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औकात

‘कवियों से मुझे नफरत है

घिन आती है उनके वजूद से

जैसे सच्चे मुसलमान को 

मूलधन के सूद से’

मुझसे कुबेर ने कहा

मैंने आघात को सहा

 

‘कवि तो मै भी हूँ

अँधेरे का रवि मै ही हूँ

जहाँ नहीं जाता रवि

वहां पहुँच जाता कवि 

फिर आपको घिन क्यों है ?’

 

‘वो बात जरा यों है,

कवि को गरीब ही दिखते है

उन पर ही लिखते हैं

उन्हें दिखता है –काली रात,…

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Added by डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव on December 28, 2014 at 3:20pm — 19 Comments

गजल- बिना तेरे किसकी इबादत करेंगे!

१२२ १२२ १२२ १२२

बहुत दुख दिये है कि नफरत करेंगे!
तेरी अब कभी हम न चाहत करेंगे!!

जरा सोच इतना लिया होता जालिम!
बिना तेरे किसकी इबादत करेंगे!!

समझ ही न पाये मुहब्बत मेरी तुम!
कि मर के भी तुमसे मुहब्बत करेंगे!!

वे बच्चें हैं उन पर न गुस्सा करो यूं!
वे नादां वही फिर शरारत करेंगे!!

तु जिसके लिए इतना पागल है 'राहुल'!
अदा प्यार की वो न कीमत करेंगे!!

मौलिक व अप्रकाशित!

Added by Rahul Dangi Panchal on December 28, 2014 at 2:10pm — 22 Comments


सदस्य कार्यकारिणी
आओं ना यार चले .... (मिथिलेश वामनकर)

जीवन लड़कैया से, सपनो की नैया से

तारों के पार चलें, आओं ना यार चले

 

उतनी ही प्यास रहे, जितना विश्वास रहे

मन की तरंगों से पुलकित उमंगों से 

आशा के विन्दु से जीवन विस्तार चले........

 

क्या था जो पाया था, क्या था जो खोया था

था कुछ समेटा जो सारा ही जाया तो   

खुशियों की टहनी को थोड़ा सा झार चले.......

 

डोली पे फूल झरे, दो दो कहार चले

सुन्दर सी सेज सजी, तपने को देख रही

मन की अगनिया को थोड़ा सा बार चले…

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Added by मिथिलेश वामनकर on December 28, 2014 at 10:30am — 19 Comments


सदस्य कार्यकारिणी
है तेरे वास्ते वफ़ा मेरी- ग़ज़ल

2122 1212 22/112

तू मुहब्बत न आजमा मेरी

है तेरे वास्ते वफ़ा मेरी

 

यूँ कहे पर न जा ज़माने के

गाह चौखट तलक तो आ मेरी

 

अश्क़ चाहें निकलना आँखों से

रोकती है उन्हें अना मेरी

 

कौन रखता हिसाब ज़ख़्मों का

खुद मैं कातिब हयात का मेरी

 

रेत में दफ़्न हो गया कतरा

जो ज़बीं से अभी गिरा मेरी

 

ज़ख़्म देते हैं वो मुझे पहले

फिर वही करते हैं दवा मेरी

 

हर सफर में उदास राहों…

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Added by शिज्जु "शकूर" on December 28, 2014 at 9:00am — 20 Comments

वसुंधरा की त्रासदी/कारण था पतझार

वसुंधरा की त्रासदी,

कारण था पतझार !

वसन्त आगमन हुआ,

उपवन में आया निखार !!

 

प्रफुल्लित हुई नव कोपल,

पल्लव मुस्करा रहे !

सतरंगी सुमनों पर,

भ्रमर हैं मंडरा रहे !!

 

प्रकृति की सात्विक सुन्दरता,

अपनी प्रकृति मैं उतार लें !

आस्था, विश्वास के सूखे,

पल्लव को फिर संवार लें !!

 

संस्कारों की पौध लगा,

धरा को निखार लें !

प्रकृति के सन्देश को,

जन-जन स्वीकार लें…

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Added by Hari Prakash Dubey on December 28, 2014 at 4:30am — 10 Comments


सदस्य कार्यकारिणी
गैर की ग़ज़ल थी तू... ग़ज़ल (मिथिलेश वामनकर)

वक़्त के थपेड़ो में.... खर्च आशिकी अपनी

आज फिर मुहब्बत ने हार मान ली अपनी

 

लफ्ज़ भी किसी के थे, दर्द भी किसी का था

गैर की ग़ज़ल थी तू... सिर्फ सोच थी अपनी

 

भूख की गुजारिश में रात भर बिता कर के

बेच दी चराग़ों ने........ आज रौशनी अपनी

 

आजकल कहीं अपना जिक्र भी नहीं मिलता

वक़्त था कभी अपना, बात थी कभी अपनी

 

आशना तसव्वुर में........ कुर्बते मयस्सर है

फिर किसी परीवश से जान जा लगी अपनी

 

आसमान की…

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Added by मिथिलेश वामनकर on December 28, 2014 at 12:52am — 16 Comments

सुन लो नयन अबोले मेरे

सुन लो नयन अबोले मेरे

सुन लो नयन अबोले मेरे

कितना कुछ कहने को आकुल

चिर-प्रतिक्षित हृदय-द्वार की

खड़काते हैं कब से सांकल !

सुनो खड़कती उर की पीड़ा

क्रन्दन करता रहा वियोगी

तुम संजीवन सुषेण तुम्हीं हो

में अमोध का मारा रोगी |

जहाँ-जहाँ पे पट में भिती

तहाँ-तहाँ से किरने खोजूँ

अवचेतन को चेतन करने

के उपाय निरंतर सोचूँ |

सोच रहा हूँ क्या मैं गाऊँ

तू भी भीतर से अकुलाए

पट हृदय के खोल…

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Added by somesh kumar on December 28, 2014 at 12:12am — 3 Comments

लाल पानी (लघुकथा)

"तो बीबी जी कोनू जगह पक्की हुई सूट की?"

"जी, सरपंच जी।

वो जो बड़ के पेड़ के पास नदी है न, बस वहीँ नीतू के डूबने का सीन शूट करेंगे।"

"बीबी जी, बौराय गई हो का? हम तोहरा के पहले ही बतावत रहे अऊर एक बार फिर बताय देब, जब-जब उ नदी का पानी लाल होई जाई उहा मौजूद हर आदमी-औरत की मौत हुई जाई। सराप है उ नदी पे।"

"आप आज भी इन सब बातोँ पर यकीन करते हैँ?"

"तुम सहरी लोगन का यही तो प्राब्लम है कोनू की कछु नाही सुनत।"

अगले दिन सीन शूट होने लगा। अचानक नदी का पानी लाल हो गया।…

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Added by pooja yadav on December 27, 2014 at 10:00pm — 6 Comments

इक ग़ज़ल (आईने भी ज़बान रखते हैं !! )

आज हम भी मकान रखते है

साथ अपना जहान रखते है !!



प्यार से देख लो जरा तुम भी

आईने भी ज़बान रखते हैं !!



जिंदगी में कमी नहीं कोई

इसलिए कुछ  गुमान रखते है !!



तुम हमें छोड़ कर नहीं जाना |

तुम में* हम अपनी*जान रखते हैं ||



साथ उनके रहे सभी अपने,

खास सबका भी* मान रखते है !!



फूल कितने खिलाय आँगन में

वो बहुत घर का* ध्यान रखते है !!



है सभी काम का पता उनको !

वो तजुर्बा तमाम रखते है !!  



(अप्रकाशित और मौलिक…

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Added by Alok Mittal on December 27, 2014 at 5:44pm — 17 Comments

कब तलक दीपक जलेगा ये मुझे मालूम है

२१२२   २१२२   २१२२   २१२

कब तलक दीपक जलेगा ये मुझे मालूम है

तप रहा सूरज ढलेगा ये मुझे मालूम है

 

कौन ऊँचाई पे कितनी ये नहीं मुझको पता

पर जमी में ही मिलेगा ये मुझे मालूम है

 

कितनी दौलत वो कमाता आप उससे पूँछिये

साथ उसके क्या चलेगा ये मुझे मालूम है

 

अपनी खुशियों के लिए जो आज  कांटे बो रहे

कल उन्हें भी ये खलेगा ये मुझे मालूम है

 

वो बबूलों को लगाते आम की उम्मीद में

क्या हकीकत में फलेगा ये मुझे…

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Added by Dr Ashutosh Mishra on December 27, 2014 at 4:31pm — 16 Comments


सदस्य कार्यकारिणी
कैनवस जिंदगी का \ नज्म (मिथिलेश वामनकर)

आरम्भ

 

मिल गए शख्स दो,पास आने लगे

कैनवस ज़िन्दगी का सजाने लगे

रोज फिर वो मुलाकात करने लगे

हर मुलाकात का रंग भरने लगे

 

मध्यांतर



कैनवस रोज़ रंगो से भरने लगा

वो ख़ुशी से ग़मों से संवरने लगा

देखते देखते दिन गुजरने लगे

ज़िन्दगी के सभी रंग भरने लगे

 

अंत



हर मुलाकात के रंग घुल मिल गए

और मिलके सभी रंग क्या कर गए

ये करामात या कसमकस देखिये

आज काला हुआ कैनवस…

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Added by मिथिलेश वामनकर on December 27, 2014 at 2:38am — 8 Comments

यूँ मुझे याद करके

यूँ  मुझको याद करके

हिय में ना धार उठाओ

शांत-शीतल मन ताल है

छेड़कर,ना भंवरे उठाओ |

स्मृतियाँ आषाढ़ी नदी सी

वेग-दासी हो रही हैं  

तुलना प्रस्तुत की पुरा से  

मन-उदासी हो रही है |

मुश्किलों से बाँधा है मन

और गाठें मत बढाओ |

यूँ  मुझको  याद करके

हिय में ना धार उठाओ

जब तक रहता अधूरा

प्रेम की ही पूर्णंता है

वासनारत देव हरदम

भक्त नए ढूंढता है |

मुक्त मधुप मकरंद पा

कब कलि की टोह…

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Added by somesh kumar on December 27, 2014 at 1:30am — 3 Comments

मैंने ऐसा मंज़र देखा

मैंने ऐसा मंज़र देखा।
बहती आँख समंदर देखा।।

मुझको अपना कहता था जो।
उसके हाथों खंजर देखा।।

मुखड़ा देखा जबसे उनका।
तबसे चाँद न अम्बर देखा।।

शायद कुछ तो दिख ही जाये।
मैंने खुद के अंदर देखा।

दूर दूर तक हरियाली थी।
धरती अब वो बंज़र देखा।।
**********************
राम शिरोमणि पाठक
मौलिक।अप्रकाशित

Added by ram shiromani pathak on December 26, 2014 at 1:00pm — 24 Comments

कितना तामझाम...(नवगीत ) सीमा हरि शर्मा

कितना तामझाम....(नवगीत)



कितना तामझाम पसराया

जीवन आँगन में।



स्वर्णिम किरणें सुबह जगाती

दिन भर आपाधापी है।

साँझ धुँधलके से घिर जाती

रात तमस ले आती है।

तम को रोज झाड़ बुहरया

जीवन आँगन में।....कितना तामझाम पसराया



गजब मुखोटे मुख पर सजते

तन मशीन के कलपुर्जे।

जीने का दम भरने वाले

मानव ने ये खुद सरजे।

दूर खड़ा मन है खिसियाया

जीवन आँगन में।.....कितना तामझाम पसराया



रेलम पेला धक्का मुक्की

चलती…

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Added by seemahari sharma on December 26, 2014 at 12:00pm — 14 Comments

जब नए शब्द बुन लूँगा

कल से तुम नहीं 

तुम्हारी यादें आएँगी

गिरेगी बूंदें आँखों से

समुन्दर बन जायेंगी

रो- रो कर    मैं  भी

समुन्दर  भर  दूंगा

पर तुम्हे मन की बात कहूँगा

जब नए शब्द बुन लूँगा !! 

तुम साधारण नहीं

साधारण शब्द  तुम्हारे नहीं

तुम्हे प्यार करता हूँ

इन अर्थहीन शब्दों को,

तुमसे कभी नहीं कहूँगा

नयी उपमायें गढ़ लूँगा

पर तुम्हे मन की बात कहूँगा,

जब नए शब्द बुन लूँगा !!

 

तुमसे बात नहीं…

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Added by Hari Prakash Dubey on December 26, 2014 at 11:00am — 5 Comments

ग़ज़ल ,,,,,,,,,,,, गुमनाम पिथौरागढ़ी

2122

ज़िन्दगी है

बोझ सी है

इश्क तो अब

ख़ुदकुशी है

इक ग़ज़ल सी

तू हँसी है

अब ग़मों से

दोस्ती है

बुलबुले सी

ये ख़ुशी है

आफतों से

दोस्ती है

इक पहेली

ज़िन्दगी है

शोर गुमनाम

दिल में भी है

मौलिक व अप्रकाशित

गुमनाम पिथौरागढ़ी

Added by gumnaam pithoragarhi on December 26, 2014 at 8:22am — 12 Comments

स्पर्श

स्पर्श

कभी-कभी तुम्हारे स्पर्श मात्र से

जो सिहरन होती है वो उस

चरम से बड़ी है जो शायद

तुम्हें पूर्ण पाने से मिले |

बीच सागर में ,तपती दोपहरी में

अकेले बेड़े पर भटकते…

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Added by somesh kumar on December 26, 2014 at 12:00am — 9 Comments

भंडारा (कहानी )

                        भंडारा

मास्टर जी ,आप भी चलिए ना भंडारे में - - - “ साथियों ने आग्रह किया|

‘” भाई तुम तो जानते ही हो ,मुझे लाईनों में लगना और याचकों की तरह मांगना पसंद नहीं है “ मा.भोलेराम ने सपाट सा जवाब दिया |

“ अरे!आप भी,भाईसाहब,भंडारे की लाईनों में लगने में कौन सी ईज्जत घट जाती है बल्कि ये तो आपकी भक्ति-भावना की परीक्षा होती है ,प्रसाद के लिए आप जितना ईंतज़ार कर सकते हैं उतना ही पुण्य बढ़ता है “`राजीव बोल पड़ा |

“भाई मैं ऐसी भक्ति-परीक्षा नहीं देना चाहता…

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Added by somesh kumar on December 25, 2014 at 10:57pm — 5 Comments


सदस्य टीम प्रबंधन
ग़ज़ल - बोलिये किसको सुनायें.. // -- --सौरभ

2122 2122 2122 212

 

दिख रही निश्चिंत कितनी है अभी सोयी हुई  

गोद में ये खूबसूरत जिन्दगी सोयी हुई



बाँधती आग़ोश में है.. धुंध की भीनी महक

काश फिर से साथ हो वो भोर भी सोयी हुई



चाँद अलसाया निहारे जा…

Continue

Added by Saurabh Pandey on December 25, 2014 at 9:30pm — 35 Comments

बस तू साथ है |

हर जगह हर घडी बस तू साथ है

जहाँ मेरी नज़रे पडी बस तू साथ है

छोड़ा वक़्त ने जहाँ मुझ बदनसीब को

वहां पे मिली खड़ी बस तू साथ है



मेरे नये संसार में बस तू साथ है

प्यार के व्यवहार में बस तू साथ है

बदल गये जिसमें मेरे सब चाहने वाले

उस वक़्त के रफ़्तार में बस तू साथ है



मोहब्बत के इस कर्ज़ में बस तू साथ है

इंसानियत के फ़र्ज़ में बस तू साथ है

यूँ तो खुशियों के हमदर्द सब हैं मगर

मुझे मिले हर दर्द में बस तू साथ है



सावन का असर है जब तू…

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Added by maharshi tripathi on December 25, 2014 at 8:38pm — 7 Comments

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