हरिगीतिका/16,12 जय जय हनुमान !!!
हनुमान दास, राम गुन भाष, भक्ति रस ज्ञानी घने।
तु चंचल चपल, तेजस अतिबल, अखिल रवि विद्या जने।।
तुम मारूत सुत, शंकर अंशम, देव सब तप वरदने।
तुम अजर अमर, सुजान सुन्दर, प्रेम रस देखत बने।।1
महत्तम वीर, औ विकट धीर, निर्मलता हृदय रमी।
तुम दीन कथा, समरथ विरथा, तत्छन उबारत गमी।।
बहु विधि सताय, लंक जराए, सीतहि हर दुःख थमी।
संजीवन सुख, लछमन जागे, सफल काज नाहि…
ContinueAdded by केवल प्रसाद 'सत्यम' on April 2, 2013 at 10:07pm — 16 Comments
सामाजिक प्राणी होने के नाते हम सभी रिश्तों से घिरे रहते हैं। रिश्ते सामाजिक व्यवस्था का मूल आधार होते हैं। रिश्ते हमें आपस में बांधे रहते हैं। हमारे रिश्ते जितने मज़बूत होते हैं सामजिक ढांचा उतना ही मज़बूत बनता है।
प्रेम संबंधों को सबल बनाता है। स्वस्थ संबंधों के लिए आवश्यक है की हमारे बीच एक दूसरे के लिए आदर तथा आपसी समझबूझ हो। एक दूसरे के हित लिए अपने निजी स्वार्थों का त्याग रिश्तों को दीर्घायु बनाता है। रिश्ते हमें बहुत कुछ…
Added by ASHISH KUMAAR TRIVEDI on April 2, 2013 at 8:00pm — 9 Comments
यादों की बारिश हो रही है, पलपल ऐसे..!
सूखी नदी में हो, झरनों की हलचल जैसे..!
१.
दिल का चमन शायद, गुलगुल हो न हो मगर,
ख़्वाब होगें ज़रूर गुलज़ार, हो मलमल जैसे..!
सूखी नदी में हो, झरनों की हलचल…
Added by MARKAND DAVE. on April 2, 2013 at 12:30pm — 4 Comments
जन सेवा
देख गरीबी भारत की,
फफक फफक मैं रो पड़ा,
क्यों अभिमान करूँ अपने पर,
अपने से ही , पूंछ पड़ा ।
शर्म नहीं आती क्यों उसको,
बड़ा आदमी कहता जो खुद…
Added by akhilesh mishra on April 2, 2013 at 11:30am — 8 Comments
गंगा, (ज्ञान गंगा व जल गंगा) दोनों ही अपने शाश्वत सुन्दरतम मूल स्वभाव से दूर पर्दुषित व व्यथित, हमारी काव्य कथा नायक 'ज्ञानी' से संवादरत हैं।
Added by Dr. Swaran J. Omcawr on April 1, 2013 at 7:56pm — 16 Comments
कुम्हार सो गया
थक गया होगा शायद
मिट़टी रौंदी जा रही है
रंग बदल गया
स्याह पड़ गयी
चाक घूम रहा है
समय चक्र की तरह…
ContinueAdded by बृजेश नीरज on April 1, 2013 at 5:17pm — 26 Comments
Added by PRADEEP KUMAR SINGH KUSHWAHA on April 1, 2013 at 5:00pm — 11 Comments
प्रतिष्ठान के मालिक ने
Added by PRADEEP KUMAR SINGH KUSHWAHA on April 1, 2013 at 4:20pm — 10 Comments
फूलों को तू सूंघ मत, आज अप्रैल फूल|
हो सकता है फूल में, हो मिर्ची की धूल||
तू देख वतन पश्चिमी, कितने होते…
ContinueAdded by rajesh kumari on April 1, 2013 at 3:00pm — 19 Comments
'मत्तगयन्द' सवैया : 7 भगण व अंत में दो दीर्घ
जात न पात न भेद न भाव न रूप न रंग न डोर दिवारें.
एक धरा यह प्रेम भरी जँह प्रेम लिए हम आप पधारें,
सीख सिखाय रहे सबहीं यँह ज्ञान भरें अरु लेख निखारें,
देश विदेश मिलाय दिए जन मेल…
Added by अरुन 'अनन्त' on April 1, 2013 at 2:33pm — 17 Comments
हमें मिला यह मंच, हमरा…
ContinueAdded by अरुन 'अनन्त' on April 1, 2013 at 1:00pm — 16 Comments
ओबीओ परिवार सम, शारद के सब भक्त
’सीख-सिखाना’-अर्चना, भाव गहन हों व्यक्त
भाव गहन हों व्यक्त, आज का दिन पावन है
नदिया धारे धार, जिये नित परिवर्तन है…
ContinueAdded by Saurabh Pandey on April 1, 2013 at 10:30am — 33 Comments
बीते इसके साथ में, माह दिवस अरु साल,
छंद ‘चित्र से काव्य तक’, लगता बहुत कमाल,
लगता बहुत कमाल, गजब के छंद सुनाता,
छ्न्दोत्सव आगाज, महोत्सव सबको भाता,…
ContinueAdded by Ashok Kumar Raktale on April 1, 2013 at 8:08am — 13 Comments
अभी हाल में मुझे एक उच्च मध्यम वर्ग के यहाँ पूजा (सत्य नारायण भगवान की पूजा) में जाने का सौभाग्य प्राप्त हुआ! बड़े अच्छे ढंग से तैयारियां की गयी थी. सफाई सुथराई का भी पूरा पूरा ख्याल रखा गया था. उम्मीद यह थी कि पूजा में बैठने वाले यजमान और उनकी श्रीमती बिना कुछ खाए पूजा में बैठेगें ... पर यह क्या ? सुनने में आया कि सत्यनारायण भगवान की कथा में यह बाध्यता नहीं है. फिर क्या, सभी लोगों ने जमकर इडली और बड़े खाए पंडित जी भी सहभागी बने. उसके बाद पूजा के क्रिया-कलाप प्रारंभ हुए. पंडित जी को कहा गया…
ContinueAdded by JAWAHAR LAL SINGH on April 1, 2013 at 6:04am — 22 Comments
लब पे ये मुस्कान जैसे चंद्रमा हो,
तारक खचित अम्बर में तुम अनुपमा हो –
विश्व के सुकुमार पलकों पर सुभगे,
स्वप्नवत तुम मधुर कोई कल्पना हो.
*****
जागो जगाओ विश्व को दो निज आलोक,
कलुष भेद तम दूर हटें जागे त्रिलोक,
बाहु में शक्ति, हृदय में भक्ति लिए सुकुमारी,
निर्भीक बढ़ो जीवन पथ पर बेरोक-टोक.
****
माटी का कण तृण गंध तुम्हारे साथ है,
उन्मुक्त समीरण मंद तुम्हारे साथ है,
जीवन उपवन में खिली हुई ऐ नवल कलि,
रोम-रोम में रग-रग में भगवान…
Added by sharadindu mukerji on April 1, 2013 at 1:30am — 11 Comments
सजा औरत को देने में मज़ा है तेरा ,
क़हर ढहाना, ज़फा करना जूनून है तेरा !
दर्द औरत का बयां हो न जाये चेहरे से ,
ढक दिया जाता है नकाब से चेहरा !
बहक न जाये औरत सुनकर बगावतों की खबर ,
उसे बचपन से बनाया जाता है बहरा !
करे न पार औरत हरगिज़ हया की चौखट ,
उम्रभर देता है मुस्तैद होकर मर्द पहरा !
मर्द की दुनिया में औरत होना है गुनाह ,
ज़ुल्म का सिलसिला आज तक नहीं ठहरा…
Added by shikha kaushik on March 31, 2013 at 9:02pm — 9 Comments
मुझे आज ही ज्ञात हुआ की 1 अप्रैल 2013 को ओबीओ की
तीसरी वर्ष गाँठ है। तीन वर्षो में इस मंच ने मुझ जैसे सैकड़ों लेखको को तैयार किया
है | इस अवसर पर दोहों के रूप में सभी सदस्यों में सहर्ष पुष्प समर्पित है ।-
बढे साथ का…
ContinueAdded by लक्ष्मण रामानुज लडीवाला on March 31, 2013 at 9:00pm — 21 Comments
फूलों ने जब खिलना है तशीर मुताबिक
फेलेगी खुशबु भी तब समीर मुताबिक
कर ले, कह ले, कुछ भी ये हक है तेरा
कलम लिखेगी जब,अपनी जमीर मुताबिक
यूँ तो सपने हजारों तेरे मन में हें,
याद करेंगे लोग पर तदबीर मुताबिक
साथ निभाएँगे कब तक पंख जो मंगवें,
तुम कब उड़ोगे न खुद की जमीर मुताबिक
शख्स जिसका उम्र भर घर ना हुआ था अपना
ऐसा मिलेगा जब भी तो फकीर मुताबिक
चाल ढाल मेरी भी मुझ को समझ ना आई
चलता रहाँ…
Added by मोहन बेगोवाल on March 31, 2013 at 6:30pm — 10 Comments
Added by Savitri Rathore on March 31, 2013 at 5:03pm — 4 Comments
Added by विन्ध्येश्वरी प्रसाद त्रिपाठी on March 31, 2013 at 4:47pm — 12 Comments
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