Added by दिनेश कुमार on March 15, 2015 at 3:59pm — 12 Comments
Added by दिनेश कुमार on March 15, 2015 at 1:19pm — 10 Comments
रुख़सती पे उनकी आँखों में नमी अच्छी लगी
ज्यूं दूर बादलों को धरा की गमी अच्छी लगी
तबस्सुम देख के मचली लबों पे एक दूसरे के
पाक इरादों में छिपी उनकी कमी अच्छी लगी
असीम…
ContinueAdded by anand murthy on March 15, 2015 at 11:30am — 8 Comments
१२२२ १२२२ १२२
शिकायत हो न जाये आसमाँ से
अँधेरा अब उठा ले इस जहाँ से
अगर चुप आग है, तो कह धुआँ तू
शनासाई ये कैसी इस मकां से
तेरे कूचे के पत्थर से हसद है
शिकायत क्यूँ रहे तब कहकशाँ से
सुकूने ज़िन्दगी अब चाहता हूँ
बहुत उकता गया हूँ इम्तिहाँ से
कभी थे फूल से रिश्ते मगर अब
तगाफ़ुल से हुये हैं वे गिराँ से
परिंदों के परों ने की बग़ावत
सवाल अब पूछ्ना…
ContinueAdded by गिरिराज भंडारी on March 15, 2015 at 10:00am — 25 Comments
1222 1222 1222 1222
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जहाँ में वक्त के माफिक हवायें भी बदलती हैं
नजर पर मत भरोसा कर निगाहें भी बदलती हैं
..
बहारों से लगाकर दिल अभी पगला गया है तू
खिजाँ से दोस्ती करले फिजायें भी बदलती हैं
..
लगे जो आज अपना सा पता क्या कब मुकर जाये
नये जब यार मिल जायें , दुआयें भी बदलती हैं
..
कभी चाँदी ,कभी सोना ,कभी नोटों,के बिस्तर पर
मुहब्बत तड-फडाती है ,वफायें भी बदलती हैं…
Added by umesh katara on March 15, 2015 at 9:30am — 16 Comments
Added by gumnaam pithoragarhi on March 15, 2015 at 8:51am — 8 Comments
2122 1212 22
रोज किसके यहाँ तू* जाता है,
राज अब कौन सा छुपाता है !!
है इमां साथ में अगर तेरे,
साथ वो दूर तक निभाता है !!
जब रहे साथ साथ हम दोनों
प्यार का गीत तब ही* भाता है !!
देखता हूँ अजीब से सपने,
नीद को कौन आ चुराता है !!
आज बनना सभी को* है टाटा,
ख्व़ाब बुनना तो सबको* आता है !!
शोक इतने नहीं किया करते,
बस यही जिंदगी का* नाता है…
ContinueAdded by Alok Mittal on March 14, 2015 at 4:00pm — 11 Comments
1222 1222 1222 1222
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सितारे चाँद सूरज तो समय से ही निकलते हैं
दियों की कमनसीबी से अँधेरे रोज छलते हैं
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किसी को देखकर गिरता सँभल जाते समझ वाले
जिन्हें लत ठोकरों की हो कहाँ गिरकर सभलते हैं
****
खुशी घर में उन्हीं से है खुदा की नेमतें वो तो
न डाँटा कर कभी उनको अगर बच्चे मचलते हैं
****
कहा है सच बुजुर्गों ने करें सब मनचली रूहें
किए बदनाम तन जाते कि कहकर ये…
Added by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on March 14, 2015 at 11:10am — 23 Comments
मेरी ज़िन्दगी तुम हो ,मेरी बंदगी तुम हो
मेरे आँखों की पानी तुम हो
मेरे ख्वाबों की रानी तुम हो
मेरे दर्द की कहानी तुम हो
हाँ तुम हो ,
मेरी ज़िन्दगी तुम हो ,मेरी बंदगी तुम हो |
तुझसा कोई न आये
गर आये तो फिर न जाये
तेरे बिन जिया न जाये
ये दिल पाये जिसे पाये ,तुम हो
हाँ तुम हो
मेरी ज़िन्दगी तुम हो ,मेरी बंदगी तुम हो |
हर जगह से था मैं हारा
था मैं वक़्त का मारा
मुझे मिला…
ContinueAdded by maharshi tripathi on March 13, 2015 at 10:42pm — 11 Comments
Added by Dr. Vijai Shanker on March 13, 2015 at 9:30pm — 16 Comments
“इस सन्डे कहाँ पार्टी करें कोमल”? नील ने पूछा. “यू लाइक मॉल चलते हैं” “अरे यार, फिर वहीँ.... बोर हो गए हमेशा मॉल मॉल में जाते कोई नई जगह... “फिर उस भूतिया महल में चलें? है हिम्मत’? बीच में ही बात काटती हुई आस्था बोली| “ना बाबा ना मैं तो नहीं जा सकती तू जा सकती है”?
“मैं भूतों में विश्वास नहीं करती हम आज के युग में जीते हैं क्या पुराने लोगों जैसी घिसी पिटी बातें करते हो और फिर हमारे साथ विश्वास भी तो है उस पर विश्वास करना चाहिए सब भूतों को ठिकाने लगा देगा हाहाहा”..…
ContinueAdded by rajesh kumari on March 13, 2015 at 7:30pm — 24 Comments
| ११२१२ ११२१२ ११२१२ ११२१२ कामिल - मुतफ़ाइलुन |
| हक़ के लिये लड़ते सभी झगड़ा कभी थमता नहीं | |
| शक है वहीँ डर है कहीं प्रिय पास है समता नहीं | |
| जब साथ है हर बात है कटु… |
Added by Shyam Narain Verma on March 13, 2015 at 12:03pm — 17 Comments
साल पहले विद्यालय दफ्तर में
“सर, मैं अंदर आ सकती हूँ ?”
“बिल्कुल !” मि.सुरेश एक बार उस नवयुवती को ऊपर से नीचे तक देखते हैं और फिर उसकी तरफ प्रश्नसूचक निगाह से देखते हैं |
“सर ,मुझे इस स्कूल में नियुक्ति मिली है |” वो बोली
“बहुत बढ़िया !बैठो अभी प्रधानाचार्य आते हैं तो आपको ज्वाइन करवाते हैं |” प्रफुल्लतापूर्वक मि.सुरेश बोले
“वैसे कब और कहाँ से की है बी.एड.?” उन्होंने अगला सवाल किया
“इसी साल,कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय से - -“उसने बड़ी सौम्यता से जवाब…
ContinueAdded by somesh kumar on March 13, 2015 at 11:18am — 17 Comments
ताप घृणा का शीतल करदे सीला माँ
इस ज्वाला को तू जल करदे सीला माँ
इस मन में मद दावानल सा फैला है
करुणा-नद की कलकल करदे सीला माँ
सूख गया है नेह ह्रदय का ईर्ष्या से
इस काँटे को कोंपल करदे सीला माँ
प्यास लबों पर अंगारे सी दहके है
हर पत्थर को छागल करदे सीला माँ
सूरज सर पर तपता है दोपहरी में
सर पर अपना करतल करदे सीला माँ
दूध दही हो जाता है शीतलता से
भाप जमा कर बादल करदे सीला…
ContinueAdded by khursheed khairadi on March 13, 2015 at 11:13am — 15 Comments
मैं तो शब्द पिरो रही थी यूँ ही
सोच रही थी ख्यालों में खोकर
क्या ऐसे ही चलती है ज़िन्दगी
जैसे अनजाने बनती हैं कवितायें
झरने की तरह प्रवाह सी बहती
बस हर शब्द बरसता है बूँद सा
टपकता है मन के बादलों से कही
और जुड़ जुड़ कर बनता जाता है
एक मिसरा..एक शेर..एक मतला
कभी दर्द में डूबा हुआ सियाह लफ्ज़
कभी खुशी की चाशनी में डूबा हुआ.
कभी मिलन की आस में शरमाया हुआ
कभी विरह की तड़प में टूटता हुआ शब्द
एहसासों की चादर में…
ContinueAdded by Nidhi Agrawal on March 13, 2015 at 9:30am — 10 Comments
सपनो को बेच रहा वादों की मंडी में
शोर बहुत है बस्ती में सुनता नहीं कोई
वो वहीँ खड़ा चल चित्र दिखा रहा
रंगीन चश्मे की दुनियां समझता नहीं कोई
बाहँ थाम कर जिसे उसने आगे बढ़ाया
कन्धों पर चढ़ गया वो देखता नहीं कोई
मशाल लेकर भीड़ में आगे चला था जो
वो अब बदल गया टोकता नहीं कोई
चार दीवारें खड़ी कर बन गया मकां
आपस में लड़ते रहे,मोहब्बत जगाता नहीं कोई
झंडे किताब के चर्चे यों ही होते…
ContinueAdded by Shyam Mathpal on March 13, 2015 at 9:07am — 10 Comments
मैं तो प्रेम रस से
बादलों की तरह
भरा हुआ
बेचैन था
तुम पर बरसने को
मगर
तुमने पुकारा ही नहीं मुझको
सूखी
प्यासी
व्याकुल
दरकती हुयी जमीन बनकर
मेरा बरस जाना
जरूरी थी
क्योंकि
मैं भरा चुका था
अन्दर से
पूरी तरह
मेरी हदों से बाहर
निकला प्रेम रस
आँखों की कोरों से फूटकर
अश्रुधार बनकर
और बरसता रहा
उम्र भर
उमेश कटारा
मौलिक व अप्रकाशित
Added by umesh katara on March 13, 2015 at 7:24am — 19 Comments
“ यह कुकिंग गैस के, यह राशन वाले के, यह बच्चों की स्कूल फी और अभी तो बिजली का बिल आने वाला है. न जाने इस बार....” सुनीता माह का बजट बना ही रही थी कि, तपाक से घर में झाडू-पौंछा कर रही लक्ष्मीबाई पूछ बैठी..
“ बीबी जी.. आप हर माह बिजली के बिल को लेकर क्यूँ परेशान हो जाती हो..?”
“अरे!! बिजली का बिल ही तो झटके मार देता है, पूरे महीने के बजट पर. क्यूँ तुम लोग भी तो खूब टी.व्ही. पंखे चलाते हो, तुम्हे फर्क नहीं पड़ता क्या..?”
“ अरे!! बीबी जी.. टी.व्ही. पंखा ही क्या. हम तो खाना भी…
ContinueAdded by जितेन्द्र पस्टारिया on March 12, 2015 at 6:22pm — 36 Comments
बह्र : २२ २२ २२ २२ २२ २२ २२
वक़्त कसाई के हाथों मैं इतनी बार कटा हूँ
जाने कितने टुकड़ों में किस किस के साथ गया हूँ
हल्के आघातों से भी मैं टूट बिखर जाता हूँ
इतनी बार हुआ हुँ ठंडा इतनी बार तपा हूँ
जाने क्या आकर्षण, क्या जादू होता है इनमें
झूठे वादों की कीमत पर मैं हर बार बिका हूँ
अब दोनों में कोई अन्तर समझ नहीं आता है
सुख में दुख में आँसू बनकर इतनी बार बहा हूँ
मुझमें ही शैतान कहीं है और…
ContinueAdded by धर्मेन्द्र कुमार सिंह on March 12, 2015 at 4:40pm — 24 Comments
ना हाथों में कंगन,
न पैरों में पायल,
ना कानो में बाली,
न माथे पे बिंदियाँ
कुदरत ने सजाया है उसे!!
न बनावट,ना सजावट
न दिखावट,ना मिलावट
गाँव की मिट्टी ने सवारा है उसे!!
ये बांकपन ,ये लड़कपन
चंचल अदाओं में भोलापन,
जवानी के चेहरे में हय!....
हँसता हुआ बचपन!!
वख्त ने जैसे....संजोया है उसे!!
उसकी बातें सुनती हैं तितलियाँ
उसीके गीत गाती हैं खामोशियाँ
हँसी पे जिसकी फ़सल लेती है…
Added by Krish mishra 'jaan' gorakhpuri on March 12, 2015 at 3:38pm — 20 Comments
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