For any Query/Feedback/Suggestion related to OBO, please contact:- admin@openbooksonline.com & contact2obo@gmail.com, you may also call on 09872568228(योगराज प्रभाकर)/09431288405(गणेश जी "बागी")

August 2014 Blog Posts (158)


सदस्य कार्यकारिणी
आइडिया (लघु कथा )

‘’बहुत खुश दिख रही हो लाजो” गाँव से आई लाजो की सहेली कनिया ने कहा|

“हाँ हाँ क्यूँ नहीं बेटा बहू काम पर चले जाते हैं नौकरानी सब  काम कर जाती है बस घर में महारानी की तरह रहती हूँ” लाजो ने जबाब दिया|

कुछ देर की शान्ति के बाद फिर लाजो बोली”ये सुख तेरा ही तो दिया हुआ है उस दिन न तू उस बुढ़िया से पिंड छुडाने का आइडिया देती तो आगे भी न जाने कितने सालों तक मुझे उसकी गंद  उठानी पड़ती और मेरा रोहित दादी की सेवा के लिए मुझे वहीँ सड़ने के लिए छोड़े रखता, नरक बनी हुई थी मेरी…

Continue

Added by rajesh kumari on August 31, 2014 at 1:00pm — 18 Comments

खुश खबरी--

" बेटा , अब दूसरे विवाह की तैयारी करो , इससे तो कुछ होना नहीं है " |
" लेकिन माँ , दूसरे में भी क्या भरोसा , थोड़ा और सबर करो " , और बात आई गयी हो गयी |
कुछ महीनों बाद खुश खबरी थी , माँ बहुत प्रसन्न हुई |
और बेटे का दोस्त जो कुछ दिनों पहले आया था , अचानक वापस चला गया |

मौलिक एवम अप्रकाशित

Added by विनय कुमार on August 31, 2014 at 2:57am — 6 Comments

क्षणिकाएँ -1--डा० विजय शंकर

क्षणिकाएँ

आकर्षित करती हैं , लुभाती हैं ,

क्षण भर को चौंका भी देतीं हैं ,

स्तब्ध भी कर देती हैं , बस .

फिर हम अपने - अपने

महाकाव्य में लौट आते हैं||



* * * * * * * * * * * * * * * * * *

हर व्यथा को हर कथा को

हर छोटी बड़ी बात को

साहित्य में छाप देने भर से

समस्याओं का अंत नहीं होता ,

समस्याओं से जूझना पड़ता है

उनकें हल यूँ नहीं मिलते

उन्हें ढूंढना पड़ता है ||



* * * * * * * * * * * * * * * * * *

सोहबत का असर होता… Continue

Added by Dr. Vijai Shanker on August 30, 2014 at 11:00am — 11 Comments

शुरुआत....(लघुकथा)

रमेश अपने बेटे व् त्यौहार पर आई हुई अपनी बहन के बेटे को, लेकर बाजार गया था, उसकी बहन कल अपने घर जाने वाली है. सोचा शायद उसके बेटे को कुछ दिलवा दिया जाये, उसे कुछ सस्ते से कपडे  एक दुकान से दिला लाया है. बहन के बेटे ने भी निसंकोच उन्हें स्वीकार कर लिया.  बाजार में रमेश का बेटा जिद करता रहा पर ,  उसने   अपने बेटे को कुछ नही दिलवाया है ...

“ पापा..!! मुझे तो वो ही वाले ब्रांड के कपडे चाहिए जो मैंने पसंद किये थे, कुछ भी हो उसी दुकान से दिलवाना पड़ेगा आपको..” रमेश के बेटे ने,  रमेश…

Continue

Added by जितेन्द्र पस्टारिया on August 29, 2014 at 2:08pm — 8 Comments

क्या ये हमारी संस्कृति के अंग नहीं ?....

क्या आपको याद है ... आपने आखरी बार कब डुगडुगी की आवाज सुनी थी ?कब अपनी गली या घर के रास्ते में  एक छोटी सी सांवली  लड़की को दो मामूली से बांस के फट्टियों के बीच एक पतली सी रस्सी पर चलते देखा और फिर  हैरतअंगेज गुलाटी मारते, बिना किसी सुरक्षा इन्तमाजात के | सोचिये , दिमाग पर जोर डालिए !!!

       चलिए आज मैं याद दिलाती हूँ | याद है बचपन में जब स्कुल से आकर आप अपना बस्ता फेंक ,माँ के हिदायत पर हाथ मुँह धोकर ,कपडें बदल कर  अपने दोस्तों के साथ झटपट खेलने जाने के मुड में होते थे तब…

Continue

Added by MAHIMA SHREE on August 28, 2014 at 6:34pm — 15 Comments

घर और मायका (लघुकथा)

किचेन से रश्मि की आवाज आई ...... भाभी जरा मेरे कपड़े धुल देना, खाना बनाने के बाद धुलुंगी तो काॅलेज के लिए देर हो जायेगी! इतना सुनते ही सुमन का जैसे पारा गरम हो गया ...... बड़बड़ाते हुए बोली... सभी ने जैसे नौकर समझ लिया है, कुछ ना कुछ करने के लिए बोलते ही रहते हैं, आराम से टी0वी0 भी नही देखने देतें ........ देखिये जी ! अगर इसी तरह चलता रहा तो मैं मायके चली जाउँगी, मेरी भाभी बहुत अच्छी हैं, घर का सारा काम करती हैं,  वहाँ मुझे कुछ नही करना पड़ता, और मैं आराम से टी0वी0…

Continue

Added by Pawan Kumar on August 28, 2014 at 6:06pm — 8 Comments

चूस हाथों के अंगूठे नन्हा बचपन सो गया

२१२२    २१२२     २१२२      २१२ 

 

वो कहें सागर  में मिलकर आज दरिया खो गया 

हम कहें सागर से दरिया मिल के सागर हो गया 

 

सोच कुछ तेरी जुदा है सोच कुछ मेरी अलग

सोचिये सोचों का अंतर आज  कैसा हो…

Continue

Added by Dr Ashutosh Mishra on August 28, 2014 at 9:57am — 17 Comments

एक ऐसी सास -- डा० विजय शंकर

श्वसुर के निधन पर रात भर की यात्रा पूरी करके वह घर में घुसी ही थी कि एक बार फिर जोर से रोना शुरू हो गया . वह अपनी सास से लिपट के रोये जा रही थी और उन्हें सांत्वना भी देती जा रही थीं . रिश्तेदार दोनों को समझाने, चुप कराने में लगे थे . थोड़ी देर बाद सब आगे की व्यवस्था में लग गए पर उसके आंसू जैसे रुक ही नहीं रहे थे , रोते रोते बोली , " यह कल ही होना था , कल मेरा जन्मदिन था . अब मैं अपना जन्मदिन कभी नहीं मनाऊँगीं " . सास अब तक कुछ संयत हो चुकी थीं , बड़े प्यार से बहू का सर सहलाते हुए बोलीं, " नहीं… Continue

Added by Dr. Vijai Shanker on August 27, 2014 at 11:22pm — 10 Comments

बोझ

सारी उमर मैं बोझ उठाता रहा जिनका

उन आल-औलादों की वफ़ा गौर कीजिये

मरने के बाद मेरा बोझ ले के यूँ चले

मानो निजात पा गए हों सारे बोझ से

मैंने समझ के फूल जिनके बोझ को सहा

छाती से लगाया जिन्हें अपना ही जानकर

वे ही बारात ले के बड़ी धूम धाम से

बाजे के साथ मेरा बोझ फेंकने चले

अपने लिए ही बोझ था मै खुद हयात में

अल्लाह ये तेरा भला कैसा मजाक है

ज्योही जरा हल्का हुआ मै मरकर बेखबर

खातिर मै दूसरों के एक बोझ बन गया

लगती थी बोझ जिन्दगी उनके बिना…

Continue

Added by डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव on August 27, 2014 at 10:02pm — 13 Comments

सिकुड़ा हुआ समय

पृथ्वी की धुरी के इशारों पर

यूं तो नाचता है समय...

विस्मृत क्षण हो गए धूमिल

कई दिनों से गुम था समय...

कितने ही वर्षों से ढूंढता

पूछता था जिससे वो कहता

“मेरे पास तो नहीं है समय...”…

Continue

Added by Chandresh Kumar Chhatlani on August 27, 2014 at 6:51pm — 15 Comments

राह देखी सूर्य की भर रात हमने - ( गजल ) - लक्ष्मण धामी ‘मुसाफिर’

2122     2122     2122

*************************

सिंधु  मथते  कर पड़ा  छाला हमारे

हाथ  आया  विष  भरा प्याला हमारे

***

धूर्तता  अपनी  छिपाने  के लिए क्यों

देवताओं    दोष    मढ़   डाला  हमारे

***

भाग्य सुख को ले चला जाने कहाँ फिर

डाल  कर  यूँ  द्वार  पर  ताला  हमारे

***

हर  तरफ  फैले हुए हैं दुख के बंजर

खेत  सुख  के  पड़ गया पाला हमारे

***

राह  देखी  सूर्य  की  भर   रात हमने

इसलिए  तन  पर  लगा काला…

Continue

Added by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on August 27, 2014 at 11:14am — 10 Comments

याद बहुत ही आती है तू

याद बहुत ही आती है तू, जब से हुई पराई।

कोयल सी कुहका करती थी, घर में सोन चि‍राई।

अनुभव हुआ एक दि‍न तेरी, जब हो गई वि‍दाई।

अमरबेल सी पाली थी, इक दि‍न में हुई पराई।

परि‍यों सी प्‍यारी गुड़ि‍या को जा वि‍देश परणाई।।

याद बहुत ही आती है तू---------

लाख प्रयास कि‍ये समझाया, मन को कि‍सी तरह से।

बरस न जायें बहलाया, दृग घन को कि‍सी तरह से।

वि‍दा समय बेटी को हमने, कुल की रीत सि‍खार्इ।

दोनों घर की लाज रहे बस, तेरी सुनें…

Continue

Added by Dr. Gopal Krishna Bhatt 'Aakul' on August 27, 2014 at 8:00am — 5 Comments

ग़ज़ल/ इस धरती के नाम लिखूंगा हरियाली मैं (डॉ. राकेश जोशी)

जब भी आऊंगा खाकर तुमसे गाली मैं

इस धरती के नाम लिखूंगा हरियाली मैं

 

छोटे-छोटे बच्चों की उंगली थामूंगा

आसमान तक दौड़ लगाऊंगा खाली मैं

 

हरेक महल के हर पत्थर से बात करूंगा

मज़दूरों के लिए बजाऊंगा ताली मैं

 

जिस दिन तेरे बच्चे भी पढ़ने जाएंगे

उस दिन तुझे कहूँगा 'हैप्पी दीवाली' मैं

 

खेतों में सपने फिर से उगने लगते हैं

जब भी करता हूँ बातें फसलों वाली…

Continue

Added by Dr. Rakesh Joshi on August 26, 2014 at 9:46pm — 7 Comments


सदस्य कार्यकारिणी
ग़रीब के हाथ से निवाला न छीनिए (ग़ज़ल 'राज')

12122 12122 1212

कभी लबों तक पँहुचता प्याला न छीनिए

 ग़रीब के हाथ से निवाला न छीनिए  

 

यतीम का बचपना निराला न छीनिए

जमीन, दरगाह या शिवाला न छीनिए

 

बड़ी नहीं कोई चीज़ तहजीब से यहाँ      

नक़ाब, सिर पे ढका दुशाला न छीनिए

 

नसीब में क्या लिखा यहाँ कौन जानता          

किसी जवाँ दीप का उजाला न छीनिए

 

समान हक़ है मिला सभी को पढ़ाई का

गरीब बच्चों से  पाठ शाला न छीनिए 

 

जुड़े खुदा से…

Continue

Added by rajesh kumari on August 26, 2014 at 5:00pm — 31 Comments

हाइकु

प्रेम धुन

प्रिय मोहन

नाचत मन राधा

वेणुका धुन

विरह

टूटती आस

साजन घर नाहीं

फागुन मास…

Continue

Added by Pawan Kumar on August 26, 2014 at 1:30pm — 12 Comments

पुण्‍य (लघुकथा)/ रवि प्रभाकर

शहर के अंतरराष्ट्रीय ख्याति प्राप्त डाॅक्टर के नेतृत्व में एक बहुत बड़ा ‘मुफ्त मैडीकल कैंप’ आयोजित किया गया। जहाँ मुफ्त चैकअप करवाने वालों का हजूम उमड़ आया था। डाॅक्टर साहिब व उनकी टीम को निस्वार्थ भाव से सैकड़ों मरीजों का चैकअप करते देख सभी उनकी मुक्त कंठ से सराहना कर रहे थे।



उसी…
Continue

Added by Ravi Prabhakar on August 26, 2014 at 11:30am — 10 Comments

प्रगति आत्मबल से होती है --डा० विजय शंकर

सड़क आने जाने के लिए है ,

आवागमन को गति देने के लिए है

गढ्ढे प्रक्रिया की नैसर्गिक देन हैं ,

गत्यावरोध गति नियंत्रण का विधान है ,

व्यवधान ही प्रगति का सही समाधान है ॥



इंटरनेट , विश्व व्यापी सम्पर्क सूत्र है ,

दुनिया को कंप्यूटर के माध्यम से

पल भर में जोड़ देता है , युग की देन है ,

हमारा संपर्क सूत्र प्रायः टूटा रहता है ,

क्यों , यही तो हमारे लिए शोध का विषय है ,

नेटवाला बताएगा, फोन लाइन चेक कराओ ,

फोन वाला कहेगा , नेट चेक कराओ… Continue

Added by Dr. Vijai Shanker on August 26, 2014 at 9:44am — 8 Comments

यह जीवन महावटवृक्ष है

यह जीवन महावटवृक्ष है।

सोलह संस्‍कारों से संतृप्‍त

सोलह शृंगारों से अभिभूत है

देवता भी जिसके लिए लालायित

धरा पर यह वह कल्‍पवृक्ष है।

यह जीवन महावटवृक्ष है।।

सुख-दु:ख के हरित पीत पत्र

आशा का संदेश लिए पुष्‍प पत्र

माया-मोह का जटाजूट यत्र-तत्र

लोक-लाज, मर्यादा,

कुटुम्‍ब, कर्तव्‍य, कर्म,

आतिथ्‍य, जीवन-मरण

अपने-पराये, सान्निध्‍य, संत समागम,

भूत-भविष्‍य में लिपटी आकांक्षा,

जिस में छिपा…

Continue

Added by Dr. Gopal Krishna Bhatt 'Aakul' on August 26, 2014 at 8:00am — 5 Comments


सदस्य कार्यकारिणी
दर सारे दीवार हो गए ( गीत ) गिरिराज भंडारी

दर सारे दीवार हो गए

**********************

सारी खिड़की बंद लगीं अब 

दर सारे दीवार हो गये

 

भौतिकता की अति चाहत में

सब सिमटे अपने अपने में

खिंची लकीरें हर आँगन में  

हर घर देखो , चार हो गये

 

सारी खिड़की बंद लगीं अब 

दर सारे दीवार हो गए

 

पुत्र कमाता है विदेश में

पुत्री तो ससुराल हो गयी

सब तन्हा कोने कोने में

तनहा सब त्यौहार हो गए

 

सारी खिड़की बंद लगीं अब 

दर सारे…

Continue

Added by गिरिराज भंडारी on August 25, 2014 at 8:30pm — 34 Comments

बस बात करें हम हिन्‍दी की

बस बात करें हम हिन्‍दी की।

न चंद्रबिन्‍दु और बिन्‍दी की।

ना बहसें, तर्क, दलीलें दें,

हम हिन्‍दुस्‍तानी, हिन्‍दी की।।

हों घर-घर बातें हिन्‍दी की।

ना हिन्‍दू-मुस्लिम-सिन्‍धी की।

बस सर्वोपरि सम्‍मान करें,

हम हिन्‍दुस्‍तानी, हिन्‍दी की।।

पथ-पथ प्रख्‍याति हो हिन्‍दी की।

ना जात-पाँत हो हिन्‍दी की।

बस जन जाग्रति का यज्ञ करें,

हम हिन्‍दुस्‍तानी, हिन्‍दी की।

एक धर्म संस्‍कृति हिन्‍दी…

Continue

Added by Dr. Gopal Krishna Bhatt 'Aakul' on August 25, 2014 at 7:44pm — 6 Comments

Monthly Archives

2019

2018

2017

2016

2015

2014

2013

2012

2011

2010

1999

1970

कृपया ध्यान दे...

आवश्यक सूचना:-

1-सभी सदस्यों से अनुरोध है कि कृपया मौलिक व अप्रकाशित रचना ही पोस्ट करें,पूर्व प्रकाशित रचनाओं का अनुमोदन नही किया जायेगा, रचना के अंत में "मौलिक व अप्रकाशित" लिखना अनिवार्य है । अधिक जानकारी हेतु नियम देखे

2-ओपन बुक्स ऑनलाइन परिवार यदि आपको अच्छा लगा तो अपने मित्रो और शुभचिंतको को इस परिवार से जोड़ने हेतु यहाँ क्लिक कर आमंत्रण भेजे |

3-यदि आप अपने ओ बी ओ पर विडियो, फोटो या चैट सुविधा का लाभ नहीं ले पा रहे हो तो आप अपने सिस्टम पर फ्लैश प्लयेर यहाँ क्लिक कर डाउनलोड करे और फिर रन करा दे |

4-OBO नि:शुल्क विज्ञापन योजना (अधिक जानकारी हेतु क्लिक करे)

5-"सुझाव एवं शिकायत" दर्ज करने हेतु यहाँ क्लिक करे |

6-Download OBO Android App Here

हिन्दी टाइप

New  देवनागरी (हिंदी) टाइप करने हेतु दो साधन...

साधन - 1

साधन - 2

Latest Activity

लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' commented on Sushil Sarna's blog post दोहे ... एक भाव कई रूप ... नर से नारी माँगती ..
"आ. भाई सुशील जी, सुंदर दोहे हुए हैं। हार्दिक बधाई।"
3 hours ago
लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' commented on सतविन्द्र कुमार राणा's blog post पत्थरों पे हैं इल्ज़ाम झूठे सभी-गजल
"आ. भाई सतविंद्र जी, अच्छा प्रयास हुआ है । हार्दिक बधाई।"
3 hours ago
Sushil Sarna commented on Sheikh Shahzad Usmani's blog post 'कागा उवाच' (लघुकथा) :
"आदरणीय शेख़ उस्मानी साहिब, आदाब .... बहुत ही सुंदर और सारगर्भित लघु कथा हुई है। अपडेट रहना ही पड़ेगा…"
3 hours ago
Sushil Sarna commented on गिरधारी सिंह गहलोत 'तुरंत ''s blog post रंग-ए-रुख़सार निखरने का सबब क्या आखिर(३९ )
"आदरणीय गहलोत जी खूबसूरत अशआर की ग़ज़ल के लिए दिल से बधाई।"
3 hours ago
Sushil Sarna commented on विनय कुमार's blog post चिट्ठियाँ --
"आदरणीय विनय कुमार जी चिट्ठियों के माध्यम से अंतस भावों का सुंदर चित्रण हुआ है। हार्दिक बधाई।"
3 hours ago
Sushil Sarna commented on बृजेश कुमार 'ब्रज''s blog post नवगीत-वेदना ने नेत्र खोले-बृजेश कुमार 'ब्रज'
"आदरणीय बृजेश जी सुंदर भावों को चित्रित करते इस नवगीत के लिए हार्दिक बधाई।"
3 hours ago
लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' commented on बृजेश कुमार 'ब्रज''s blog post नवगीत-वेदना ने नेत्र खोले-बृजेश कुमार 'ब्रज'
"आ. भाई बृजेश जी, सुंदर नवगीत हुआ है । हार्दिक बधाई।"
3 hours ago
लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' commented on लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर''s blog post कैसे बाँचें पीढ़ियाँ, रंगों का इतिहास - दोहे ( लक्ष्मण धामी' मुसाफिर' )
"आ. भाई समर जी, सादर अभिवादन। दोहों पर उत्साहवर्धन के लिए हार्दिक आभार।  क्या " इधर "…"
3 hours ago
Sushil Sarna commented on Sushil Sarna's blog post होली के दोहे :
"आदरणीय समर कबीर साहिब आदाब , सृजन के भावों को आत्मीय स्नेह से अलंकृत करने का दिल से आभार। सर आपके…"
3 hours ago
विनय कुमार commented on विनय कुमार's blog post चिट्ठियाँ --
"बहुत बहुत आभार आ मुहतरम बृजेश कुमार 'ब्रज साहब"
7 hours ago
विनय कुमार commented on विनय कुमार's blog post एक और कसम-व्यंग्य
"बहुत बहुत आभार आ मुहतरम समर कबीर साहब"
7 hours ago
विनय कुमार commented on विनय कुमार's blog post चिट्ठियाँ --
"बहुत बहुत आभार आ मुहतरम समर कबीर साहब"
7 hours ago

© 2019   Created by Admin.   Powered by

Badges  |  Report an Issue  |  Terms of Service