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पत्थरों पर गीत लिखे

कितने भले हो तुम 
कि तुमने 
पत्थरों पर गीत  लिखे

और पत्थर उछाल दिए 
 
इधर कितने भले हैं हम 
पत्थराई दृष्टि 
पत्थरों पर गीत पढ़े …
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Added by amita tiwari on March 23, 2019 at 12:30am — 1 Comment

होली के दोहे :

होली के दोहे :

हिलमिल होली खेलिए, सब अपनों के संग।

रिश्तों में रस घोलिए, मिटा घृणा के रंग।। १

रंगों की बौछार में, बोले मन के तार।

अधर तटों को दीजिए, साजन अपना प्यार।। २

होली के हुड़दंग में , सिर चढ़ बोले भाँग।

करें ठिठोली मुर्गियाँ, मुर्गे देते बाँग।।३

तन-मन भीगे रंग में, मचली मन की प्यास।

अवगुंठन में नैन से, नैन रचाएं रास। ४

चाहे जितना कीजिए, होली पर हुड़दंग।

लग कर गले मिटाइये,…

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Added by Sushil Sarna on March 22, 2019 at 7:00pm — 8 Comments

'कागा उवाच' (लघुकथा) :

तीनों प्यासे थे। अपनी-अपनी सामर्थ्य अनुसार वे पानी की तलाश कर चुके थे। मुश्किल से एक सुनसान जगह पर एक झुग्गी के द्वार के पास एक मटका उन्हें दिखाई दिया। बारी-बारी से तीनों ने उसमें झांका। फिर गर्दन झुकाकर एक दूसरे को उदास भाव से देखने लगे। मटके में पानी का तल काफी नीचे था।



बहुत ज़्यादा प्यासे कौए ने पुरानी लोककथा अनुसार काफी कंकड़-पत्थर चोंच से उठा-उठा कर मटके में डाल कर पानी का स्तर ऊपर लाने की कोशिश की, लेकिन उसे उस कथा की कल्पना की सच्चाई समझ में आ गई। थक कर वह बैठ…

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Added by Sheikh Shahzad Usmani on March 22, 2019 at 6:30pm — 6 Comments

ग़ज़ल

221, 2121, 1221, 212



दैरो हरम से दूर वो अंजान ही तो है ।

होंगी ही उससे गल्तियां इंसान ही तो है ।।

हमको तबाह करके तुझे क्या मिलेगा अब ।

आखिर हमारे पास क्या, ईमान ही तो है ।।

खुलकर जम्हूरियत ने ये अखबार से कहा ।

सारा फसाद आपका उन्वान ही तो है ।।

खोने लगा है शह्र का अम्नो सुकून अब ।

इंसां सियासतों से परेशान ही तो है ।।

उसने तुम्हें हिजाब में रक्खा है रात दिन ।

वह भी तुम्हारे हुस्न का दरबान ही तो है…

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Added by Naveen Mani Tripathi on March 22, 2019 at 4:39pm — 2 Comments

सुब्ह शाम की तरह अब ये रात भी गई ..

2121-212-2121-212

सुब्ह शाम की तरह अब ये रात भी गई।।

ख़ैरख्वाह वो बने,खैर-ख्वाही' की गई।।

मुद्दतों के बाद गर जो यूँ बात की गई।।

खामियां जता के ही गात फिर भरी गई।।

गर दो'-आब की पवन,रोंक लें ये खिड़कियां ।

रूह चंद दिवारों के दरमियाँ सिली गई।।

गर कहूँ जो' उनकी' तो साफ़ लफ़्ज हैं यही।

रात-ओ-दिन युँ आदतन हमसे बात की गई ।।

बिन पढ़े किताब -ए- दिल ,ग़र हिंसाब कर दिया ।।

तो दरख़्ती' जिंदगी क़त्ल ही तो की…

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Added by amod shrivastav (bindouri) on March 22, 2019 at 10:30am — 1 Comment

पत्थरों पे हैं इल्ज़ाम झूठे सभी-गजल

212 212 212 212

अब नए फूल डालों पे आने लगे,

और' भ्रमर फिर ख़ुशी से हैं गाने लगे।

पत्थरों पे हैं इल्जाम झूठे सभी,

राही के ही कदम डगमगाने लगे।

रहबरी तीरगी की जो करते रहे,

अब वो सूरज को दीपक दिखाने लगे।

वादा वो ही किया जो था तुमने कहा,

घोषणा क्यों चुनावी बताने लगे।

जिनकी आँखों पे सबने भरोसा किया,

वक्त  आने पे सारे वो काने लगे।

भैंस बहरी नहीं सुन समझ लेगी सब,

बीन ये सोच कर फिर…

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Added by सतविन्द्र कुमार राणा on March 21, 2019 at 11:30am — 2 Comments

सरदार लाज़मी हो असरदार तो जनाब (३८ )

++ग़ज़ल ++(221 2121 1221 212 /2121 ) 

सरदार लाज़मी हो असरदार तो जनाब 

जो चुन सके अवाम के कुछ ख़ार तो जनाब 

****

ऐसा भी क्या शजर जिसे फूलों से सिर्फ़ इश्क़ 

कोई हो शाख शाख-ए-समरदार* तो जनाब (*फल से लदी डाली )

***

होगा नसीब में कि न हो बात और है 

ता-ज़ीस्त रहती प्यार की दरकार तो जनाब 

***

जज़्बात बर्ग-ए-गुल* से ही होते हैं क़ल्ब…

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Added by गिरधारी सिंह गहलोत 'तुरंत ' on March 20, 2019 at 10:51pm — 2 Comments

नवगीत-वेदना ने नेत्र खोले-बृजेश कुमार 'ब्रज'

वेदना ने नेत्र खोले

रात ने उर लौ लगाई
चांदनी कुछ मुस्कुराई
आज फिर चन्दा गगन में बादलों के बीच डोले
वेदना ने नेत्र खोले

रातरानी खिलखिलाई
रुत रचाती है सगाई
आ गया मौसम बसंती प्रीत पंछी ले हिंडोले
वेदना ने नेत्र खोले

ओ बटोही देश आजा
छोड़कर परदेश आजा
टेरती कोयल सलोनी मन पपीहा नित्य बोले
वेदना ने नेत्र खोले
(मौलिक एवं अप्रकाशित)
बृजेश कुमार 'ब्रज'

Added by बृजेश कुमार 'ब्रज' on March 20, 2019 at 6:11pm — 8 Comments

'मुझे भी!' (लघुकथा) :

आज होलिका दहन दिवस था। पहले से लिए गए फैसले के अनुसार अधिकतर लोग कोई न कोई सफ़ेद पोशाक पहन कर आये थे। होली अवकाश के पहले विद्यालय में छुट्टी होने के एक घंटे पूर्व परीक्षा मूल्यांकन कार्य के बीच स्टाफ को गुलाल से होली खेलने की अनुमति जैसे ही मिली महिला स्टाफ लायी हुई अपनी गुलाल की पुड़ियें खोलकर एक-दूसरे को तिलक कर गालों पर रंगीन गुलाल पोतने लगीं। एक-दो नौजवान पुरुष शिक्षक भी उनमें शामिल हो गये। शेष परीक्षा-मूल्यांकन कार्य में जुटे रहे। मोबाइल कैमरों से फ़ोटो, सेल्फ़ी व वीडियो का दौर भी शुरू…

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Added by Sheikh Shahzad Usmani on March 20, 2019 at 3:56pm — 9 Comments

कैसे बाँचें पीढ़ियाँ, रंगों का इतिहास - दोहे ( लक्ष्मण धामी' मुसाफिर' )

दोहे

कदम थिरकने लग गए, मुख पर छाए रंग

फागुन में मादक हुआ, मानव का हर अंग।१।



टेशू महका हैं इधर, उधर आम के बौर

रंगों की चौपाल है, खूब सजी हर ठौर।२।



अमलतास को छेड़ती, मादक हुई बयार

भर फागुन हँसती रहे, रंगों भरी फुहार।३।



धरती से आने लगी, मादक-मादक गंध

फागुन का है रंग से, जन्मों का अनुबंध।४।



हवा पश्चिमी ले गयी, पर्वों की बू-बास

कैसे बाँचें  पीढ़ियाँ, रंगों  का इतिहास।५।



हिन्दू मुस्लिम…

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Added by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on March 20, 2019 at 3:15pm — 4 Comments

होली

फागुन आया अंगना मेरे ,रंगो की हम जोली है ,

नभ में उड़ते रंग गुलाल,आज सखी री होली है |

 

गाते गीत चौक चौबारे ,मस्तों की ये टोली है,

बाजे ढोल मृदंग मजीरा ,आज सखी री होली है |

 

धानी धानी चुनरी  ओढे,पात बजाते ताली है

एक रंग में रंगे सभी है, आज सखी री होली है |

 

बिन ठिठोली होली कैसी ,बात सभी ने बोली है ,

भंग का रंग चढा सभी को , आज सखी री होली है |

 

धरती पर रंगो की नदियाँ ,अम्बर पर रंगोली है ,

आँगन आँगन…

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Added by Maheshwari Kaneri on March 20, 2019 at 3:00pm — 2 Comments

होली पर कुछ दोहे

मंच को होली की मुबारक के साथ इस अवसर पर कुछ दोहे :

होली के त्योहार पर ,इतना रखना ध्यान।

नारी का अक्षत रहे ,रंगों में सम्मान।।

गौर वर्ण पर रंग ने, ऐसा किया धमाल।

नैनों नें की मसखरी, गाल हो गए लाल।।

प्रेम प्यार का राग है होली का त्योहार ।

देह देह पर सज रही, रंगों की बौछार ।।

होली का त्योहार है, रिश्तों की मनुहार।

मन मुटाव को भूल कर,गले मिलें सौ बार।।

संयत होली खेलिए, रहे सुरक्षित चीर।

टूट न जाए…

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Added by Sushil Sarna on March 19, 2019 at 8:04pm — 2 Comments

चिट्ठियाँ --

चिट्ठियाँ नहीं जानती

वो तो बस चली आती हैं

कभी सही पते पर

तो अक्सर गलत पते पर

लेकिन उन्हें क्या पता

कि वह सालों साल

धूल खाती रहेंगी

दरअसल उनका गंतव्य

बदल चुका होता है

लेकिन लोग अपने पते

इन चिट्ठियों के लिए

अक्सर नहीं बदलते

बस फोन नंबर ही

बदल लेते हैं

सन्देश मिलते रहते हैं

उन बदले हुए नंबरों पर

लेकिन चिट्ठियाँ आती रहती हैं

उन पुराने पतों पर

लोग अक्सर भूल जाते हैं

लोग उन्हें अब नहीं बदलते…

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Added by विनय कुमार on March 19, 2019 at 7:13pm — 6 Comments

एक और कसम-व्यंग्य

दोस्त क्यूँ होते हैं, इस सवाल का जवाब जिंदगी के अलग अलग समय में अलग अलग हो सकता है. लेकिन एक जवाब तो कामन है कि जो आपके लिए हमेशा खड़ा रहे, आपकी हर मुसीबत में काम आए, वही असली दोस्त होता है. बहरहाल अधिकांश दोस्त ऐसे होते भी हैं, बस कुछेक अपवाद को छोड़कर.

कुछ लोगों का यह भी मानना है कि अगर सियापा ही न करें तो दोस्त कैसे, ये अलग बात है कि आप माने या न माने. अमूमन ऐसे दोस्त तो जिंदगी के शुरूआती दिनों में ही मिलते हैं जब आपके ऊपर किसी किस्म के सियापे का कोई असर नहीं पड़े. और मुझे तो बिलकुल नहीं…

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Added by विनय कुमार on March 19, 2019 at 7:00pm — 2 Comments

2 लघु रचनाएँ : इंतज़ार

2 लघु रचनाएँ : इंतज़ार
1.
कितने अज़ाब हैं
उल्फ़त के सफ़हात में
मिलता नहीं
क्यूँ चैन
फाड़ के भी
इंतज़ार के सफ़हात को

..................................
2
आंखें
कर बैठीं
इंतज़ार से
बग़ावत
अश्क
कर बैठे
चश्म से अदावत
उल्फत करती रही
इंतज़ार
ख़ारी लकीरों में

सुशील सरना

मौलिक एवं अप्रकाशित

Added by Sushil Sarna on March 19, 2019 at 5:30pm — 1 Comment

ग़ज़ल

2122 1122 1122 22



जब  मुलाकात में सौ बार  बहाना आया ।।

कैसे कह दूँ मैं तुझे प्यार निभाना आया ।।

क़ातिले इश्क़ का इल्ज़ाम लगा जब तुम पर ।

पैरवी करने यहां सारा ज़माना आया ।।

आज की शाम तेरी बज़्म में हंगामा है।

मुद्दतों बाद जो मौसम ये सुहाना आया ।।…

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Added by Naveen Mani Tripathi on March 19, 2019 at 1:09am — No Comments

उम्मीद का पेड़  (लघुकथा )

बूढ़े ने आँखें बंद किये-किये ही करवट ली I उसका ध्यान किचन से आती आवाज की ओर चला गया I

‘कैसा बना है ?’– बहू ने पूछा I

‘बहुत बढ़िया‘- बेटे ने कहा –‘थोड़ा चटनी और डालो I हाँ बस--बस I’

‘अच्छा लगा---? नमक ठीक पड़ा है न ?’

‘हाँ, बहुत मजेदार है I थोडा और कुरकुरा करो I’

‘जल जायेंगे ---‘

‘जलेंगे नहीं, बस थोड़ा लाल हो जाय I ‘- लडके ने उकसाया  I फिर जैसे उसे कुछ याद आया –‘पापा कहाँ हैं ?’

बूढ़े की आँखों में चमक आयी I कम से कम बेटे को तो उसकी फ़िक्र है I उसके…

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Added by डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव on March 18, 2019 at 2:30pm — 7 Comments

कोई ऐसे रूठता है क्या

122-1212-22

.

कोई रोकने लगा है क्या  ?

कोई राज दरमियां है क्या?

तेरा फोन अब नहीं आता!!

कोई और मिल गया है क्या ?

मुझे गैर कह दिया तुमने!!

मेरा वास्ता बुरा है क्या ?

मेरे रूबरू नहीं रहते!!

मेरा साथ बददुआ है क्या?

तू ही खैरख्वाह बस मेरा!!

तू भी आजकल खफा है क्या?…

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Added by amod shrivastav (bindouri) on March 17, 2019 at 9:00pm — 1 Comment

ये कौन आया है महफ़िल में चाँदनी पहने------पंकज मिश्र

1212 1222 1212 22

.

अदा में शोखियाँ मस्ती गुलाबी रंग धरे

ये कौन आया है महफ़िल में चाँदनी पहने

ये हुस्न है या कोई दरिया ही चला आया

है दिल डुबोने को गालों पे इक भँवर ले के

ठुमकने लगते हैं सपने सलोने सरगम पर

वो खिलखिला के हँसे तो लगे सितार बजे

नज़र उसी पे ही सबकी टिकी है महफ़िल में

ये बात और है उसकी निगाहें बस मुझ पे

ज़रा सा छू ने पे छुई मुई समेटे ज्यूँ खुद को

नज़र पड़े तो वो खुद को समेटती…

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Added by Pankaj Kumar Mishra "Vatsyayan" on March 17, 2019 at 7:30pm — 4 Comments

मन की मनमानी को ठुकराने लगे हैं ..

2122-2122-2122

वक्त से दो चार हो जाने लगे हैं।।

मन की मनमानी को ठुकराने लगे हैं।।

अब जो अरमानों को टहलाने-लगे* हैं।।(बहाने बाजी करना)

जीस्त की सच्चाई अपनाने लगे हैं।।

उम्र की दस्तक़ जो है चहरे प मेरे।

श्वेत होकर केश लहराने लगे हैं।।

बचपना अब रूठता सा जा रहा है ।

पौढ़पन* अब अक्श दरसाने लगे हैं।।

मंजिलों में जिनके परचम दिख रहे उन।

सब के तर* पे शाल्य* मनमाने लगे हैं।।( निचला हिस्सा,…

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Added by amod shrivastav (bindouri) on March 16, 2019 at 1:21pm — 4 Comments

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