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October 2015 Blog Posts (160)

फिसली फसल

         

           "क्या मम्मी आप भी जरा-जरा सी बातों पर तुनक पड़ती हो,पूरा आसमान सिर पर उठा लेती हो.पापा के दोस्तों के बीच में ही तो थीं आप   वे लोग कोई जानवर तो नहीं,हँसी-मजाक ही तो किया चीर हरण तो नहीं.."सुनकर खून उतर आया था उसकी आँखों में,अपनी ही लाठी,अपने पर वार,तिलमिलाते हुए पलकें बंद कर ली तो दर्द आंसू बन बह निकला.वह सोचने लगी,

     'उम्र की पहली फसल बाबा की अँगुलियों में अटक गई,सतरंगी सपने उड़े भी न थे कि उम्र की दूसरी फसल बिन हवा-पानी घूँघट में उजड़ गई और तीसरी को तो…

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Added by asha jugran on October 31, 2015 at 11:30pm — 17 Comments

कैश बाॅक्स के नजारे

साफ़ नीला आसमान

सफेद रूई सा हल्का

बिलकुल हल्का ,

हल्का वाला सफेद बादल

कभी बहुत भारी सा हो जाता है

वक्त रेशम सी ,

रेशम सी मुलायम वक्त

फिसलती हुई ,सरकती हुई

रेशमी सा एहसास देती हुई गुजर जाती है

वक्त के वजूद में

जाने क्यों पहिए होते है

जो दिखाई नहीं देते पर ब्रेक नहीं होते है

शायद ब्रेक भी रहें हो कभी लेकिन

आजकल वक्त  नहीं रूकता

यहाँ बाजार में बहुत भीड़ है

यह भीड़ कभी खत्म नहीं…

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Added by kanta roy on October 31, 2015 at 10:09am — 6 Comments

आज मेरे गाँव से गली ओझल हो गयी। "अज्ञात "

जब थी उठी बरसात से,                        

पहले पहल भीनी महक,                         

था मन तरंगित हो उठा,                              

सुन पक्षियों की चह चहक,                                   

गुमशुदा, अब बाग से,                       

क्यों कली कोमल हो गयी।                       

बीते पलों को याद कर,                         

आँख, बोझल हो गयी।

पत्थरों की शगल में,                               

सड़क सौतन क्या…

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Added by Ajay Kumar Sharma on October 30, 2015 at 7:04pm — 3 Comments

कितने ही यहाँ जिनके घर अपने नहीं होते

२२१ १२२२ २२१  १२२२ 

कितने ही यहाँ जिनके घर अपने नहीं होते 

क्या होता खुदा जग में गर अपने नहीं होते

 

 हर जुल्म सहा उसने लेकिन न कहा कुछ भी 

पाले हुए पंछी के पर अपने नहीं होते 

था जंगली वो हाथी देता ही कुचल हमको 

गर पास धनुष अपना शर अपने नहीं होते 

बिगड़े न अगर होते बेटे तो यकीनन ही 

रातों में भटकते क्यूँ घर अपने नहीं होते 

चोरी से कहाँ बचते चोरों से बचाते क्या 

मजबूत घरों के गर दर अपने नहीं…

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Added by Dr Ashutosh Mishra on October 30, 2015 at 4:36pm — 7 Comments


सदस्य टीम प्रबंधन
चाँद वरदान दे.... करवाचौथ पर ख़ास ( डॉ० प्राची सिंह)

ओढ़नी ओढ़ कर मैं पिया प्रेम की

प्रार्थना कर रही, चाँद वरदान दे

 

मन महकता रहे प्रीत की गंध से

दो हृदय एक हों प्रेम के बंध से

प्रीत अक्षय सदा भाग्य अनुपम मिले

जिस्म दो हैं मगर एक ही जान दे...

ओढ़नी ओढ़ कर...

 

मैं पिया के हृदय में सदा ही रहूँ

वो ही सागर मेरे, मैं नदी सी बहूँ

चाँद, हर इक नज़र से बचाना उन्हें

दीर्घ आयु सदा मान-सम्मान दे

ओढ़नी ओढ़ कर...

 

मेंहदी हाथ में रच महकती रहे

और लाली…

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Added by Dr.Prachi Singh on October 30, 2015 at 2:30pm — 18 Comments

तेरी याद में

रात के तीसरे पहर में

खिड़की पर यादें लिए बैठा हूँ

बारिश की बुँदे

तेरी आँसुओ से लगते है

दिल में कई अरमान से जगते है

गलियों में भागते हुए

एक झलक देखी है ख्वाबों की

कई रतजगा किये, कई दिन बीते खाली सा

कड़ी धूप में नंगे पैर जलाये है

मेरे संग आज भी तेरे साये है

एक रंग चुना है आँखों ने

एक गंध बसी है साँसों में

अज़ब सा नशा है

नज़रे भागती है हरदम

ज़ुल्फों पर चमकती है शबनम

पानी की टंकी पर बैठ…

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Added by राकेश on October 30, 2015 at 2:00pm — No Comments

हृदय को विक्षिप्त करते। " अज्ञात "

हृदय को विक्षिप्त करते,                    

शूल हैं, दंश हैं कुछ,                           

घावों को कुरेदते,                               

बीते पलों के अंश हैं कुछ।                   

अतीत की स्मृति भला,                         

मस्तिष्क से हो दूर कैसे,                        

कसक भी है, ठेस भी,                                

चुभन है भरपूर ऐसे,                        

वेदनाएं मिट रही हैं शनैः शनैः,                  

अभी भी पल…

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Added by Ajay Kumar Sharma on October 30, 2015 at 8:09am — No Comments

तुम तो कमाल करते हो मिश्रा जी (इस्लाह के लिए ग़ज़ल)

221 2122 2122
सौ सौ सवाल करते हो मिश्रा जी।
कितना बवाल करते हो मिश्रा जी।।

मतलब परस्त युग में प्रीत मिलेगी?
झूठा ख़याल करते हो मिश्रा जी।।

जीवन सदा परीक्षा से है गुज़रा।
किसका मलाल करते हो मिश्रा जी।।

कोई नहीं है यहाँ सुननें वाला।
काहें कराल करते हो मिश्रा जी।।

दुनिया के दर्द खुदमें भर लिया है।
मुझको निहाल करते हो मिश्रा जी।।

औरों के अश्क खुद की आँख भीगी?
तुम तो कमाल करते हो मिश्रा जी।।

Added by Pankaj Kumar Mishra "Vatsyayan" on October 29, 2015 at 11:40pm — 8 Comments

ज़हर अपने भी उगलते है यहाँ

यूँ भी तक़दीर बदलते हैं यहाँ

लोग गिर गिर के संभलते है यहाँ।



दोस्तों ! इक ज़रा मतलब के लिए

लोग चेहरों को बदलते है यहाँ।



माईले हिर्सो हवस है कितने

देख कर ज़र को फिसलते है यहाँ।



आँख की पुतली फिरे फिर शायद

लोग पल भर में बदलते है यहाँ।



ग़ैर की बात नहीं ऐ लोगों

ज़हर अपने भी उगलते है यहाँ।



क्या बिगाड़ेगी हवाये उनका

वो जो तूफान में पलते है यहाँ।



रोशनी बस वही फैलाते है

जो दीये की तरह जलते है यहाँ।…

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Added by MOHD. RIZWAN (रिज़वान खैराबादी) on October 29, 2015 at 11:30pm — 5 Comments

"पैंतीस का उत्सव" - (लघुकथा) 23 - शेख़ शहज़ाद उस्मानी

"अंकल जी, बर्थडे का सामान दे दो , ये छोटा वाला केक कितने में मिलेगा ?" - सोनू ने बेकरी वाले से पूछा।

"डेढ़ सौ रुपये का"

जवाब सुनकर सोनू आँखें फाड़े साथियों की तरफ देखने लगा । सभी ने अपनी जेबों से पैसे निकाले। कुछ सिक्के, कुछ पुराने फटे से नोट, कुल जमा पैंतीस रुपये थे। छोटे भाई का बर्थडे तो मनाना ही है।



"लो अंकल जी, पैंतीस रुपये में छोटा सा कोई केक और बाक़ी सामान पैक कर दो !" - सोनू ने निराश हो कर कहा। बेकरी वाले को हँसी आ गई । फटे पुराने से कपड़े पहने हुए बच्चों को देखकर…

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Added by Sheikh Shahzad Usmani on October 29, 2015 at 11:00pm — 9 Comments

एक घूंट फिर सही।

117

वही !

एक घूंट फिर सही।

निराशा  के गहरे आघातों से,…

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Added by Dr T R Sukul on October 29, 2015 at 10:03pm — No Comments

सच्ची सुहागन (लघुकथा)

पूरे दिन घर में आवागमन लगा था | दरवाज़ा खोलते बंद करते श्यामू परेशान हो गया था | घर की गहमागहमी से वह इतना तो समझ चूका था कि बहूरानी का उपवास हैं | सारे घर के लोग उनकी तीमारदारी में लगें थें | माँजी सरगी की तैयारी के लिय उसे बार-बार आवाज दे रही थी | सारी सामग्री उन्हें देने के बाद वह खाना खिलाने लगा घर के सभी सदस्यों को | फिर फुर्सत हो माँजी से कह अपने घर की ओर चल पड़ा |

बाजार की रौनक देख अपनी…

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Added by savitamishra on October 29, 2015 at 8:30pm — 5 Comments

जाने ये कैसा असर जिन्दगी का। "अज्ञात"

जाने ये कैसा, असर जिन्दगी का,

फूलों की चाहत है होती सभी को,        

काँटों भरा है, सफर जिन्दगी का।

मेहनत मशक्कत सब करते हैं फिर भी,

रस्ता न आता, नज़र जिन्दगी  का।     

बदलती फिजायें , बदलता जमाना,      

अंधेरा है देखो जिधर, जिन्दगी का।        

मन की मुरादें जब पूरी न होतीं,              

तो सपना है जाता, बिखर जिन्दगी का।

गरीबों को मिलती न रोटी कहीं भी,          

ये करते हैं कैसे, बसर जिन्दगी का।

भटकता हर इंसा कुछ पाने की जिद…

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Added by Ajay Kumar Sharma on October 29, 2015 at 7:25pm — 1 Comment

लो अब तुम्हारी राह मे दीवार हम नहीं।

तुमने उठाई राह मे दीवार हम नहीं

फिर भी कह रहे हो गुनहगार हम नहीं।



उम्मीद कर रहा हूँ वफ़ा की उन्ही से मैं

कहते हैं जो किसी के तलबग़ार हम नहीं।



दिल मे नज़र मे तुम हो तो फिर किस तरह कहें

ऐ दोस्त अब भी करते तुम्हें प्यार हम नहीं।



दुनिया की ठोकरों ने गिरा कर ही रख दिया

लो अब तुम्हारी राह मे दीवार हम नहीं।



वो तो शगुन मे आज अंगूठी भी दे गये

हम लाख कह रहे थे की तैयार हम नहीं।



हम उसकी धुन में हैं तो ज़माने की क्या… Continue

Added by MOHD. RIZWAN (रिज़वान खैराबादी) on October 29, 2015 at 7:00pm — 2 Comments


सदस्य कार्यकारिणी
ऐ सुखनवर साथ चल -- (ग़ज़ल) -- मिथिलेश वामनकर

2122---2122---2122---212

 

दौर बदला है, बदल जा,   ऐ सुखनवर साथ चल 

सोचता है जिस जबां में, उस जबां में लिख ग़ज़ल

 

जिंदगी बदलाव है...... गर थम गए…

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Added by मिथिलेश वामनकर on October 29, 2015 at 2:44pm — 36 Comments

सरकार पर व्यंग्य बाण " अज्ञात "

काश कि सरकार,                           

अपने चक्षुओं से देख पाती,                  

यदि वोट की खातिर वो,                             

दोनों हाथ से धन न लुटाती।                  

तो देश की सारी व्यवस्था,                       

इस तरह न चरमराती।                                

काश कि सरकार,                           

अपने चक्षुओं से देख पाती।                                            

छोड़ निंदा रस कहीं,                          

गर…

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Added by Ajay Kumar Sharma on October 29, 2015 at 1:42pm — 7 Comments

"जश्न पर जश्न" - (लघुकथा) 22 - शेख़ शहज़ाद उस्मानी

"जश्न पर जश्न" - (लघुकथा)



"आदरणीय, आज तुम मुझे बार-बार यूँ घूर-घूर कर क्यों देख रहे हो, अपनी इन उँगलियों से मुझे बार-बार यूँ क्यों छू रहे हो ?' - उसने कुछ इतराते हुए पूछा।



"प्रिये, आज तुम पहले से ज़्यादा ख़ूबसूरत लग रही हो, तुम्हारा प्रत्येक अंग, हर एक हिस्सा मुझे सुंदर और मुस्कराता सा लग रहा है !"



"और तुम, तुम भी तो बहुत दिनों बाद बहुत ख़ुश नज़र आ रहे हो, तभी तो तुम मेरे लिए नई श्रंगार सामग्री लाये हो, वरना कब जाते हो तुम बाज़ार। तुम्हें तुम्हारे तरीक़े से जश्न… Continue

Added by Sheikh Shahzad Usmani on October 29, 2015 at 11:31am — 7 Comments

उत्सव –( लघुकथा ) -

उत्सव –( लघुकथा ) -

"नाना जी, इस बार दीवाली पर पूरे मकान को बिजली की लडियों से ढक दैंगे, सारा घर जगमग करेगा"!

"नहीं छुट्टू, इस बार दीवाली पर यह सम्भव नहीं होगा"!

"किसलिये नाना जी"!

"छुट्टू, तेरी नानी,तेरे पापा और तेरी मॉ की बरसी होना बाकी है,उसके बाद ही हम कोई उत्सव मना सकते हैं"!

"यह तो और भी अच्छा है, एक साथ ही दौनों काम कर लेते हैं, दीवाली पर ही बरसी मना लेते हैं"!

"छुट्टू, बरसी एक साल पूर्ण होने पर पंडित जी द्वारा दी गयी तिथि पर  ही होती…

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Added by TEJ VEER SINGH on October 29, 2015 at 11:23am — 8 Comments

आता है जीना जिंदगी हूँ मैं

तुम सोचते हो जो नहीं हूँ मैं
जो कुछ भी मैं हूँ वो यही हूँ मैं। 

दुश्वारियाँ करती नहीं व्याकुल
आता है जीना जिंदगी हूँ मैं। 

जो सोचना है सोचिए साहब
मैं जानता हूँ कि सही हूँ मैं। 

साहिल से यारी मैं करूँ कैसे
जाना है आगे इक नदी हूँ मैं। 

अच्छा किसे लगता भला जलना
पर क्या करूँ कि रोशनी हूँ मैं । 

नीरज कुमार नीर / मौलिक एवं अप्रकाशित

Added by Neeraj Kumar Neer on October 28, 2015 at 11:08pm — 12 Comments

बेरोजगारी / लघुकथा

कमरे में घुसते हुए वह अपनी चाल को संतुलित कर रहा था ,पर बैठते हुए थोडा़ लड़खड़ा गया ।



" आज इतनी देर कैसे कर दी आपने , कहाँ रह गये थे , खाना लगा दूँ ? " बाहर आॅफिस , घर में बेरोजगार पति , दोनों को ही काँच के बर्तन के समान संभालने की जिम्मेदारी भी वह बखूबी निभा रही थी कि आज ऐसे ....!



नजदीक जाकर गौर से देखी तो उनकी आँखें लाल हो रही थी । अचानक वह सोफे पर ही लुढ़क गया । एक पल के लिए उसकी धड़कन जैसे रूक गई ।



" क्या आपने ड्रग लिया है ...? "



" हाँ " अधनींदे… Continue

Added by kanta roy on October 28, 2015 at 8:36pm — 18 Comments

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