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कविता

शब्द उड़ते हैं कल्पनाओ में तो कविता बनती है,
चाँद होता है जब घटाओ में तो कविता बनती है,
यु तो हो जाती हैं बस राहतें दवा जो काम करे,
दर्द होता है जब दवाओ में तो कविता बनती…
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Added by Brajesh Kant Azad on September 14, 2012 at 12:00am — 5 Comments

समाज सुधारक

भ्रष्टता के इस युग में

हर कोई समाज सुधारक है,

देखता है, विचारता है

समाज में व्याप्त घृणित बुराइयों को,

करता है प्रतिकार पुरजोर तरीके से

हर एक बुराई का,

लड़ता है सच के लिए,

बावजूद, क्यों अंत नहीं होता

किसी भी बुराई का,

बल्कि बढ़ती जा रही

बुराइयाँ, दिन-प्रतिदिन,

वजह मात्र एक,

हरेक मनुष्य सुधारता औरों को,

नहीं दिखती किसी को भी

कमियाँ अपनी,

करते नजरअंदाज

अपने अवगुणों को,

कैसे सुधरेगा समाज

जब…

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Added by कुमार गौरव अजीतेन्दु on September 13, 2012 at 10:30pm — 10 Comments

भारत माता की वाणी हिंदी से जुडा पावन अवसर....

भारत माता की वाणी

हिंदी से जुडा

पावन अवसर,

आओ करें संकल्प

करेंगे इसका प्रयोग

हर स्तर पर...



हम रहें कहीं भी

नहीं भूलते 

जैसे अपनी माँ को,

याद रखेंगे वैसे ही

हम हिंदी की गरिमा को...



इन्टरनेट पर

जहाँ कहीं भी

अंग्रेजी हो मजबूरी,

वहाँ छोड़कर

हो प्रयास कि

हिंदी से हो कम…

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Added by VISHAAL CHARCHCHIT on September 13, 2012 at 10:00pm — 6 Comments

यादों का सफ़र

******************************
वो चले थे सिर्फ दो कदम
हम कदम बढ़ाते चले गए
वादे किये थे उसने मगर
हम वादे निभाते चले गए
उसकी सादगी के साज पर
हम गीत गाते चले गए
उसकी मुस्कुराने की शर्त पर
हम जख्म खाते चले गए
भुला बैठे हैं वो हमको शायद
मगर हमें याद वो आते चले गए
******************************

Added by Sachin Dev on September 13, 2012 at 5:30pm — 7 Comments


सदस्य कार्यकारिणी
शीर्षक सुझाइए

आज पैंतीस साल बाद उसकी आवाज सुनी 

पर पहचान नहीं पाई 
फोन पर वार्ता लाप कुछ इस तरह हुआ 
स्नेहा ---हेल्लो राज  पहचान कौन बोल रही हूँ 
मेरा उत्तर ---सारी कौन बोल रही हो ??
स्नेहा --अच्छा अब पहचानती भी नहीं पैंतीस  साल पहले याद कर स्कूल में कालेज में एक साथ घूमते थे 
मेरा जबाब --माफ़ करना नहीं पहचान पा रही हूँ |
स्नेहा ---अरे स्नेहा को भूल गई 
मैं उछल पड़ी बोली ---अरे तू…
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Added by rajesh kumari on September 13, 2012 at 3:30pm — 23 Comments

जानूं नहीं

जानूं नहीं ये मेरी उलझन

कहां ठिकाना पाएगी

कबतक जीवन यूं ही मुझको

चौराहों तक लाएगी



जिसको भी आवाज लगाई

वही मिला घबराया सा

घनी धुंध की परत लपेटे

सुबह भी था कुम्‍हलाया सा



जाने कौन गढ़े जा रहा

दीवारों पर ठिगने साए

खोह-कन्‍‍दरा-तमस छुपाके

नीले पड़ गए हमसाए



स्‍वर्ण छुआ तो राख मिली

राई-रत्‍ती भी खाक मिली

बस कोहरे ही रह गए हमारे

फूलों में भी आग मिली



जो करीब थे दूर हुए

सुख के पल कर्पूर हुए

शेष बची जो थोड़ी…

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Added by राजेश 'मृदु' on September 13, 2012 at 2:00pm — 4 Comments


मुख्य प्रबंधक
लघु कथा : उत्तरदायित्व

उत्तरदायित्व



कार्यालय में कुछ ज्यादा ही गहमागहमी का माहौल था । नये साहब प्रभार ग्रहण कर रहे थे जो कड़े अनुशासन और अपने सख्त स्वभाव के लिए जाने जाते हैं | प्रभार ग्रहण करने के साथ ही उन्होंने पहला सवाल दागा - "कार्यालय की कार्यावधि क्या है ? और, सभी कर्मी कब तक कार्यालय आ जाते हैं |"



"सर कार्यालय अवधि सुबह १० बजे से शायं ५ बजे तक है और सभी कर्मचारी अमूमन ११ बजे तक आ ही जाते हैं."



"अब ऐसा नहीं चलेगा, कल से सबकी उपस्थिति सुबह १० बजे देखी जायेगी…

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Added by Er. Ganesh Jee "Bagi" on September 13, 2012 at 1:30pm — 36 Comments

आस की कश्तियाँ

मायूसियों ने आज फिर दस्तक दी

खयालो के बंद दरवाजो से निकल

मन के आँगन में बिखरने को

बेताब सी मायूसियाँ

लेकिन आस की एक लौ

जिससे रोशन है दिल की बस्तियाँ

मुस्कुरा के बोली बुझने ना देना मुझे

जीवन में आयेंगे कठोर थपेड़े

वक़्त की आंधियों में

हमने मिटती देखी हैं

इन थपेड़ो की गिरफ्त में कई हस्तियाँ

जिंदगी की उलझनों से…

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Added by Kiran Arya on September 13, 2012 at 1:30pm — 20 Comments

इस युग में कैसे संभव हो फिर तेरा और मेरा मिलना

न सूरज पश्चिम से ऊगे , न पूरव में होगा ढलना

इस युग में कैसे संभव हो फिर तेरा और मेरा मिलना



तुम फेसबुक की टाइम लाइन

मैं ऑरकुट बहुत पुराना हूँ

तुम काजू किशमिश के जैसे

मैं तो बस चना का दाना हूँ

तुम अमरीका के डालर…

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Added by SANDEEP KUMAR PATEL on September 13, 2012 at 12:14pm — 16 Comments

हिंदी को बचाइए : घनाक्षरी

एक राष्ट्र एक टोली, एक भाव एक बोली,

हिंदी से ही हो सकेगी, आप जान जाइए |

भाषा ये सनातनी है, शीलवाली, पावनी है,

शोला है सुहावनी है, विश्व को बताइए |

पूर्वजों ने भी कहा है, हिंदी ने बड़ा सहा है,

हिंदी को बढ़ावा दे के, विद्वता दिखाइए |…

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Added by कुमार गौरव अजीतेन्दु on September 13, 2012 at 10:51am — 14 Comments

ये हादसे.......

ये  हादसे -

महज

अखबार की सुर्खियाँ

 पढ़कर इन्हें

जगती नहीं  संवेदना

 बेस्वाद नहीं होतीं

 चाय की चुस्कियां

ये हादसे............

देख- सुन

अत्याचार अनाचार

कछुवे की भांति निर्विकार

सर घुसा लेते हैं

विश्रांति की खोह में

सुस्ताते दो पल

और भूल जाते सब कुछ

जीने के मोह में

पाषाण बन जाती हैं

अनुभूतियाँ

ये..................

नुक्कड़,  चौराहों में

दफ्तर, मुह्ल्लों में

उछलते हैं जब

  मुद्दे यही

तो…

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Added by Vinita Shukla on September 13, 2012 at 9:17am — 7 Comments

औलाद की कुर्बानियां न यूँ दी गयी होती .

औलाद की कुर्बानियां न यूँ दी गयी होती .

शबनम का क़तरा थी मासूम अबलखा ,

वहशी दरिन्दे के वो चंगुल में फंस गयी .

चाह थी मन में छू लूं आकाश मैं उड़कर ,

कट गए पर पिंजरे में उलझकर रह गयी .

थी अज़ीज़ सभी को घर की थी लाड़ली ,

अब्ज़ा की तरह पाला था माँ-बाप ने मिलकर .

आई थी आंधी समझ लिया तन-परवर उन्होंने ,

तहक़ीक में तबाह्कुन वो निकल गयी .

महफूज़ समझते थे वे अजीज़ी का फ़रदा ,

तवज्जह नहीं देते थे तजवीज़ बड़ों की .

जो कह गयी जा-ब-जा हमसे ये तवातुर…

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Added by shalini kaushik on September 13, 2012 at 1:21am — 2 Comments

पाँच दोहे आँसू भरे

राजनीति के मंच पर, चढ़ गए आज दबंग

फूट फूट कर रो रहे, ध्वज के तीनों रंग



गधा जो देखन मैं चला, गधा न मिलया मोय

तब इक नेता ने कहा, मुझसा गधा न कोय



उजली खादी पहन के, करते काले काम…

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Added by Albela Khatri on September 12, 2012 at 9:30pm — 18 Comments

अमृत ही बरसाय ----(दोहे)



अमृत ही बरसाय
 (संशोधित दोहे)


 
खबरे पढ़ पढ़ जग मुआ, ज्ञानी भया न कोय,
छंदों में जब मन लगे,तब मन निर्मल होय //   
 
बालक को धन्धे लगा, अमीर बना न कोय …
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Added by लक्ष्मण रामानुज लडीवाला on September 12, 2012 at 6:00pm — 16 Comments

चंद हाइकु

कई मोड़ हैं

मेरी हथेली पर

हांफते हुए

 

ख्‍वाब में डूबे

कुछ चश्‍में भी तो हैं

कांपते हुए

 

नीले पड़ाव

धुंध में फिसलते ...

सैलाब भी हैं

 

सुर्ख परियां

वजू करते हाथ

हुबाब भी हैं

 

कम भी नहीं

इतनी खामोशियां

जीने के लिए

 

बेदर्द जख्‍म

काफी है इतना ही

अभी के…

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Added by राजेश 'मृदु' on September 12, 2012 at 3:30pm — 6 Comments

"लिखते लिखते"

"लिखते लिखते"



जमीं पे चाँद तारे

सूरज 

सब हैं दिखते

लिखते लिखते

नदियाँ, पहाड़, झरने

हाथी-घोड़ा

शेर, भालू, हिरने

कभी सजर

कभी…

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Added by SANDEEP KUMAR PATEL on September 12, 2012 at 1:56pm — 11 Comments

हाथ मलते रह गए

पडौसी खावे मलाई, हम ताकत ही रहे,

शरनागाह बना देश, हम देखते ही रहे |



नीतियाँ उदारवादी, हमको ही खा रही,

स्वार्थ की राजनीति, सबको जला रही |



स्पष्ट निति के अभाव में,अभाव में जी रहे,

सहिष्णुता लोकतंत्र में, तपत हम सोना रहे |



समय हमें सिखलाएगा, काँटों पर चलना,

शहीद की शहादत को, अक्षुण बनाए रखना |



शीतल कैलाश हिम पर, है शिव शंकर बैठे,

पवित्र गंगा भी धारित, है जटा में समेटे |



त्रिनेत्र से भष्म कर दे, इसका…

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Added by लक्ष्मण रामानुज लडीवाला on September 12, 2012 at 1:00pm — 2 Comments

अपनी अदा

अपनी अदा 
 

आज हम ग़म से वाकिफ हैं,असर तेरी दुआ का है

हर हाल में जीते हम यह अपनी अदा है दोस्त



हक़ दोस्ती-ओ-मुहब्बत का अदा हमको भी करना है

हम हँसते हुए कुर्वान हुए यह अपनी वफ़ा है दोस्त



दुनियाँ यकीं करे न करे तुम ज़रूर कर लेना

हमने तुमपे ऐतवार किया यह अपनी ख़ता है…

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Added by Deepak Sharma Kuluvi on September 12, 2012 at 11:30am — 8 Comments


सदस्य कार्यकारिणी
मेहँदी वाले हाथ

पलकों पे टिकी शबनम को सुखा ले साथिया

धूप के जलते टुकड़े को बुला ले साथिया 

 

जुल्म ढा रही हैं मुझ पर  सेहरे की लडियां

इस  चाँद पर से बादल को हटा ले साथिया 

 

 बिछ गए फूल खुद  टूट कर  राहों में तेरी

 अब कैसे कोई  दिल को संभाले साथिया 

 

बिजली न गिर जाए तेरे दामन पे कोई 

कर दे मेरी तकदीर के हवाले साथिया 

 

देख के सुर्ख आँचल में  लहराती शम्मा 

दे देंगे जान इश्क में मतवाले साथिया 

 

यहाँ जल…

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Added by rajesh kumari on September 12, 2012 at 11:00am — 17 Comments

ग़ज़ल

इन्साफ जो मिल जाय तो दावत की बात कर  

मुंसिफ के सामने न रियायत की बात कर

 

तूने किया है जो भी हमें कुछ गिला नहीं

ऐ यार अब तो दिल से मुहब्बत की बात कर

 

गर खैर चाहता है तो बच्चों को भी पढ़ा

आलिम के सामने न जहालत की बात कर

 

अपने ही छोड़ देते तो गैरों से क्या गिला

सब हैं यहाँ ज़हीन सलामत की बात कर

 

'अम्बर' भी आज प्यार की धरती पे आ बसा 

जुल्मो सितम को भूल के जन्नत की बात कर

--अम्बरीष श्रीवास्तव  

Added by Er. Ambarish Srivastava on September 12, 2012 at 10:30am — 26 Comments

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