हैं
हमेशा के लिये
और दुनिया को हँसा देते…
Added by umesh katara on March 8, 2015 at 4:08pm — 16 Comments
नारी अब चेतन हुई ,बदला उसका रूप
हर मौसम हर समय वो ,लेती नए स्वरूप
लेती नए स्वरूप ,आसमां पर छा जाती
सहती हर संघर्ष ,दिलेरी खूब दिखाती
स्वाभिमान को जान,स्वयं पर जाती वारी
खूब कमाती मान ,आज कीशिक्षित नारी ॥
अप्रकाशित व मौलिक
कल्पना मिश्रा बाजपेई
Added by kalpna mishra bajpai on March 8, 2015 at 4:00pm — 12 Comments
“आज स्त्री दिवस है भाई, अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस, ८ मार्च है ना, समझे कुछ !”
“किस लिए मना रहें हैं भईया, और कबसे ?”
“ अरे यार एकदम बकलोल हो क्या ? अरे महिलाओं के लिए, उनकी क्षमता, सामाजिक, राजनीतिक व आर्थिक तरक़्क़ी दिलाने और उन महिलाओं को याद करने के लिए जिन्होंने महिलाओं के लिए प्रयास किए, अरे १९०९ से मना रहें हैं १०० साल से जयादा हो गए मनाते हुए, कुछ पढ़ते नहीं हो क्या ? !”
“तब भइया, रोज क्यों नहीं मनाते, देखिये न सभी स्त्रीयां सुबह से रात तक घर, परिवार,समाज का कितना…
ContinueAdded by Hari Prakash Dubey on March 8, 2015 at 3:16pm — 27 Comments
Added by Dr. Vijai Shanker on March 8, 2015 at 12:56pm — 15 Comments
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