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यह रास्ते ... यह मोड़

यह रास्ते … यह मोड़
 
मुद्दतें  हो  चुकी  हैं रास्तों  को
रास्तों  से अलग  हुए
फिर  भी  कोई  उमीद  लिए
रात से  भोर  तक और  फिर
एक और  रात  तक  
लैम्पपोस्ट  के कांपते  प्रकाश  तले
समर्पण  भाव  से  यह  रास्ते
चट्टानी  चुप्पी  की  चादर  ओढ़े
यह  उसी  मोड़  पर जुड़े  रहे
 
जमी  रही  है  उस  मोड़  पर
अनोखी  इमानदारी  से
हमारी  विरह  की…
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Added by vijay nikore on April 24, 2021 at 11:30pm — 3 Comments

ग़ज़ल: कफ़स में उम्र गुजरी है परिंदा उड़ न पायेगा

1222 1222 1222 1222

कफ़स में उम्र गुजरी है परिंदा उड़ न पायेगा

जो तुम आज़ाद भी कर दो घर अपने मुड़ न पायेगा

संभल जाना अगर कोई तुम्हें करने ख़ुदा आये

वगरना ऐसे तोड़ेगा कि दिल फ़िर जुड़ न पायेगा

वो चाहे बेड़ियों से हो या फ़िर की हो किसी दिल से

अगर जो पड़ गई आदत तो बंधन छुड़ न पायेगा

लुटेरे हैं ये सब मुफ़्लिस जो तुम विश्वास दिलाते हो

रिवायत बन गया गर ये भरम फ़िर तुड़ न पायेगा

तमाम आज़ी कुछ आदत…

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Added by Aazi Tamaam on April 24, 2021 at 10:40am — No Comments

बलि नित्य चढ़ाई जाती है

आशाओं , आकांक्षाओं की

जीवन की और प्रतिभाओं की

इस लोकतन्त्र के मन्दिर में

बलि नित्य चढ़ाई जाती है

कोरोना की महमारी में

त्रासद स्थिति, लाचारी में

लाशों पर राजनीति करके

जनता भरमाई जाती है

जिस समय मुसीबत ने घेरा

चँहु ओर काल का है डेरा

वीभत्स घड़ी में आन्दोलन

रैली करवाई जाती है

नज़रें गड़ाए सब वोटों पर

टिकती निगाह बस नोटों पर

शासन में भागीदारी की

कामना जगाई जाती…

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Added by Usha Awasthi on April 24, 2021 at 9:47am — 4 Comments

याद तुम्हारी

याद तुम्हारी क्या बतलाऊँ

कैसे कैसे आ रही है

चलने का अंदाज़ ठुमक कर

मचल-मचल कर और चहक कर

हाथों को लहरा-लहरा कर

अदा-अदा से और विहँस कर

तेरी सुंदर-सुंदर बातें

मन हर्षित है गाते-गाते

मैं कब से आवाज दे रहा

आ जाते हँसते-मुस्काते

तेरे गालों वाले डिम्पल

याद आते हैं मुझको पल-पल

मिसरी में पागे होठों के

नाज़ुक चुम्बन कोमल-कोमल

एक छवि मुस्कान बटोरे

मुझको अपने परितः घेरे

सुंदर सुखद समीर…

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Added by आशीष यादव on April 24, 2021 at 4:36am — 1 Comment

चूड़ी भरी कलाईयाँ, कँगना बसंत है - ग़ज़ल

एक ग़ज़ल 

 

चूड़ी भरी कलाईयाँ, कँगना बसंत है. 

सिंदूर भर के मांग में सजना बसंत है.

 

चारों तरफ घिरी रहें यादों की बदलियाँ, 

फिर उनके साथ रात में जगना बसंत है. 

 

बिखरी हुई हो चाँदनी नदिया के तीर…

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Added by बसंत कुमार शर्मा on April 22, 2021 at 8:28pm — 4 Comments

बिना बात की बात

बिना बात की बात बनाते,

लोग यहाँ दिख जाते हैं

जैसे उल्लू सीधा होता,

वैसे ही बिक जाते हैं।

धर्म नहीं जानें क्या होता,

क्या जानें परिभाषा को

रिश्तों को अब मान नहीं है,

स्थान नहीं कुछ आशा को।

दशरथ घर से बाहर हैं अब,

पूत वहाँ का राजा है,

देकर वचन भूल जाना बस,

यही समय से साधा है

सरयू को अपमानित करते,

गंगा दूषित होती है

देख नज़ारा प्रतिदिन का यह,

भारत भू अब रोती है।

राम नहीं है घट में लेकिन,

झंडों पर…

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Added by सतविन्द्र कुमार राणा on April 21, 2021 at 2:46pm — 2 Comments

मेरे किरदार को ऐसी कहानी कौन देता है...

जो पहले मौत दे, फिर जिंदगानी कौन देता है

मेरे किरदार को ऐसी कहानी कौन देता है

यहां तालाब नदियां जब कई बरसों से सूखे हैं

खुदा जाने हमें पीने को पानी कौन देता है

हमारी जिंदगी ठहरी हुई इक झील है लेकिन

ये उम्मीदों के दरिया को रवानी कौन देता है

जमीं से आसमां तक का सफर हम कर चुके लेकिन

नहीं मालूम मंजिल की निशानी कौन देता है

परिंदे भी समझते हैं कि पर कटने का खतरा है

इन्हें फिर हौसला ये आसमानी कौन देता…

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Added by atul kushwah on April 20, 2021 at 5:30pm — 6 Comments

नानी की कमी जीवन पर्यन्त याद आएगी!

नानी की कमी जीवन पर्यन्त याद आएगी ,

आंखें मेरी क्षण-क्षण अक्षुओं से भर आएंगी

खाये जिनके बनाये गर्मियों में चांवल और दाल,

छोड़ के हम नाती-पोतों को कब दूर चली जाएगी…

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Added by Rohit Dubey "योद्धा " on April 20, 2021 at 11:00am — No Comments

काँटा

मैं काँटा हूँ
जाने कितने काँटे चुभा दिये लोगों ने
मेरे बदन में अपने शूल शब्दों के
जमाने ने देखी तो सिर्फ
मुझसे मिलने वाली वेदना को देखा
मेरी तीक्ष्ण नोक को देखा…
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Added by Sushil Sarna on April 19, 2021 at 8:30pm — 4 Comments

यहाँ बस आदमी के भाव ही मंदे बहुत हैं - ग़ज़ल

मापनी  १२२२ १२२२ १२२२ १२२ 

 

धवल हैं वस्त्र, नीयत के मगर गंदे बहुत हैं 

चिरैया देख! दाने कम उधर फंदे बहुत हैं 

 

मचा है शोर मँहगाई का चारों ओर लेकिन 

यहाँ बस आदमी के भाव ही मंदे बहुत हैं 

 …

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Added by बसंत कुमार शर्मा on April 19, 2021 at 12:35pm — 4 Comments

कैसी विपदा कैसा डर

सुनसान सड़क, सुनसान रात है, सुनसान सबके अन्तर्मन

कैसे विपदा आन पड़ी ये, दुख, तड़प और है उलझन ||

 

चिराग भुझ रहे हर पल, हर क्षण, लगा दो चाहे तन, मन, धन

कड़ा समाधान न मिला अभी तक, जकड़ रहा है गहरा तम ||

 

भूख, प्यास और खाली है घर, रोजी रोटी भी हो गई बंद

वायु में जैसे विष घुला है, कैसा संकट ये कैसा कष्ट ||

 

हर पीड़ित अब यही पूछता, भूख लगने पर हो बंधन

पापी-खाली पेट तो मान रहा न, कैसे इच्छापूर्ति करेगा रंक ||

 

हाथ…

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Added by PHOOL SINGH on April 18, 2021 at 10:00am — No Comments

कहानी.........

कहानी ..........

पढ़ सको तो पढ़कर देखो

जिन्दगी की हर परत

कोई न कोई कहानी है

कल्पना की बैसाखियों पर

यथार्थ की हवेलियों में

शब्दों की खोलियों में

दिल के गलियारों में

टहलती हुई

कोई न कोई कहानी है

पत्थरों के बिछौनों पर

लाल बत्ती के चौराहों पर

बसों पर लटकी हुई

रोटी के लिए भटकी हुई

आँखों के बिस्तर पर बे-आवाज

कोई न कोई कहानी है

सच

पढ़ सको…

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Added by Sushil Sarna on April 16, 2021 at 5:09pm — 2 Comments

रश्मियाँ दिखतीं नहीं - ग़ज़ल

मापनी  २१२२ २१२२ २१२२ २१२ 

उपवनों में फूल कलियाँ तितलियाँ दिखतीं नहीं 

रोज कोयल खोजती अमराइयाँ दिखतीं नहीं 

 

हो गई आँखों से ओझल ऋतु बसंती प्यार की

तप रहा मन का मरुस्थल बदलियाँ दिखतीं नहीं

 

कौन सा यह आवरण ओढ़ा हुआ है आपने…

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Added by बसंत कुमार शर्मा on April 16, 2021 at 1:19pm — 10 Comments

कुछ उक्तियाँ

कैसी फ़ितरत के लोग होते हैं ?

दूसरे की आँखों में धूल झोंकने हेतु

नम्बर वही मोबाइल पर

नाम कुछ और जोड़ लेते हैं

दुर्जनों के दुर्वचन

सहिष्णुता की परख होते हैं

अपनी नहीं खुद उनकी

औक़ात बता देते हैं

उनकी माँ नहीं थीं, मेरे पिता

वे मुझमें माँ ढूँढते रहे,मैं उनमें पिता

उन्हे ना माँ मिलीं, ना मुझे पिता

मौलिक एवं अप्रकाशित

Added by Usha Awasthi on April 16, 2021 at 10:43am — 4 Comments

चेहरे पर मुस्कान बनाकर बैठे हैं (ग़ज़ल)

22 22 22 22 22 2

.

चेहरे पर मुस्कान बनाकर बैठे हैं

जो नकली सामान बनाकर बैठे हैं

दिल अपना चट्टान बनाकर बैठे हैं

पत्थर को भगवान बनाकर बैठे हैं

जो करते बातें तलवार बनाने की…

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Added by धर्मेन्द्र कुमार सिंह on April 14, 2021 at 9:30pm — 4 Comments

मन पर दोहे ...........

मन पर दोहे ...........

मन माने तो भोर है, मन माने तो शाम ।
मन के सारे खेल हैं, मन के सब संग्राम । 1।
हर मन को मिलता नहीं, मन वांछित परिणाम ।
मन फल की चिन्ता करे, मन अशांति का धाम ।2।…
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Added by Sushil Sarna on April 13, 2021 at 1:30pm — 6 Comments

अगर हक़ माँगते अपना कृषक, मजदूर खट्टे हैं (ग़ज़ल)

१२२२ १२२२ १२२२ १२२२

अगर हक़ माँगते अपना कृषक, मजदूर खट्टे हैं

तो ख़ुश्बू में सने सब आँकड़े भरपूर खट्टे हैं

मधुर हम भी हुये तो देश को मधुमेह जकड़ेगा 

वतन के वासिते होकर बड़े मज़बूर, खट्टे…

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Added by धर्मेन्द्र कुमार सिंह on April 12, 2021 at 10:28pm — 7 Comments

कोरोना को हराना है।

हमने तो अब  ये ठाना है

कोरोना   को   हराना  है

अब  साथ  न  छूटेगा  ये 

वादा   हमें   निभाना   है

कोरोना   को   हराना  है... कोरोना को हराना है। 

जाना  हो   जब   ज़रूरी 

सबसे  दो  गज़  की  दूरी  

कर   हाथ    सेनिटाइज़्ड 

और मास्क भी लगाना है 

कोरोना   को    हराना  है... कोरोना को हराना है। 

बाहर  से  जब भी आओ

अच्छी     तरह    नहाओ

ज्वर, छींक हो या  खाँसी

डाॅक्टर को ही दिखाना है 

कोरोना   को   …

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Added by अमीरुद्दीन 'अमीर' बाग़पतवी on April 12, 2021 at 7:02pm — 6 Comments

नग़मा: इक रोज़ लहू जम जायेगा इक रोज़ क़लम थम जायेगी

22 22 22 22 22 22 22 22

इक रोज़ लहू जम जायेगा इक रोज़ क़लम थम जायेगी

ना दिल से सियाही निकलेगी ना सांस मुझे लिख पायेगी

जिस रोज़ नये लब गाएंगे जिस रोज़ मैं चुप हो जाऊंगा

इक चाँद फ़लक से उतरेगा इक रूह फ़लक तक जायेगी

फिर नये नये अफ़सानों में कुछ नये नये चहरे होंगे

फिर नये नये किरदारों के किरदार नये गहरे होंगे

फिर कोई पिरोयेगा रिश्तों को नये नये अल्फाज़ों में

फिर कोई पुरानी रश्मों को ढालेगा नये रिवाज़ों…

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Added by Aazi Tamaam on April 11, 2021 at 8:00pm — 7 Comments

गरीबी ........

गरीबी..........
कैसी होती है गरीबी
शायद
तिमिर के गहन आवरण को
भेदने में असफल होती
जुगनू की
क्षीण सी रोशनी…
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Added by Sushil Sarna on April 11, 2021 at 12:00pm — 4 Comments

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