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बाबू मैं बाजारू हूं

ना मैं बेटी ना ही मां हूं

केवल रैन गुजारू हूं

रम्‍य राजपथ, नुक्‍कड़ गलियां

सबकी थकन उतारू हूं

बाबू मैं बाजारू हूं ........बाबू मैं बाजारू हूं

अंधेरे का ओढ़ दुशाला

छक पीती हूं तम की हाला

कट-कट करते हैं दिन मेरे

रिस-रिस रात गुजारूं हूं

बाबू मैं बाजारू हूं ........बाबू मैं बाजारू हूं

जात-पात का भेद ना मानूं

ना अस्ति ना अस्‍तु जानूं

घुंघरू भर अरमान लिए मैं

सबका पंथ बुहारू…

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Added by राजेश 'मृदु' on April 11, 2013 at 6:05pm — 33 Comments

देखा एक स्वप्न

एक खवाब जो देखा था

सपने जो आँखों में संजोये थे

अरमान जो दिल में बरसे थे

तरसे थे सारी रातें

बरसे थे आँखों से ये दरिया

तड़पी थी ये रूहें

बुलंद थे ये होंसले

तेज थी आँखों में

छूना था आस्मां को

पाना था सारा जहाँ

जीना था उन सपनों को

करना था कुछ ऐसा

बन कर दिखाना था सरे जहाँ को

करनी थी दुनिया मुट्ठी में

कुछ कर गुजरने की तमन्ना थी

कुछ बदलने की आंस थी

कुछ ऐसी ख्वाइश थी

बस देखा एक स्वप्न था

आँखों जो…

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Added by Rohit Singh Rajput on April 11, 2013 at 4:30pm — 8 Comments

"ग़ज़ल" तू क्या तेरी हस्ती है क्या ये ध्यान में ला

ग़ज़ल कहने का प्रयास किया है

तू क्या तेरी हस्ती है क्या ये ध्यान में ला

अब उठ खड़ा हो खुद को फिर मैदान मे ला

मज़हब की बातें औ नहीं ईमान की कर

पहले ज़रा इंसानियत इंसान में ला

जब तक जिया उसको बुरा सबने कहा है

क्यूँ रोते हो अब तुम उसे शमशान में ला

नेता है उसको क्या पता क्या है ग़रीबी

उसको कभी इस कोयले की ख़ान मे ला

क्यूँ दीप जलता खुद पे ही इतरा रहा है

दम आजमा तू खुद को इस तूफान में…

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Added by SANDEEP KUMAR PATEL on April 11, 2013 at 3:45pm — 20 Comments

अभिलाषा

                        

               अभिलाषा

मेरी अब  यही एक अभिलाषा है
कि दूर क्षितिज में जाने से पहले
इन बेनाम-लावारिस कविताओं का
नामकरण करता चलूँ ।
 
सुनो, तुम्हें न्योता भेजूँ तो
आओगी न…
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Added by vijay nikore on April 11, 2013 at 11:30am — 34 Comments

समझ न पाती...

वो नन्ही नन्ही सी गोल मटोल,

आंखे इधर उधर निहारती ,

कुछ तलाशती सी लगती ,

न पा सकने की स्थिति,

समझ न पाती .............

 …

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Added by annapurna bajpai on April 11, 2013 at 9:00am — 10 Comments

भारतीय नव संवत्सर 2070

चैत्र पवित्र नवरात्री , साल नया ये खास.

गुडी पडवा में नींव पड़े, चहुंदिश सुख की आस.

सुख दुख गतिक्रम सृष्टि का, चले सनातन चक्र.

किसी…

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Added by डा॰ सुरेन्द्र कुमार वर्मा on April 11, 2013 at 6:00am — 4 Comments

समस्त ओ बी ओ परिवार को हिंदी नववर्ष और नवरात्रि की बहुत बहुत शुभकामनाएं

समस्त ओ बी ओ परिवार को हिंदी नववर्ष और नवरात्रि की बहुत बहुत शुभकामनाएं

 

अर्गला स्तोत्र को हिंदी में छंदबद्ध करने का प्रयास किया है

 

अथ अर्गला स्तोत्र

 

 

शिवा जयंती माता काली, भद्रकाली है नाम

क्षमा स्वधा कपालिनी स्वाहा, बारम्बार प्रणाम

दुर्गा धात्री माँ जगदम्बे,  जपता आठों याम

मात मंगला हे चामुंडे, हरो क्रोध अरु काम

सबकी पीड़ा हरने वाली, तुमको नमन हजार 

व्याप्त चराचर में तुम माता, तेरी जय जयकार

जय दो यश…

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Added by SANDEEP KUMAR PATEL on April 10, 2013 at 11:00pm — 17 Comments

नववर्ष

नववर्ष

नव वर्ष हमारा आ भी गया, शुभ कामना छा भी गया।

इक वर्ष हमारा गुजर गया,इक वर्ष हमारा बढ़ भी गया।।

हम इस वर्ष को प्यार करें, मिलकर शांति बिहार करे।

नहीं जात-पात आडम्बर हो,मिल सम्प्रदाय विचार करें।।

यहां आतंक वाद की बेला है,चहुं दिश जग अंधियारा है।

इस वर्ष के नूतन प्रभात से, हमको आतंक मिटाना है।।

नववर्ष हमारा हो मंगल, जन-जन की विकृति दूर करें।

न भेद-भाव न धर्म-देश, विश्वबंधुत्व का स्वर गूंज…

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Added by केवल प्रसाद 'सत्यम' on April 10, 2013 at 10:21pm — 13 Comments


सदस्य टीम प्रबंधन
नवसंवत्सर पर हार्दिक शुभकामनाएँ

संप्रेषित शुभकामना, स्वजन करें स्वीकार 

नव-संवत शुभ आगमन, सृष्टि सृजन त्यौहार 

सृष्टि-सृजन त्यौहार, पुलक शुभ वर्ष मनाएँ

मनस चरित व्यवहार साध निज गौरव पाएं 

संकल्पित हो कर्म, धर्म को करें प्रतिष्ठित 

राष्ट्र करे उत्थान, भावना शुभ संप्रेषित

Added by Dr.Prachi Singh on April 10, 2013 at 8:30pm — 28 Comments

कुछ दोहे

पढ़ लिख कर आगे बढ़ें, बनें नेक इन्सान ।

अच्छी शिक्षा जो मिले, बच्चें भरें उड़ान ।।

बच्चे कोमल फूल से, बच्चे हैं मासूम ।

सुमन की भांति खिल उठें, बनो धूप लो चूम ।।

देखो बच्चों प्रेम ही, जीवन का आधार ।

सज्जन को सज्जन करे, सज्जन का व्यवहार ।।…

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Added by अरुन 'अनन्त' on April 10, 2013 at 5:06pm — 11 Comments

नव-संवत्सर की- - - - लक्ष्मण लडीवाला

नव-संवत्सर कीशुभ कामनाए

-लक्ष्मण लडीवाला 

 

बीत गया वर्ष विगत,नव संवतसर आया, 

गत का आकलन कर,आगे अवसर लाया।

 

स्व का गत रहा कैसा, स्व हो अब कैसा,

करे नवा कुछ ऐसा, हो दो पग आगे जैसा।

नव-संवत्सर का प्रारम्भ होता दुर्गा पूजा से,

घट-स्थापना, उगा नया धान नए जवारे से ।

   

शक्ति की प्रतिक मान करते देवी कि पूजा,

प्रेरणा स्वरूप है देवी,मिलती जिनसे ऊर्जा |

जिसके बिना चल न सके दुनिया का…

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Added by लक्ष्मण रामानुज लडीवाला on April 10, 2013 at 3:30pm — 8 Comments

सोच रहा है राजू

रंग भरे

फागुन के चेहरे

संग रीता

सुख चैन

टनटन करती

भाग रही फिर

अग्निशमन की वैन

होंठ चाटता

बेबस राजू

सोच रहा

फिर आज

चूते छप्‍पर

सर्द रात दे

तुष्‍ट नहीं क्‍यों ताज

तैर रही

उसकी आंखों में

मात-पिता की देह

आवास इंदिरा

के नीचे ही

कुचल गया

जो नेह

है तो वो

जनजाति का पर

पाए कहां प्रमाण

दैन्‍य रेख पर

अमला…

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Added by राजेश 'मृदु' on April 10, 2013 at 1:18pm — 7 Comments

सदा चैन की बंशी बजती , जब घर में खुशहाली हो |

घरनी -कविता |
सदा चैन की बंशी बजती , जब घर में खुशहाली हो | 
जंगल में मंगल हो जाता , साथ अगर घरवाली हो |
एक म्यान में दो तलवारें , चैन कहाँ मिल पायेगा |
यदि यार का दखल हो घर में ,…
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Added by Shyam Narain Verma on April 10, 2013 at 11:12am — 7 Comments

तुम सोचो मानव

हे ब्रम्हा जी की रचना से निर्मित मानव

तुम सोचो मानव

क्या मैने ये ठीक किया था युध्द कराकर,

क्या मैने ये ठीक किया दो पक्छ लडाकर

तुम्ही बताओ क्या मै इसका उत्तरदायी हू

तुम सोचो मानव



राजदूत बनकर पाण्डव का जब मै पंहुचा

बस गाँव मांगने पाँच और कुछ भी न ज्यादा

क्या मै और मेरा राज्य था इतना दुर्बल मानव

कुछ अपने हिस्से के गाँव उन्हे मै दे न पाता

किन्तु उन्हे दे देता तो ये युध्द न होता

क्या मैने ये ठीक किया था बात बढाकर

तुम सोचो… Continue

Added by manoj shukla on April 10, 2013 at 11:07am — 6 Comments

क्या न लिखूँ

क्या न लिखूँ

दोपहर घर में बैठा मैं, कुछ,

सोच रहा,मस्तिस्क में आ रहे,

विषय कई,पर उलझन है की,

क्या लिखूँ और क्या न लिखूँ ।

शब्दों और वाणी में, आज,

अनुशासन है नहीं, फिर भी,

समय देशकाल को विचारकर,

क्या लिखूँ और क्या न लिखूँ ।

लिखने से तूफ़ान आ जाता,

लिखने से संबंध बिगड़ते,और,

सत्ता गिर जाती है ,इसीलिये,

क्या लिखूँ और क्या न लिखूँ ।

लिखने से मन के भाव आते,

कटु सत्य निकल जाता है,

आ…

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Added by akhilesh mishra on April 10, 2013 at 11:00am — 5 Comments

मैं

मैं कौन हू ,मैं क्या हू ,

नही जानता ,

 मैं खुद ही स्वयं को ,

नहीं पहचानता ,



 मैं स्वप्न हू या कोई हक़ीकत ,

मैं स्वयं हू या कोई वसीयत ,



जैसे किसी कॅन्वस पर उतारा हुआ ,

रंगों की बौछारों से मारा हुआ ,



हर किसी के स्वप्न की तामिर हू मैं ,

हक़ीकत नही निमित तस्वीर…

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Added by अशोक कत्याल "अश्क" on April 10, 2013 at 7:58am — 15 Comments

ख्वाब यूँ तूफ़ानी हो गये

ख्वाब यूँ तूफ़ानी हो गए ,

रिश्ते भी जिस्मानी हो गए

,

बदले करवट ज़िंदगी , हर पल हर छिन ,

लक्ष्य भी आसमानी हो गए ,



क्या दिखाएँ जलवा , अपने अश्कों का ,

गम ही किसी की , मेहरबानी हो गए ,



नहीं आता रोना उनके सितम पे ,

फिक्रे वफ़ा , किस्से कहानी हो गए ,



बेहया हो गया ये आँखों का परदा ,

सुना हे जबसे , वे रूमानी हो गए ,



छोड़ दिया मिलना गैरों से हमने ,

बंधन दिलों के ,बेमानी हो गये…

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Added by अशोक कत्याल "अश्क" on April 10, 2013 at 7:48am — 6 Comments

आग चिराग ने लगाई....

देखो जबरदस्त होसला अफजाई ,

बैरी बने बादल और आग चिराग ने लगाई ,



करेंगे अपने बूते , खामोशी से संवाद ,

चौंकाना चाहती हे , दिल से , तन्हाई ,



आशा की लौ मे , मेरी वापसी के संकेत ,

दे ही देगी , तेरी चौतरफ़ा रुसवाई ,



कगार पे आ पहुँचा , अब रोमानी पहलू ,

महज संजोग नहीं है , तेरी बेवफ़ाई ,



थाम ली कमान , आख़िरकार मुहानो की हमने ,

फूटते हुए लावो की , अब…

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Added by अशोक कत्याल "अश्क" on April 10, 2013 at 7:00am — 2 Comments

दर्द

जिधर भी देखा दर्द ही दर्द मिले ,

अपने साए से हुए , चेहरे सर्द मिले ,



किया बेगाना सरे राह हमको ,

मिले भी तो , ऐसे हमदर्द मिले ,



था ज़माना गुलाबी कभी जिनका ,

वही दर्द ए दिल के मारे , आज जर्द मिले ,



गुमान ना था इस कदर कहर नाज़िल होगा ,

फाक़त खंडहर , वो भी ज़रज़र मिले ,



आज़िज़ हे हम अपने ही लहजे से ,

दुरुस्त जिनको समझा , वोही ख़ुदग़र्ज़ मिले…

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Added by अशोक कत्याल "अश्क" on April 10, 2013 at 7:00am — 10 Comments

पत्थर



कारोलीन एक छोटा सा गाँव . यह उन्नीस सौ साठ की बात है . हमारे पड़ोस में एक औरत अपने

छः साल के बेटे के साथ रहने आयी . वह बहुत झगड़ालू थी . वह आये दिन किसी न किसी से लड़ाई करती रहती . वह जब भी किसीको निशाना बनाती अपने बेटे से कहती जाओ उसे पत्थर से

मारो . वह परित्यक्ता थी, अकेली थी , इसीलिये लोग कुछ नहीं कहते और उससे हर सम्भव दूरी बनाये रखते . लोगों की चुप्पी को वह कायरता समझ बैठी .

उसके घर के समीप एक बड़ा सा मैदान था . शाम के वक्त हम सभी गाँव के बच्चे उसमें खेलने जाते थे.…

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Added by coontee mukerji on April 9, 2013 at 11:01pm — 5 Comments

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