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सभ्य कितना चल गया सबको पता -गजल (लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर')

२१२२/ २१२२/२१२२



द्वार पर वो  नित्य  आकर  बोलता है

किन्तु अपना सच छुपाकर बोलता है।१।

***

दोस्ती का मान जिसने नित घटाया

दुश्मनों को अब क्षमा कर बोलता है।२।

***

हूँ अहिन्सा का पुजारी सबसे बढ़कर

हाथ  में  खन्जर  उठाकर  बोलता है।३।

***

गूँज घन्टी की न आती रास जिसको

वो अजाँ को नित सुनाकर बोलता है।४।

***

दौड़कर मंजिल को हासिल कर अभी तू

पथ  में  काँटे  वो  बिछा कर  बोलता …

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Added by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on May 1, 2020 at 10:00pm — 5 Comments

ज़िंदगी का हिसाब हो जाऊँ - ग़ज़ल - बसंत

मापनी 2122 1212 22/112

गर कहो तो जनाब हो जाऊँ

तुम जो देखो वो ख़्वाब हो जाऊँ

 

रोज पढ़ने का गर करो वादा

प्रेम की मैं क़िताब हो जाऊँ 

 

मुझको काँटों से डर नहीं लगता 

चाहता हूँ गुलाब हो…

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Added by बसंत कुमार शर्मा on May 1, 2020 at 12:30pm — 6 Comments

श्रमजीवी

श्रमिक दिवस पर श्रमजीवी को आओ शीश झुकाएँ।

बलाक्रान्त शोषित निर्बल को मिलकर सभी बचाएँ।

दुरित दैन्य दुख झेल रहे हैं

सदा मौत से खेल रहे हैं।

तृषा तपन पावस तुसार सह

जीवन नौका ठेल रहे हैं।

हर सुख से जो सदा विमुख हो उस पर बलि-बलि जाएँ।

निर्मित जो करता नवयुग तन,उसे नहीं ठुकराएँ।

आजीवन कटु गरल पी रहे

दुर्धर जीवन सभी जी रहे।

हाँफ-हाँफ कर विदीर्ण दामन

जीने के हित सदा सी रहे।

कर्म निरत गुरु गहन श्रमिक…

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Added by डॉ छोटेलाल सिंह on May 1, 2020 at 11:30am — 8 Comments

तू यार हवा गर है तो मानन्द-ए-सबा रह(९३ )

221 1221 1221 122 

तू यार हवा गर है तो मानन्द-ए-सबा रह

तू है दुआ तो एक असर वाली  दुआ रह

**

तू अब्र है तो बर्क़ से झगड़ा न किया कर

हर हाल में पाबंद-ए-रह-ए-रस्म-ए-वफ़ा रह

**

तू शम'अ है तो ताक़  में रह कर ही  जला कर

तूफ़ान है तो दिल में मेरे यार उठा रह

**

तू याद किसी की है तो हिचकी में समा जा

तू ज़ख़्म अगर दिल का है दिन रात हरा रह

**

आज़ाद तेरे इश्क़ से हो पाऊँ न…

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Added by गिरधारी सिंह गहलोत 'तुरंत ' on April 30, 2020 at 3:30pm — 6 Comments

शहर शर्म के चलते

कौन कहता  है कि

मन तभी  …

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Added by amita tiwari on April 30, 2020 at 3:00am — 5 Comments

आहट .....

आहट .....

दिल

हर आहट को

पहचानता है

आहट

बेशक्ल नहीं होती

होती हैं उसमें

हज़ारों ख़्वाहिशें

जिनके इंतज़ार में

ज़िंदगी

रहती है ज़िंदा

फ़ना होने के बाद भी

सहर होती है साँझ होती है

वक़्त मगर

ठहरा ही रहता है

किसी आहट के इंतज़ार में

नज़रें

अपनी ख़्वाहिशों के अक़्स

देखने को बेताब रहती हैं



तसव्वुर में

ज़िंदा रहती हैं

आहटें

मगर

मिलता है धोख़ा

सायों…

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Added by Sushil Sarna on April 29, 2020 at 8:04pm — 6 Comments

ज़मीँ पर हल चलाता है इसी उम्मीद में कोई(९२ )

एक ग़ैर मुरद्दफ़ ग़ज़ल  (1222 *4 )

.

ज़मीँ पर हल चलाता है इसी उम्मीद में कोई

कभी तो जाग जाएगी मेरी क़िस्मत अगर सोई

**

मेरे किरदार की दौलत रहे महफूज़, काफ़ी है

मुझे कुछ ग़म नहीं होगा मेरी दौलत अगर खोई

**

भले इल्ज़ाम मुझ पर बेवफ़ा होने का लग जाये

मगर बर्दाश्त कैसे हो उसे रुस्वा करे कोई

**

अभी भी रोक दो सब क़ह्र क़ुदरत पे न बरपाओ

अरे बर्बाद कर देगी कभी क़ुदरत अगर रोई

**

मेरा…

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Added by गिरधारी सिंह गहलोत 'तुरंत ' on April 29, 2020 at 12:00pm — 6 Comments

आत्मावलंबन

आत्मावलंबन

बाहरी दबाव और आंतरिक आदर्श 

असीम उलझन और तीव्रतम संघर्ष

ऐसा भी तो होता है कभी

कि मन का सारा संघर्ष मानो

किसी एक बिंदु पर केंद्रित हो उठा हो

और पीड़ा ... जहाँ कहीं से भी उभरी

सारी की सारी द्रवित हो कर

उस एक बिंदु के इर्द-गिर्द

ठहर-सी गई हो

बह कर कहीं और चले जाने का

उस पीड़ा का

कोई साधन न हो

वाष्प-सा उसका उड़…

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Added by vijay nikore on April 28, 2020 at 6:52am — 6 Comments

पर्यावरण सुरक्षा

आज धरती धन्य है , उसका हृदय प्रमुदित हुआ

स्वच्छ वायु , स्वच्छ जल , पर्यावरण निर्मल हुआ

गर यही स्थिति रही तो संक्रमण मिट जाएगा

यदि पुनः मानव ना अपनी गलतियां दोहराएगा

क्या कभी नभ सर्वदा उज्ज्वल धुला  रह पाएगा ?

या कि फिर से धुन्ध का अजगर निगल ले जाएगा

है यही सपना निशा में दमकते नक्षत्र हों

चँहु दिशा पंछी चहकते उपवनों में मस्त हों

शुद्ध हो वातावरण , कैसे ? बड़ों से ज्ञान लें

उनकी अनुभव जन्य ज्ञान मशाल…

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Added by Usha Awasthi on April 27, 2020 at 7:39pm — 6 Comments

हक़बयानी लिख रहे हैं  - ग़ज़ल - बसंत

 

मापनी २१२२ २१२२ २१२२ २१२२ 

दूध को जो दूध और पानी को पानी लिख रहे हैं 

लोग वो कम ही बचे जो हक़बयानी लिख रहे हैं 

 

खेत में ओले पड़े हैं नष्ट सब कुछ हो चुका है 

कूल है मौसम बहुत वे ऋतु सुहानी लिख रहे हैं 

 …

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Added by बसंत कुमार शर्मा on April 27, 2020 at 6:59pm — 10 Comments

बस यही सोच के फेंका था जाल आंखों में...

पूछते क्या हो यूं लेकर सवाल आंखों में

पढ सको पढ लो मेरा सारा हाल आंखों में

देखना था कि समंदर से क्या निकलता है

बस यही सोच के फेंका था जाल आंखों में

वो मिरे सामने आती है झुकाए पलकें

हया को रखा है उसने संभाल आंखों में

नजर से नब्ज पकडकर इलाज कर भी कर दे

वो लेकर चलती है क्या अस्पताल आंखों में

जो उसका साथ है तो तीरगी से डर कैसा

इश्क में जलने लगती है मशाल आंखों में।। #अतुल

                   …

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Added by atul kushwah on April 27, 2020 at 4:50pm — 1 Comment

कई बात अभी बाकी है

कुछ पल और ठहर जाओ के रात अभी बाकी है

दो घूंट कश के लगाओ के कई बात अभी बाकी है

 

जो टूटे है ख्वाब सारे वो बैठ के जोड़ेंगे

छाले दिल में है जितने भी इसी हाथ से फोड़ेंगे

थोड़ा तुम दिल को बहलाओ के ज़ज़्बात अभी बाकी है

के आज हद से गुज़र जाओ मुलाकात अभी बाकी है

 

तमन्ना जो भी है दिल में आज पूरी सारी कर लो

हम खाएं खो ना जाएं अपने बाहों में भर लो

करेंगे हम ना अब इंकार के इकरार अभी बाकी है

ना होंगे फिर ये हालात के ऐतबार अभी बाकी…

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Added by AMAN SINHA on April 27, 2020 at 2:28pm — 7 Comments

कविता

जब हो हृदय अतिशय व्यथित

मन में उठें लहरें अमिट।

शब्द के जल से द्रवित हो

अश्रु सा बन धार बहना

काव्य सरिता का निकलना

है यही कविता का कहना।।काव्य सरिता का...

या परम सुख की घड़ी में

याद करके जिस कड़ी को।

या हृदय की धड़कनों से

शब्द गुच्छों का निकलना

काव्य सरिता का है बहना।काव्य सरिता का....

या विरह की वेदना का

जब स्वयं वर्णन हो करना।

बिन कहे सब कुछ हो कहना

शब्द की नौका पे चढ़कर

दर्द की दरिया में बहना

है यही कविता का…

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Added by Awanish Dhar Dvivedi on April 27, 2020 at 9:19am — 1 Comment

मनोदशा और खुजली(लघुकथा)

डॉक्टर की बातों के जवाब में वर्मा जी कहने लगे-

-हाँ साहब, मुझे पुरानी चीजों से लगाव है।चाहे यादें हों,या पुस्तकें,पन्ने आदि।

-मसलन?

-मैं यदा-कदा यह निर्णय ही नहीं कर पाता कि किन यादों को स्मृति-पटल से खुरचकर मिटा देना चाहिए या कौन किताब या पन्ना अपनी अलमारी से बाहर करूँ,कौन रखूँ।

-मतलब ,आप दुविधाग्रस्त रहते हैं।

-जी।

-और पुरातनता से संबद्ध भी रहना चाहते हैं।

-जी।पर कभी-कभी अपने इस लगाव के चलते पश्ताचाप भी होता है कि मैं अनावश्यक तौर पर अनचाही चीजों में फँसकर खुद…

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Added by Manan Kumar singh on April 27, 2020 at 8:30am — 4 Comments

कोरोना पर छप्पय छंद में कुछ रचनाएँ

(सूत्र रोला + उल्लाला = छप्पय छंद)



लेकर लाखों पाँव, एक आया संहारी

चुप सारे दरवेश, पादरी सन्त पुजारी

जीवन गति अवरूद्ध, क्रुद्ध हों ईश्वर जैसे

नहीं किसी को ज्ञान, कटे यह विपदा कैसे

दिखे नहीं उम्मीद अब, मंदिर मस्जिद धाम से

आज सभी भयभीत हैं, कोरोना के नाम से।।1



जिव्हा का कुछ स्वाद, पड़ा हम सब पर भारी

खाया जो आहार, उसी ने दी बीमारी

पर अपना क्या दोष, चीन यह समझ न पाया

खाकर कुत्ता गिद्ध, भयंकर रोग बुलाया।।

जिससे जग गति थम गई, डर फैला… Continue

Added by नाथ सोनांचली on April 27, 2020 at 6:24am — 6 Comments

दिन को चैन और रातों को नींद नहीं है इक पल-रामबली गुप्ता

गीत

देखा जब से उनको हिय में हुई अजब सी हलचल।

दिन को चैन और रातों को नींद नहीं है इक पल।।

उनके अरुण अधर ज्यों फूलों की हों कोमल कलियाँ।

जिनसे फूटें स्वर मधुरिम तो गूँजें मन की गलियाँ।।

केशों के झुरमुट में उनका मुखमंडल यों भाये।

घन के मध्य झरोखे में ज्यों इंदु मंद मुसकाये।।

दृग पराग के प्याले हों ज्यों करते हर पल छल-छल।

दिन को चैन और रातों को नींद नहीं है इक पल।।

खिलता यौवन-पुष्प सुरभि यों चहुँ दिश बिखराता…

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Added by रामबली गुप्ता on April 26, 2020 at 11:03pm — 6 Comments

झूठ

झूठ

नहीं, नहीं

रहने दो

सच और झूठ की ये तकरार

सच में बेकार है

सत्य

जब उजागर होता है

तो आघात देता है

और झूठ जब उजागर होता है

तो शर्मिंदगी का शूल देता है

फिर क्यूँ मुझे

अपने सच और झूठ का स्पष्टीकरण देते हो

सच कहूँ

यदि आघात ही सहना है तो

मुझे ये झूठ अच्छा लगता है

कम से कम मौन पलों में

स्नेह का आवरण तो नहीं हटता

कोई स्वप्न मेघ तो नहीं फटता

स्पर्शों की आँधी

सत्य के चौखट पर…

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Added by Sushil Sarna on April 26, 2020 at 9:00pm — 4 Comments

दिल के दोहे :

दिल के दोहे :

पागल मन की मर्ज़ियाँ, उत्पाती उन्माद।

हुए अलंकृत स्वप्न से, नैनों के प्रासाद।।

वंचक नैनों का भला , कौन करे विश्वास।

इनके हर अनुरोध में, छलके तन की प्यास।।

नैनों के अनुरोध को, नैन करें स्वीकार।

लगती है इस खेल में, दिल को अच्छी हार।।

हृदय कुंज में अवतरित, हुई पिया की याद।

नैन तीर को कर गई, अश्कों से आबाद।।

तृषा हुई बैरागिनी, द्रवित हुए शृंगार।

हौले-हौले दिन ढला, रैन बनी…

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Added by Sushil Sarna on April 26, 2020 at 7:10pm — 8 Comments

तब जाकर नानी कहलाई

नन्हीं बिटिया जग में आई

बड़ी उदासी घर में छाई!
सब के सब हैं चुपचाप मगर
मैया की छाती भर आई।।

जन्म दिया मैया कहलाई
पर इक बात समझ ना आई
नानी है या कोई मिसरी?
माँ से भी मीठी कहलाई।।

पहले बिटिया बनकर आई
फिर बिटिया को जग में लाई
माँ बनती जब, माँ की बिटिया
तब जाकर नानी कहलाई।।

"मौलिक व अप्रकाशित"

Added by Dharmendra Kumar Yadav on April 26, 2020 at 3:30pm — 3 Comments

पहले जगकर रोज भोर में सूरज ताका करते थे - लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर'

२२२२/२२२२/२२२२/२२२

पत्थर को भी फूल सरीखा होना अच्छा लगता है

काँधा अपनेपन का हो तो रोना अच्छा लगता है।१।

**

पहले जगकर रोज  भोर  में  सूरज ताका करते थे

अब आँखों को उसी वक्त में सोना अच्छा लगता है।२।

**

छीन लिया है वक्त ने चाहे खेत का जो भी टुकड़ा था

बेटे हलधर के  हम  जिन को  बोना अच्छा लगता है।३।

**

घोर तमस के बीच भी जो  तब चौपालों में रहते थे

उनको…

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Added by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on April 26, 2020 at 12:31pm — 9 Comments

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