212 122 212 12
बिन कहा समझते हैं कमाल है
क्या से क्या समझते हैं कमाल है
मैं मना करूँ तो हाँ जो हाँ करूँ
तो मना समझते हैं कमाल है
शर्म से निगाहें जो झुकी मेरी
वो अदा समझते हैं कमाल है
कद्र मैं करूँ जज्बात की जिसे
वो वफ़ा समझते हैं कमाल है
चूड़ियाँ बजें मेरी ये आदतन
वो सदा समझते हैं कमाल है
झाँकते वो मेरी आँखों के निहाँ
आईना समझते हैं…
ContinueAdded by rajesh kumari on December 14, 2014 at 10:45am — 30 Comments
Added by Dr. Vijai Shanker on December 14, 2014 at 10:04am — 9 Comments
कोहरे के कागज़ पर
किरणों के गीत लिखें
आओ ना मीत लिखें
सहमी सहमी कलियाँ
सहमी सहमी शाखें
सहमें पत्तों की हैं
सहमी सहमी आँखें
सिहराते झोंकों के
मुरझाए
मौसम पर
फूलों की रीत लिखें
आओ ना मीत लिखें
रातों के ढर्रों में
नीयत है चोरों की
खीसें में दौलत है
सांझों की भोरों की
छलिया अँधियारो से
घबराए,
नीड़ों पर
जुगनू की जीत लिखें
आओ ना मीत…
ContinueAdded by seema agrawal on December 13, 2014 at 9:30pm — 14 Comments
कोई पढ़वाता नमाज है, कोई जपवाता माला।
भारत और इंडिया का, देखो यह है गड़बड़झाला।
धर्म, जाति, मक्कारी की, हाला उसने जो पी ली है।
मानवता को नोंच, नोंचकर, लगा रहा मुंह पर ताला।
राम, रहीम, मुहम्मद हमको मिले नहीं हैं अभी तलक।
धर्म नीति के प्याले में है, दिखता बस जाला-जाला।
भावों का जो घाव मिल रहा, कब तक उसे कुरेदोगे।
मंदिर कभी और मस्जिद में, कब तक मन को तोलोगे।
ईश्वर अल्ला नाम एक ही, बोलो क्यू हो भूल रहे।
धर्म तराजू से भारत की, संतानों को तोल रहे।
तेज सियासी…
Added by Atul Chandra Awsathi *अतुल* on December 13, 2014 at 9:01pm — 3 Comments
22-22-22 / 22-22-2 / 22-22-22
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ये नींद उड़ाते है,
ख़्वाब हसीं लेकिन,
रातों को रुलाते है।
नाचों फिर रो लेना,
कुछ शब बाकी है,
तारों फिर सो लेना।
सरहद पे दुश्मन है,
सरहद आँखों में,
आँखों में सावन है।
दो नैन हुए गीले,
बाप बिदाई दे,
लो हाथ हुए पीले।
गंगा में नहा लेना,
माटी फूल बने,
गंगा…
ContinueAdded by मिथिलेश वामनकर on December 13, 2014 at 8:00pm — 6 Comments
"हे भगवान, मुझे सारी उम्र हो गई आपकी पूजा-पाठ करते हुए और कितनी परीक्षा लोगे? अब तो मुझे दर्शन दीजिए और अपनी सेवा का एक मौका देकर मेरे जीवन को धन्य कीजिए मेरे प्रभु।"
भगवान अपने भक्त की अटूट भक्ति देखकर बहुत प्रसन्न हुए और उसकी अभिलाषा पूर्ण करने के लिए एक भिखारी का रूप धारण करके उसके द्वार पर पहुँच गए।
"बेटा, कल से भूखा हूँ कुछ जलपान करवा दो।"
"सुबह-सुबह तुमको मेरा ही घर मिला था जलपान के लिए! चल भाग यहाँ से वरना तुझ पर कुत्ता छोड़ दूँगा।"
भगवान मुस्कुराते हुए अपने धाम की…
Added by विनोद खनगवाल on December 13, 2014 at 7:56pm — 4 Comments
जिंदगी में क्या कमी है !
हर ख़ुशी मेरी ख़ुशी है !!
है नहीं कोई हुनर तो !
जिंदगी किसकी सगी है !!
इल्म कोई है अगर तो !
नौकरी फिर आपकी है !!
आजकल फन का जमाना !
फेन बिना क्या आदमी है !!
हर कला को जानता वो !
इसलिए तो मतलबी है !!
तैरना तुम जानते हो !
साथ चल आगे नदी है !!
चाहिए क्या और मुझको !
जब खुदा में बंदगी है !!
है नहीं अभिमान मुझको !
जिंदगी में सादगी…
Added by Alok Mittal on December 13, 2014 at 1:00pm — 12 Comments
212 / 212 / 212 / 212 / 212 / 212 / 212 / 212
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चाँद से रूठ के जब गई चाँदनी, कुर्बतो-फासले याद आने लगे
जब हवा में नमी आज छाने लगी, दो नयन बावले याद आने लगे
वो अमरबेल तो पेड़ को खा रही, शाख के फूल से शबनमी…
ContinueAdded by मिथिलेश वामनकर on December 13, 2014 at 12:30am — 19 Comments
Added by विनोद खनगवाल on December 12, 2014 at 4:34pm — 11 Comments
Added by Neeraj Nishchal on December 12, 2014 at 1:32pm — 8 Comments
2122 2122
ये भी जीने की अदा है
ग़म खुशी में मुब्तला है
रात भी है चाँद भी और
चाँदनी की ये रिदा है
नेस्त हो जाएगा इक दिन
रेत पर जो घर बना है
हादसों के दरमियाँ इक
ज़िन्दगी का सिलसिला है
मखमली सा लम्स तेरा
सर्द जैसे ये सबा है
तुझमें है यूँ अक्स मेरा
तू कि जैसे आइना है
मैं नहीं तन्हा सफ़र में
साथ अपनो की दुआ है
छोर पर नाकामियों…
ContinueAdded by शिज्जु "शकूर" on December 11, 2014 at 10:15pm — 23 Comments
Added by Rahul Dangi Panchal on December 11, 2014 at 10:00pm — 14 Comments
कुछ लिखना चाहता हूँ
पर सोचता हूँ क्या लिखूं
कलम जब होती है हाथ में
दिल करता है कुछ सांय-सांय
सोचता हूँ
पुण्य लिखूं
सेवा लिखूं, सम्मान लिखू
हाथ से फिसलता आसमान लिखूं
सत्य लिखूं , प्रेम लिखूं
ममता लिखूं , मौन-व्यापार लिखूं
किसी उजड़ी बस्ती का हाहाकार लिखूं
पाप लिखूं, शाप लिखूं
मन का परिमाप लिखूं
भूख लिखूं , स्वार्थ लिखूं
टी वी से झांकता
आधुनिक परमार्थ लिखूं
थाना लिखूं, जेल…
ContinueAdded by डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव on December 11, 2014 at 12:30pm — 17 Comments
Added by Neeraj Nishchal on December 11, 2014 at 9:59am — 13 Comments
२२ २२ २२ २२ २२ २२
कैलेण्डर के सवालों से सहम जाता हूँ मैं
ईद दीवाली को जब नज़र मिलाता हूँ मैं
परदों से घर का हाल भला लगता है
परदों से घर की मुफलिसी छुपाता हूँ मैं
जीवन और गणित का हिसाब यार खरा है
जब आंसूं जुड़ता है हँसी घटाता हूँ मैं
मैं था काफिला था और सफ़र लम्बा
मन्जिल तक जाते तनहा रह जाता हूँ मैं
कोई मुझसे भी पूछे तू क्या चाहे गुमनाम
है प्यास प्यार की ,प्यासा रह जाता हूँ…
ContinueAdded by gumnaam pithoragarhi on December 10, 2014 at 5:30pm — 16 Comments
शादी को ३ महीने हुए थेI सुबह करीब १०.३० बजे, चित्रा नहा धो कर बाहर निकली और एक प्याला गर्म चाय का ले कर अपना LP प्लेयर ओंन कर दिया I यह वह समय था जब वह एकांत में चाय के साथ कोई ग़ज़ल या गीत सुनती है I यह वक़्त किसी के साथ भी शेयर करना उसे पसंद ना था I ख़ास तौर पर, पति के साथ I उन दोनों के स्वभाव का अंतर इस वक़्त और मुखर हो कर उसे डसने लगता था I इसलिए उनके जाने के पश्चात वह फारिग हो, कुछ समय नितांत अपने लिए चुनती थी, और यह वही समय था I आँखें बंद किये मेंहदी हसन की आवाज़ उसके अंतर में पहुँच रही थी I…
ContinueAdded by poonam dogra on December 10, 2014 at 4:00pm — 13 Comments
हूँ महफ़िलों में तन्हा, खुद की नज़र में रुस्वा
हर एक रंग फीका , हर एक शै फसुर्दा
आवाज़ें दोस्तों की ,मुझ से नहीं हैं गोया
ज़िंदा दिली भी जैसे , करती है मुझ से पर्दा
क्या ग़म है ज़िन्दगी में , तुमको बताऊँ कैसे
अब तक हुआ नहीं है , ये राज़ मुझे पे अफ़्शाँ
उलझन है कैसी दिल की ? उलझन यही है मुझको
रंग ज़िन्दगी से रूठे , दिल भी रंगों से रूठा…
Added by saalim sheikh on December 10, 2014 at 3:30pm — 7 Comments
Added by Dr. Vijai Shanker on December 10, 2014 at 9:51am — 22 Comments
1 2 2 2
हुआ पैदा कि धोके से, किसी का पाप मैं बन के
मुझे फेंका गया गन्दी कटीली झाड़ियों में फिर
कि चुभती झाड़ियाँ फिर फिर, कि होता दर्द भी फिर फिर
यहाँ काटे कभी कीड़े, वहां फिर चीटियाँ काटे
पड़ा देखा, उठा लाई, मुझे इक चर्च की दीदी.
हटा के चीटियाँ कीड़े, धुलाए घाव भी मेरे
बदन छालों भरा मेरा, परेशां मैं अज़ीयत से
खुदा से मांगता हूँ मौत अपनी सिर्फ जल्दी से
बड़ी नादान दीदी वो, लगाती जा रही मरहम
दुआ…
ContinueAdded by मिथिलेश वामनकर on December 10, 2014 at 1:30am — 15 Comments
पीर पैरों की खड़ा होने नही देती मुझे
मेरी देहरी ही बड़ा होने नहीं देती मुझे
फिर वही आँगन की परिधि में बँट गया
किंतु सीमाएँ मेरी खोने नहीं देती मुझे
उधर पाबंदी ज़माने की हैं हँसनें पे मेरे
इधर दीवारें मेरी रोने नहीं देती मुझे
कर्म के ही हल…
ContinueAdded by ajay sharma on December 9, 2014 at 11:00pm — 8 Comments
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