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एक गीत- निर्मल नदीम

मेरे घर का सूना आँगन सूना - सूना ही रह जाता

अगर तुम्हारे पग पायल की मधुर मधुर झंकार न होती।



तुमने पाँव रखा जैसे ही

मुर्दे दिल में जान आ गयी;

ज़र्द फूल के रुखसारों पर

लाली बनकर ख़ुशी छा गयी,

यह चांदनी जलन बन जाती, ठण्डी छाँव चुभन बन जाती,

अगर न तुम जुल्फ़ें लहराती, शीतल पड़ी फुहार न होती।



जलने लगे स्वतः दीपक सब

लगा महकने कोना - कोना,

कंकड़ - पत्थर, हीरे - मोती,

लगे मृत्तिका सच्चा सोना,

मुक्त गगन के चाँद सितारे, उतर गए आँगन में… Continue

Added by Nirmal Nadeem on March 15, 2015 at 6:18pm — 16 Comments

ग़ज़ल -- आरज़ू दिल की दिल में दबी रह गई ....

212-212-212-212



आरज़ू दिल की दिल में दबी रह गई

ज़िन्दगी में मेरी कुछ कमी रह गई



ज़ख़्म नासूर मेरे सभी बन गए

दिल में अब आँसुओं की नदी रह गई



ज़ेहन के आईनों पर था पर्दा पड़ा

मुझ से कमज़ोरी मेरी छुपी रह गई



आस्तीनों में ख़ंजर छुपाए हुए

दोस्ती तो फ़क़त नाम की रह गई



बागबाँ ही चमन का है दुश्मन बना

सहमी सहमी यहाँ हर कली रह गई



अब न चिड़ियों का घर में बसेरा रहा

चहचहाहट की पीछे सदी रह गई



अब के बेमौसमी जो हुईं… Continue

Added by दिनेश कुमार on March 15, 2015 at 3:59pm — 12 Comments

ग़ज़ल -- मैंने ग़ज़लों में उतारी ज़िन्दगी...

2122-2122-212



'इम्तिहानों में गुज़ारी ज़िन्दगी'

इस तरह हमने सँवारी ज़िन्दगी



सर्दियों की धूप थी पहले मगर

फ़स्ल-ए-बाराँ अब हमारी ज़िन्दगी



बाज के पंजों ने मसला देर तक

एक चिड़िया आज हारी ज़िन्दगी



मैकदे की राह दिखलाई इसे

बाम-ए-ग़म से यूँ उतारी ज़िन्दगी



सर पे चढ़ कर बोलता इसका नशा

सबको अपनी जाँ से प्यारी ज़िन्दगी



जो बनाते दूसरों का आशियाँ

वो रहें सड़कों पे सारी ज़िन्दगी



इसके मजमे की कोई सीमा… Continue

Added by दिनेश कुमार on March 15, 2015 at 1:19pm — 10 Comments

रुख़सती पे उनकी...............

रुख़सती पे उनकी आँखों में नमी अच्छी लगी

ज्यूं दूर बादलों को धरा की गमी अच्छी लगी

तबस्सुम देख के मचली लबों पे एक दूसरे के

पाक इरादों में छिपी उनकी कमी अच्छी लगी

असीम…

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Added by anand murthy on March 15, 2015 at 11:30am — 8 Comments


सदस्य कार्यकारिणी
"कहूँ कुछ और कुछ निकले जुबां से “ एक तरही ग़ज़ल ( गिरिराज भंडारी )

१२२२        १२२२      १२२ 

शिकायत हो न जाये आसमाँ से

अँधेरा अब उठा ले इस जहाँ से   

 

अगर चुप आग है, तो कह धुआँ तू  

शनासाई ये कैसी इस मकां से 

 

तेरे कूचे के पत्थर से हसद है

शिकायत क्यूँ रहे तब कहकशाँ से

 

सुकूने ज़िन्दगी अब चाहता हूँ  

बहुत उकता गया हूँ इम्तिहाँ से

 

कभी थे फूल से रिश्ते मगर अब   

तगाफ़ुल से हुये हैं वे गिराँ से

 

परिंदों के परों ने की बग़ावत

सवाल अब पूछ्ना…

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Added by गिरिराज भंडारी on March 15, 2015 at 10:00am — 25 Comments

मगर क्यों रोज फिर मेरी दवायें भी बदलती हैं

1222 1222 1222 1222

---------------------------------------------------------------

जहाँ में वक्त के माफिक हवायें भी बदलती हैं

नजर पर मत भरोसा कर निगाहें भी बदलती हैं

..

बहारों से लगाकर दिल अभी पगला गया है तू

खिजाँ से दोस्ती करले फिजायें भी बदलती हैं

..

लगे जो आज अपना सा पता क्या कब मुकर जाये

नये जब यार मिल जायें , दुआयें भी बदलती हैं

..

कभी चाँदी ,कभी सोना ,कभी नोटों,के बिस्तर पर

मुहब्बत तड-फडाती है ,वफायें भी बदलती हैं…

Continue

Added by umesh katara on March 15, 2015 at 9:30am — 16 Comments

ग़ज़ल ------------------गुमनाम पिथौरागढ़ी

शहर में इक अजनबी घूमता है
शहर में इक अजनबी बेपता है

बंद हैं क्यों डर दिलों के यहाँ पर
शहर में इक अजनबी पूछता है

मजहबों के नाम पर मर रहे क्यों
शहर में इक अजनबी सोचता है

गाँव से लाया मुहब्बत आज देखो
शहर में इक अजनबी बांटता है

नाम वाले हैं कहाँ आज गुमनाम
शहर में इक अजनबी लापता है

गुमनाम पिथौरागढ़ी

मौलिक व अप्रकाशित

Added by gumnaam pithoragarhi on March 15, 2015 at 8:51am — 8 Comments

ग़ज़ल (राज अब कौन सा छुपाता है )

2122 1212 22

 

रोज किसके यहाँ तू* जाता है,

राज अब कौन सा छुपाता है !!

 

है इमां साथ में अगर तेरे,

साथ वो दूर तक निभाता है !!

 

जब रहे साथ साथ हम दोनों

प्यार का गीत तब ही* भाता है !!

 

देखता हूँ अजीब से सपने,

नीद को कौन आ चुराता है !!

 

आज बनना सभी को* है टाटा,

ख्व़ाब बुनना तो सबको* आता है !!

 

शोक इतने  नहीं किया करते,

बस यही जिंदगी का* नाता है…

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Added by Alok Mittal on March 14, 2015 at 4:00pm — 11 Comments

ये विष ही उगलते हैं - लक्ष्मण धामी ’मुसाफिर’

1222   1222   1222 1222

*****************************

सितारे  चाँद  सूरज  तो  समय से ही निकलते हैं

दियों  की  कमनसीबी  से   अँधेरे  रोज  छलते हैं

****

किसी को देखकर गिरता  सँभल जाते समझ वाले

जिन्हें लत ठोकरों की हो  कहाँ  गिरकर सभलते हैं

****

खुशी  घर  में उन्हीं  से है  खुदा  की नेमतें वो तो

न डाँटा  कर  कभी उनको अगर बच्चे  मचलते हैं

****

कहा  है  सच   बुजुर्गों  ने  करें  सब  मनचली रूहें

किए बदनाम तन जाते कि कहकर ये…

Continue

Added by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on March 14, 2015 at 11:10am — 23 Comments

मेरी ज़िन्दगी तुम हो ,मेरी बंदगी तुम हो

मेरी ज़िन्दगी तुम हो ,मेरी बंदगी तुम हो 

मेरे आँखों की पानी तुम हो 

मेरे ख्वाबों की रानी तुम हो 

मेरे दर्द की कहानी तुम हो 

हाँ तुम हो ,

मेरी ज़िन्दगी तुम हो ,मेरी बंदगी तुम हो |

तुझसा कोई न आये

गर आये तो फिर न जाये 

तेरे बिन जिया न जाये 

ये दिल पाये जिसे पाये ,तुम हो 

हाँ तुम हो 

मेरी ज़िन्दगी तुम हो ,मेरी बंदगी तुम हो |

हर जगह से था मैं हारा 

था मैं वक़्त का मारा

मुझे मिला…

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Added by maharshi tripathi on March 13, 2015 at 10:42pm — 11 Comments

किसको बतायें -एक कोशिश - डॉo विजय शंकर

सम्हाल सके न इश्क किसको बतायें
हम काबिल ही न थे किसको बतायें |

जगहंसाई अपनी क्योंकर करायें
तुम बेवफा निकले किसको बतायें |

तुम खेल गये खेल था तुम्हारे लिये
हम समझे क्या उसे किसको बतायें |

लगा दुनियाँ जीत ली संग तुम्हारे
पर हम हर पल हारे किसको बतायेँ |

इक काँटा चुभे उसकी फितरत है
फूल भी चुभता है किसको बतायें

वजह भी बेवफाई की होती है
वजह वो खुद हम थे किसको बतायें |

Added by Dr. Vijai Shanker on March 13, 2015 at 9:30pm — 16 Comments


सदस्य कार्यकारिणी
‘आस्था’ शापिंग मॉल (लघु कथा)

“इस सन्डे कहाँ पार्टी करें कोमल”? नील  ने पूछा. “यू लाइक  मॉल चलते हैं” “अरे यार, फिर वहीँ.... बोर हो गए हमेशा मॉल मॉल  में जाते कोई नई जगह... “फिर उस भूतिया महल में चलें? है हिम्मत’? बीच में ही बात काटती हुई आस्था बोली| “ना बाबा ना मैं तो नहीं जा सकती तू जा सकती है”?

“मैं भूतों में विश्वास नहीं करती हम आज के युग में जीते हैं क्या पुराने लोगों जैसी  घिसी पिटी बातें  करते हो  और फिर हमारे साथ विश्वास भी तो है उस पर विश्वास करना चाहिए  सब भूतों को ठिकाने लगा देगा  हाहाहा”..…

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Added by rajesh kumari on March 13, 2015 at 7:30pm — 24 Comments

हक़ के लिये लड़ते सभी झगड़ा कभी थमता नहीं |

११२१२      ११२१२       ११२१२       ११२१२     कामिल - मुतफ़ाइलुन 
हक़ के लिये लड़ते सभी झगड़ा  कभी थमता नहीं | 
शक है वहीँ डर है कहीं प्रिय   पास है समता  नहीं | 
जब साथ है हर बात है कटु…
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Added by Shyam Narain Verma on March 13, 2015 at 12:03pm — 17 Comments

दीवारों में दरारें-2 सोमेश कुमार

साल पहले विद्यालय दफ्तर में

“सर, मैं अंदर आ सकती हूँ ?”

“बिल्कुल !” मि.सुरेश एक बार उस नवयुवती को ऊपर से नीचे तक देखते हैं और फिर उसकी तरफ प्रश्नसूचक निगाह से देखते हैं |

“सर ,मुझे इस स्कूल में नियुक्ति मिली है |” वो बोली

“बहुत बढ़िया !बैठो अभी प्रधानाचार्य आते हैं तो आपको ज्वाइन करवाते हैं |” प्रफुल्लतापूर्वक मि.सुरेश बोले

“वैसे कब और कहाँ से की है बी.एड.?” उन्होंने अगला सवाल किया

“इसी साल,कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय से - -“उसने बड़ी सौम्यता से जवाब…

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Added by somesh kumar on March 13, 2015 at 11:18am — 17 Comments

ग़ज़ल ..22 22 22 22 22 2 ....सीला माँ (शीतला माता )

ताप घृणा का शीतल करदे सीला माँ

इस ज्वाला को तू जल करदे सीला माँ

 

इस मन में मद दावानल सा फैला है

करुणा-नद की कलकल करदे सीला माँ

 

सूख गया है नेह ह्रदय का ईर्ष्या से

इस काँटे को कोंपल करदे सीला माँ

 

प्यास लबों पर अंगारे सी दहके है

हर पत्थर को छागल करदे सीला माँ

 

सूरज सर पर तपता है दोपहरी में

सर पर अपना करतल करदे सीला माँ

 

दूध दही हो जाता है शीतलता से

भाप जमा कर बादल करदे सीला…

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Added by khursheed khairadi on March 13, 2015 at 11:13am — 15 Comments

ज़िन्दगी और कविता

मैं तो शब्द पिरो रही थी यूँ ही

सोच रही थी ख्यालों में खोकर

क्या ऐसे ही चलती है ज़िन्दगी

जैसे अनजाने बनती हैं कवितायें

झरने की तरह प्रवाह सी बहती

बस हर शब्द बरसता है बूँद सा

टपकता है मन के बादलों से कही

और जुड़ जुड़ कर बनता जाता है

एक मिसरा..एक शेर..एक मतला

कभी दर्द में डूबा हुआ सियाह लफ्ज़

कभी खुशी की चाशनी में डूबा हुआ.

कभी मिलन की आस में शरमाया हुआ

कभी विरह की तड़प में टूटता हुआ शब्द

एहसासों की चादर में…

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Added by Nidhi Agrawal on March 13, 2015 at 9:30am — 10 Comments

हालात

सपनो  को बेच  रहा वादों  की मंडी में

शोर बहुत है बस्ती में सुनता नहीं कोई

 

वो वहीँ खड़ा  चल चित्र दिखा रहा

रंगीन चश्मे की दुनियां समझता नहीं कोई 

 

बाहँ थाम कर जिसे उसने आगे बढ़ाया

कन्धों पर चढ़ गया वो  देखता नहीं कोई

 

मशाल लेकर भीड़ में आगे चला था जो

वो अब बदल गया टोकता नहीं कोई

 

चार दीवारें खड़ी कर बन गया मकां

आपस में लड़ते रहे,मोहब्बत जगाता नहीं कोई

  

झंडे किताब के चर्चे  यों  ही होते…

Continue

Added by Shyam Mathpal on March 13, 2015 at 9:07am — 10 Comments

तुमने पुकारा ही नहीं मुझको

मैं तो प्रेम रस से 
बादलों की तरह 
भरा हुआ 
बेचैन था 
तुम पर बरसने को
मगर 
तुमने पुकारा ही नहीं मुझको
सूखी 
प्यासी 
व्याकुल 
दरकती हुयी जमीन बनकर
मेरा बरस जाना 
जरूरी थी
क्योंकि 
मैं भरा चुका था 
अन्दर से 
पूरी तरह
मेरी हदों से बाहर 
निकला प्रेम रस
आँखों की कोरों से फूटकर
अश्रुधार बनकर
और बरसता रहा
उम्र भर

उमेश कटारा 
मौलिक व अप्रकाशित

Added by umesh katara on March 13, 2015 at 7:24am — 19 Comments

बजट....(लघुकथा)

“ यह कुकिंग गैस के, यह राशन वाले के, यह बच्चों की स्कूल फी और अभी तो बिजली का बिल आने वाला है. न जाने इस बार....” सुनीता माह का बजट बना ही रही थी कि, तपाक से घर में झाडू-पौंछा कर रही लक्ष्मीबाई पूछ बैठी..

“ बीबी जी.. आप हर माह बिजली के बिल को लेकर क्यूँ परेशान हो जाती हो..?”

“अरे!! बिजली का बिल ही तो झटके मार देता है, पूरे महीने के बजट पर. क्यूँ तुम लोग भी तो खूब टी.व्ही. पंखे चलाते हो, तुम्हे फर्क नहीं पड़ता क्या..?”

“ अरे!! बीबी जी.. टी.व्ही. पंखा ही क्या. हम तो खाना भी…

Continue

Added by जितेन्द्र पस्टारिया on March 12, 2015 at 6:22pm — 36 Comments

ग़ज़ल : वक़्त कसाई के हाथों मैं इतनी बार कटा हूँ

बह्र : २२ २२ २२ २२ २२ २२ २२

 

वक़्त कसाई के हाथों मैं इतनी बार कटा हूँ

जाने कितने टुकड़ों में किस किस के साथ गया हूँ

 

हल्के आघातों से भी मैं टूट बिखर जाता हूँ

इतनी बार हुआ हुँ ठंडा इतनी बार तपा हूँ

 

जाने क्या आकर्षण, क्या जादू होता है इनमें

झूठे वादों की कीमत पर मैं हर बार बिका हूँ

 

अब दोनों में कोई अन्तर समझ नहीं आता है

सुख में दुख में आँसू बनकर इतनी बार बहा हूँ

 

मुझमें ही शैतान कहीं है और…

Continue

Added by धर्मेन्द्र कुमार सिंह on March 12, 2015 at 4:40pm — 24 Comments

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