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एक धरा है एक गगन है

एक धरा है एक गगन है

किंतु विभाजित अपना मन है

 

मीत किसी का ख़ाक बनेगा

उसकी ख़ुद से ही अनबन है

 

याद तुम्हारी महकाये मन

इस सहरा में इक गुलशन है

 

स्वर्ग तिहारे चरणों की रज

मातृधरा तुझको वंदन है

 

चौक बड़ा सा एक चबूतर

यादों में कच्चा आँगन है

 

नहीं बहलता खुशियों से मन

ग़म से अपना अपनापन है

 

आँसू बाती आँखें दीपक

दुख की लौ में सुख रोशन है

 

घाव दिये…

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Added by khursheed khairadi on December 23, 2014 at 12:30pm — 22 Comments

तहकीक़े हयात

आज फुर्सत मे जो बैठा तो ध्यान आया है
हमने क्या खो दिया है और क्या बनाया है

वार हर बार तो होते ही रहे पीछे से
जब किसी दोस्त ने हमको गले लगाया है

कोई आवाज नही राख कोई शोला भी
ज़िन्दगी तूने हमे खूब क्या जलाया है

कोई तो एब हमारा ही रहा होगा ही
हमने हरबार जो रूठों को फिर मनाया है

मौत भी खाक 'ऋषी' रोकेगी मेरा रस्ता
मुझको मॉं बाप के आशीष ने बनाया है

अनुराग सिंह "ऋषी"

मौलिक व अप्रकाशित

Added by Anurag Singh "rishi" on December 23, 2014 at 10:06am — 10 Comments


सदस्य कार्यकारिणी
कोई कारवां भी दिखा नही / ग़ज़ल (मिथिलेश वामनकर)

11212 x 4  ( बह्र-ए-क़ामिल में पहला प्रयास) 

--------------------------------------------------------

न वो रात है, न वो बात है, कहीं ज़िन्दगी की सदा नहीं   

न उसे पता, न मुझे पता, ये सिफत किसी को अता नहीं

 

वो खुशी कभी तो मिली नहीं, मेरी किस्मतों में रही कहाँ

कोई दश्त जिसमे नदी न हो, हूँ शज़र कभी जो फला…

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Added by मिथिलेश वामनकर on December 23, 2014 at 1:30am — 48 Comments

प्रभाव-क्षेत्र

प्रभाव-क्षेत्र

अलग होना ही पर्याप्त नहीं है

मुखर होना भी जरूरी है

प्रखर होना और भी जरूरी है

इसी से बनती है पहचान

लोग यूँ ही नहीं सौपते अपनी कमान |

तीर सिर्फ विरोध के…

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Added by somesh kumar on December 22, 2014 at 11:00pm — 11 Comments

ग़ज़ल ,,,,,,,,,,,, गुमनाम पिथौरागढ़ी

२१२२  २१२२ २१२

तुमने पुरखों की हवेली बेच दी

शान दुःख सुख की सहेली बेच दी

भूख दौलत की मिटाने के लिए

मौत को दुल्हन नवेली बेच दी

जिस्म के बाजार ऊंचे दाम थे

गाँव की राधा चमेली बेच दी

बस्ता बचपन और कागज़ छीनकर

तुमने बच्चों  की हथेली बेच दी

गाँव में दिखने लगा बाज़ार पन

प्यार सी वो गुड की भेली बेच दी

मौलिक व अप्रकाशित

गुमनाम पिथौरागढ़ी

Added by gumnaam pithoragarhi on December 22, 2014 at 5:57pm — 19 Comments

नववर्ष दोहे

विभु से मांगो मित्र तुम, अब ऐसा वरदान

नये  वर्ष में शांत हो, मानव का शैतान

 

हो न धरा अब लाल फिर, महके मनस प्रसून

किसी अबोध अजान का, नाहक बहे न खून

 

सबके जीवन में खुशी, छा जाए भरपूर

अच्छे  दिन ज्यादा नहीं, भारत से अब दूर

 

कवि गाओ वह गीत अब, जिससे सदा विकास

तन में हो उत्साह प्रिय, मन में हो उल्लास

 

आपस में सद्भाव हो, सभी बने मन-मीत

ओज भरे स्वर में कवे, महकाओ कुछ गीत 

 

ऐसा जिससे नग…

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Added by डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव on December 22, 2014 at 3:00pm — 44 Comments

नवगीत : ये है नया नजरिया.

फटी भींट में चौखट ठोकी,

खोली नयी किवरिया.

चश्मा जूना फ्रेम नया है,

ये है नया नजरिया.

 

गंगा में स्नान सबेरे,

दान पूण्य कर देंगे.

रात क्लब में डिस्को धुन पर,

अधनंगे थिरकेंगे.

देशी पी अंग्रेजी बोलीं,

मैडम बनीं गुजरिया.

 

अपने नीड़ों से गायब हैं,

फड़की सोन चिरैया.

ताल विदेशी में नाचेंगी,

रजनी और रुकैया.

घूंघट गया ओढनी गायब,

उड़ती जाए चुनरिया.

 

चूल्हा चक्की कौन करे…

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Added by harivallabh sharma on December 22, 2014 at 1:55pm — 24 Comments

हुकूमत

हुकूमत हाथ में आते, नशा तो छा ही जाता है,

अगर भाषा नहीं बदली, तो कैसे याद रक्खोगे.

किये थे वादे हमने जो, मुझे भी याद है वो सब,

मनाया जश्न जो कुछ दिन, उसे तो याद रक्खोगे.

मुझे दिल्ली नहीं दिखती, समूचा देश दिखता है,   

बिके हैं लोग…

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Added by JAWAHAR LAL SINGH on December 22, 2014 at 1:30pm — 17 Comments


मुख्य प्रबंधक
हास्य घनाक्षरी : ईलाज (गणेश जी बागी)

छंद : घनाक्षरी 

झट छायी चिंता-रेखा,

नीला-नीला पाँव देखा,

पहुँचे करीम चच्चा, शफ़ाख़ाना आस में.

देखते हकीम बोला,

पाँव में ज़हर फैला,

दोनों पाँव काट डाले, ज़िन्दग़ी की आस में.

बात हुई ज़ल्द साफ़,

कट गये पर पाँव,

डरता हकीम आया, चच्चा जी के पास में.

सुनो जी करीम भाई,

बात ये समझ आई,

लुंगी रंग छोड़ रही, बोला एक साँस में.…

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Added by Er. Ganesh Jee "Bagi" on December 22, 2014 at 12:00pm — 33 Comments


सदस्य कार्यकारिणी
कुछ नक्शा बदला है \ माहिया, क़िस्त-तीन (मिथिलेश वामनकर)

मेरा मन दरपन है।

देखी छब तेरी,

आँखों में सावन है।

 

वो पागल लडकी है।

ऐसी बिछडन में.

वो कितना हँसती है।

 

क्यूँ उलटा चलते हो।

वक़्त सरीखे तुम,

हाथों से फिसलते हो।

 

जब शाम पिघलती है।

ऐसे आलम में,

क्यूं रात मचलती है।

 

सूरज को मत देखों ।

उसका क्या होगा,

चाहे पत्थर फेंकों ।

 

सूरज ने पाला है।

हँसता रातों में,

ये चाँद निराला…

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Added by मिथिलेश वामनकर on December 22, 2014 at 9:03am — 25 Comments

परिवर्तन

बदल रहा समाज बदल रहा कल आज

बीच चौराहे आ जाती अक्सर घर को लाज

सामान्य से हो रहे विवाहेत्तर सम्बन्ध

धुंधले से पड़ गये, दिल के सब अनुबंध

हर किसी को चाहिए जरुरत से ज्यादा "मोर"

भौतिकता जागी है सारे बंधन तोड़

जितना मिले उतना जगे, ज्यादा पाने की आस

कम हो गयी सहनशीलता बढ़ गयी है प्यास

हर किसी को चाहिए अस्तित्व की खोज

कमजोर हो रहे है रिश्ते, दरक रहे है रोज

आया नया ज़माना है कुछ खोकर कुछ पाना…

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Added by sarita panthi on December 21, 2014 at 8:02pm — 13 Comments

इश्क की हद से, गुज़र कर देखा...

इश्क की हद से गुज़र कर देखा,

जीते जी हमने तो मर कर देखा।

राह में तेरा वो बिछड़ जाना,

कितना तनहा सा वो सफ़र देखा।

छोड़कर तुझको जब हुए रुखसत,

हमने कई बार पलटकर देखा।

काश तू फिर कहीं पे मिल जाए,

हर गली हमने ढूँढकर देखा।

ख्वाब में भी कभी तो तू आये,

हमने नींदों में जागकर देखा।

होके तनहा सदा न देता हो,

आहटों पे भी गौर कर देखा।

ऊषा पाण्डेय.

अप्रकाशित व…

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Added by Usha Pandey on December 21, 2014 at 8:00pm — 9 Comments

ये शज़र आज भी......

अपने  वज़ूद  की  ख़बर   इस तरह  हम  देते हैं

मुट्ठी  में  रेत उठाकर  हम  हवा  में उड़ा देते हैं



क्या हुआ जो  इस  उम्र में  हम बे-समर हो गए

ये शज़र आज भी  गुज़री  बहारों  की हवा देते हैं



अब हंसी भी  लबों पे  पैबंद  सी  नज़र  आती हैं

जाने लोग आँखों में कैसे नमी को  छुपा  लेते हैं



रुख से चिलमन उठते ही नज़रें भी बहकने लगी

हम भी बेजुबानों की तरह पैमाने को उठा लेते हैं



जागते  रहे  तमाम  शब्  हम  उसके इंतज़ार में

बार बार  चरागों…

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Added by Sushil Sarna on December 21, 2014 at 7:00pm — 16 Comments

"लुटा हाट में नोट वोटें बटोरे",-

चुनावी समा बाँधना हो जभी वो,

गली में लुटाते रुपैया तभी वो|

लुटा हाट में नोट वोटें बटोरे,

यही वो घड़ी जो भुनाते चटोरे ||

 

बनायें-बिगाड़ें, सभी पे तुले वो,

इसारा मिले बर्तनें भी धुलें वो|

दिखे जो हुआ आपसे वोट लेना,

विजेता हुए तो, अधेला न देना ||

 

कभी ज्ञान की  ज्योंति जाया न होगी,

बली पुष्ट होते निरा मूढ़-रोगी |

मिटाये अँधेरा डगोँ को बढ़ाए,

यही ज्योंति प्रेरा शिखा पे…

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Added by SHARAD SINGH "VINOD" on December 21, 2014 at 6:00pm — 11 Comments

अन्धकार भी आज उदास है

भरी हुई मधुशालायें सारी

पीकर  सारे मस्त पड़ें हैं ,

मदिरालय पर लोगों का जमघट

अब मंदिर पर बंध जड़ें  हैं ,

मिटे दुःख दर्द गरीबी सारी

आया नव वर्ष उल्लास है ,

सुन्दर गति,सुन्दर मति सारी

अन्धकार…

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Added by Hari Prakash Dubey on December 21, 2014 at 5:32pm — 15 Comments

अनबूझा मौसम

अनबूझा मौसम

आसमानी बिजली

मूसलाधार बारिश

फिर सूरज की चमकती किरणें

डाल पर फूल का नव रूप धर आना

मौसम के बाद एक और मौसम ...

यह सब सिलसिला है न ?

पर किसी एक के चले जाने के बाद

यहाँ कहीं नए मौसम नहीं आए

एक मौसम लटक रहा है

उदासी का

डाल पर रुकी, लटक रही टूटी टहनी-सा

भय और शंका और आतंक का मौसम

भिगोए रहता है पलकों को

आधी रात

क्या नाम दूँ

टूटे विश्वास का…

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Added by vijay nikore on December 21, 2014 at 4:30pm — 14 Comments

स्वागत नववर्ष : दोहे

चौदह अब इतिहास है, पंद्रह से है आस.
समय सलौना कब रुका, क्षण भर अपने पास.
 
पल बीता तो कल हुआ, कल बीता तो मास.
पल पल गुजरे साल के, हर पल कल की आस,
 
खुशियाँ कितनी दे गया, गुजर गया जो साल.…
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Added by harivallabh sharma on December 21, 2014 at 2:17pm — 18 Comments


सदस्य कार्यकारिणी
गीत - आने वाला नया, नया कब रह पाता है ( गिरिराज भंडारी )

नया कहूँ तो, वैसे तो हर पल होता है

नया जागता तब है जब पिछला सोता है 

पर सोचो तो नया , नये में क्या होता है

हर पल पिछला, आगे को सब दे जाता है

 

आने वाला नया, नया कब रह पाता है

 

वही गरीबी , भूख , वही है फ़टी रिदायें 

वही चीखती मायें , जलती रोज़ चितायें

वही पुराने घाव , वही है टीस पुरानी

वही ज़हर, बारुद, धमाका रह जाता है

 

आने वाला नया, नया कब रह पाता है

 

वही अक़्ल के अंधे , जिनके मन जंगी…

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Added by गिरिराज भंडारी on December 21, 2014 at 11:48am — 25 Comments

ग़ज़ल-उमेश कटारा

फँस गया हूँ आफ़तों में
आज़ हूँ मैं पागलों में

क्या सुँकू तूने कमाया
क्या मिला है फ़ासलों में

मज़हबी आतंक से अब
आदमी है दहशतों में

सब ग़िले शिक़वे भुलादो
क्या रख़ा है रतज़गों में 

ख़ो दिये हैं घर हजारों
जिन्द़गी ने हादसों में

मौलिक व अप्रकाशित
उमेश कटारा

Added by umesh katara on December 21, 2014 at 10:00am — 11 Comments

रिश्ते हैं , बन जाते हैं -- डा० विजय शंकर

लोग मिलते हैं ,

जीवन में आते हैं ,

रिश्ते हैं , बन जाते हैं |

कभी छाँव में दो पल साथ बिताते हैं ,

कभी तपती दोपहरी भी सह जाते हैं ,

कभी चट्टान से बन जाते हैं ,

कभी बरगद की तरह हो जाते हैं,

कभी फूलों की तरह आते हैं ,

सब महका , महका जाते हैं ,

रिश्ते हैं , बन जाते हैं |



रिश्ते बनते हैं ,

बनते जाते हैं ,

कभी छूट भी जाते हैं ,

कभी कहीं बिखर जाते हैं ,

कभी बिखरने की वजह से छूट जाते हैं।

कभी कांच से भी नाज़ुक रह जाते हैं… Continue

Added by Dr. Vijai Shanker on December 21, 2014 at 9:40am — 20 Comments

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