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ग़ज़ल (काश होता न जो तक़दीर का मारा मैं भी )

2122 - 1122 - 1122 - 22/112

काश होता न जो तक़दीर का मारा मैं भी

देता  इफ़लास-ज़दाओं  को सहारा मैं भी

रौशनी मेरे सियह-ख़ाने  में रहती हर शब 

टिमटिमाता जो कोई होता सितारा मैं भी

वो  निगाहों  में  मिरी  जैसे  बसे रहते  हैं 

काश नज़रों  में  रहूँ  बनके नज़ारा मैं भी 

वो भी  मेरी  ही  तरह  दर्द  सहे आहें भरे  

यूँ  ही तन्हा  न रहूँ  इश्क़  का मारा मैं भी

जिस तरह क़ैस ने सहरा में गुज़ारे थे…

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Added by अमीरुद्दीन 'अमीर' बाग़पतवी on August 22, 2021 at 5:00pm — 6 Comments

प्रेम के दोहे

याद तुम्हारी क्या कहूँ, यूँ करती तल्लीन।

घर, दफ़्तर, दुनिया, ख़ुदी, सब कुछ लेती छीन।

जल बिन मछली से कभी, मेरी तुलना ही न।

मैं आजीवन तड़पता, कुछ पल तड़पी मीन।

प्रेम पहेली एक है, हल हैं किन्तु अनेक।

दिल नौसिखिया खोजता, इनमें से बस…

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Added by धर्मेन्द्र कुमार सिंह on August 21, 2021 at 7:00pm — 5 Comments

सहज त्योहार है राखी -लक्ष्मण धामी "मुसाफिर"

१२२२/१२२२/१२२२/१२२२



सनातन धर्म का गौरव सहज त्योहार है राखी

समेटे प्यार का खुद में अजब संसार है राखी।१।

*

हैं केवल रेशमी धागे  न  भूले से भी कह देना

लिए भाई बहन के हित स्वयं में प्यार है राखी।२।

*

पुरोहित देवता भगवन सभी इस को मनाते हैं

पुरातन सभ्यता की इक मुखर उद्गार है राखी।३।

*

बुआ चाची ननद भाभी सखी मामी बहू बेटी

सभी मजबूत रिश्तों का गहन आधार है…

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Added by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on August 19, 2021 at 12:00am — 21 Comments

ग़ज़ल-गीत आशिक़ाना हो

2122 1212 22/112

 1

उसका जब मेरी कू में आना हो

उठ चुका ग़म का शामियाना हो

2

मिल रहा प्यार जब पुराना हो

लब प तब गीत आशिक़ाना हो

3

हिज्र की रात में वो आए जब

होटों पर वस्ल का तराना हो

4

ऐ ख़ुदा हर गरीब के घर में

पेट भरने को आब ओ दाना हो

5

टूटी कश्ती में बैठ कर कैसे

उस किनारे प अपना जाना हो

6

कह रहा है मरीज़-ए-इश्क़ मुझे

उसका दिल मेरा आशियाना…

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Added by Rachna Bhatia on August 18, 2021 at 1:20pm — 6 Comments

देश जयचंदों की क्या जागीर है- लक्ष्मण धामी "मुसाफिर"

२१२२/२१२२/२१२



होंठ हँसते हैं  तो  मन में पीर है

जिन्दगी की अब यही तस्वीर है।२।

*

जो सिखाता था कलम ही थामना

वो भी  हाथों  में  लिए  शमशीर है।२।

*

झूठ को आजाद रक्खा नित गया

सच के  पाँवों  में  पड़ी  जंजीर है।३।

*

हाथ जन के वो न आयेगा कभी

उसका वादा सिर्फ उड़ता तीर है।४।

*

रास नेताओं  से  करती है बहुत

रूठी जनता की सदा तक़दीर है।५।

*

इक दफ़अ बोला तो फिर छूटा नहीं

झूठ की  भी  क्या  गजब तासीर है।६।…

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Added by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on August 17, 2021 at 6:30am — 10 Comments

बेवज़्ह मुझे रोने की आदत भी बहुत थी...( ग़ज़ल :- सालिक गणवीर)

221-1221-1221-122

बेवज़्ह मुझे रोने की आदत भी बहुत थी

पर मुझको रुलाने में सियासत भी बहुत थी (1)

माज़ी को भुला कर मियाँ अच्छा किया मैंने

रखने में उसे याद अज़ीयत भी बहुत थी (2)

मैंने भी बुझा दी थीं वो जलती हुई शम'एँ

कमरे में हवाओं की शरारत भी बहुत थी (3)

है मुझसे अदावत उन्हें अब हद से ज़ियादा

था और ज़माना वो महब्बत भी बहुत थी (4)

ज़ालिम की शिकायत भी करें तो करें किससे

हाकिम की उसी पर ही इनायत भी…

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Added by सालिक गणवीर on August 16, 2021 at 8:37pm — 15 Comments

सुभद्रा कुमारी चौहान

राष्ट्रीय चेतना की सजग प्रहरी और मणिकर्णिका की वीरता को घर-घर पहुंचाने वाली सुभद्रा कुमारी चौहान की सुप्रसिद्ध कविता झांसी की रानी की पंक्तियाँ

'बुन्देले हरबोलों के मुंह हमने सुनी कहानी थी

खूब लड़ी मर्दानी वो तो झांसी वाली रानी थी...

'सुप्त जनता के दिलों में आजादी का अलाव जगाने आयी सुभद्रा कुमारी चौहान की ये पंक्तियाँ सुभद्रा जी द्वारा रचित कई कविताओं से ज्यादा ख्याति प्राप्त हैं। 



नौ साल की उम्र में पहली कविता ’नीम’ लिखने वाली सुभद्रा जी का…

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Added by babitagupta on August 16, 2021 at 2:00pm — 4 Comments

आज़ादी में आधी आबादी का योगदान....जंग अभी भी जारी हैं....

आज़ादी में आधी आबादी का योगदान....जंग अभी भी जारी हैं.....

महात्मा गांधी जी ने कहा, आंदोलनों में महिलाओं की भागीदारी के बिना स्वराज्य प्राप्ति असंभव हैं। शारीरिक-मानसिक रूप से कमजोर समझने वाले लोगों के खिलाफ जाकर महिलाओं को राष्ट्रीय आंदोलन की मुख्य धारा से जोड़ा।और महिलाओं ने लोगों के कहने की परवाह किए बिना अपने आपको तौले मानसिक दृढ़ता के दस्तावेज,संघर्ष के संवेदनशील चित्रण पर डर को खारिज करते हुये समय के फलक पर अपनी कहानी लिख दी।पूर्वाग्रही सोच में जकड़े नकारात्मक…

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Added by babitagupta on August 15, 2021 at 12:06am — 1 Comment

तराना- अपने शहीदों का तुम बलिदान याद कर लो

प्राणों का कर गये जो  परिदान याद कर लो

अपने शहीदों का तुम बलिदान याद कर लो 

आज़ादी का ये दिन है  ख़ुशियाँ रहें मुबारक 

मर कर भी दे गये जो  ज़िंदगी तुम्हें मुबारक 

सरहद पे  रंग भरते  वो जवान याद कर लो 

अपने शहीदों का तुम बलिदान याद कर लो 

अक्सर घिरे रहे जो  बे-हिसाब  मुश्किलों में 

होकर शहीद  भी वो  ज़िन्दा  हैं धड़कनों में 

उन सच्चे सैनिकों का प्रतिदान याद कर लो 

अपने शहीदों का तुम बलिदान याद कर…

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Added by अमीरुद्दीन 'अमीर' बाग़पतवी on August 14, 2021 at 3:12pm — 2 Comments

चुनकर संसद भेजते, उठें उचित सवाल।

चुनकर संसद भेजते, उठें उचित सवाल।

साँसद संसद रोक के, करते वहाँ धमाल॥

निज कर्मों के साथ ही, याद रहे प्रभु  नाम। 

ईश कृपा जब तो मिले, बनते सारे काम॥

करे कमाई जिस तरह, वैसा रहे प्रभाव ।

अर्जित धन अनुचित सदा, देता रहता घाव॥  

न व्यक्तित्व हो एक सा,  अंतर होता मीत।

विचार जिससे जब मिले, जग जाती तब प्रीत॥

दो छोटों की बात पर, आप हमेशा…

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Added by Om Parkash Sharma on August 13, 2021 at 8:30pm — 5 Comments

सावन गुजर गया

२२१/२१२१/१२२१/२१२



तकरार करते करते ही सावन गुजर गया

मनुहार करते करते ही सावन गुजर गया।१।

*

बाधा मिलन में उनसे जो हालात थे उलट

अनुसार करते करते ही सावन गुजर गया।२।

*

हम खुद में व्यस्त  और  वो औरों में व्यस्त थे

व्यवहार करते  करते  ही  सावन  गुजर गया।३।

*

इस पार हम थे बैठे तो उस पार थे सजन

नद पार करते करते ही सावन गुजर गया।४।

*

उनसे मिलन की बात थी लेकिन हमें ये मन

तैय्यार करते …

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Added by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on August 8, 2021 at 10:00pm — 13 Comments

ग़ज़ल-तस्वीर है

2122 2122 212 

1

अपने रिश्ते की यही तस्वीर है

उसका मैं रांझा वो मेरी हीर है

2

पाँव में रस्मों की जो ज़ंजीर है 

मेरे दिल को देती हर पल पीर है

3

जाने किसकी शह में आ कर यार ने

सामने कर दी मेरे शमशीर है

4

हाथ की तहरीर पढ़कर तो बता 

रूठी क्यों मुझसे मेरी तक़दीर है 

5

होगी तेरे पास दौलत लाखों की 

अपनी तो तालीम ही जागीर है 

6

अब छिपाने से भी छिप सकती नहीं

आपकी आँखों में जो…

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Added by Rachna Bhatia on August 8, 2021 at 12:30pm — 4 Comments

ग़ज़ल

रहगुज़र को मेरी कारवाँ दे गया....

212     212     212     212

रहगुज़र  को  मेरी कारवाँ  दे गया

वो खुदी  को अभी पासवाँ दे गया

मुफलिसी वो बुरा ख्वाब थी ज़िन्दगी 

था खुदा जात वो कहकशाँ  दे  गया

आँख भर आए है याद कर के उसे

वो खुदा  था मुझे  बागवाँ  दे गया

ज़िन्दगी  को रज़ा की जबाँ दे गया

रास्ता  एक  था  दो  जहाँ  दे गया

जो बुरा ख्वाब  होता मुझे नींद में

वो बदल  कर नई दास्ताँ  दे…

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Added by Chetan Prakash on August 7, 2021 at 6:00pm — No Comments

(ग़ज़ल) सर ये जिस दर न झुके दर है कहाँ

2122 - 1122 - 112/22

(बह्र - रमल मुसद्दस मख़्बून मह्ज़ूफ़) 

सर ये जिस दर न झुके दर है कहाँ

हर कहीं पर जो झुके सर है कहाँ 

हौसलों से जो भरे ऊँची उड़ान

गिर के मरने का उसे डर है कहाँ 

अम्न-ओ-इन्साफ़ जो राइज कर दे

आज के दौर का 'हैदर' है कहाँ 

देखते हैं यूँ हिक़ारत से मुझे 

हम कहाँ और ये अहक़र है कहाँ 

यूँ अज़ीज़ों से किनाराकश हूँ

मुझसे पूछेंगे तेरा घर है कहाँ

फिर…

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Added by अमीरुद्दीन 'अमीर' बाग़पतवी on August 7, 2021 at 3:41pm — 3 Comments

नहीं कर कुन्द पाओगे कलम की धार नेता जी

१२२२/१२२२/१२२२/१२२



तुम्हारी कुर्सी का  जब  है  यही  आधार नेता जी

कहो फिर देश की जनता लगे क्यों भार नेता जी।१।

*

सिकुड़ती देश की सीमा तुम्हें दिखती नहीं है पर

लगे करने में कुनबे  का  सदा अभिसार नेता जी।२।

*

जिताकर वोट से जनता बनाती दास से मालिक

जताते क्यों नहीं उस का  कभी आभार नेता जी।३।

*

बने केवल धनी का ही सहारा…

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Added by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on August 7, 2021 at 5:30am — 14 Comments

ये लोग मुझे कुछ भी तो करने नहीं देते....( ग़ज़ल :- सालिक गणवीर)

221-1221-1221-122

ये लोग मुझे कुछ भी तो करने नहीं देते

मुश्किल है बहुत जीना ये मरने नहीं देते (1)

खोदा था कुआँ सहरा में हमने कभी मिल कर

कुछ लोग घड़े हमको वाँ भरने नहीं देते (2)

इक उम्र गुज़ारी है यहाँ मैंने सफ़र में

अब पाँव भी मंज़िल पे ठहरने नहीं देते (3)

उसने जो कहा है तो वो कर के ही रहेगा

वादे से उसूल उसको मुकरने नहीं देते (4)

छाता है कभी ज़ीस्त में जब ग़म का अँधेरा

डरता हूँ मगर दोस्त सिहरने…

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Added by सालिक गणवीर on August 6, 2021 at 11:01pm — 8 Comments

ग़ज़ल

2122, 2122, 2122



1)कर लिया हमने ख़सारा दो मिनट में

हो गया दिल ये पराया दो मिनट में

2)उम्र उसकी राह तकते कट गई है

आ रहा हूँ कह गया था दो मिनट में

3)थी उसे जल्दी तो मैं भी कुछ न बोला

हाल उसको क्या सुनाता दो मिनट में

4)जिस्म कैसे साथ दे अब उम्र भर तक

पक रहा है आज खाना दो मिनट में

5)होती है नाज़ुक बहुत रिश्तों की डोरी

टूट जाता है भरोसा दो मिनट…

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Added by Md. Anis arman on August 5, 2021 at 10:12am — 10 Comments

मन पर कुछ दोहे ......

मन पर कुछ दोहे : ......

मन को मन का मिल गया, मन में ही विश्वास ।

मन में भोग-विलास है, मन में है सन्यास ।।

मन में मन का सारथी, मन में मन का दास ।

मन में साँसें भोग की, मन में है बनवास ।।

मन माने तो भोर है, मन माने तो शाम ।

मन के सारे खेल हैं, मन के सब संग्राम । ।

मन मंथन करता रहा, मिला न मन का छोर ।

मन को मन ही छल गया, मन को मिली न भोर । ।

मन सागर है प्यास का, मन राँझे का तीर ।

मन में…

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Added by Sushil Sarna on August 3, 2021 at 9:28pm — 4 Comments

ग़ज़ल

2122     1212    22 / 112

आज  सोया है शहर घर कर के ! 

खूब  रोया  खुदा  महर  कर के  !!

क्या बुरा हो गया  सनम मुझ से

देखता कब है वो नज़र कर के  !

ज़हरीला बन गया हरेक रिश्ता याँ 

खत्म हो हर अजाब मर कर के  !

हम हैं मारे उसी की बेरुखी के

जिसको देखा नज़र वो भर कर के !

कोई है बात जो लगी दिल को

मिलता कोई नहीं खबर  कर के !

क्या करू मिल के ज़िन्दगी से मैं

खौलता  खून  है …

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Added by Chetan Prakash on August 3, 2021 at 12:46am — 2 Comments

अहसास

यूँ तो अपना था वो कहने को

पर वो अपना हो ऐसा एहसास कहाँ,

उनके दिल में उतर कर देखा जो ख़ुद को

तो जाना उनके दिल में अपना ठौर कहाँ,

ख़ुद तजुर्बा ये मैने है पाया

इस दुनिया में वफ़ा का मोल कहाँ,

झूठे वादों पर चलती है दुनिया

सच का तो अब है मौन यहाँ,

यूँ तो अपना था वो कहने को

पर वो भी अपना हो ऐसा एहसास…

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Added by रोहित डोबरियाल "मल्हार" on August 2, 2021 at 11:30pm — 12 Comments

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