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ग़ज़ल नूर की - बनें जब तक बना कर हम रखेंगे इस ज़माने से

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बनें जब तक बना कर हम रखेंगे इस ज़माने से

फिर इक दिन लौट जाएँगे चले थे जिस ठिकाने से.  

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अँधेरे की हुकूमत यूँ तो चारों सिम्त फैली है

मगर वो काँप जाता है दीये के टिमटिमाने से.

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तो फिर दरिया तो क्या मैं इक समुन्दर भी बहा देता

अगर बिछड़ा कोई मिलता हो अश्कों के बहाने से.

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कई बरसों से मैं बस उन की ही महफ़िल में जाता हूँ

जिन्हें कुछ फ़र्क़ पड़ता हो मेरे आने न आने से.

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बड़प्पन ये कि औरों से लकीर अपनी बड़ी रक्खें

नहीं बढ़ता किसी…

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Added by Nilesh Shevgaonkar on June 14, 2023 at 1:00pm — 2 Comments

एक ताज़ा गज़ल

22 22 22 22 2

आँगन-आँगन अब धूप खिली है

कि..अंगड़ाई ले ..नदी ..बही है

ओस पत्तियाें हुई सतरँगी है

बसंत, बूँद हीर कनी बनी है

बागों बहार फूल कली आई

ऋुतु बसन्त भी बन वधू बिछी है

लिखा शह्र के भाग्य अभी रोना

गली-सड़क याँ, लू गर्म बही है

तपता तवा सड़क तारकोल की

मुफलिस के घर वो छान पड़ी है

आई क्या गरमी मई - जून की

मौत आम जन सर, आन पड़ी है

बहरा हो गया ख़ुदा…

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Added by Chetan Prakash on June 12, 2023 at 5:26pm — No Comments

कैसे कर लेते हो

दबा कर आँखों में आँसू यूं मुस्कुरा जाते हो तुम 

देकर खुशियाँ अपने हिस्से की हमें ग़म भुला जाते हो तुम 

कैसे अपने एहसासों को ज़ुबां पर आने नहीं देते 

दिल के बवंडर को क्यों बह जाने तुम नहीं देते 

कैसे हर बार तुम हीं अपने अरमानो को दबाते हो …

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Added by AMAN SINHA on June 10, 2023 at 6:47am — No Comments

नग़्मा (टूटते यक़ीन तार-तार देखते रहे)

रिश्ते सब बिखर गये

दोस्त उज़्र कर गये 

वक़्त की हवा में रुख़ों से नक़ाब उतर गये 

हम तो बस वफ़ाओं का मज़ार देखते रहे 

टूटते यक़ीन तार-तार देखते रहे 

ग़म की धूप धीरे-धीरे सब नमी चुरा गई

पत्तियों का नूर और कली का रूप खा गई

मेरे आशियाँ पे कोई बर्क़-सी गिरा गई

ख़ाक भी न मिल सकी कि इस तरह जला गई

ज़ख़्म हो गए हरे

खिल गए, जो थे भरे 

दब चुके तमाम दर्द फिर उभर-उभर गये 

हम तो बस अचेत-से 

मुट्ठियों की…

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Added by अमीरुद्दीन 'अमीर' बाग़पतवी on June 9, 2023 at 1:16am — No Comments

पुकार

कैसी ये पुकार है? कैसा ये अंधकार है 

मन के भाव से दबा हुआ क्यों कर रहा गुहार है? 

क्यों है तू फंसा हुआ, बंधनों में बंधा हुआ 

अपनी भावनाओं के रस्सी में कसा हुआ 

त्याग चिंताओं को अब चिंतन की राह धरो

स्वयं पर विश्वास कर दृढ़ हो…

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Added by AMAN SINHA on June 3, 2023 at 7:26pm — No Comments

कुकुभ छंद आधारित सरस्वती गीत-वन्दनाः

दुर्दशा हुई मातृ भूमि जो, गंगा ...हुई... .पुरानी है

पावन देवि सरस्वती तुझे, कविता-कथा सुनानी है !

दोहा ..सोरठा ..सवैया तज, कवि मुक्त काव्य लिखता है ।

सिद्ध छंद छोड़ काव्य वह अब, भार गिरा कर पढ़ता है ।।

ग़ज़ल उसे बहुत भाती रही, याद ,.,कविता.. दिलानी है ।

कविता का ..मर्म नहीं.. जाने , घुट्टी ..उन्हें ...पिलानी है ।।

पावन देवि सरस्वती तुझे, कविता - कथा.. सुनानी है !

माँ शारदे .. सुन, वरदान दे, दास काव्य का..बन…

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Added by Chetan Prakash on June 1, 2023 at 7:35am — 1 Comment

दोहा सप्तक- लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर'

जलते दीपक कर रहे, नित्य नये पड्यंत्र।

फूँका उन के  कान  में, तम ने कैसा मंत्र।१।

*

जीवनभर  बैठे  रहे, जो  नदिया  के तीर।

भाँणों ने उनको लिखा, मझधारों के वीर।२।

*

करती हो पतवार जब, दुश्मन सा व्यवहार।

कौन  करे  उम्मीद  फिर, नाव  लगेगी पार।३।

*

दुख के अपने रंग हैं, दुख की अपनी चाल।

जिसके चंगुल में हुए, जग में सभी निढाल।४।

*

लूले-लँगड़े सुख  सकल, साध  रहे  नित मौन।

आगे बढ़कर फिर भला, दुख को कुचले कौन।५।

*

दुख के जनपद हैं बहुत, सुख…

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Added by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on May 30, 2023 at 10:25pm — 2 Comments

मोल रोटी का उसी को - लक्ष्मण धामी "मुसाफिर"

२१२२/२१२२/२१२२/२१२

*

अब न काली रातों में ही चूमती फिरती है लब

भोर में भी यह  उदासी  चूमती  फिरती है लब।१।

*

वो जमाना और था  जब प्यार था पर्दानशीं 

आज तो हर बेहयायी चूमती फिरती है लब।२।

*

जेब खाली की न घर में  पूछ होती आजकल

धन मिले तो स्वर्ग दासी चूमती फिरती है लब।३।

*

मोल रोटी का उसी को  हम  से  बढ़कर ज्ञात है

नित्य जिसके सिर्फ बासी चूमती फिरती है लब।४।

*

हर थकन से  मुक्ति  पाती  देह  जर्जर आज भी

जब गले लग झट से बच्ची…

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Added by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on May 29, 2023 at 11:00am — 2 Comments

है ज़हर आज हवाओं में, दिल दहलते हैं

1212 1122 1212 22

है ज़हर आज हवाओं में, दिल दहलते हैं

मुनाफ़िकों की है बस्ती कि वो टहलते हैं

के चार सू यहाँ मरते हैं लोग तनहाई

बुझे- बुझे से हैं बूढ़े कहीं निकलते हैं

कि ख़ौफनाक है मंज़र ये नफ़रतों दुनिया

ये ज़ालिमों की है बस्ती खला बहलते हैं

वो शर्म मर गयी आँखों की ग़मज़दा हम हैं

करें भी क्या अदब वाले यहाँ से चलते हैं

गुलाम देते सलामी वो शाह भी खुश हैं

कि मार डाले हैं दुश्मन जहाँ जो…

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Added by Chetan Prakash on May 29, 2023 at 7:30am — No Comments

ख्बाब केवल ख्बाब

ख्बाब केवल ख्बाब



ख्बाब था मेहनत के बल पर , हम बदल डालेंगे किस्मत

ख्बाब केवल ख्बाब बनकर, अब हमारे रह गए हैं



कामचोरी ,धूर्तता ,चमचागिरी का अब चलन है

बेअर्थ से लगने लगे है ,युग पुरुष जो कह गए हैं



दूसरो का किस तरह नुकसान हो सब सोचते है

त्याग ,करुना, प्रेम ,क्यों इस जहाँ से बह गए हैं



अब करा करता है शोषण ,आजकल बीरों का पौरुष

मानकर बिधि का विधान, जुल्म हम सब सह गए है



नाज हमको था कभी पर आज सर झुकता शर्म से

कल तलक जो थे… Continue

Added by Madan Mohan saxena on May 23, 2023 at 11:06am — No Comments

ग़ज़ल नूर की



बारहा साहिल की जानिब लह’र क्यूँ आती रही


सर पटकती पाँव पड़ती रोती चिल्लाती रही.

.

ओस में भीगे हुए इक गुल को नज़ला हो गया

देर तक तितली लिपटकर उस को गर्माती रही.

.

इक नदी की चाह में रोया समुन्दर ज़ार…

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Added by Nilesh Shevgaonkar on May 22, 2023 at 1:08pm — 4 Comments

तीन जन्म नारी के

एक जीवन मे नारी का तीन जन्म होता है 

लेकिन हर जनम मे उसका कर्म अलग होता है 

पहला रूप है पुत्री का, पिता के घर वो आती है 

संग में अपने मात-पिता का स्वाभिमान भी लाती है 

यहाँ कर्म हैं मात-पिता की सेवा निशदिन करते रहना …

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Added by AMAN SINHA on May 21, 2023 at 6:00am — No Comments

ग़ज़ल - मुझे ग़ैरों में शामिल कर चुका है

2122 2122 2122

1

वो ज़रा-सा सिरफ़िरा कुछ मनचला है

जो महब्बत के सफ़र पर चल पड़ा है

2

मेरे दिल ने जो कहा मैंने किया है

काम फिर चाहे वो अच्छा या बुरा है

3

अक़्स आँखों में हमारी जो छिपा है

इस जहाँ के सबसे प्यारे शख़्स का है

4

है महब्बत एक चिंगारी कुछ ऐसी

दिल लगाने वाला ही इसमें जला है

5

बाद मुद्दत के मिला उससे तो जाना

वो मुझे ग़ैरों में शामिल कर चुका है 

6

कुछ कहे बिन और…

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Added by Rachna Bhatia on May 17, 2023 at 11:30am — 7 Comments

ग़ज़ल ( दिनेश कुमार )

2122--1122--1122--22

मेरी क़िस्मत में अगरचे नहीं धन की रौनक़

सब्र-ओ-तस्लीम से हासिल हुई मन की रौनक़



एक दूजे की तरक़्क़ी में करें हम इमदाद

भाई-चारा ही बढ़ाता है वतन की रौनक़



किसको फ़ुर्सत है जो देखे, तेरी सीरत का जमाल

हर तरफ़ जल्वा-नुमा अब है बदन की रौनक़



मुश्किलें कितनी भी पेश आएं तेरी राहों में

जीत की शक्ल में चमकेगी जतन की रौनक़



ये परखते हैं ग़ज़लगो के तख़य्युल की उड़ान

सामईन अस्ल में हैं बज़्म-ए-सुख़न की…

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Added by दिनेश कुमार on May 17, 2023 at 10:30am — 4 Comments

क्या रंग है आँसू का

क्या रंग है आँसू काकैसे कोई बतलाएगा
सुख का है या दु:ख का है ये कोई कैसे समझाएगा
 
कभी किसी के खो जाने से, कोई कभी मिल…
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Added by AMAN SINHA on May 14, 2023 at 8:30am — 1 Comment

मातृ दिवस के दोहे - लक्ष्मण धामी "मुसाफिर"



माँ का आँचल बाल को, सदा सुरक्षा ढाल

टलता जिसकी छाँव में, आया संकटकाल।१।

*

हीरे, मोती, स्वर्ण का, रख कितना भी तोल

माँ की ममता का नहीं, पास किसी के मोल।२।

*

माँ के आँचल के तले, मिलती ऐसी छाँव

हर्षित होकर नाचता, हर दुखियारा गाँव।३।

*

चाहे मन  से हो  स्वयं, माँ  यूँ बहुत उदास

बच्चों को देती मगर, सदा खुशी की आस।४।

*

अपने सब दुख भूलकर, देती सबको हर्ष

माता  जीवन  नींव  है, माता  ही  उत्कर्ष।५।

*

रग-रग में माँ के भरे, ममता, करुणा,…

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Added by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on May 13, 2023 at 10:10pm — 2 Comments

क्या बात करें ?

गुफ़्तगु तो बहुत हैं मगर क्या बात करें,

ग़म ए ज़िंदगी बहुत है, मगर क्या बात करें।

कहते हैं दुःख बांटने से कम हो जाता है ,

मगर शब्द ही मुंह से न निकलें , फिर क्या बात करें।

ज़िंदगी ने सिखाया कि रोना नहीं है ,

मगर अश्क़ ही न थम पाएं , फिर क्या बात करें।

आप उनकी ख़ातिर मर-मर के जिये हैं ,

वो फिर भी न समझ पाएं , फिर क्या बात करें।

है बड़ी कुंद सी मेरी ये ज़िन्दगी ,

झूठे ही मुस्कुराये ,फिर क्या बात करें।

नाहक़ ही उन्हें कोई कुछ भी ना बताये,…

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Added by Sudhir Thakur on May 12, 2023 at 12:20pm — 1 Comment

धूल में खेले हुए (गज़ल)

धूल में खेले हुए, कितने ज़माने हो गए।

ये पता ही ना चला, कब हम सयाने हो गए।।

अब मुहल्ले में नई, दास्तान हैं बनने लगीं।

इश्क़ के किस्से सभी मेरे, पुराने हो गए।।

शब्द कुछ यूँ ही पिरोकर, इक बहर में रख लिए।

आपके होंठों से…

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Added by प्रशांत दीक्षित 'प्रशांत' on May 10, 2023 at 10:19pm — 5 Comments

ज़हरीला परिवेश

बाहर तपती धूप है , हवा चले , ले रेत

मनुज न फिर भी चेतता,होता जीव अचेत

भीषण बाढ़ें कर रहीं घर संग फसल तबाह

मेहनतकश किसान का,किस विधि हो निर्वाह?

शब्दों कर्मों में नहीं दिखता सामंजस्य

धरती जो है उर्वरा, कहते ऊसर व्यर्थ

उस पर वह बनवा रहे सुखद, मनोरम 'स्यूट'

बिल्डर , माननीय मिल,जमकर करते लूट

अभिभाषण में कह रहे पर्यावरण बचाव

कटवाएँ खुद तरु,विटप, देते नित्य सुझाव

कथनी करनी में बड़ा अन्तर…

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Added by Usha Awasthi on May 9, 2023 at 4:00pm — 1 Comment

मेरी खूबसूरती श्राप है

मेरी खूबसूरती श्राप है 

मेरे पूर्व जन्म का पाप है 

जितनों को मैंने छला होगा 

ये उन सबका अभिशाप है 

घर से निकल ना पाऊँ मैं 

रास्ते पर चल ना पाऊँ मैं  

कपड़े गहनों की बात हीं…

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Added by AMAN SINHA on May 7, 2023 at 6:39am — 1 Comment

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