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March 2012 Blog Posts

बहू या अलादीन का चिराग

एक बात समझ में नहीं आती है कि जब हमारी हैसियत नहीं होती तो क्यों दूसरे परिवार की प्यारी सी बिटिया को अपने घर में बहू बनाकर लाते है. क्या हम इतने निकम्मे, लूले-लंगडे हो गए है कि बेटे व परिवार की सुख-सुविधा की वस्तुओं को एकत्र करने की नियत के साथ दूसरे से धन ऐंठने के लिए उनकी प्यारी सी बिटिया को विवाह मंडप में अग्नि के सात फेरों के बाद अपने घर ले आते है. फिर उस परिवार की मजबूरी बन जाता है कि वह अपनी बिटिया की खुशी के लिए वह सब कुछ करे, जो हम चाहते है. क्योंकि हम तो पहले से ही इतने कंगाल हैं,…

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Added by Harish Bhatt on March 8, 2012 at 12:04pm — 3 Comments

होली आई रे



 नीला   रंग अम्बर पे धरा हरियाली छायी है 

फीकी पड़ी वसंत बयार लगे होली आयी है 
चहके कानन फूला उपवन चली पवन मतवाली है 
पुलकित तन  बहके मन आनन् पे  छायी लाली  है 
फीकी पड़ी वसंत बयार .........
अमराई फूली सरसों फूली डार डार कोयलिया कूकी 
चातक पपीहा विरही प्रियतमा पिया मिलन हिय हूकी 
फीकी पड़ी वसंत बयार…
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Added by PRADEEP KUMAR SINGH KUSHWAHA on March 7, 2012 at 7:26pm — 1 Comment

तक धिनैया तक धिनैया फागुन के बयार

 [चित्र द्वारा: सोनाली सिंह ]


तक धिनैया तक धिनैया फागुन के…
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Added by Sulabh Jaiswal on March 7, 2012 at 5:08pm — 2 Comments

होली एक चुनौती

आपको और आपके परिवार को रंगों के त्यौहार होली की हार्दिक शुभकामनाएं

हम खुशनसीब है कि जिंदगी ने हमको अपने गिले-शिकवे दूर करने का एक और मौका दिया है। माना जाता है कि रंगो की होली में गिले-शिकवे बह जाते है। भले ही दिखावे के लिए ही सही, लोग एक-दूसरे के गले मिलकर होली की बधाई के साथ-साथ अपने को पाक-साफ बताते है, तो इसमें क्या बुरा है। आखिर होली का मकसद ही है बैर-भाव भुला कर प्यार से एक-दूसरे के गले लग जाना। वैसे भी दिखावे का जमाना है, तो दिखाने के लिए ही सही, कुछ बुराई तो कम होगी ही हमारे…

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Added by Harish Bhatt on March 6, 2012 at 9:43am — 1 Comment

भारत और हम









भारत सदैव 
आजाद था
आजाद है 
आजाद रहेगा 
 गुलामी और आजादी
 का कैसे भान हो 
शासक कोई, शासन कोई 
चाहें जो सरकार हो 
जब मानसिकता विकलांग हो 
भारत कभी जकड़ा नहीं 
गुलामी की जंजीर में 
देखने का…
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Added by PRADEEP KUMAR SINGH KUSHWAHA on March 5, 2012 at 3:50pm — 11 Comments

जरूरत सोच बदलने की

हर सोच, हर कल्पना, हर विचार पर हजारों पन्ने लिखे जा चुके है. कुछ लोगों की दुष्ट मानसिकता की बदौलत आज तक भी हम गुलामी की मानसिकता से पूरी तरह नहीं उबर पाए है. समय के साथसाथ गुलामी की परिभाषा भी बदल गई. पहले विदेशियों का कब्जा होने से हम गुलाम थे. उनको खदेड़ा, तो अब यहां धार्मिक, राजनैतिक ताकतों के गुलाम हो गए. जो इनकी सीमाओं से बाहर रहने का साहस दिखाए, वह समाज के अयोग्य नागरिकों में शामिल कर दिया जाता है. बहरहाल बात यह है कि कुछ लोग अपने जीवनकाल में वह मुकाम हासिल करते है, जिनके आचरण को आदर्श…

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Added by Harish Bhatt on March 5, 2012 at 1:32pm — 3 Comments

कटी पतंग (एक बलात्कार -पीड़िता का ग़म)

 
ना मैं हंसी हूँ - ना मैं ख़ुशी हूँ, ना मैं रंग -उमंग हूँ.
मेरा जीवन एक अफसाना , मैं एक कटी पतंग हूँ.
डोर से कटकर लटक गयी हूँ, मंजिल -पथ से भटक गयी हूँ.
कोई रंग चढ़े भी कैसे , मैं ऐसा बदरंग हूँ.
मेरा जीवन एक अफसाना , मैं एक कटी पतंग हूँ.
तूफानों में जकड़ गयी हूँ, साहिल से मैं बिछड़ गयी हूँ.
किस मुँह से बाबुल से कहूँ मैं, रंज़ोग़म के संग हूँ.
मेरा जीवन एक अफसाना , मैं एक कटी पतंग हूँ.
किस -किस…
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Added by satish mapatpuri on March 4, 2012 at 5:20pm — 7 Comments

ग़ज़ल- गालियों से पेट भर रोटी नहीं तो क्या हुआ

 

ग़ज़ल- गालियों से पेट भर रोटी नहीं तो क्या हुआ

 

ये व्यवस्था न्याय की भूखी नहीं तो क्या हुआ ,

गालियों  से पेट भर रोटी नहीं तो क्या हुआ |

 

पार्कों में रो  रही  हैं गांधियों…

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Added by Abhinav Arun on March 4, 2012 at 10:43am — 18 Comments

ओ बी ओ का नव रूप ..

कितने वक़्त के बाद आई यहाँ ..

जैसे…
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Added by Lata R.Ojha on March 4, 2012 at 2:30am — 11 Comments

गुफ़्तगू पत्रिका का आनलाईन विमोचन व मुशायरा धूमधाम से सम्पन्न

इलाहाबाद। एक पुलिसकर्मी हमेशा डंडा ही नहीं चलाता बल्कि कलम उठाकर अपनी अभिव्यक्ति भी खूबसूरती से व्यक्त कर सकता है। इश्क सुल्तानपुरी ने इस को बेहतरीन ढंग से करके दिखाया है। इन्होंने अपनी काव्य सृजन की क्षमता से लोगों को अवगत करा दिया है। यह बात डीआईजी कार्मिक श्री लाल जी शुक्ल ने ‘गुफ्तगू’ के इश्क सुल्तानपुरी अंक के विमोचन के अवसर पर कही। उन्होंने कहा कि इश्क साहब की शायरी को लोगों तक लाने में गुफ्तगू पत्रिका ने महत्वपूर्ण भूमिका…

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Added by वीनस केसरी on March 3, 2012 at 9:30pm — 7 Comments

जुदाई (गजल)

अपनों से जुदा अपने,होते हैं कहां प्रियवर।

अनमोल रतन धन,खोते हैं कहां प्रियवर॥



नजरों से दूरी तो,दूरी ही नहीं होती।

दिल से अलग अपने,होते हैं कहां प्रियवर॥



आंखों में आंसू हैं,अपनों के लिए ही हैं।

गैरों के लिए हम,रोते हैं कहां प्रियवर॥…



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Added by विन्ध्येश्वरी प्रसाद त्रिपाठी on March 3, 2012 at 9:30pm — 15 Comments

भूला कहाँ हूँ कच्चा घर अपने गाँव का

भूला कहाँ हूँ कच्चा घर अपने गाँव का ||

जो बना था लकड़ी का दर अपने गाँव का ||

थी वो महकती मिटटी और वो कच्ची गली ,

घूमे  ख़्यालों में  मंज़र अपने  गाँव का ||

आँखे हुई नम , देखकर  पानी  बरसात  का ,

जो याद आये जोहड़ अक्सर अपने गाँव का ||

जब…

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Added by Nazeel on March 3, 2012 at 7:00pm — 11 Comments

प्रथम पुष्प

प्रथम पुष्प अर्पित तुमको, मसलो या श्रृंगार करो,

आया तेरे द्वार प्रभु, मेरा बेड़ा पार करो ,



चाहत थी जीवन की मेरी, दुखियों का दर्द उधार लूं

उजड़ चुके है जिनके घर,…

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Added by PRADEEP KUMAR SINGH KUSHWAHA on March 3, 2012 at 3:00pm — 26 Comments

अपवाद मेरे जीवन के

विकल्पों की इस दुनियां में

बेरस से इस जहां में

तुम्ही कहो क्यों ढूँढूँ विकल्प तुम्हारा

तुम ही तो वो लम्हा हो

जिसे जीया है मैने

तुम्हारी ही सॉसों के बिगङते तरन्नुम को

तो गीतों में पिरोया है मैंने

तुम्ही पर छोङ रखी है हर ख्वाहिश

 एक ही तो है सपना,जिसे तुम्हारी ही

आंखों से देख रखा है मैने

तुम्हारे ही हर लफ्ज को कैद रखा है दिल में,

जिसे तुम्हारा ही आशियां बनाया है मैने

तुमसे ही तो खुशियों-गमों का रिश्ता…

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Added by minu jha on March 3, 2012 at 1:00pm — 26 Comments

दुनियादारी के दस हाइकू

फूटा ठीकरा

शेख बच निकला

तू था मुहरा

 

ढूंढ़ बकरा

शनैः रेत लो गला

दे चारा हरा

 

बेजुबाँ खरा

हक माँगने लगा

तो दोष भरा

 

अना दोहरी

नश्तर सी चुभन

दगा अखरी!

 

यहाँ खतरा

ईश्वर हुआ अंधा

इन्सां बहरा

 

यार बिसरा

अब यहाँ क्या धरा

चलो जियरा

 

छटा कुहरा

छद्म बंधन मुक्त

पिया मदिरा

 

समा ठहरा

इंद्रधनुषी दुनिया

नशा…

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Added by राकेश त्रिपाठी 'बस्तीवी' on March 3, 2012 at 10:30am — 17 Comments

-:प्रेम के कुछ मुक्तक:-

"कम से कम दो कदम प्रेम पथ पर चलें"…




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Added by CA (Dr.)SHAILENDRA SINGH 'MRIDU' on March 3, 2012 at 1:30am — 13 Comments

हाइकु गीत



 खुद बेवफा

 दूसरों से चाहते

 करें वो वफा |…

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Added by dilbag virk on March 2, 2012 at 8:42pm — 6 Comments

वक़्त का वज़ूद

वक़्त का वज़ूद

वक़्त की बेलगाम रफ़्तार का वज़ूद

दिखता है चेहरे की गहराती लकीरों में

या मिलता है जीवन की भूलभुलैया में

स्नेहसिक्त माँ की आँचल में मौज़ूद

है अब भी मेरे होने की महक

सन्नाटों में गूँजती है मेरी चहक ।

चलती थी एक गुड़िया उँगलियों को थामे

उन काँपती बेजान हाथों की नरमी

और छुपी उनमे उनके नेह की गरम

उन्हीं थापों से बीतती हैं रातें ,हँसती है शामें ।

चराचर का भेद समझा जब ज्ञानदीप से

जीवन को गुज़रता देखा सामने से

अतीत के गर्त में…

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Added by kavita vikas on March 2, 2012 at 7:34pm — 6 Comments

अंतस का कोना...

बतकही कितनी भी
कर लूँ
रहता है खाली खाली
अंतस का कोना
ढोल बजा लूँ कितनी भी
रहता है सुना सुना
अंतस का कोना
शब्दों का मायाजाल है
जिंदगी का ख्याल है
कोशिश कितनी भी कर लूँ
रहता उदास है
अंतस का कोना
इश्वर के दरबार में
सब के लिए अरदास है
चलो अक दीप जला लूँ
जुगनुओ को दोस्त बना लूँ
अपनेपन के शोर से
गुंजित कर लूँ
अंतस का कोना.....

Added by MAHIMA SHREE on March 2, 2012 at 5:52pm — 9 Comments

मेरे कुछ हाइकू...( 5 - 7- 5 )

1.

प्रकृति प्यारी 

रुई बिछी धरती

ये बर्फ़बारी .

२.

मुखौटे छाए

जनमानस लुटा

चुनाव आये .

३.

उड़ते गिद्ध

फिर मारा आदमी

लो आया युद्ध .

४.

ये दुपहरी 

अलसाया शरीर

जेठ का माह .

रचयिता : डा अजय कुमार शर्मा

Added by Dr Ajay Kumar Sharma on March 2, 2012 at 5:26pm — 6 Comments

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