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लघुकथा : सुकून (गणेश जी बागी)

                         व्यंग्यात्मक शैली में लिखने के लिए जाना जाता है, उसकी कवितायेँ बिम्बों और प्रतीकों के माध्यम से राजनेताओं पर तीखी मार करती हैं, उसकी कविता प्रतिष्ठित अखबार के साहित्यिक स्तम्भ में आज प्रकाशित हुई है, कल से ही वो परेशान और बेचैन था, जाने क्या होगा, पता नहीं उसकी अभिव्यक्ति को लोग समझ भी पाएंगे अथवा नहीं, रात भर वह सो न सका ।
                        सुबह होते ही मोबाइल की घंटियां बजने लगी, उसका मन शांत था और…
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Added by Er. Ganesh Jee "Bagi" on December 3, 2014 at 12:13pm — 33 Comments


सदस्य कार्यकारिणी
दोहे-क़िस्त तीन

मुट्ठी में कब रेत भी, ठहरी मेरे यार।

चार पलों की जिंदगी, बाकी सब बेकार।।

 

जीवन की इस भीड़ में, सबके सब अनजान।

सिर्फ फलक ही जानता, तारों की पहचान।।

 

पाप पुण्य जो भी किया, सब भोगे इहलोक।

जाने कैसा कब कहाँ, होगा वो परलोक।।

 

आँखों ने जाहिर किया, कुछ ऐसा अफ़सोस।

आँखों पे कल धुंध थी, अब आँखों में ओंस।।

 

व्यर्थ मशालें ज्ञान की, प्रेम पिघलते दीप।

बिखरी है हर भावना, सिमटा दिल का सीप।।

 

सागर से…

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Added by मिथिलेश वामनकर on December 3, 2014 at 3:00am — 11 Comments


सदस्य कार्यकारिणी
दोहे-क़िस्त दो

घर बदला, बदला जहां, बदले बदले लोग ।

अर्थ बदलते देखिए, क्या जोगी क्या जोग ।।

 

पलकों से उतरी जरा, धीरे धीरे रात ।

शामों की दहलीज पे, साए करते बात ।।

 

धुंधली धुधली हो गई, यादों की सौगात।

अफरातफरी वक़्त की, ये कैसे हालात।।

 

आवाजे होती गई, सब की जब खामोश।

शहर बिचारा क्यों मढ़े, सन्नाटे को दोष।।

 

ढलती शामों में किया, पीपल ने संतोष।

बिछड़ गई परछाइयाँ, सूरज भी खामोश ।।

 

हमने जब से ले लिया, इश्क़…

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Added by मिथिलेश वामनकर on December 3, 2014 at 3:00am — 8 Comments


सदस्य कार्यकारिणी
दोहे-क़िस्त एक

मिलना तो दिल खोल के, मिल लो मेरे यार।

छोटी सी है ज़िन्दगी, तुम छोड़ो तकरार ।।

 

बहुत दिनों से गर्म है, सपनो के बाज़ार ।

बदल रहे है देखकर, रिश्तो के आसार।।

 

आँखे भर भर आ गई, छूकर उनके पाँव।

यादों में फिर छा गया, बरगद वाला गाँव।।

 

मौसम की पदचाप भी, गुमसुम और उदास।

आँगन की तुलसी डरी, सहमा देख पलाश ।।

 

रहने दो गुल बाग में, गुंचा और बहार ।

हरियाली का इस तरह, ना बाटो सिंगार।।

 

मालिक के  दीदार…

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Added by मिथिलेश वामनकर on December 3, 2014 at 2:30am — 12 Comments


सदस्य कार्यकारिणी
अपना घर (नज़्म)

वक़्ते-पैदाइश पे यूं

मेरा कोई मज़हब नहीं था

गर था मैं,

फ़क़त इंसान था, इक रौशनी था

बनाया मैं गया मज़हब का दीवाना

कि ज़ुल्मत से भरा इंसानियत से हो के बेगाना

मुझे फिर फिर जनाया क्यूँ

कि मुझको क्यूँ बनाया यूं

पहनकर इक जनेऊ मैं बिरहमन हो गया यारो

हुआ खतना, पढ़ा कलमा, मुसलमिन हो गया यारों

कहा सबने कि मज़हब लिक्ख

दिया किरपान बन गया सिक्ख

कि बस ऐसे धरम की खाल को

मज़हब के कच्चे माल को…

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Added by मिथिलेश वामनकर on December 3, 2014 at 2:00am — 22 Comments

ग़ज़ल--उमेश कटारा

क्या पता किस ख़ुदा ने बनायी मोहब्बत

पत्थरों से मुझे फिर करायी मोहब्बत



उसकी आँखों में सारा जहाँ मिल गया था

उसने हँसके ज़रा सा ज़तायी मोहब्बत



वो मेरा हा गया ,हो गया मैं भी उसका

हमने बर्षों तलक फिर निभायी मोहब्बत



रोज मिलने लगे ,सिलसिला चल पड़ा था

चाँद तारों से मैंने सजायी मोहब्बत



पर खुदा हमसे नाराज रहने लगा तो

दिलजलों की तरह फिर जलायी मोहब्बत



हो गये हम दिवानों से मशहूर दोनों

दुश्मनों ने बहुत फिर सतायी मोहब्बत



ख़ाक में…

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Added by umesh katara on December 2, 2014 at 7:37pm — 15 Comments

आभास हो तुम ......

आभास हो  तुम  ........

आभास हो  तुम  विश्वास  नहीं हो

तुम रूठी  तृप्ति  की प्यास नहीं हो

जिन मधु पलों को मौन भी तरसे

तुम उस पूर्णता का प्रयास नहीं हो

आभास हो  तुम  विश्वास  नहीं हो 

तुम रूठी  तृप्ति  की प्यास नहीं हो .........

अतृप्त कामनाओं के स्वप्न नीड़ हो

अभिलाष कलश  के  विरह नीर हो

जिस प्रकाश  को  तिमिर भी तरसे

तुम उस  जुगनू  का प्रकाश नहीं हो

आभास हो  तुम  विश्वास  नहीं हो 

तुम रूठी…

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Added by Sushil Sarna on December 2, 2014 at 1:30pm — 17 Comments

इंसान कौन?

एक नामी कॉलेज मेँ कोई मनचला एक लड़की के साथ बदतमीज़ी करने लगा और वो डरी सहमी होने के बाद भी विरोध करने का प्रयास कर रही थी, लेकिन नाकाम रही और वहाँ खड़े लोग मूकदर्शक बने तमाशे का आनन्द लेते रहे।

"ऐसे पचड़ोँ मेँ कोई भला क्यूँ पड़े?"

पर एक लड़के को जाने क्या पड़ी थी जो उस लड़के को पकड़कर एक थप्पड़ रसीद कर दिया। उस मनचले को ऐसा अप्रत्याशित व्यवहार असहनीय था। उसने झट से पलटवार किया। मामले को यूँ बढ़ता देख लोगोँ ने बीच-बचाव किया।



"आखिर इस दृश्य मेँ वह आनन्द कहाँ था?"

खैर, बला… Continue

Added by pooja yadav on December 2, 2014 at 12:02pm — 10 Comments

वो मेरा साथी मेरा सहारा मेरा दोस्त

मेरी खिड़की से दीखता है एक पेड़

उसका हाल भी मेरे जैसा ही है

ना जाने कब प्यार कर बैठे हम

जब भी खिड़की खोलती हूँ

उसे अपने इन्तजार में ही पाती हूँ

 

कोई तो है जिसे हर पल मेरा इन्तजार है

मेरा साथी मेरा सहारा मेरा दोस्त

एक अनजाना सा बंधन बंध गया है

हम दोनों के बीच में

हर पल मुझे ही निहारा करता है

 

जब भी उसके सामने से गुजरती हूँ

कहता है जल्दी आना

में तुम्हारा यही इन्तजार कर रहा हूँ

दिल खुश हो…

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Added by sarita panthi on December 2, 2014 at 10:00am — 13 Comments

खुदा को दो नयी मज़ार बनानी थी

छुपा कर दिल में रक्खी थी

बचपन में बनी प्रेम कहानी थी

 

तुम्हारे जिस पर नाम लिखे थे

दीवार वो, बहुत पुरानी थी

 

पगली ,इश्क में तेरे दीवानी थी

तूने फ़ौज मैं जाने की ठानी थी    

 

तुझे सेहरा बाँध के आना था

निकाह की रस्म निभानी थी

 

कुछ अजब तौर की कहानी थी

तेरी लाश तिरगे में आनी थी

 

उठ गए थे खुनी खंज़र

जान तो जानी ही थी

 

अरे आसमां से तो पूछ लेता

खुदा गर तुझे ,बिजली…

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Added by Hari Prakash Dubey on December 1, 2014 at 11:00pm — 25 Comments

चित्र हो और कोई , ये गॅवारा नहीं

साथ मेरे चलों , तो चलों उम्र भर ,

दो कदम साथ चलना गॅवारा नहीं।

तुम अधूरे इधर , मैं हूँ अधूरा उधर ,

दोनों आधे जिये , ये गॅवारा नहीं ।

तुम जो कह दो शुरू, तो शुरूआत हो

तुम जो कह दो खतम , सॉस थम जोयगी ।

पंथ कांटों का हो या कि फूलों भरा

तुम नहीं साथ में , ये गॅवारा नहीं ।

लाख नजरों में दिलकश नजारे रहे

किंतु आँखों की देहरी को न छू सके

मेरे सपनों के घर में सिवाय तेरे ,

चित्र हो और कोई , ये गॅवारा नहीं

मैं अकेला रहूँ या रहूँ भीड…

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Added by ajay sharma on December 1, 2014 at 11:00pm — 11 Comments

दोहे 19(खिचड़ी)

जब से देखा है उन्हें'रहा न खुद का ज्ञान।

जादूगरनी या कहूँ'मद से भरी दुकान।।1 

दुख की रजनी जब गयी'सुख का हुआ प्रभात।

तरुअर देखो झूमते'नाच रहे हैं पात।।2

उपवन में ले आ गयीं'अनुपम एक सुगंध।

मन भँवरे ने कर लिया'जीने का अनुबंध।।3

मन उपवन में बस गया'उनका उजला चित्र।

बाकी सब धुँधला दिखे'अब तो मुझको मित्र।।4

नीति नियम हों साथ में'नेह भरा लघु कोष।

हिय उपवन में तब रहे'परम शांति संतोष।।5

मानवता…

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Added by ram shiromani pathak on December 1, 2014 at 9:00pm — 20 Comments

क्षणिकायें - 4 -डॉo विजय शंकर

प्यार का
अर्थ खोजोगे
प्यार खो दोगे

दोस्ती की
वजह खोजोगे
दोस्ती खो दोगे

रिश्तों का अर्थशास्त्र
न काम करे अर्थ ,
न करे शास्त्र

राजनीति
बिना दूध दही
ढेरों नवनीत

शाश्त्रों का अर्थ
अपना अपना
अर्थशास्त्र

मौलिक एवं अप्रकाशित

Added by Dr. Vijai Shanker on December 1, 2014 at 8:30am — 21 Comments

बस इतना मेरा जीवन

बस इतना मेरा जीवन

मैं बच्चों में बच्चे मुझमें

बस इतना मेरा जीवन

 

वो ही मेरा सोना-चाँदी

उनसे मेरा तन-मन-धन

आने वाले कल की सूरत

जिनकी रेखा खींच रहा

कल पक के धन्य-धान करेंगी

मैं वो फसलें सींच रहा

मैं बच्चों में बच्चे मुझमें

बस इतना मेरा जीवन

 

सुबह मिल अभिवादन करते

मन हो जाता बहुत प्रसन्न

होड़ लगाए बढ़-चढ़ आते

सर बजा दें टन-टन-टन |

मैं बच्चों में बच्चे मुझमें

बस इतना मेरा…

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Added by somesh kumar on November 30, 2014 at 11:50pm — 7 Comments

हम याद तुम्ही को करते थे

हम याद तुम्ही को करते थे,

छुप छुप के आहें भरते थे,

मदहोश हुआ जब देख लिया

सपनों में अब तक मरते थे.

रूमानी चेहरा, सुर्ख अधर,

शरमाई आँखे, झुकी नजर,

पल भर में हुए सचेत मगर,

संकोच सदा हम करते थे.

कलियाँ खिलकर अब फूल हुई,

अब कहो कि मुझसे भूल हुई,

कंटिया चुभकर अब शूल हुई,

हम इसी लिए तो डरते थे.

अब होंगे हम ना कभी जुदा,

बंधन बाँधा है स्वयं खुदा,

हम रहें प्रफुल्लित युग्म सदा,

नित आश इसी की करते…

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Added by JAWAHAR LAL SINGH on November 30, 2014 at 8:58pm — 22 Comments


सदस्य कार्यकारिणी
आग लगाते वो कुछ इस तरह जो धुआँ तक नहीं होता(ग़ज़ल 'राज')

२११२ २१२२  १२२१  २२१२ २२

लोग हुनरमंद कितने किसी को गुमाँ तक नहीं होता

आग लगाते वो कुछ इस तरह जो धुआँ तक नहीं होता

 

जह्र फैलाते हुए उम्र गुजरी भले  बाद में उनकी

मैय्यत उठाने कोई यारों का कारवाँ तक नहीं होता

 

आज यहाँ की बदल गई आबो हवा देखिये कितनी

वृद्ध की माफ़िक झुका वो शजर जो जवाँ तक नहीं होता

 

मूक हैं लाचार हैं जानवर हैं यही जिंदगी इनकी  

ढो रहे हैं  बोझ पर दर्द इनका बयाँ तक नहीं होता

 

 ख़्वाब सजाते…

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Added by rajesh kumari on November 30, 2014 at 7:05pm — 23 Comments

ग़ज़ल

ग़ज़ल के 4 अशआर 

सन्नाटों पर खूब सितम बरपाती है
मेरे भीतर तन्हाई चिल्लाती है
संकल्पों के मन्त्र मैं जब भी जपता हूँ
मंज़िल मेरे और निकट आ जाती है
पूरी क्षमता से जब काम नहीं करता
मेरी किस्मत भी मुझ पर झल्लाती है
हर पल तुझ को याद किया करता हूँ मैं
याद विरह के दंशों को सहलाती है

मौलिक व अप्रकाशित .... 

Added by Ajay Agyat on November 30, 2014 at 5:23pm — 9 Comments

बुद्ध हो गये क्या

बुद्ध हो गये क्या?
शुद्ध हो गये क्या?

मज़ाक मज़ाक में!
क्रुद्ध हो गये क्या?

उसको देख देख!
मुग्ध हो गये क्या?

सफेदी दिखी है!
दुग्ध हो गये क्या?

अपनों के पथ में!
रुद्ध हो गये क्या?
**************
-राम शिरोमणि पाठक
मौलिक/अप्रकाशित

Added by ram shiromani pathak on November 30, 2014 at 5:00pm — 12 Comments

अलबेला चाँद

पत्नी या प्रेमिका

चांद जैसी नहीं

सचमुच चाँद होती है

कभी लगती हेम जैसी

कभी देवि कालिका 

कभी अंधकार

कभी मानस मरालिका

अंतस में अमिय-घट

स्वर्गंगा पनघट

राका एक छली नट

अभ्र बीच नाचे तू

चपला का शुभ्र पट 

स्वयं में मगन  इतना

शीतल तू आह कितना

सताये न अगन

चातक भी बैठा चुप   

सहेजे निज लगन  

सोलह कला चाँद में

अहो ! षोडश शृंगार में

अरे—रे---…

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Added by डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव on November 30, 2014 at 3:00pm — 6 Comments

दोहा...........पूजा सामाग्री का औचित्य

दोहा...........पूजा सामाग्री का औचित्य

रोली पानी मिल कहें, हम से है संसार।
सूर्य सुधा सी भाल पर, सोहे तेज अपार।।1

चन्दन से मस्तक हुआ, शीतल ज्ञान सुगन्ध।
जीव सकल संसार से, जोड़े मृदु सम्बन्ध।।2

अक्षत है धन धान्य का, चित परिचित व्यवहार।
माथे लग कर भाग्य है, द्वार लगे भण्डार।।3

Added by केवल प्रसाद 'सत्यम' on November 30, 2014 at 12:00pm — No Comments

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