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तन्हाई

सुनो!!!

यु तनहा रहने का

शउर

सबको नही आता

तनहा होना अलग होता हैं

अकेले होने से

और

मैं तनहा हूँ

क्युकी तुम्हारी यादे

तुम्हारी कही /अनकही बाते

मुझे कमजोर करती हैं

लेकिन

तुम्हारी हस्ती

मेरे वजूद में एक हौसला सा बसती है

परन्तु

यह  तन्हाई

सिर्फ मेरे हिस्से में ही नही आई हैं

तेरी हयात…

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Added by Neelima Sharma Nivia on April 8, 2013 at 4:59pm — 13 Comments

जिन्दगी तू इतनी आसान नही है

 

जिन्दगी तू इतनी आसान नही है

 

जिन्दगी तू इतनी आसान नही है , जितनी की लोगो से तेरी…

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Added by बसंत नेमा on April 8, 2013 at 1:30pm — 5 Comments

हार न मानें लड़ें

जीवन में सभी के साथ कोई न कोई कठिनाई होती है। कठिनाईयां तो जीवन का एक हिस्सा हैं। उनसे हार नहीं मानना चाहिए। कठिनाईयों से लड़कर ही उनसे पार पाया जा सकता है न कि उनके सामने घुटने टेक कर। धैर्य, हिम्मत एवं थोड़ी सी सूझ बूझ से मुश्किलों का हराया जा सकता है। किन्तु अक्सर हम समस्याओं से इतने भयभीत हो जाते हैं कि अपना धैर्य खो बैठते हैं। समस्याओं के प्रति हमारा नकारात्मक रवैया हमें अधिक तकलीफ पहुंचाता है।

इसके लिए आवश्यक है कि हम…

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Added by ASHISH KUMAAR TRIVEDI on April 7, 2013 at 7:30pm — 9 Comments


सदस्य कार्यकारिणी
जन्मदिन !!

(1)

विधि ने सुंदर गीत रचा,

अलि कुल स्वर सा यह गुंजन –

विश्व चराचर,

अविरत निर्झर,

श्वासों का यह स्पंदन.

कितना विस्मय,

कितना मधुमय,

कितना अनुपम,

मानव जीवन !

(2)

नक्षत्र खचित अम्बर में

किसके, उज्ज्वल स्नेह का प्रकाश ?

किसके इंगित पर मुस्काते हैं

यह धरती और यह आकाश ?

किसके सौरभ से

सुरभित यह मन,

अश्रु शिशिर,

नहीं क्रंदन !

किसके कर में क्रीड़ा करते

जीवन – मरण,

मरण – जीवन -

उसको अर्पित…

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Added by sharadindu mukerji on April 7, 2013 at 4:30am — 17 Comments

प्रश्न

करूणा के वशीभूत होकर

हृदय ने,पूछा मुझसे यह,

जीवन की निर्जन-बेला में,

तू बता,मुझे कौन है वह?

 विशाल जीवन-सागर में

चलता है साथ तेरे जो,

क्या है कोई इस संसार में,

समझ सके विचार तेरे वो?

हृदय के इस प्रश्न ने,

डाल दिया मुझे सोच में।

फिर मन-ही-मन मैं लगी,

 स्वयं से यह पूछने।

इस विशाल-संसार में होगा

कहीं पर ऐसा कोई क्या?

दुःख-दग्ध और करूणा से पूर्ण,

समझेगा मेरे हृदय की व्यथा।

सोचा है मन में जो कुछ मैंने,

संभव…

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Added by Savitri Rathore on April 6, 2013 at 11:21pm — 18 Comments

कथा......‘‘जो ध्यावे फल पावे सुख लाये तेरो नाम...........।‘‘

गतांक...3 से आगे.---.

                हां! मेरे ईष्ट देव मेरे साथ ही थे और मैंने जो कुछ देखा तथा अनुभव किया। अक्षरशः याद तो नही रहा फिर भी जितना प्रभु ने आदेश दिया स्पष्ट वाक्योे में लिख रहा हूं। मेरे दो शरीर थे। एक जो अस्पताल की शैया पर पड़ा था और दूसरा प्रभु नाम सुमिरन करता हुआ अज्ञात दिशा की ओर चला जा रहा था। राह में कितने दरवाजे पर दरवाजे खुलते जा रहे थे, गिनना मुश्किल था। हर इक द्वार लगता था कि अब यह आखिरी होगा किन्तु वही ढाक के दो पात। अंधेरे में दरवाजे के सिवाय कुछ और…

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Added by केवल प्रसाद 'सत्यम' on April 6, 2013 at 12:41pm — 2 Comments

कुण्डलियाँ छंद - लक्ष्मण लडीवाला

 
सहन करे आलोचना, नेता वही महान,
ताने सहना सीख ले, नेता असली  मान |
 नेता असली मान, मन में राज छुपाय ले,  
संख्या बल का भान, समर्थन भी जुटाय ले |
वोटो का रख मान, गिद्ध द्रष्टि इनपर धरे,
समय का रखे ध्यान,…
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Added by लक्ष्मण रामानुज लडीवाला on April 6, 2013 at 9:30am — 15 Comments

ग़ज़ल - तिश्नगी कर दी !!!

दर्द में आपने कमी कर दी
अपनी यादें जो अजनबी कर दी ।
 
 
आँख भर इश्क का समंदर था
रूठकर कैसी तिश्नगी कर दी ।
 
 
मामला घर में ही सुलझ जाता
बात छोटी सी थी, बड़ी कर दी ।
 
 
फैसला जब दिया तो मक़्तल में
जान आफ़त में थी, बरी कर दी ।
 
 
और क्या देंगे मुफलिसी में तुम्हें
नाम तेरे ये जिंदगी कर…
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Added by आशीष नैथानी 'सलिल' on April 5, 2013 at 11:55pm — 21 Comments

वो यारों का कोई किस्सा पुराना ढूँढ लेता है "ग़ज़ल"

इक ताज़ा ग़ज़ल पेशेखिदमत है आपके जानिब

 

वो यारों का कोई किस्सा पुराना ढूँढ लेता है

ग़मों में मुस्कुराने का बहाना ढूँढ लेता है

 

फकीरो पीर पैगम्बर खुदा क्या आदमी है क्या  

बुराई हर किसी में ये ज़माना ढूँढ लेता है

 

मुसलसल चोट खाता है मगर आशिक है क्या कीजे

मुहब्बत करने को मौसम सुहाना ढूँढ लेता है

 

बुरी आदत है उसकी एक का दो चार करने की

पडोसी पर नज़र रख के फ़साना ढूँढ लेता है

 

अहम् झूठा नहीं करता गिला…

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Added by SANDEEP KUMAR PATEL on April 5, 2013 at 11:08pm — 28 Comments

गज़ल/ एक प्रयास

2122,       2122,      2122,   2

भूख से बिल्ली परेशां जो रही होगी

रोटियां बासी तभी तो खा गयी होगी

 

हौसले परिंदों के भी तो पस्त होते हैं

लाख उड़ने की कला उनमें रही होगी

 

कोयलों की कूक गायब…

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Added by बृजेश नीरज on April 5, 2013 at 6:20pm — 10 Comments

माँ की सीख -पापा के संस्कार

माँ की सीख पापा के संस्कार

फँसी रहती हूँ इनमें मैं बारम्बार

माँ ने सिखाया था – पति को भगवान मानना

पापा ने समझाया था – गलत बात किसी की न सुनना

 

माँ ने कहा - कितनी भी आधुनिक हो जाना

पर अपने परिजनों का तुम पूरा ख्याल रखना

पढ़लिख आधुनिक बनकर रूढीवादी न बनना

और पुरानी परम्पराओं का भी तुम ख्याल करना......

 

पापा ने बताया - भारतीय संस्कृति बहुत अच्छी है

पर इसकी कुछ मान्यताएं बहुत खोखली हैं

बेटे-बेटी में भेदभाव बहुत…

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Added by vijayashree on April 5, 2013 at 3:30pm — 17 Comments

अंतिम स्पंदन

                 अंतिम स्पंदन

   यदि मैं अर्पित करता भी स्नेह

   उमड़ता रहा है जो मन में मेरे

   क्षण-अनुक्षण तुम्हारे लिए,

   कोई अंतरित ध्वनि कह देती है..कि

   स्नेह  इतना  तुम  सह  ही  न  सकती,

   और फिर द्वार तुम्हारे से लौट आए

  …

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Added by vijay nikore on April 5, 2013 at 1:41pm — 34 Comments

"दोहे "

कबहुँ सुखी क्या आलसी, ज्ञानी कब निद्रालु ?

वैरागी लोभी नहीं, हिंसक नहीं दयालु!! १



शक्ति क्षीण करते सदा, यदि अवगुण हों पास

दुर्गुण रहित चरित्र में, होता शक्ति निवास!!२

गुरुता का व्यवहार ही, गुरु को करे महान

पूजनीय औ श्रेष्ठ जो, पायें खुद सम्मान!!३

नैतिकता सद्चरित का, जिसमें पूर्ण अभाव

दयाहीन उस मनुज के, रहें मलिन ही भाव!!४

अवगुण निज में देखिये, रख सद्गुण पहचान

त्रुटियों से जो सीख ले, जग में वही…

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Added by ram shiromani pathak on April 5, 2013 at 12:30pm — 19 Comments

चलिये शाश्वत गंगा की खोज करें- तृतीय खंड (2)

तृतीय  खंड 

पाठक के लिए: 

हमारे काव्य नायक 'ज्ञानी' की पर्वचन  श्रृंखला  जारी है। ज्ञानी का लक्ष्य मानवीय अनुभूति से उपजे ज्ञान को जन मानस तक पहुँचाना। प्रस्तुत खंड में वह गंगा उत्पुति की कथा बयान कर रहा है। गंगा की उत्पुति विष्णु हृदय से मानी जाती है। वह विष्णु हृदय क्या है - ज्ञानी इस की विवेचना के लिए प्रयतन रत है।
प्रस्तुत कथा और इस का…
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Added by Dr. Swaran J. Omcawr on April 5, 2013 at 11:39am — 14 Comments

!!! मासूम सा बच्चा !!!

!!! मासूम सा बच्चा !!!



जाति-पाति और औकात नहीं!

माँ से बिछड़ा-बाप से बिछड़ा

जन-समाज ने पुचकारा नहीं !

दुनिया देख रहा अब बच्चा !

हिन्दू न मुस्लिम बिलकुल सच्चा!

जिसको देखता उसको लुभाता,

लगता जैसे अपना बच्चा !

मंदिर का घंटा ज्यो बजता,

दौड़ चहेक कर आता बच्चा !

मस्जिद की आजान को सुनकर,

रोज फूक डलवाता बच्चा!

हरी शर्ट-केसरिया नेकर,

नंगे पैर ठुमकता बच्चा !

मंदिर का प्रसाद और हलुवा,

गुरूद्वारे में लंगर चखता !

मस्जिद की मिलाद में…

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Added by केवल प्रसाद 'सत्यम' on April 5, 2013 at 10:24am — 20 Comments

राना (कनाडा) होली मिलन समारोह सम्पन्न

राजस्थान एसोसियेशन आफ़ नार्थ अमेरिका (राना कनाडा) तथा विश्व हिंदी संस्थान के संयुक्त तत्वावधान में रविवार, दिनांक ३१ मार्च, २०१३ को स्थानीय भारत माता मंदिर, गोर रोड़, ब्रेम्प्टन, कनाडा में धूम-धाम से होली का पर्व मनाया गया। लगभग २०० सदस्यों की उपस्थिती में रंगों की बौछार, होली गीतों की झंकार और ’होली है’ की हुंकार से सारा वातावरण होलीमय हो गया।

लगभग ५ घंटे चले इस होली कार्यक्रम का प्रारंभन स्नैक्स व ठंडाई से हुआ। होली गीत, चुटकुले तथा एक-दूसरे को रंगों से सराबोर करने की होड़ ने…

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Added by Prof. Saran Ghai on April 5, 2013 at 7:47am — 4 Comments

ग़ज़ल- "न पीपल की छाया, न पोखर दिखे!"

बह्रे मुतक़ारिब मुसम्मन महज़ूफ़

122/122/122/12

***********************

न पीपल की छाया, न पोखर दिखे;

मेरे गाँव के खेत बंजर दिखे; (1)

हैं शुअरा जहाँ में बड़े नामवर,…

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Added by संदीप द्विवेदी 'वाहिद काशीवासी' on April 5, 2013 at 2:00am — 14 Comments

क्या जीवन है/हाइकू (प्रयास)

बालू का स्थल
जालाभास रश्मि से
तपती प्यास
------------------

प्रीति सुमन
नागफनी का बाग
व्यर्थ खोजना
------------------

तृप्ति कामना
घी दहकाए ज्वाला
पूर्ति आहुति
-------------------

जीवन यात्रा
हर क्षण रहस्य
रोना या गाना
-------------------
गन्तव्य कहाँ!
लमकन जारी है
क्या जीवन है?
-विन्दु (मौलिक,अप्रकाशित)

Added by Vindu Babu on April 4, 2013 at 11:54pm — 17 Comments

कथा......‘‘जो ध्यावे फल पावे सुख लाये तेरो नाम...........।‘‘

गतांक...2 से आगे--   आज दिवाली का दिन था। घर के सभी लोग चिंतित और अस्त-व्यस्त से बेहाल हो चुके। मेरे मुहल्ले के लोगों का तांता मेरे घर एवं अस्पताल में मेरी शैया के इर्द-गिर्द लगा हुआ था। मेरे मिलने वालों से डाक्टर और नर्स भी काफी परेशान हो थक चुके थे। अब तक इन लोगों ने मेरे रिश्तेदारों एवं मिलने वालों से एक सामंजस्य सा बिठा लिया था। नवम्बर मास का समय और सायं के 6.00 बज रहे थे। किसी को भी आज अमावस्या के दिन घरों में दीप जलाने की कोई चिन्ता नहीं हो रही थी। मेरे बार-बार कहने पर भी लोगो ने जबाब…

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Added by केवल प्रसाद 'सत्यम' on April 4, 2013 at 9:15pm — 8 Comments

अक्षर का संसार

कभी कभी शब्द आकार नहीं लेते

और मैं बह जाती हूँ अक्षरों में

सुनो ध्यान से ये क्या कहते है ?

खामोश हैं ???

नहीं इनमे कलकल का नाद…

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Added by डॉ नूतन डिमरी गैरोला on April 4, 2013 at 8:36pm — 9 Comments

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