सुन्दर शय्या
अधमुँदी सी आँखे
एक लम्बी सांस
एकांत वास
सोच के तार
अतीत मे जा
जिंदगी की किताब
खोली जो इक बार
पन्ना- दर- पन्ना
धोखा, छल, आघात
कभी भावुकता तो
कभी अज्ञानता
भरे निर्णय,
कभी विवशता
रिश्ते निभाने की
तो कभी मजबूरी
सामाजिकता की,
जीवन की लम्बी डगर
पग-पग अवरोध,
बावजूद, बढ़ती गई वो
कदम-कदम
लड़खड़ाती,संभलती
तपन दिनकर की सहती,
चढती गई
हर चढाई
मिले…
Added by Meena Pathak on December 9, 2014 at 10:30pm — 14 Comments
22-22-22 / 22-22-2 / 22-22-22
मस्जिद न शिवाला है,
दिल में रहता तू,
तेरा घर भी निराला है.
तू मन का दरपन है
बस एक उजाले से,
सूरज भी रौशन है.
देखों मन का आँगन,
बादल आँखों में,
फिर खूब झरा सावन.
लो छूटा अपना घर,
एक मुसाफिर हूँ,
लम्बा है आज सफ़र.
सूरज जब ढल जाए,
मन अँधियारा हो,
तब दीपक जल जाए.
परबत पर बादल है,
दरिया बहता…
ContinueAdded by मिथिलेश वामनकर on December 9, 2014 at 1:00am — 16 Comments
बह्र : २२१२ १२११ २२१२ १२
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अपनी मिठास पे उसे बेहद गरूर था
समझा था जिसको आम वो बंदा खजूर था
मृगया में लिप्त शेर को देखा जरूर था
बकरी के खानदान का इतना कसूर था
दिल्ली से दिल मिला न ही दिल्ली में दिल मिला
दिल्ली में रह के भी मैं यूँ दिल्ली से दूर था
शब्दों में विश्व जीत के शब्दों में छुप गया
लगता था जग को वीर जो शब्दों का शूर था
हीरे बिके थे कल भी बहुत, आज भी बिकें
लेकिन…
ContinueAdded by धर्मेन्द्र कुमार सिंह on December 8, 2014 at 8:30pm — 30 Comments
अब नहीं करता मेरा मन ,
अपने घर जाने को ,
ना जाने क्यों ?
हालाँकि बदला कुछ खास नहीं है.
सिर्फ माता-पिता का साया उठा है ,
उस घर से , अलावा सब वैसा ही तो है,
भाई-भाभी, बच्चे , पडोसी सब.
पर पता नहीं अब क्यों नहीं ,
लगता मन ,
सोचता हूँ क्या खास था तब ,
दौड़ा चला आता था मैं ,
बेवजह छुट्टियां लेकर ,
अब छुट्टी हो तब भी ,
नहीं करता मेरा मन ,
अपने घर जाने को ,
ना जाने क्यों ?
अप्रकाशित -मौलिक
Added by Naval Kishor Soni on December 8, 2014 at 6:07pm — 13 Comments
अतुकांत - स्वीकार हैं मुझे तुम्हारे पत्थर
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स्वीकार हैं मुझे आज भी
कल भी थे स्वीकार , भविष्य मे भी रहेंगे
तुम्हारे फेके गये पत्थर
तब भी फल ही दिये मैनें
आज भी दे रहा हूँ , और मेरा कल जब तक है देता रहूँगा
मैं जानता हूँ और मानता हूँ , इसी में तो मेरी पूर्णता है
यही मेरी नियति है , और उद्देश्य भी
चाहे मेरी जड़ों को तुमने पानी दिया हो या नहीं
मैं अटल हूँ , अपने उद्देश्य में
पर आज…
ContinueAdded by गिरिराज भंडारी on December 8, 2014 at 4:30pm — 20 Comments
.
"मौलिक व…
Added by Shraddha Thawait on December 8, 2014 at 3:30pm — 11 Comments
डाटा
मैमोरी-कार्ड लगाकर हरीश ने गैलरी खोली |परंतु-वहाँ सब कुछ खाली था |कोई पिक्चर-वीडियो-ऑडियो कुछ भी नहीं |शायद कैमरे का सोफ्टवेयर खराब हो ये सोच कर वो पड़ोसी के पास पहुँचा |
पहले पड़ोसी का मोबाईल ,फिर पी.सी. पर नतीजा वही - - - -
वही संदेश –ये फाईल खुल नहीं सकती या खराब हो चुकी है|
उसकी आँखों के सामने शून्य तैर गया |सब कुछ खत्म हो जाने के अहसास से वो टूट गया |कुछ भी नहीं बचा था अब जगजाहिर करने को |बेशक उसके मन में स्मृतियों का अनंत संरक्षित हो पर बाहरी तौर…
ContinueAdded by somesh kumar on December 8, 2014 at 11:19am — 10 Comments
Added by Dr. Vijai Shanker on December 7, 2014 at 9:51am — 14 Comments
यूँ तो 17 बरस की उमर मेँ भी वो बड़ी भोली थी। उसकी हर बात मेँ अभी भी बचपना-सा था।
उसकी बातेँ कभी मुझे माता की गोद के समान आनन्दित कर देती तो कभी उसकी ज़िद खीझ उत्पन्न कर अपना गुस्सा उस पर उतार देने को विवश। अक्सर ही मैँ उसे कहता- "न जाने तुम कब बड़ी होओगी ?"
और वो मुस्कुरा कर कहती- "मै नही सुधरने वाली।"
आज पूरे दो साल बाद मैँ उससे मिलने वाला हूँ। जाने वो कैसी दिखती होगी? मुझे देखते ही मुझे मारने दौड़ पड़ेगी। खूब शिकायतेँ करेगी और भी न जाने क्या-क्या पूर्वानुमान लिए मैँ उससे…
Added by pooja yadav on December 6, 2014 at 7:30pm — 6 Comments
एक प्रयास ...नवगीत : तुम अब तक भूखे हो?
हम सबको तो मिला चबैना,
तुम अब तक भूखे हो?
बंटता खूब चुनावी चंदा,
तुम अब तक रूखे हो?
पंजा वाले, सइकल वाले,
कुछ हाथी वाले थे.
खिले फूल थे, दीवारों पर,
सब अपने वाले थे.
बटी बोतलें गली गली में,
तुम अब तक छूछे हो?
हम सबको तो मिला चबैना,
तुम अब तक भूखे हो?
हाथों…
Added by harivallabh sharma on December 6, 2014 at 11:00am — 14 Comments
मुहब्बत का ज़ला हूँ मैं,पिघलता ही रहा हूँ मैं
ख़ुदा से माँगकर तुझको,भटकता ही रहा हूँ मैं
................
समन्दर के किनारों ने समेटा है बहुत मुझको
मगर आँखों की कोरों से निकलता ही रहा हूँ मैं
................
अगर सच बोलता हूँ तो,समझते हैं मुझे पागल
मगर सच्चाई को लेकर ,उबलता ही रहा हूँ मैं
................
सितारों की कसम ले ले,नजारों की कसम ले ले
तेरे दीदार की ख़ातिर मचलता ही रहा हूँ मैं
.................
मेरी किस्मत के सौदागर ,मुझे…
Added by umesh katara on December 6, 2014 at 10:00am — 21 Comments
इश्क़ तो इश्क़ है फितूर नहीं
कौन है जो नशे में चूर नहीं
लक्ष्य कोई भी पा सकोगे तुम
हौसला हो तो लक्ष्य दूर नहीं
आके मिल मुझसे बात भी कर अब
दूर से ऐसे मुझको घूर नहीं
सब खुदा हो गए ये बाबा तो
संत जैसा किसी पे नूर नहीं
सिर्फ ममता मिलेगी आँचल में
माँ खुदा सी है कोई हूर नहीं
सब पुजारी हैं आज दौलत के
कोई तुलसी रहीम सूर नहीं
बेवजह रस्ता देख मत गुमनाम
तेरी तक़दीर में हुज़ूर नहीं
गुमनाम…
Added by gumnaam pithoragarhi on December 5, 2014 at 6:00pm — 13 Comments
अलि, आज छू गया प्रिय से दुकूल !
पुलक गया मन महक उठा तन
हंस रहा अंतर का वृन्दावन
भाव के मेघ उठे सागर की छोर
मन में बरस गए सावन के घन
अम्बर से तारों के फूल गए झूल I
बसी नस-नस में पीड़ा की पीर
सुप्त उर हो उठा सहसा अधीर
पाटल से छिल रहा सांवला तन
मन को बेध गया नैनो का तीर
फूलो सा फूल गया अंतस का फूल I
मुकुलित…
ContinueAdded by डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव on December 5, 2014 at 1:00pm — 18 Comments
Added by Rahul Dangi Panchal on December 5, 2014 at 12:30pm — 11 Comments
[ 2 2 1 2 ]
वो आज ही बेवा हुई !
बुझ-सी गई जब रौशनी, जमने लगी जब तीरगी,
बदली यहाँ फिर ज़िन्दगी, वह आज ही बेवा हुई !
क्यूं तीन बच्चे छोड़कर, मुंह इस जहां से मोड़कर,
वो हो गया ज़न्नतनशीं, वो आज ही बेवा हुई !
है लाश नुक्कड़ पे पड़ी, मजमा लगा चारो तरफ,
उस पर सभी नज़रें गड़ी, वह आज ही बेवा हुई !
वो रो रही फिर रो रही, बस लाश को वो ताकती,
उसने कहा कुछ भी नहीं, वो आज ही बेवा हुई !
फिर यकबयक वो चुप हुई,…
ContinueAdded by मिथिलेश वामनकर on December 5, 2014 at 2:30am — 19 Comments
हर क़दम पर मात खाकर रह गई,
जिंदगी सर को झुका कर रह गई.
देख लो पहचान मेरी हो जुदा,
एक खुदसर में समाकर रह गई.
होगी मलिका सल्तनत की वो मगर,
मेरी खातिर कसमसा कर रह गई.
रूह मुझसे जाँ छुड़ाने के लिए,
हर दफा बस छटपटा कर रह गई.
सोजे दिल पानी से भी ना बुझ सके,
आंख भी आंसू बहा कर रह गई.
(मौलिक एवं अप्रकाशित)
Added by इमरान खान on December 4, 2014 at 3:58pm — 16 Comments
आज से 2 साल पहले ज़िन्दगी की सबसे काली रात मेरी प्रतीक्षा कर रही थी |काला नाग अपना फन फैलाए ,घात लगाए बैठा था ,मेरा सब कुछ छीन लेने के लिए |नहीं जानता था की जीवन के सबसे सुंदर सपने का आज अंत हो जाएगा | 12 दिसम्बर 2009 को जब प्रणय-सूत्र में तुमसे बंधा था तो उसी रोज़ से एक सपने में खो गया था |तुम्हारे सपने में |–जैसा की तुम्हारा नाम था –‘सपना | जगती हुई आँखे में तुम और सोते हुए भी बस तुम्हारा ही सपना |अपने नाम के मुताबिक जीवन में कितनी रंगीनिया भर दी तुमने |कहने को तो मैं एक सपने में था…
ContinueAdded by somesh kumar on December 4, 2014 at 11:30am — 12 Comments
१२२२ १२२२ १२२२
अकेले पन को कर ले तू , ठिकाना अब
क़सम ली है, तो उस चौखट न जाना अब
समय बदला तो वो बदले , नज़र बदली
चलो कर लें निकलने का बहाना अब
वही आंसू , वही आहें , वही ग़म है
कहीं पे ख़त्म हो जाये फ़साना अब
झिझक ये ही हरिक दिल में, यही डर है
कहेगा क्या जो जानेगा ज़माना अब
सुनो तितली , सुने पंछी बहारें भी
मेरे उजड़े हुये घर में , न आना…
ContinueAdded by गिरिराज भंडारी on December 4, 2014 at 11:00am — 32 Comments
तेरा दिया जन्म
मुझे स्वीकार नहीं
जन्म स्थान
मुझे स्वीकार नहीं
यह नाम
मुझे स्वीकार नहीं
स्वीकार नहीं मुझे
कर्म करना, और
भाग्य से बंध जाना
मुझे स्वीकार नहीं
स्वीकार नहीं मुझे
तेरे तथा-कतिथ दूतों के
नैतिकता-अनैतिकता के निर्देश
उनके छल भरे उपदेश
तेरे नाम पर रचे, उनके
षडयन्त्र भरे परिवेश
मैं विद्रोही तेरी माया का
आ ,मुझे नरसिंह बनकर
हिरण्यकश्यप की तरह मार दे
या…
ContinueAdded by Hari Prakash Dubey on December 3, 2014 at 10:30pm — 14 Comments
Added by Neeraj Nishchal on December 3, 2014 at 12:32pm — 30 Comments
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