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All Blog Posts (19,155)

मैंने ऐसा मंज़र देखा

मैंने ऐसा मंज़र देखा।
बहती आँख समंदर देखा।।

मुझको अपना कहता था जो।
उसके हाथों खंजर देखा।।

मुखड़ा देखा जबसे उनका।
तबसे चाँद न अम्बर देखा।।

शायद कुछ तो दिख ही जाये।
मैंने खुद के अंदर देखा।

दूर दूर तक हरियाली थी।
धरती अब वो बंज़र देखा।।
**********************
राम शिरोमणि पाठक
मौलिक।अप्रकाशित

Added by ram shiromani pathak on December 26, 2014 at 1:00pm — 24 Comments

कितना तामझाम...(नवगीत ) सीमा हरि शर्मा

कितना तामझाम....(नवगीत)



कितना तामझाम पसराया

जीवन आँगन में।



स्वर्णिम किरणें सुबह जगाती

दिन भर आपाधापी है।

साँझ धुँधलके से घिर जाती

रात तमस ले आती है।

तम को रोज झाड़ बुहरया

जीवन आँगन में।....कितना तामझाम पसराया



गजब मुखोटे मुख पर सजते

तन मशीन के कलपुर्जे।

जीने का दम भरने वाले

मानव ने ये खुद सरजे।

दूर खड़ा मन है खिसियाया

जीवन आँगन में।.....कितना तामझाम पसराया



रेलम पेला धक्का मुक्की

चलती…

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Added by seemahari sharma on December 26, 2014 at 12:00pm — 14 Comments

जब नए शब्द बुन लूँगा

कल से तुम नहीं 

तुम्हारी यादें आएँगी

गिरेगी बूंदें आँखों से

समुन्दर बन जायेंगी

रो- रो कर    मैं  भी

समुन्दर  भर  दूंगा

पर तुम्हे मन की बात कहूँगा

जब नए शब्द बुन लूँगा !! 

तुम साधारण नहीं

साधारण शब्द  तुम्हारे नहीं

तुम्हे प्यार करता हूँ

इन अर्थहीन शब्दों को,

तुमसे कभी नहीं कहूँगा

नयी उपमायें गढ़ लूँगा

पर तुम्हे मन की बात कहूँगा,

जब नए शब्द बुन लूँगा !!

 

तुमसे बात नहीं…

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Added by Hari Prakash Dubey on December 26, 2014 at 11:00am — 5 Comments

ग़ज़ल ,,,,,,,,,,,, गुमनाम पिथौरागढ़ी

2122

ज़िन्दगी है

बोझ सी है

इश्क तो अब

ख़ुदकुशी है

इक ग़ज़ल सी

तू हँसी है

अब ग़मों से

दोस्ती है

बुलबुले सी

ये ख़ुशी है

आफतों से

दोस्ती है

इक पहेली

ज़िन्दगी है

शोर गुमनाम

दिल में भी है

मौलिक व अप्रकाशित

गुमनाम पिथौरागढ़ी

Added by gumnaam pithoragarhi on December 26, 2014 at 8:22am — 12 Comments

स्पर्श

स्पर्श

कभी-कभी तुम्हारे स्पर्श मात्र से

जो सिहरन होती है वो उस

चरम से बड़ी है जो शायद

तुम्हें पूर्ण पाने से मिले |

बीच सागर में ,तपती दोपहरी में

अकेले बेड़े पर भटकते…

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Added by somesh kumar on December 26, 2014 at 12:00am — 9 Comments

भंडारा (कहानी )

                        भंडारा

मास्टर जी ,आप भी चलिए ना भंडारे में - - - “ साथियों ने आग्रह किया|

‘” भाई तुम तो जानते ही हो ,मुझे लाईनों में लगना और याचकों की तरह मांगना पसंद नहीं है “ मा.भोलेराम ने सपाट सा जवाब दिया |

“ अरे!आप भी,भाईसाहब,भंडारे की लाईनों में लगने में कौन सी ईज्जत घट जाती है बल्कि ये तो आपकी भक्ति-भावना की परीक्षा होती है ,प्रसाद के लिए आप जितना ईंतज़ार कर सकते हैं उतना ही पुण्य बढ़ता है “`राजीव बोल पड़ा |

“भाई मैं ऐसी भक्ति-परीक्षा नहीं देना चाहता…

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Added by somesh kumar on December 25, 2014 at 10:57pm — 5 Comments


सदस्य टीम प्रबंधन
ग़ज़ल - बोलिये किसको सुनायें.. // -- --सौरभ

2122 2122 2122 212

 

दिख रही निश्चिंत कितनी है अभी सोयी हुई  

गोद में ये खूबसूरत जिन्दगी सोयी हुई



बाँधती आग़ोश में है.. धुंध की भीनी महक

काश फिर से साथ हो वो भोर भी सोयी हुई



चाँद अलसाया निहारे जा…

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Added by Saurabh Pandey on December 25, 2014 at 9:30pm — 35 Comments

बस तू साथ है |

हर जगह हर घडी बस तू साथ है

जहाँ मेरी नज़रे पडी बस तू साथ है

छोड़ा वक़्त ने जहाँ मुझ बदनसीब को

वहां पे मिली खड़ी बस तू साथ है



मेरे नये संसार में बस तू साथ है

प्यार के व्यवहार में बस तू साथ है

बदल गये जिसमें मेरे सब चाहने वाले

उस वक़्त के रफ़्तार में बस तू साथ है



मोहब्बत के इस कर्ज़ में बस तू साथ है

इंसानियत के फ़र्ज़ में बस तू साथ है

यूँ तो खुशियों के हमदर्द सब हैं मगर

मुझे मिले हर दर्द में बस तू साथ है



सावन का असर है जब तू…

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Added by maharshi tripathi on December 25, 2014 at 8:38pm — 7 Comments

फूल नहीं तो पत्थर कह दो

फूल नहीं तो पत्थर कह दो।
दो बातें पर हंसकर कह दो ।।

आज मुकम्मल कर दो ऐसे ।
एक दफे बस दिलबर कह दो ।।

साथ चलूँगा मरते दम तक।
मुझको अपना रहबर कह दो।।

माँ बाबा की बात सुने सब।
ऐसा सपनों में घर कह दो ।।

ऊँच नीच सम भाव रहा जो।
उसको भी तो बेहतर  कह दो।।

सदियों तक सुनने में आये। 
एक ग़ज़ल बस जमकर कह दो।।
*******************
राम शिरोमणि पाठक
मौलिक।अप्रकाशित

Added by ram shiromani pathak on December 25, 2014 at 5:30pm — 30 Comments

उद्धार (लघु कथा )

नर्मदा के एक ऊंचे कगार पर खड़ा मै प्रकृति के अप्रतिम सौन्दर्य का अवलोकन कर रहा था कि एक ग्यारह वर्ष का बालक मेरे पास आया और बोला –‘बाबू जी मै इस कगार से नर्मदा मैया में छलांग लगाऊंगा तो तुम मुझे पांच रुपये दोगे ?’

‘क्यों, तुम इतना खतरा क्यों उठाओगे ?’

‘कल से खाना नहीं खाया, बाबू जी ‘

मैंने उसे दस रुपये दे दिए I वह मेरे पैरो मे लोट गया I तभी मुझे एक जोरदार ‘छपाक’ की आवाज सुनायी दी और उसके साथ ही एक ह्रदय विदारक चीख I मैंने घबरा कर नीचे देखा I एक दूसरा लड़का कगार से कूदा था पर…

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Added by डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव on December 25, 2014 at 2:30pm — 16 Comments

बस तू साथ है |

हर जगह हर घडी बस तू साथ है 

जहाँ मेरी नज़रे पडी बस तू साथ है

 छोड़ा वक़्त ने जहाँ मुझ बदनसीब को

वहां पे मिली खड़ी बस तू साथ है

मेरे  नये संसार में बस तू साथ है

प्यार के व्यवहार में बस तू साथ है

बदल गये जिसमें मेरे सब चाहने वाले 

उस वक़्त के रफ़्तार में बस तू साथ है

मोहब्बत के इस कर्ज़ में बस तू साथ है

इंसानियत के फ़र्ज़ में बस तू साथ है

यूँ  तो खुशियों के हमदर्द  सब हैं मगर 

 मुझे मिले हर दर्द में बस तू साथ…

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Added by maharshi tripathi on December 25, 2014 at 12:00pm — 3 Comments

ये खुशियाँ , ये गम --- डा० विजय शंकर

दुःख तो हम कितने ही झेल जाते हैं ,

ये तो खुशियाँ हैं जो संभाले नहीं संभाली जाती हैं।



ये दर्द हैं , दुःख है जो हम हमेशा छुपा ले जाते हैं ,

बस ये खुशियाँ हैं जो हर बार चेहरे पे आ जाती हैं।



हम खुशियों को लोगों में बाँटने की बात करते हैं ,

लोग जाने कैसे हैं , लोगों को ही बाँट लेते हैं ।



दुःख दर्द कितने अपने हैं , छिपाओ तो बस छिपे रहते हैं ,

खुशियां गैर ,परायी , बेमुर्रव्वत हैं ,जाहिर हो जाती हैं |



खुशियाँ हैं ,आती हैं ,जाती हैं, कितनी… Continue

Added by Dr. Vijai Shanker on December 25, 2014 at 11:15am — 11 Comments

ग़ज़ल----उमेश कटारा ---बिचाराधीन है मेरा मुकदमा भी अदालत में

फँसा इन्साफ है मेरा गुनाहों की सियासत में 

विचाराधीन है मेरा मुकदमा भी अदालत में

-----

लिये हथियार हाथों में,चली थी मज़हबी आँधी

ज़ला परिवार था मेरा , कभी शहरे क़यामत में

-----

अख़रता है सियासत को ,मेरा इन्सान हो जाना 

हुआ बरबाद था मैं भी, क़भी सच की वक़ालत में

-----

कहीं मन्दिर कोई तोड़ा ,कहीं मस्ज़िद कोई तोड़ी

फँसा है आदमी देखो,न जाने किस इबादत में

-----

दरिन्दे आज बाहर हैं,मेरी तारीख पड़ती है

खडे मी-लॉर्ड हैं देखो ,गुनाहों की…

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Added by umesh katara on December 25, 2014 at 11:00am — 20 Comments

मैं सूर्य के गर्भ में पला हूँ

मैं  सूर्य  के

गर्भ में पला हूँ

मैं अपने ही

अंतर्द्वंदों की आग में

तिल -तिल जला हूँ

अनगिनत दी हैं

अग्नि परीक्षायें

और उन क्रूर परीक्षाओं में

हरदम  खरा उतरा हूँ

आसमां से मैं

धरती पर गिरा हूँ 

अपने आप से ही

मैं निरंतर लड़ा हूँ

मैंने प्रसन्नचित्

मर्मान्तक पीड़ा के

पहाड़ को झेला है

हसं हसं कर

आग से खेला है

तपस्वी सा तपा हूँ

नहाया हूँ डूबकर

समुद्र…

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Added by Hari Prakash Dubey on December 25, 2014 at 4:30am — 12 Comments


सदस्य कार्यकारिणी
खुदा बोलता है : ग़ज़ल (मिथिलेश वामनकर)

122-122

------------

जहां में लगा है

खुदी से जुदा है

 

हुआ मैं पशेमाँ

गज़ब देखता है

 

कभी रूह झांको

खुदा बोलता है

 

सजन शे’र जैसा

लबों पे सजा है

 

सजा ज़िन्दगी की

अजब फैसला है

 

 

हंसी जब्त कर लो

हंसी में सदा है

 

बड़ी दास्तां है

मगर ये ज़दा है

सफ़र है गली में 

मकां में अमा है 

 

ग़मों का य’ दरिया

कहे कब…

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Added by मिथिलेश वामनकर on December 24, 2014 at 8:00pm — 24 Comments


सदस्य कार्यकारिणी
ग़ज़ल - कल पराया जो लगा था, आज प्यारा हो गया ( गिरिराज भंडारी )

2122     2122     2122     212

अश्क़ ऊपर जब उठा, उठ कर  सितारा हो  गया

जा मिला जब अश्क़ सागर से, वो खारा हो गया

 

चन्द  मुस्कानें  तुम्हारी शक़्ल में  जो पा लिये

आज दिन भर के  लिये अपना ग़ुजारा  हो गया

 

चाहतें जब  इक हुईं , तो  दुश्मनी  भूले  सभी   

कल पराया जो लगा था, आज  प्यारा  हो गया

 

ढूँढ  कर  तनहाइयाँ  हम  यादों  में मश्गूल थे

रू ब रू आये  तो  यादों  का  खसारा हो  गया

 …

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Added by गिरिराज भंडारी on December 24, 2014 at 6:00pm — 40 Comments

ग़ज़ल : डर लगता है

अपनी ही परछाई से डर लगता है

मुझको इस तन्हाई से डर लगता है

 

साथ देखकर भाईयों का जग डरता

भाई को अब भाई से डर लगता है

 

मनमोहक है भोलापन उसका इतना

दुनिया की चतुराई से डर लगता है

 

मौन रहूं या झूठ कहूं उलझन में हूं

लोगों को सच्चाई से डर लगता है

 

सारा जीवन सहराओं में भटका हूं

मुझको अब अमराई से डर लगता है

 

कानों में इक सिसकी सीसा घोल गई

मुझको अब शहनाई से डर लगता है

 

ग़म…

Continue

Added by khursheed khairadi on December 24, 2014 at 3:30pm — 10 Comments

गज़ल ज़िन्दगी जाती सरकती..... सीमा हरि शर्मा

जिंदगी जाती सरकती

ज़िन्दगी जाती सरकती।
लाख पकड़ो कब ठहरती।

जो भी पल समझा मुकम्मल।
फिर नई इक दौड़ चलती।

सूर्य समझा जो सहर का।
शाम थी लाली फिसलती।

थक चुका है जिस्म चलते।
चाह से क्या जां निकलती।

धुन्द जब है कुछ पलों की।
रश्मि आखिर क्यों अटकती।

झूमती दिखती जो डाली।
आँधियों से है सिहरती।

रात से लड़ता है दीपक।
आस सुबहा की मचलती।
सीमा हरि शर्मा 24.12.2014
(मौलिक एवं अप्रकाशित)

Added by seemahari sharma on December 24, 2014 at 12:43pm — 18 Comments

मर्द (कहानी )

“ मास्टर जी ,अपने दोस्त से पूछिए अगर मेरे लिए कोई जगह हो तो थोड़ी सिफारिश कर दे |” जब विजय मुझसे ये बात कहता है तो मेरे मन में उसके लिए नैसर्गिक साहनभूति फूटती है |मैं पहले से उसकी नौकरी को लेकर फिक्रमंद हूँ और पहले ही कई दोस्तों से उसके बारे में बात कर चुका हूँ |

कुछ लोग होते हैं जो चुम्बक की तरह अपनी तरफ खींचते हैं |विजय में मुझे वही चुम्बकत्व महसूस होता है | गोरा वर्ण ,5”6’ का कद सुघड़ अंडाकार चेहरा ,घुंघराले काले बालों के बीच में कहीं-कहीं सफ़ेद हो गए बाल ,आत्मीयता और उचित मिठास से…

Continue

Added by somesh kumar on December 24, 2014 at 11:30am — 4 Comments

ग़ज़ल - गुज़ारिश थी, कि तुम ठोकर न खाना अब

ग़ज़ल श्री गिरिराज भंडारी जी की नज्र ...





गुज़ारिश थी, कि तुम ठोकर न खाना अब

चलो दिल ने, कहा इतना तो माना अब



न काम आया है उनका मुस्कुराना अब

यकीनन चाल तो थी कातिलाना .... अब ?



ये दिल तो उन पे अब फिसला के तब फिसला

ये तय जानो, नहीं इसका ठिकाना अब



जो दानिशवर थे सब नादान ठहरे हैं

ये किसका दर है, तुमको क्या बताना अब

ये मौसम खूबसूरत था ये माना पर

वो आये तो हुआ है शायराना अब …



Continue

Added by वीनस केसरी on December 24, 2014 at 5:00am — 18 Comments

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