Added by ram shiromani pathak on December 26, 2014 at 1:00pm — 24 Comments
कितना तामझाम....(नवगीत)
कितना तामझाम पसराया
जीवन आँगन में।
स्वर्णिम किरणें सुबह जगाती
दिन भर आपाधापी है।
साँझ धुँधलके से घिर जाती
रात तमस ले आती है।
तम को रोज झाड़ बुहरया
जीवन आँगन में।....कितना तामझाम पसराया
गजब मुखोटे मुख पर सजते
तन मशीन के कलपुर्जे।
जीने का दम भरने वाले
मानव ने ये खुद सरजे।
दूर खड़ा मन है खिसियाया
जीवन आँगन में।.....कितना तामझाम पसराया
रेलम पेला धक्का मुक्की
चलती…
Added by seemahari sharma on December 26, 2014 at 12:00pm — 14 Comments
कल से तुम नहीं
तुम्हारी यादें आएँगी
गिरेगी बूंदें आँखों से
समुन्दर बन जायेंगी
रो- रो कर मैं भी
समुन्दर भर दूंगा
पर तुम्हे मन की बात कहूँगा
जब नए शब्द बुन लूँगा !!
तुम साधारण नहीं
साधारण शब्द तुम्हारे नहीं
तुम्हे प्यार करता हूँ
इन अर्थहीन शब्दों को,
तुमसे कभी नहीं कहूँगा
नयी उपमायें गढ़ लूँगा
पर तुम्हे मन की बात कहूँगा,
जब नए शब्द बुन लूँगा !!
तुमसे बात नहीं…
ContinueAdded by Hari Prakash Dubey on December 26, 2014 at 11:00am — 5 Comments
2122
ज़िन्दगी है
बोझ सी है
इश्क तो अब
ख़ुदकुशी है
इक ग़ज़ल सी
तू हँसी है
अब ग़मों से
दोस्ती है
बुलबुले सी
ये ख़ुशी है
आफतों से
दोस्ती है
इक पहेली
ज़िन्दगी है
शोर गुमनाम
दिल में भी है
मौलिक व अप्रकाशित
गुमनाम पिथौरागढ़ी
Added by gumnaam pithoragarhi on December 26, 2014 at 8:22am — 12 Comments
स्पर्श
कभी-कभी तुम्हारे स्पर्श मात्र से
जो सिहरन होती है वो उस
चरम से बड़ी है जो शायद
तुम्हें पूर्ण पाने से मिले |
बीच सागर में ,तपती दोपहरी में
अकेले बेड़े पर भटकते…
ContinueAdded by somesh kumar on December 26, 2014 at 12:00am — 9 Comments
भंडारा
मास्टर जी ,आप भी चलिए ना भंडारे में - - - “ साथियों ने आग्रह किया|
‘” भाई तुम तो जानते ही हो ,मुझे लाईनों में लगना और याचकों की तरह मांगना पसंद नहीं है “ मा.भोलेराम ने सपाट सा जवाब दिया |
“ अरे!आप भी,भाईसाहब,भंडारे की लाईनों में लगने में कौन सी ईज्जत घट जाती है बल्कि ये तो आपकी भक्ति-भावना की परीक्षा होती है ,प्रसाद के लिए आप जितना ईंतज़ार कर सकते हैं उतना ही पुण्य बढ़ता है “`राजीव बोल पड़ा |
“भाई मैं ऐसी भक्ति-परीक्षा नहीं देना चाहता…
ContinueAdded by somesh kumar on December 25, 2014 at 10:57pm — 5 Comments
2122 2122 2122 212
दिख रही निश्चिंत कितनी है अभी सोयी हुई
गोद में ये खूबसूरत जिन्दगी सोयी हुई
बाँधती आग़ोश में है.. धुंध की भीनी महक
काश फिर से साथ हो वो भोर भी सोयी हुई
चाँद अलसाया निहारे जा…
Added by Saurabh Pandey on December 25, 2014 at 9:30pm — 35 Comments
हर जगह हर घडी बस तू साथ है
जहाँ मेरी नज़रे पडी बस तू साथ है
छोड़ा वक़्त ने जहाँ मुझ बदनसीब को
वहां पे मिली खड़ी बस तू साथ है
मेरे नये संसार में बस तू साथ है
प्यार के व्यवहार में बस तू साथ है
बदल गये जिसमें मेरे सब चाहने वाले
उस वक़्त के रफ़्तार में बस तू साथ है
मोहब्बत के इस कर्ज़ में बस तू साथ है
इंसानियत के फ़र्ज़ में बस तू साथ है
यूँ तो खुशियों के हमदर्द सब हैं मगर
मुझे मिले हर दर्द में बस तू साथ है
सावन का असर है जब तू…
Added by maharshi tripathi on December 25, 2014 at 8:38pm — 7 Comments
Added by ram shiromani pathak on December 25, 2014 at 5:30pm — 30 Comments
नर्मदा के एक ऊंचे कगार पर खड़ा मै प्रकृति के अप्रतिम सौन्दर्य का अवलोकन कर रहा था कि एक ग्यारह वर्ष का बालक मेरे पास आया और बोला –‘बाबू जी मै इस कगार से नर्मदा मैया में छलांग लगाऊंगा तो तुम मुझे पांच रुपये दोगे ?’
‘क्यों, तुम इतना खतरा क्यों उठाओगे ?’
‘कल से खाना नहीं खाया, बाबू जी ‘
मैंने उसे दस रुपये दे दिए I वह मेरे पैरो मे लोट गया I तभी मुझे एक जोरदार ‘छपाक’ की आवाज सुनायी दी और उसके साथ ही एक ह्रदय विदारक चीख I मैंने घबरा कर नीचे देखा I एक दूसरा लड़का कगार से कूदा था पर…
Added by डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव on December 25, 2014 at 2:30pm — 16 Comments
हर जगह हर घडी बस तू साथ है
जहाँ मेरी नज़रे पडी बस तू साथ है
छोड़ा वक़्त ने जहाँ मुझ बदनसीब को
वहां पे मिली खड़ी बस तू साथ है
मेरे नये संसार में बस तू साथ है
प्यार के व्यवहार में बस तू साथ है
बदल गये जिसमें मेरे सब चाहने वाले
उस वक़्त के रफ़्तार में बस तू साथ है
मोहब्बत के इस कर्ज़ में बस तू साथ है
इंसानियत के फ़र्ज़ में बस तू साथ है
यूँ तो खुशियों के हमदर्द सब हैं मगर
मुझे मिले हर दर्द में बस तू साथ…
ContinueAdded by maharshi tripathi on December 25, 2014 at 12:00pm — 3 Comments
Added by Dr. Vijai Shanker on December 25, 2014 at 11:15am — 11 Comments
फँसा इन्साफ है मेरा गुनाहों की सियासत में
विचाराधीन है मेरा मुकदमा भी अदालत में
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लिये हथियार हाथों में,चली थी मज़हबी आँधी
ज़ला परिवार था मेरा , कभी शहरे क़यामत में
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अख़रता है सियासत को ,मेरा इन्सान हो जाना
हुआ बरबाद था मैं भी, क़भी सच की वक़ालत में
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कहीं मन्दिर कोई तोड़ा ,कहीं मस्ज़िद कोई तोड़ी
फँसा है आदमी देखो,न जाने किस इबादत में
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दरिन्दे आज बाहर हैं,मेरी तारीख पड़ती है
खडे मी-लॉर्ड हैं देखो ,गुनाहों की…
Added by umesh katara on December 25, 2014 at 11:00am — 20 Comments
मैं सूर्य के
गर्भ में पला हूँ
मैं अपने ही
अंतर्द्वंदों की आग में
तिल -तिल जला हूँ
अनगिनत दी हैं
अग्नि परीक्षायें
और उन क्रूर परीक्षाओं में
हरदम खरा उतरा हूँ
आसमां से मैं
धरती पर गिरा हूँ
अपने आप से ही
मैं निरंतर लड़ा हूँ
मैंने प्रसन्नचित्
मर्मान्तक पीड़ा के
पहाड़ को झेला है
हसं हसं कर
आग से खेला है
तपस्वी सा तपा हूँ
नहाया हूँ डूबकर
समुद्र…
ContinueAdded by Hari Prakash Dubey on December 25, 2014 at 4:30am — 12 Comments
122-122
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जहां में लगा है
खुदी से जुदा है
हुआ मैं पशेमाँ
गज़ब देखता है
कभी रूह झांको
खुदा बोलता है
सजन शे’र जैसा
लबों पे सजा है
सजा ज़िन्दगी की
अजब फैसला है
हंसी जब्त कर लो
हंसी में सदा है
बड़ी दास्तां है
मगर ये ज़दा है
सफ़र है गली में
मकां में अमा है
ग़मों का य’ दरिया
कहे कब…
ContinueAdded by मिथिलेश वामनकर on December 24, 2014 at 8:00pm — 24 Comments
2122 2122 2122 212
अश्क़ ऊपर जब उठा, उठ कर सितारा हो गया
जा मिला जब अश्क़ सागर से, वो खारा हो गया
चन्द मुस्कानें तुम्हारी शक़्ल में जो पा लिये
आज दिन भर के लिये अपना ग़ुजारा हो गया
चाहतें जब इक हुईं , तो दुश्मनी भूले सभी
कल पराया जो लगा था, आज प्यारा हो गया
ढूँढ कर तनहाइयाँ हम यादों में मश्गूल थे
रू ब रू आये तो यादों का खसारा हो गया
…
ContinueAdded by गिरिराज भंडारी on December 24, 2014 at 6:00pm — 40 Comments
अपनी ही परछाई से डर लगता है
मुझको इस तन्हाई से डर लगता है
साथ देखकर भाईयों का जग डरता
भाई को अब भाई से डर लगता है
मनमोहक है भोलापन उसका इतना
दुनिया की चतुराई से डर लगता है
मौन रहूं या झूठ कहूं उलझन में हूं
लोगों को सच्चाई से डर लगता है
सारा जीवन सहराओं में भटका हूं
मुझको अब अमराई से डर लगता है
कानों में इक सिसकी सीसा घोल गई
मुझको अब शहनाई से डर लगता है
ग़म…
ContinueAdded by khursheed khairadi on December 24, 2014 at 3:30pm — 10 Comments
Added by seemahari sharma on December 24, 2014 at 12:43pm — 18 Comments
“ मास्टर जी ,अपने दोस्त से पूछिए अगर मेरे लिए कोई जगह हो तो थोड़ी सिफारिश कर दे |” जब विजय मुझसे ये बात कहता है तो मेरे मन में उसके लिए नैसर्गिक साहनभूति फूटती है |मैं पहले से उसकी नौकरी को लेकर फिक्रमंद हूँ और पहले ही कई दोस्तों से उसके बारे में बात कर चुका हूँ |
कुछ लोग होते हैं जो चुम्बक की तरह अपनी तरफ खींचते हैं |विजय में मुझे वही चुम्बकत्व महसूस होता है | गोरा वर्ण ,5”6’ का कद सुघड़ अंडाकार चेहरा ,घुंघराले काले बालों के बीच में कहीं-कहीं सफ़ेद हो गए बाल ,आत्मीयता और उचित मिठास से…
ContinueAdded by somesh kumar on December 24, 2014 at 11:30am — 4 Comments
ग़ज़ल श्री गिरिराज भंडारी जी की नज्र ...
गुज़ारिश थी, कि तुम ठोकर न खाना अब
चलो दिल ने, कहा इतना तो माना अब
न काम आया है उनका मुस्कुराना अब
यकीनन चाल तो थी कातिलाना .... अब ?
ये दिल तो उन पे अब फिसला के तब फिसला
ये तय जानो, नहीं इसका ठिकाना अब
जो दानिशवर थे सब नादान ठहरे हैं
ये किसका दर है, तुमको क्या बताना अब
ये मौसम खूबसूरत था ये माना पर
वो आये तो हुआ है शायराना अब …
Added by वीनस केसरी on December 24, 2014 at 5:00am — 18 Comments
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