Added by seema agrawal on April 4, 2013 at 5:00pm — 8 Comments
दाइज ऐसा देना बाबुल
जिससे तन-मन जले नहीं
दर्द-वेदना के सिक्कों से
जो बेबस हो तुले नहीं
ना गुलाब की कलियां न्यारी
स्वर्णहार ना चूड़मणि
नहीं मुलायम गद्दी, सोफे
नहीं रेशमी लाश बुनी
देना बाबुल ऐसा ताला
जो बुद्धि पर लगे नहीं
अम्लान रूढि़यों की ठोकर से
जो बेदम हो खुले नहीं
लाड़-प्यार चाहे ना देना
ना लेना मेरी पोथी
जनमजली ना करना मुझको
शिक्षा बिन सब हैं रोती
देना…
ContinueAdded by राजेश 'मृदु' on April 4, 2013 at 4:24pm — 9 Comments
तृतीय खंड
पाठक के लिए:
Added by Dr. Swaran J. Omcawr on April 4, 2013 at 4:23pm — 11 Comments
गद्य के खंड रचे
प्रवाह भर भर के
इतना प्रवाह के
कविता टिक न सकी
पल भर को
उड़ गयी कहीं दूर
बहुत दूर
कवियों की खोज मे
और लेखक इतराता है
अतुकान्त का बोध कराता
स्वयं को
गुपचुप मुस्काता
सोचता है
कौन जानता है
कविता का आंतरिक सौंदर्य
बाहरी परिवेश
इंफ्रास्ट्रकचर ठीक
मतलब सब ठीक
अंदर जा के
किसको क्या मिला है
लय छन्द ताल
व्यर्थ हैं भाव के बिना
फिर एक मुस्कान भरता है
देखा हो गया न…
Added by SANDEEP KUMAR PATEL on April 4, 2013 at 2:09pm — 10 Comments
ढाक अमलतास पे, आ गयी बहार देखो,
सेमर भी कुसुमित, फाग का महीना है |
सारे रंग लाल-लाल, फूलों पर दिखाई दें,
कुहु-कुहू कोयल की, राग का महीना है |
सूरज का ताप तन, बदन झुलसायेगा,
तपन दहन…
ContinueAdded by Ashok Kumar Raktale on April 4, 2013 at 2:00pm — 16 Comments
नयन झुकाए मोहिनी, मंद मंद मुस्काय ।
रूप अनोखा देखके, दर्पण भी शर्माय ।।
नयन चलाते छूरियां, नयन चलाते बाण ।
नयनन की भाषा कठिन, नयन क्षीर आषाण ।।
दो नैना हर मर्तबा, छीन गए सुख चैन ।…
ContinueAdded by अरुन 'अनन्त' on April 4, 2013 at 12:30pm — 17 Comments
वक़्त बहता रहा
कभी पानी की तरह
कभी हवा के मानिद
हम भी बहते रहे बहाव में इसके
कभी फूल बनकर
कभी धूल बनकर .....
कब जिदगी के उस छोर से हम
इस छोर पर आ गये…
Added by Sonam Saini on April 4, 2013 at 11:30am — 7 Comments
आकाशीय बिजली !!!
लप-लप चमकि-चमकि
रहि रहि कुलेल करत
इत उत धावति बदरा मा
कड़क-कड़क कर
मेघ धमकावत।
बालक-नारि हृदय धड़कावत
बालक जायें छिपे अंचरा मा।
नारि मन धक-धक, रहा न जाये
पाए सहारा और अपनापन
छटपटाय झट गले लगावत।
आंखें मींच लई जोरों से
कसमसात और लजावति।
बिजुरी तनिक समझि न पावति,
गिरत-पड़त छपकि-छपकि
लाज-शर्म न झपकि-झपकि।
नयनों से ज्यों तीर चलावति
सर सर सर सर सरर…
ContinueAdded by केवल प्रसाद 'सत्यम' on April 4, 2013 at 10:01am — 12 Comments
प्रो. सरन घई, संपादक – “प्रयास”, संस्थापक, विश्व हिंदी संस्थान, कनाडा
शादी से पहले हमको कहते थे सब आवारा,
शादी हुई तो वो ही कहने लगे बेचारा।
कुछ हाल यों हुआ है शादी के बाद मेरा,
जैसे गिरा फ़लक से टूटा हुआ सितारा।
सब लोग पूछते हैं दिखता हूँ क्यों दुखी मैं,
कैसे बताऊँ उनको, बीवी ने फिर है मारा।
शादी हुई है जब से, तब से ये हाल मेरा,
जिस ओर खेता नैया, खो जाता वो किनारा।
फिरता था तितलियों…
ContinueAdded by Prof. Saran Ghai on April 4, 2013 at 1:07am — 9 Comments
हास्य घनाक्षरी
आप तो पहाड़ हम माटी भुरभुरी वाली
धूल न हो जाएँ कहीं , गले न लगाइए
आपका शरीर है ये तन से अमीर बड़ा
दुबले गरीब हम रहम तो खाइए
माटी वाला घर मेरा और द्वार छोटा बना
टूट नहीं जाए ज़रा धीरे धीरे आइए
फूल थी जो आप कद्दू हो गयी हो आजकल
ऐसा क्या है खाया ज़रा हमें भी बताइए
संदीप पटेल “दीप”
Added by SANDEEP KUMAR PATEL on April 3, 2013 at 11:30pm — 16 Comments
इस जीवन में लगा रहेगा ,
दुःख-सुख हार जीत!
दृढ़ता से बढ़ते रहो ,
गाओ विजय का गीत !!
अविराम बढ़ते चलो ,
भर लो अन्दर शक्ति भरपूर…
Added by ram shiromani pathak on April 3, 2013 at 9:46pm — 17 Comments
प्यास है
लरजते होंठों में
आज भी वही
जब कहा था तुमसे
मैं प्यार करता हूँ
और देखा था
खुद को
तुम्हारी आँखों से
पागल सा
दीवाना सा
कुछ पल बाद
वो झुकीं
और इक मीठी सी सदा
हट पागल
जाता हूँ
आइने के सामने
देखने वही
अक्स
लेकिन धुंधला
हो जाता है
मुझे याद है अब भी
जब तुमने
झांका था
मेरी आँखों में
थामा था
सिरहन भरा
मेरा…
ContinueAdded by SANDEEP KUMAR PATEL on April 3, 2013 at 9:00pm — 22 Comments
क्या वजह क्या वजह कहर बरपा रहे
मेहरबां - मेहरबां से नजर आ रहे
ये दुपट्टा कभी यूँ सरकता न था
आज हो क्या गया यूँ ही सरका रहे
चूडियाँ यूँ तो बरसों से ख़ामोश थी
बात क्या है हुजूर आज खनका रहे
यूँ तो चेहरे पे दिखती थीं…
Added by VISHAAL CHARCHCHIT on April 3, 2013 at 6:30pm — 37 Comments
झुलसाई ज़िन्दगी ही तेजाब फैंककर ,
दिखलाई हिम्मतें ही तेजाब फैंककर .
अरमान जब हवस के पूरे न हो सके ,
तडपाई दिल्लगी से तेजाब फैंककर .
ज़ागीर है ये मेरी, मेरा ही दिल जलाये ,
ठुकराई मिल्कियत से तेजाब फैंककर .
मेरी नहीं बनेगी फिर क्यूं बने किसी की,
सिखलाई बेवफाई तेजाब फैंककर .
चेहरा है चाँद तेरा ले दाग भी उसी से ,
दिलवाई निकाई ही तेजाब…
Added by shalini kaushik on April 3, 2013 at 4:15pm — 9 Comments
बहर : हज़ज मुसम्मन सालिम
वज्न: १२२२, १२२२, १२२२, १२२२
रदीफ़ों काफियों को चाह पर अपने चलाता है,
बहर के इल्म में जो रोज अपना सिर खपाता है,
हुआ है सुखनवर* उसकी कलम करती ग़ज़लगोई*,
सभी अशआर के अशआर वो सुन्दर बनाता है,
कभी वो लाम* में जागे कभी वो गाफ़* में सोये,
सुबह से शाम तक बस तुक से अपने तुक भिड़ाता है,
मुजाहिफ* को करे सालिम, करे…
ContinueAdded by अरुन 'अनन्त' on April 3, 2013 at 2:30pm — 15 Comments
विधना तेरे रूप में, आया कहां निखार
बेशकीमती ब्लीच औ, लोशन मले हजार
मौनी बाबा टल्ली हैं, आफत में युवराज
घूर रहा जो ताज को, गुजराती परबाज
शहर गाल में गांव हैं, कोलतार में पैर
बेदम होकर हांफती, सुबह-शाम की सैर
ट्रैफिक की हर चीख पर, सिग्नल मारे आंख
रेल-बसों में चुप खड़े, सहमे डैने, पांख
अनशन पर कोई अड़ा, कोई हुआ मलंग
इटली वाले रंग में, किसने घोला भंग
नदी रही नाला हुई, किसपर नखरे नाज…
ContinueAdded by राजेश 'मृदु' on April 3, 2013 at 12:54pm — 8 Comments
जिन्दगी में ये सब होना ही था
हर ख़ुशी की चाह मे रोना ही था
रिश्ते नाते प्यार वादों का महल
टुटा खंडहर एक दिन होना ही था
दूसरों के बोझ ढोते रह गए
अपने गम का बोझ भी ढोना ही था…
ContinueAdded by Dr.Ajay Khare on April 3, 2013 at 12:00pm — 3 Comments
कमला बाई को सुबह सुबह दरवाजे पर बुरी हालत में देख रीना का माथा ठनका , एक्सीडेंट के कारण हास्पिटल में भर्ती हुई कल ही तो एक हफ्ते बाद वापस लौटी है ।सर पर पट्टी गले की हँसली टूटने पर पीछे हाथ कर बाँधी हुई पूरी छाती पर पट्टी ,आँखे सूजी हुई देखते ही फफक- फफक कर रो पड़ी कमला रीना के बहुत बार पूछने पर बताया "मेमसाब मेरी पट्टी देखकर मेरे दो साल के बच्चे ने जो…
ContinueAdded by rajesh kumari on April 3, 2013 at 10:08am — 19 Comments
गतांक-1 से आगे......सतसंग में हजारों का गुप्त दान करके स्वयं को धन्य समझ लेते हैं किन्तु रिक्शे वाले को पूरे पांच रूपये भी नहीं देना चाहते हैं। ईश्वर प्राप्ति हेतु अपने जिज्ञासु मन को सतसंग परिसर के गेट पर नमस्कार के साथ ही टांग देते हैं और जैसे आये थे, ठीक वैसे ही पुनः घर की ओर खाली मन, अज्ञान, संसारिक माया -मोह, व्यापार -व्यवहार आदि जंजाल के साथ चल पड़ते हैं। गृह में प्रवेश करते ही बहुओं, नौकरो आदि पर अव्यवहारिक बातें मढ़़ते हुए प्रपंच शुरू कर देते हैं। यहां तक कुछ लोग तो सतसंग में भी सुबह…
ContinueAdded by केवल प्रसाद 'सत्यम' on April 3, 2013 at 7:29am — 6 Comments
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