Added by Dr. Vijai Shanker on March 8, 2015 at 12:56pm — 15 Comments
22--22—22--22--22—2
मैं तो हूँ फ़कीर मैं झूमता चला हूँ
आदाब कर खुदा को नाचता चला हूँ
मस्त हूँ ख़ुशी मैं कहूं इसे ही जीना
गम के भँवर मैं मस्त तैरता चला हूँ
मौत क्या बला है मैंने इसे न जाना
जिंदगी मिली है बस भागता चला हूँ
बड़ी ख़ाक छानी पहले हुआ परेशां
नसीब को नाज़ तले रौंदता चला हूँ (नाज़= कोमलता)
शक हो किसी के दिल में तो आजमाले
इस देह को न’अश को सौंपता चला हूँ (न’अश =…
ContinueAdded by Hari Prakash Dubey on March 8, 2015 at 11:06am — 12 Comments
१२२ १२२ २२१ २१२ २१२
हटाये जो काँटे तो रास्ते सुधरते गये
दुआएँ समझ कर हम झोलियों में भरते गये
कदम दर कदम जिस जिस मोड़ से गुजरते गये
बने तल्ख़ियों के घर टूटते बिखरते गये
खुदा जाने कैसे किस कांच के बने थे अजब
दरकते रहे पत्थर आईने सँवरते गये
दबाता रहा हमको झूठ आजमाता रहा
सदा सच पकड़ हम हालात से उबरते गये
ज़माना कसौटी पे रात दिन परखता रहा
तपे रोज जितना हम और भी निखरते…
ContinueAdded by rajesh kumari on March 8, 2015 at 9:34am — 25 Comments
2212 / 2212 / 2212 / 2212----- (इस्लाही ग़ज़ल) |
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दिल खोल के हँस ले कभी, ऐसी कहाँ तस्वीर है |
यारो चमन की आजकल इतनी कहाँ तकदीर… |
Added by मिथिलेश वामनकर on March 8, 2015 at 9:30am — 43 Comments
2122 2122 2122 212
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दुर्दिनों ने आँख का जब यार जाला हर लिया
तब दिखा है मयकशी ने इक शिवाला हर लिया
****
बाँटती थी कल तलक तो वो बहुत ही जोर दे
राह ने किस बात से अब पाँव छाला हर लिया
****
था सरीफों के लिए वो राह से भटकें नहीं
कोतवालो चोर से पहले ही ताला हर लिया
****
टोकता है कौन दिन को दे उजाला कुछ उसे
रात के हिस्से का जिसने सब उजाला हर लिया
****
था पुराना ही सही पर मान…
Added by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on March 8, 2015 at 5:00am — 14 Comments
रख दिए उसने
छोटी सी अटैची में
कुछ कपडे सहेज के
जो जरूरी हैं सफ़र के लिए
क्योंकि वह पत्नी है जानती है
मेरी आवश्यकताये
मै जानता हूँ
उसमे क्या होगा
एक जोड़ी कपडे, कच्छा-बनयाईन
परफ्यूम की शीशी, शेव का सामान
एक टूथ-ब्रश, जीभी और पेस्ट
छोटा सा कंघा, फकत एक शीशा
लंच का पैकेट भी
है कुछ मेरी
अपनी भी तैयारियां
पसंद का रूमाल सादा और…
ContinueAdded by डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव on March 7, 2015 at 8:30pm — 14 Comments
होली का हुड़दंग न खेला, तो क्या खेला जीवन मेें,
भौजी के संग रंग न खेला, तो क्या खेला जीवन में।
फगुआ की मदमस्त हवा में, जन-जन है बौराय रहा,
मानव तो मानव है, देखौ पादप भी बौराय रहा।
नगर-नगर और गली गली में होरियारे गोहराय रहे,
होली का हुड़दंग न खेला तो क्या खेला जीवन में।
पप्पू, रामू, मुन्नू, सोनू सबके हाथों में पिचकारी,
घर से निकली बबली गोरी बौछारों के सम्मुख हारी।
ढोल, नगाड़े, ताशे के संग होरियारों की टोली निकली,
रंग गुलाल गाल को रंगो हुड़दंगो की बोली…
Added by Atul Chandra Awsathi *अतुल* on March 7, 2015 at 11:35am — 4 Comments
2222 2112 2222
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पत्थर पर भी प्यार जताया करते हैं
इक नूतन संसार बसाया करते हैं
****
लज्जत तुमको यार तनिक तो देंगे ही
दिल से हम असआर पकाया करते हैं
****
तनहा हमको आप समझना लोगो मत
हम गम का दरवार लगाया करते हैं
****
कुबड़ी अपनी पीठ हुई मत पूछो क्यों
यादों का हम भार उठाया करते हैं
****
अश्कों से मत पूछ जिगर तक आजा तू
आँसू केवल सार बताया करते हैं
****
जीवन…
Added by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on March 7, 2015 at 11:03am — 13 Comments
सामने आ रे !
रात्रि-आकाश में अक्सर
तुम्हें निहारे
कहाँ छुपे हो प्रियम्वदा
होकर तारे ?
बचपन से कहते आए हैं
सब प्यारे
इस लोक से जाने वाले हो
जाते हैं तारे !
भीड़ भरे आकाश में नयन
खोज के हारें
शांतिप्रभा आर्त पुकार सुन लो
करो इशारे |
टूटता विश्वास का पुंज देख के
टूटते तारे
है व्याकुल हृदय की क्रन्दना
सामने आ रे !
मौलिक एवं अप्रकाशित
Added by somesh kumar on March 7, 2015 at 9:51am — 7 Comments
अँधेरा डरावना क्यों होता है , अब उसे पता चल गया था | दिन के उजाले में शरीफ दिखने वाला इंसान , अँधेरे में एक घिनौने शख़्श में तब्दील हो जाता था | कई महीने हो गए थे बर्दाश्त करते हुए | पति से बताने की कोशिश भी की थी लेकिन वो तो अपने बड़े भाई के खिलाफ सुनने को भी तैयार नहीं था | कई बार उसने सोचा कि सासू से बता दे लेकिन उसे पता था कि उसकी बात कोई नहीं सुनेगा |
चार साल पहले आई थी वो शादी करके इस घर में | जेठानी बहुत सीधी और समझदार थी पर घर में सिर्फ जेठ का ही हुक्म चलता था | उनके हर निर्णय में…
Added by विनय कुमार on March 7, 2015 at 2:47am — 12 Comments
(अविजित राय की हत्या जैसे कायरतापूर्ण कृत्य ने दहला दिया...दुनिया भर के अल्पसंख्यकों को समर्पित कविता)
चेहरे-मोहरे
चाल-ढाल से जब
पहचाना न जा सका
तब पूछने लगा वो नाम
और मैं बचना चाह रहा बताने से नाम
फिर यूँ ही टालने के लिए
लिया ऐसा नाम
जो मिलता-जुलता हो उससे कुछ-कुछ
जिसे कहने से
बचा जा सके पहचान लिए जाने से
लेकिन ये क्या
अब पूछा जा…
Added by anwar suhail on March 6, 2015 at 10:03pm — 9 Comments
एक बार फिर शर्माजी ने जेब में हाँथ डाल कर चेक किया , गुलाल की पुड़िया पड़ी हुई थी | चटख लाल रंग का गुलाल ख़रीदा था उन्होंने ऑफिस आते हुए और सोच रखा था कि आज तो लगा के ही रहेंगे | उम्र तो खैर उनकी ५५ पार कर चुकी थी लेकिन पता नहीं क्यों इस बार होली खेलने की इच्छा प्रबल हो गयी थी उनकी |
५ महीना पहले ही ट्रांसफर होकर आये थे इस ऑफिस में | आते ही देखा कई नयी उम्र की लड़कियां थीं यहाँ | कहाँ पिछला ऑफिस , जहाँ सिर्फ पुरुष ही थे और वो भी काफी खडूस किस्म के | लेकिन यहाँ , एक तो उनके विभाग में भी थी |…
Added by विनय कुमार on March 6, 2015 at 1:26pm — 12 Comments
Added by Dr. Vijai Shanker on March 6, 2015 at 1:09pm — 16 Comments
अभिव्यक्तियाँ
किस्से कहानी कविताएँ
सब अभिव्यक्तियाँ जीवन की
कहाँ तक साधू अपेक्षायें
गुरुजन गुणीजन की ?
मन की बेकली है
लिखने का प्रथम उदेश्शय
हो जाऊ सफल जो मानकों
पर चलूँ /दूँ गहन संदेश |
बिन पथों से डिगे
होंगी कैसे राहे प्रशस्त
नव सृजन की ?
अलंकारों से छंदों को साधना
क्या संकुचित बस यहीं तक
साहित्य की आराधना
अर्थ क्या रह जाएगा
जो ना हो इनमें
जीवन-तत्व अवशिष्ट…
ContinueAdded by somesh kumar on March 6, 2015 at 8:54am — 5 Comments
आओ होली मिलन कर लें
जला बुराईयों को
अच्छाईयों को दिल में भर लें
मगर देखो तुम
होली की हुड़दंग में
रंग मुहब्बत का
ना इस तरहां लगाया करो
खेलो होली रंगों से
मगर दिल तक
ना आया करो
भांग का नशा है
थोड़ा संभल जाया करो
होली तो भूल जाओगे
अगले दिन
मगर दिल पे लगे रंगों को
जन्म भर ना भुला पाओगे
और हमें यूँ हीं ताउम्र
बे-वजह तड़पाओगे !!
मौलिक व अप्रकाशित
Added by Mohan Sethi 'इंतज़ार' on March 6, 2015 at 4:48am — 6 Comments
सुन री सखी फिर फागुन आयो
याद पिया की बहुत रुलायो
इत उत डोलूँ, भेद ना खोलूँ
बैरन नैना भरि-भरि आयो
सुन री सखी फिर ........
जब से गये परदेश पिया जी
भेजे न इक संदेश जिया की
इक-इक पलछिन गिन के बितायो
सुन री सखी फिर ........
ननदी हँसती जिठनी हँसती
दे ताली देवरनियो हँसती
सौतनिया संग पिया भरमायो
सुन री सखी फिर .....
खूब अबीर गुलाल उड़ायें
प्रेम रंग, सब रंग इतराएँ
बिरहा की अगनी ने मोहे जलायो
का पिया ने मोहे,…
Added by Meena Pathak on March 5, 2015 at 11:42pm — 10 Comments
रंगों के पर्व होली पर सभी मित्रों को हार्दिक शुभकामनायें -जगदीश पंकज
उड़ने लगा गुलाल,
अबीर हवाओं में
रंगों का त्यौहार
रंगीली होली है
मस्त हवा के
झोंकों ने अंगड़ाई ले
अंगों पर कैसी
मदिरा बरसाई है
मौसम की रंगीन
फुहारों से खिलकर
बजी बावरे मन में
अब शहनाई है
लगा नाचने रोम-रोम
तरुणाई का
मौसम ने मस्ती की
गठरी खोली है
रंगों की बौछारों ने
संकेत किया
रिश्तों की अनुकूल
चुहल अंगनाई में
जीजा-साली ,कहीं…
Added by JAGDISH PRASAD JEND PANKAJ on March 5, 2015 at 11:20pm — 5 Comments
......होली......
होली है त्यौहार रंगों का ,
आओ तन मन रंग लें .
हो खुशियों की बौछार ,
आओ तन मन रंग लें.
सबका हो हर अरमान पूरा
ना सपना रहे अधूरा
जिसकी जितनी चाहत हो
उतना उसको मिल जाये
बस खुशियों की बारिस हो
और तन मन खिल जाये
प्यार प्यार बस प्यार रहे
सारी दुनिया के भीतर
और किसी भी भाव का
हो ना पाए असर
इस होली पर इसी भाव को
बस अपने मन में पालें
प्यार छोड़ कर…
Added by Ganga Dhar Sharma 'Hindustan' on March 5, 2015 at 10:30pm — 3 Comments
मधुशाले भी बोल रहे.... होली आई होली आई
भंग घुटेगी रस गन्ने में होली आई होली आई
है सरकारी फ़रमान ....
प्यारे बन्द रहेगी दुकान
साकी अकेली प्याले अकेले
हथ जोड़ करें आह्वान
आजा ..आ जाओ श्रीमान
बोतल... अद्दी पउआ ले जा
रम भिस्की ए दउआ ले जा
भर लो... सारो मकान
ओ बन्द रहेगी दुकान
मयखाने भी बोल रहे होली आई होली आई
रंग घुलेंगे दंग रहेंगे होली आई होली आई
इक दिन पहले प्यारे ले जा
ज़ाम जहां के न्यारे ले जा
बम भोले का प्रसाद…
Added by anand murthy on March 5, 2015 at 10:08pm — 3 Comments
आया फ़ाग का मौैसम मुझे सपने सजाने दो
दिल के पास जो रहता उसी के पास जाने दो
तू मेरे रंग में रंग जा मैं तेरे रंग को पा लूँ
प्रियतम ने प्रिया से आज मन की बात खोली है
अधूरा श्याम राधा बिन ,राधा श्याम की हो ली
दिलों में प्यार भरने को आयी आज फिर होली
होली की असीम शुभकामनायें
तन से तन मिला लो अब मन से मन भी मिल जाये
प्रियतम ने प्रिया से आज मन की बात खोली है
ले के हाथ हाथों में, दिल से दिल मिला लो आज
यारों कब मिले मौका अब छोड़ों ना कि होली…
Added by Madan Mohan saxena on March 5, 2015 at 5:27pm — 2 Comments
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