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कुछ उक्तियाँ

पृथ्वी सम्हलती नहीं

मंगल सम्हालेंगे

यहाँ ऑक्सीजन नष्ट की

वहाँ डेरा डालेंगे

बहुत मनाईं देवियाँ

बहुत मनाए देव

कर्म-लेख मिटता कहाँ ?

भाग्य लिखा सो होय

बुज़ुर्ग बेमिसाल होते हैं

समस्त जीवन के अनुभवों की

अलिखित किताब होते हैं

बुज़ुर्ग बेमिसाल होते हैं

मौलिक एवं अप्रकाशित

Added by Usha Awasthi on May 3, 2021 at 8:04pm — No Comments

जो पेड़ शूल वाले थे-लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर'

२२१/२१२१/१२२१/२१२



किस्मत कहें न कैसे सँवारी गयी बहुत

हर दिन नजर हमारी उतारी गयी बहुत।१।

*

जो पेड़ शूल  वाले  थे  मट्ठे से सींचकर

पत्थर को चोट फूल से मारी गयी बहुत।२।

*

भूले से अपनी ओर  न  आँखें उठाए वो

जो शय बहुत बुरी थी दुलारी गयी बहुत।३।

*

धनवान मौका  मार  के  ऊँचा चढ़ा मगर

निर्धन के हाथ आ के भी बारी गयी बहुत।४।

*

बेटी का ब्याह शान से करने को बिक गये

ऐसे भी  बाजी  मान  की …

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Added by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on May 1, 2021 at 9:25pm — No Comments

आशा ......



आशा .......

बहुत कोशिश की

मगर हार गई मैं

उस अनुपस्थिति से

जो हर लम्हा मेरे जहन में जीती है

एक खौफ के लिबास में

मुझे ठेंगा दिखाते हुए

भोर से लेकर साँझ तक

दिनभर की व्यस्ततम गतिविधियों के बीच

हमेशा झकझोरती है

किसी ग़ैर की मौजूदगी

मेरे अंतःस्थल को

उस की अनुपस्थिति के लिए

निराशा की स्वर वीचियों के बीच कहाँ लुप्त होते हैं

आशा को प्रज्वलित करते अनुपस्थिति के स्वर

थकान की पराकाष्ठा पर

जब बदन निढाल होकर…

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Added by Sushil Sarna on April 30, 2021 at 4:15pm — 3 Comments

नग़मा: जगाकर दिल में उम्मीदें दिलों को तोड़ने वालो

1222 1222 1222 1222

जगाकर दिल में उम्मीदें दिलों को तोड़ने वालो

हमारा क्या है हम तो बेसहारा हैं सो जी लेंगे

तुम्हारा दिल अगर टूटा तो फ़िर तुम जी न पाओगे

मिरे लख़्त-ए-जिगर सुन लो गमों को पी न पाओगे

जरा सा नर्म रक्खो इस गुमाँ के सख़्त लहजे को

ये चादर फट गयी गर ज़िंदगी की सी न पाओगे

यहाँ हर शय पे रहता है मिरी जाँ वक़्त का पहरा

अगर जो वक़्त बदला तो बचा हस्ती न पाओगे

हमें आदत है पीने की सो हम तो…

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Added by Aazi Tamaam on April 30, 2021 at 11:22am — No Comments

विसंगति —डॉo विजय शंकर

बीते कुछ दिनों में लगा
कि हम कुछ बड़े हो गये ,
अहंकार से फूलने लगे
और फूलते...चले गए।
फूले इतना कि हर समस्या
के सामने बौने हो गये।
यकीन नहीं होता कि
आदमी खुद कुछ नहीं होता ,
ये जानने के बाद भी ,
कुछ का ख्याल हैं कि
लूटो-खाओ, पाप-पुण्य
कहीं कुछ नहीं होता ,
भगवान भी कहीं नहीं होता।

मौलिक एवं अप्रकाशित

Added by Dr. Vijai Shanker on April 30, 2021 at 10:48am — 2 Comments

सायली (कोरोना)

सायली (कोरोना)

आसुरी

कोरोना मगरूरी

कायम रखें दूरी

मास्क जरूरी

मजबूरी!

*****

महाकाल

कोरोना विकराल

देश पर भूचाल

सरकारी अस्पताल

बदहाल।

*****

चमगादड़ी

कोरोना जकड़ी

संकट की घड़ी

आफत बड़ी

पड़ी।

*****

भड़की

कोरोना कलंकी

चमगादड़ से फड़की

मासूमों की

सिसकी।

*****

लाचारी

कोरोना महामारी

भर रही सिसकारी

दुनिया…

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Added by बासुदेव अग्रवाल 'नमन' on April 29, 2021 at 10:18am — 4 Comments

सवालों का ऐसे बता हल किधर है.

 मापनी १२२ १२२ १२२ १२२ 

नदी का वो बहता हुआ जल किधर है.

सवालों का ऐसे बता हल किधर है. 

 

घुसी जा रहीं आज खेतों में सडकें,

डराता था हमको वो जंगल किधर है. 

 

कहाँ से पवन अब बहे मंद शीतल, 

चमेली, ये बेला, ये…

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Added by बसंत कुमार शर्मा on April 29, 2021 at 9:26am — 2 Comments

एक अवांछित सफर कोरोना के साथ

होम-क्वारंटाइन में मैं चेतन और अवचेतन के बीच झूल रहा था I मेरा बड़ा बेटा रमेश रंजन (कुशी) दिन भर ऑक्सीमीटर से मेरा ऑक्सीजन-लेवल और पल्स-रेट चेक करता रहा I चार बजे सायं तक ऑक्सीजन लेवल 91 हो गया I बहुत कम नहीं था पर बेटा चिंता में पड़ गया I उसने सीधे अपने मामा श्री अवधेश कुमार श्रीवास्तव, जिन्हें हम ‘कुँवर  जी’ कहते हैं, उन्हें फोन लगाया I कठिन क्षणों में कुँवर  जी और उनका परिवार ही हमेंशा हमारा संकटमोचक रहा  है और यही बड़ा विश्वास हमें और हमारे बच्चों को दुविधा की स्थिति में उनके पास ले जाता है…

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Added by डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव on April 29, 2021 at 6:30am — No Comments

मानता हूँ तम गहन सरकार लेकिन-लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर'

२१२२/२१२२/२१२२



किसलिए भण्डार अपने भर रहे हो

देश बेबस को  निवाला  कर रहे हो।१।

*

रंग पोते धर्म  का  बाहर से अपने

आप केवल पाप के ही घर रहे हो।२।

*

निर्वसनता  चन्द  लोगों  को सुहाती

इसलिए क्या चीर सब का हर रहे हो।३।

*

कत्ल का आदेश तुमने ही दिया जब

खून के छींटों से क्योंकर  डर रहे हो।४।

*

व्यर्थ है  उम्मीद  पिघलोगे  कभी ये

है पता  हर  जन्म  में  पत्थर…

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Added by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on April 29, 2021 at 5:40am — 6 Comments

सबसे बड़े डॉक्टर (लघुकथा): डॉ. गोपाल नारायन श्रीवास्तव

नर्स ने कोविड मरीज को ऑक्सीमीटर से चेक किया I उसका ऑक्सीजन लेवल 85 और पल्स रेट 60 था I पिछले बारह घंटे से वह ऑक्सीजन पर थाI

‘दादा, कोई तकलीफ ?’- नर्स ने पूछा I

‘हाँ, सूखी खाँसी आती है I गला सूखता है I’- मरीज ने दुर्बल स्वर में कहा I

‘खाँसी जाने में अभी महीना भर लगेगा I साँस लेने में तो कोई परेशानी नहीं है?

‘नहीं, ऑक्सीजन लगने से आराम है I’

‘पर दादा, यह मास्क केवल खाना खाने और पानी पीने के समय ही हटाना I मैंने पानी में ओ.आर.एस. मिला दिया है I धीरे-धीरे उसे…

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Added by डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव on April 28, 2021 at 4:30pm — 5 Comments

आतंकी कोरोना

कौन आँसू पोंछे , कौन सान्त्वना दे ?

स्वजन की मौत पर अकेले ही रोए हैं

आतंकी कोरोना के, मुश्किल हालातों में

स्वयं सांत्वना दी , स्वयं नेत्रनीर धोए हैं

ना ही चेहरा देखा , ना मरघट जा पाए

कैसी विडम्बना ; जो मन को झुलसाए

संचित स्मृतियों को , प्रेमपूर्ण भाव में

सजा लिया है अपने अन्तर के गाँव में 

मौलिक एवं अप्रकाशित

Added by Usha Awasthi on April 28, 2021 at 4:00pm — No Comments

पाकीज़गी .......

पाकीज़गी ......

मैं

जिस्म से रूह तक

तुम्हारी हूँ

मेरी नींदें तुम्हारी हैं

मेरे ख़्वाब तुम्हारे हैं

मेरी आस भी तुम हो

मेरी प्यास भी तुम हो

मेरी साँसों का विश्वास भी तुम हो

मेरे प्राणों का मधुमास भी तुम हो

मगर ख़याल रहे

मेरे जिस्म को

दिखावटी पर्दों से नफ़रत है

मेरे पास आना तो

ज़माने के बेबस लिबास को

ज़माने में ही छोड़ आना

क्योंकि

मेरे जिस्म को

पाकीज़गी पसंद है

सुशील सरना

मौलिक एवं…

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Added by Sushil Sarna on April 28, 2021 at 12:57pm — No Comments

नज़्म: किंदील

जलता है जिस्म सुर्ख है किंदील के जैसे

इक झील दिन में लगती है किंदील के जैसे

हर शाम उतर आता है ये दरियाओं झीलों पर

मर फ़ासलाई होगी इक खगोलिये इकाई

दिखता भी सुर्ख सुर्ख है घामें लपेटे है

सूरज भी तो जलता है इक किंदील के जैसे

है तीरगी घनी घनी ज़हनों के अंदर तक

सब भूल जायें जात-पात हद-कद और सरहद

सब ख़ाक करके बंदिशें रौशन करें ख़ुद को

मैं भी जलू तू भी जले किंदील के जैसे

चलो मिलके सारे जलते हैं किंदील के जैसे

है धरती के…

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Added by Aazi Tamaam on April 28, 2021 at 10:59am — No Comments

"करो उजागर प्रतिभा अपनी"

प्रतिभा छुपी हुई है सबमें,करो उजागर,

अथाह ज्ञान,गुण, शौर्य समाहित,तुम हो सागर।

डरकर,छुपकर,बन संकोची,रहते क्यूँ हो?

मन पर निर्बलता की चोटें,सहते क्यूँ हो?

तिमिर चीर रवि द्योत धरा पर ले आता है।

अंधकार से डरकर क्यूँ नहीं छिप जाता है?

पराक्रमी राहों को सुलभ सदा कर देते,

आलस प्रिय जिनको,बहाने बना ही लेते।

तंत्र,मन्त्र,ज्योतिष विद्या,कर्मठ के संगी,

भाग्य भरोसे जो बैठे वो सहते तंगी।

प्रबल भुजाओं को खोलो,प्रशंस्य बनो,…

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Added by शुचिता अग्रवाल "शुचिसंदीप" on April 27, 2021 at 3:00pm — 5 Comments

विदा की वह शाम ...

विदा  की  वह  शाम

 

प्रबल  झंझावात  के  बाद  मानो

दिशा-दिशा   आकुल अकथ  सुनसान

निस्तब्ध   शांत ... और  इस  पर

दिन  से सम्बन्ध  तोड़  रही

वैभव-विहीन  शाम…

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Added by vijay nikore on April 27, 2021 at 2:30pm — 2 Comments

अब हो गये हैं आँख वो भूखे से गिद्ध की- लक्ष्मण धामी'मुसाफिर'

२२१/२१२१/१२२१/२१२

चिन्ता करें जो आम की शासन नहीं रहे

कारण इसी के लाखों के जीवन नहीं रहे।१।

*

हर कोई खेल सकता है पैसों के जोर पर

कानून  आज  देश  में  बन्धन  नहीं  रहे।२।

*

अब हो गये हैं आँख वो भूखे से गिद्ध की

जो थे  बचाते  लाज  को  यौवन नहीं रहे।३।

*

आई हवा नगर की  तो दीवारें बन गयीं

मिलजुल जहाँ थे बैठते आगन नहीं रहे।४।

*

जीवन का दर्द आँखों में उनकी रहा जवाँ

बेवा हो जिनके  हाथों  में  कंगन नहीं रहे।५।

*

तकनीक…

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Added by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on April 26, 2021 at 12:48pm — 4 Comments

मुहब्बत हो जाती है - डॉo विजय शंकर

मुहब्बत हो जाती है ,
मुहब्बत हो जाती है ,
मुहब्बत हो जाती है ,
ये तो नफ़रतें हैं ,
जिनके लिए टेंडर
निकाले जाते हैं . 

मौलिक एवं अप्रकाशित

Added by Dr. Vijai Shanker on April 25, 2021 at 10:00pm — 2 Comments

किसी रात आ मेरे पास आ मेरे साथ रह मेरे हमसफ़र (ग़ज़ल)

११२१२ ११२१२ ११२१२ ११२१२

किसी रात आ मेरे पास आ मेरे साथ रह मेरे हमसफ़र

तुझे दिल के रथ पे बिठा के मैं कभी ले चलूँ कहीं चाँद पर

तुझे छू सकूँ तो मिले सुकूँ तुझे चूम लूँ तो ख़ुदा मिले

तू जो साथ दे जग जीत लूँ तूझे पी सकूँ तो बनूँ अमर

मेरे हमनशीं मेरे हमनवा मेरे हमक़दम मेरे हमजबाँ 

तुझे तुझ से लूँगा उधार, फिर, भरूँ किस्त चाहे मैं उम्र भर

कहीं धूप है कहीं छाँव है कहीं शहर है कहीं गाँव…

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Added by धर्मेन्द्र कुमार सिंह on April 25, 2021 at 6:10pm — 4 Comments

कालिख लगी है इनमें जो -लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर'( गजल )

२२१/२१२१/१२२१/२१२



हमने किसी को हर्ष का इक पल नहीं दिया

सूखी धरा को  जैसे  कि  बादल  नहीं दिया।१।

*

रूठे तो उससे रोज ही लेकिन मनाया कब

आँसू ढले जो आँखों से आँचल नहीं दिया।२।

*

गंगा से  भर  के  लाये  थे  पुरखों  को तारने

जलते वनों की प्यास को वो जल नहीं दिया।३।

*

कहने पे मन को आपके बंदिश में क्यों रखें

यूँ जब किसी भी द्वार को साँकल नहीं दिया।४।

*

कालिख लगी है इनमें जो सौगात जग की है

आँखों में हम ने एक  भी  काजल नहीं…

Continue

Added by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on April 25, 2021 at 12:36pm — 6 Comments

गीतिका छंद: रास्ते सुनसान और घर, कैद खाने हो गये

14-12

रास्ते सुनसान और घर, कैद खाने हो गये

खुशनुमा इंसान दहशत, के निशाने हो गये

बेबसी का हाल देखा, दिल दहल कर रह गया

मुफ़्लिसी में ज़िंदगी का, ख़्वाब जल कर रह गया

डर से कोरोना के भी, वो भला अब क्या डरे…

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Added by Aazi Tamaam on April 24, 2021 at 11:30pm — 2 Comments

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