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दीये पलते हैं...! (लघुकथा)

दीपावली के चंद रोज़ पहले से ही त्योहार सा माहौल था उस कच्चे से घर में। सब अपने पालनहार बनाने में जुटे हुए थे; कोई मिट्टी रौंद रहा था, कोई पहिया चला-चला कर उसके केंद्र पर मिट्टी के लौंदों को त्योहार मुताबिक़ सुंदर आकार दे रहा था। वह उन्हें धूप में कतारबद्ध जमाती जा रही थी। लेकिन अपने-अपने काम में तल्लीन और सपनों में खोये अपनों को देख कर उसे अजीब सा सुकून मिल रहा था हर मर्तबा माफ़िक़। एक तरफ़ उसकी सास; दूसरी तरफ़ समय के पहिये संग कुम्हार का पैतृक पहिया चलाता उसका पति दीपक और उसके कंधों पर झूलता…

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Added by Sheikh Shahzad Usmani on October 22, 2019 at 10:40pm — 3 Comments

चंद क्षणिकाएँ :

चंद क्षणिकाएँ :

मन को समझाने

आई है

बादे सबा

लेकर मोहब्बत के दरीचों से

वस्ल का पैग़ाम

............................

रात

हो जाती है

लहूलुहान

काँटे हिज़्र के

सोने नहीं देते

तमाम शब

............................

रात

जितने भी

नींदों में ख़वाब देखे

उतने

सहर के काँधों पर

अजाब देखे

...............................

हया

मोहब्बत में

हो गयी …

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Added by Sushil Sarna on October 21, 2019 at 7:30pm — 9 Comments

ग़ज़ल(ग़ज़ल बेबहर है...)

122  122  122  122

गजल बेबहर है, नदी बिन लहर है
कहो,क्या करूँ जब बिखरता जहर है?1

कहूँ क्या भला मैं? सुनेगा न कोई,
हुआ हादसा,मौन सारा शहर है।2

बचेगी नहीं लाज समझा करो तुम
बहकती यहां की हवा हर पहर है।3

गिनूँ क्या सितम गैर से जो मिले
मिले दर्द घर में, बड़ा ही कहर है।4

बुझाते रहे जो चिरागों को' अबतक
बताते कि होने को' अब तो सहर है।5
"मौलिक व अप्रकाशित"

Added by Manan Kumar singh on October 21, 2019 at 11:00am — 2 Comments

क्षणिकाएं: विछोह

1. ये यादों का अकूत कारवां है,

   नित बेहिसाब चला पर वही खड़ाI

2. तेरी हाथों की लकीरों का दोष,

   या मेरी दुआओ का,

   अकाट्य प्रवाह पहेली सा I

3. कभी शब्द भी मौन हुए,

   कभी मौन मुस्काए है I

   कभी अभिव्यक्तियों को पंख लगे,

   कभी सन्नाटों के साये है I

4. बातो का सिलसिला टूटा नहीं तेरे जाने से,

    बस फर्क इतना है तेरा किरदार भी निभाती हूँ मै I 

5. यूँ तो जी भर जिया हमने जिन्दगी को साथ…

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Added by Dr. Geeta Chaudhary on October 20, 2019 at 8:14pm — 9 Comments

याद उनको कभी,मेरी आती नहीं

212 212 212 212

याद उसको कभी,मेरी आती नहीं ।

और ख्वाबों से मेरे,वो जाती नहीं ।।

सो रही अब भी वो, चैन से रात भर…

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Added by प्रशांत दीक्षित 'प्रशांत' on October 19, 2019 at 10:30pm — 3 Comments

ऐसी ही रहना तुम (नवगीत)

जैसी हो

अच्छी हो

ऐसी ही रहना तुम

कांटो की बगिया में

तितली सी उड़ जाना

रस्ते में पत्थर हो

नदिया सी मुड़ जाना

भँवरों की…

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Added by धर्मेन्द्र कुमार सिंह on October 19, 2019 at 10:42am — 2 Comments

अहसास की ग़ज़ल

1222   1222   1222   1222

मुहब्बत के नगर में आँसुओं के कारखाने है,

यहां रहकर पुराने जन्म के कर्ज़े चुकाने हैं.

सड़क पर आके देखों तो झुलस जाओगे शिद्दत से,

समाचारों में तो इस दौर के मौसम सुहाने हैं.

उतर आया अब आँखों में आंगन में भरा पानी,

मेरी चाहत के अफसाने में पटना के फसाने हैं.

फलक पर चाँद चाहे चौथ का हो या हो पूनम का,

हमें त्यौहार सब परदेस में तन्हा मनाने हैं.

कहाँ पे आके बिगड़ी ये कहानी…

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Added by मनोज अहसास on October 17, 2019 at 8:51pm — 3 Comments

ग़ज़ल - चरागाँ इक मुहब्बत का जला दो तुम

1222 1222 1222

चरागाँ इक मुहब्बत का जला दो तुम,

अभी उन्वान रिश्ते को नया दो तुम ।

फ़ना ही हो गये जो इश्क़ कर बैठे,

ज़हर है ये,ज़हर ही तो पिला दो तुम ।

हया कायम रहे,कब तक मुहब्बत में,

ज़रा पर्दा शराफत का उठा दो तुम…

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Added by प्रशांत दीक्षित 'प्रशांत' on October 17, 2019 at 8:44pm — 6 Comments

ग़ज़ल: वक़्त की शतरंज पर किस्मत का एक मोहरा हूँ मैं।

2122 2122 2122 212
.
वक़्त की शतरंज पर किस्मत का एक मोहरा हूँ मैं। 
ज़िंदगी इतना भी ख़ुश मत हो, अभी ज़िंदा हूँ मैं। 
.
मैं ख़ुदा की हाज़िरी में भी न बदलूँगा बयान, 
तुझको हाज़िर और नाज़िर जानकार कहता हूँ मैं। 
.
एक ही घर में बसर करना मुहब्बत तो नहीं, 
आज भी तेरी ख़ुशी…
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Added by Balram Dhakar on October 16, 2019 at 10:00pm — 9 Comments

थामूँ तोरी बाँहे गोरी / तिन्ना छंद

2 2 2 2

चोरी-चोरी।
ओ री छोरी।
थामूँ तोरी।
बाँहे गोरी।

जागे नैना।
पूरी रैना।
खोएँ चैना।
भूले बैना।

आजा चूमूँ।
थोड़ा झूमूँ।
सांसे घोलूँ।
तेरा होलूँ।

- विमल शर्मा 'विमल'
स्वरचित

Added by विमल शर्मा 'विमल' on October 16, 2019 at 12:59pm — 7 Comments

स्वप्न-सृष्टि

 स्वप्न-सृष्टि

 

बुझते  दिन  का  सहारा  बनी 

गहन  गंभीर  अभागी  शाम

मन  में  अब  अपने  ही  पुराने  घाव  की

मौन  वेदना  की  गुथियाँ  समेटती

बूँद-बूँद  गलती

पहले  स्वयं  सरकती-सी  रात  की ओर

अंधेरा  होते  ही  फिर  घसीट लेती  है  रात

बेरहमी  से अपनी काली कोठरी  में …

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Added by vijay nikore on October 15, 2019 at 4:30am — 2 Comments

अहसास की ग़ज़ल

2×16

इश्क रुई के जैसा है पर,ग़म से रिश्ता मत कर लेना.

लेकर चलने में आफत हो इतना गिला मत कर लेना.

एक समय ऐसा आता है, सूरज भी मुरझा जाता है,

चार दिनों की गर्दिश में तुम दामन मैला मत कर लेना.

लाख बहाने पास है उसके, अब तो खफा होने के मुझसे,

किंतु मना लेने में उसको अना को रुसवा मत कर लेना.

सबसे अच्छे शब्दों में तुम अपनी बात बता सकते हो,

लेकिन कोई समझ भी लेगा इसका भरोसा मत कर लेना.

व्याकुल माता बचपन से ही बच्चों को…

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Added by मनोज अहसास on October 15, 2019 at 2:01am — 4 Comments

ज़िन्दगी का वह हिस्सा

अनपेक्षित तज्रिबों को  लीलती हुई

मन में सहसा उठते घिरते

उलझी रस्सी-से खयालों को ठेलती

गलियाँ पार करती  चली आती थी तुम

तब साथ तुम्हारा था

साहस हमारा

तुम्हारी मनोहर महक

थी दमकती हवाओं का उत्साह

और तुम्हारे चेहरे की चमक 

थी हमारी शाम की अजब रोशनी

और मैं ...

तुम्हारी बातें सुनते नहीं थकता था

हँसी के पट्टे पर कूदते-खेलते

बीच हमारे कोई सरहदें

सीमाएँ न थीं

समय के पल्लू में…

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Added by vijay nikore on October 14, 2019 at 9:23am — 8 Comments

कविता(मुक्तछंद) - डटे रहो

डटे रहो तुम अपने पथ पर,

इक दिन दुनिया ये डोलेगी ।

जल,थल और आकाश में जनता,

तेरी ही बोली बोलेगी ।।

कभी डरो ना असफलता से,

स्वाद तुम्हें जो जीत का चखना ।

व्यंग्य करें कितने ही…

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Added by प्रशांत दीक्षित 'प्रशांत' on October 13, 2019 at 6:19pm — 1 Comment

अहसास की ग़ज़ल

1222     1222      122

जमाने भर की बातें सोचता हूँ

मगर मैं खुद में अब कितना बचा हूँ

सुहानी भोर किस्मत में नहीं है

भला मैं रात भर क्यों जागता हूँ

मुहब्बत एक हरजाई का घर है

मैं उस घर से निकाला जा चुका हूँ

तरफदारी से तेरी क्या है हासिल

मैं अपनों में अकेला पड़ गया हूँ

गुजारी जिंदगी सारी जहाँ पर

मैं अब उस शहर में बिल्कुल नया हूँ

तुझे आवाज देने का सबब है

मैं अब तन्हाई से डरने लगा…

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Added by मनोज अहसास on October 13, 2019 at 4:28pm — 4 Comments

किस्से हैं, कहानी है

किस्से हैं , कहानी है

दुनिया अनजानी है

कोई कब आएगा ?

कोई कब जाएगा ?

कौन जानता भला ?

केवल रवानी है

किस्से हैं - -

अभी तो यहीं था

कैसे चला गया ?

बार-बार दोहराती

बात पुरानी है

किस्से हैं - -

ख़ाली ही आया धा

ख़ाली विदा हुआ

बार -बार पाने की

ज़िद , दीवानी है

किस्से हैं - -

निर्मोही देह में

मोह पोसा गया

पाया न मनभाया

नित- नित कोसा गया

फिर…

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Added by Usha Awasthi on October 12, 2019 at 9:00pm — 2 Comments

ग़ज़ल- ज़िन्दगी में

2212 122 2212 122

थम ही नहीं रही है,रफ़्तार ज़िन्दगी में ।

हर दर्द की दवा है,बस प्यार ज़िन्दगी में ।।

बैठो न चुप दबाके, तुम राज़ सारे दिल के ।

जज़्बात का ज़रूरी,इज़हार ज़िन्दगी में ।।

माशूक़ से कलह का,यूं ग़म न कीजियेगा…

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Added by प्रशांत दीक्षित 'प्रशांत' on October 12, 2019 at 9:00pm — 2 Comments

माँ .....

माँ .....

सुनाता हूँ

स्वयं को

मैं तेरी ही लोरी माँ

पर

नींद नहीं आती

गुनगुनाता हूँ

तुझको

मैं आठों पहर

पर

तू नहीं आती

पहले तो तू

बिन कहे समझ जाती थी

अपने लाल की बात

अब तुझे क्यूँ

मेरी तड़प

नज़र नहीं आती

मेरे एक-एक आँसू पर

कभी

तेरी जान निकल जाती थी माँ

अब क्यूँ अपने पल्लू से

पोँछने मेरे आँसू

तू

तस्वीर से

निकल नहीं…

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Added by Sushil Sarna on October 12, 2019 at 8:27pm — 4 Comments

नकेलें ग़म के मैं नथुनों में डालूँ (६६)

(१२२२ १२२२ १२२ )

.

नकेलें ग़म के मैं नथुनों में डालूँ

ख़ुदाया मैं भी कुछ खुशियाँ मना लूँ

**

मुझे भी तो अता कर चन्द मौक़े

ख़ुदा मैं भी तो जीवन का मज़ा लूँ

**

मुहब्बत में तिरी है जीत पक्की

भला फिर किसलिए सिक्का उछालूँ

**

हवा जब खुशबुएँ बिखरा रही है

ख़लल क्यों काम में बेकार डालूँ

**

पुराने दोस्त क्या कम हैं किसी से…

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Added by गिरधारी सिंह गहलोत 'तुरंत ' on October 12, 2019 at 10:30am — 5 Comments

वो ईश तो मौन है ...

वो ईश तो मौन है ...

नैनों के यथार्थ को

शब्दों के भावार्थ को

श्वास श्वास स्वार्थ को

अलंकृत करता कौन है

वो ईश तो मौन है

रिश्तों संग परिवार को

छोरहीन संसार को

नील गगन शृंगार को

अलंकृत करता कौन है

वो ईश तो मौन है

अदृश्य जीवन डोर को

सांझ रैन और भोर को

जीवन के हर छोर को

अलंकृत करता कौन है

वो ईश तो मौन है

कौन चलाता पल पल को

कौन बरसाता बादल को

नील व्योम के आँचल को…

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Added by Sushil Sarna on October 11, 2019 at 6:23pm — 2 Comments

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