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प्रेत अफजल औ' कसाबों के यहाँ - लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर’

2122   2122   212

********************

फिर  चिरागों  को बुझाने ये लगे

रास्ता  तम  का  सजाने ये लगे

****

प्रेत अफजल औ' कसाबों के यहाँ

कुर्सियाँ  पाकर   जगाने  ये  लगे

****

साजिशें  रचते  मरे  हैं  जो उन्हें

देश भक्तों  में  गिनाने  ये  लगे

****

देश  के  गद्दार   जितने  बंद  हैं

राजनेता  कह  छुड़ाने  ये  लगे

****

बनके अपने आज खंजर देख लो

आस्तीनों   में   छुपाने   ये  लगे

****

हौसला  दहशतगरों  का यार यूँ…

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Added by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on March 11, 2015 at 10:30am — 16 Comments

किताब /पुस्तक पर -दोहे

पुस्तक गुण की खान है,सीखें रखती गोय

जो उसका प्रेमी बना ,जग में जय जय होय॥

सखी भरी है ज्ञान से,उर में रखती भाव

पढ़-पढ़ के हासिल करो,रहे न ज्ञान अभाव॥

इस पूरे संसार की,जो रखती है थाह

दुनियाँ में कैसे मिली,किसको कहाँ पनाह॥

वर्ण-वर्ण मिल बन गई,सुंदर सुखद किताब

मनसा वाचा कर्मणा ,रख लो खूब हिसाब ॥

गुणी जनों ने बैठ कर,लिखे सुघर मंतव्य

रुचि जिसकी जिसमें रहे, खोजो वो…

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Added by kalpna mishra bajpai on March 11, 2015 at 10:00am — 9 Comments

मैं अज़ीज़ सबका था , ज़रूरत पे , मगर..........

बद -गुमानी थी मुझे क़िस्मत पे , मगर

मैं अज़ीज़ सबका था , ज़रूरत पे , मगर

हज़ार बार मुझे टोंका उसने , सलाह दी ,

ख़याल आया मुझे उसका , ठोकर पे , मगर

सुबह से हो गयी शाम और अब रात भी

पैर हैं कि थकने का , नाम नहीं लेते , मगर

वो खरीददार है , कोई क़ीमत भी दे सकता है

अभी आया है कहाँ , वो मेरी चौखट पे , मगर



करो गुस्सा या कि नाराज़ हो जायो "अजय"

सितम जो भी करो , करो खुद पे , मगर

अजय कुमार…

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Added by ajay sharma on March 10, 2015 at 11:59pm — 9 Comments

ग़ज़ल १२२२-१२२२\१२२२ १२२२ ..करें कोशिश सभी मिलकर हसीं दुनिया बना दें फिर

करें कोशिश सभी मिलकर हसीं दुनिया बना दें फिर 

चलो जन्नत से भी बढ़कर जहां अपना बना दें फिर

लगाकर रेत में पौधे पसीने से चलो सींचें 

ये सहरा सब्ज़ था पहले यहाँ बगिया बना दें फिर

मेरी मानो रियाज़त से बदल जाती है तकदीरें 

हथेली की लकीरों में कोई नक्शा बना दें फिर

जलाकर खेत मेरे गाँव के बोले सियासतदां  

इन्हें रोटी नहीं मिलती इसे मुद्दा बना दें फिर   

दिलों के दरमियां कोई रुकावट क्यों  रहे यारो

गिराकर इन…

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Added by khursheed khairadi on March 10, 2015 at 11:00pm — 20 Comments

गावं के घर का एक छोटा द्वार

गावं के घर का एक छोटा द्वार



मेरे गावं के घर में एक छोटा द्वार था

जिससे आ जाया करते थे पाहुने

नाते के रिश्ते के जाने अनजान

घर के गावं के और मेहमान



उसी दरवाज़े से आते थे गावं के बच्चे

लस्सी लेने

खबरें देने

कि किसकी गाय ने

भूरा या कि काला जाया है

और कि रतिया की ससुराल से कौन आया है

खबर ये भी कि रतिया की रसोई में धुंआ है

पकवानों की बारी है

रतिया के ससुराल जाने की तयारी है



इसी द्वार से आई थी माँ

नई नवेली… Continue

Added by amita tiwari on March 10, 2015 at 10:45pm — 8 Comments

सजा-ए-मौत लिख डाली

1222 1222 1222 1222



तेरी आँखों में डूबा था यही अपराध था मेरा

जरा सी बात पर तूने सजा-ए-मौत लिख डाली--1



ये बिखरी जुल्फ मैं तेरी ,सँवारू हाथ से अपने

मेरे जज्बात पर तूने सजा-ए- मौत लिख डाली--2



सिले हैं होठ क्यों तूने  शिकायत की बजह क्या है

मिलन की रात पर तूने सजा-ए-मौत लिख डाली--3



तेरे होठों से होठों को जलाकर देख लेता मैं

मगर हर-बात पर तूने सजा-ए-मौत लिखडाली--4



बडी मुश्किल से गुजरा था खिजाओं से भरा मौसम …

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Added by umesh katara on March 10, 2015 at 9:00pm — 14 Comments

जला न दे...''जान'' गोरखपुरी

112 212 221 212

बस कर ये सितम के,अब सजा न दे

हय! लम्बी उम्र की तू दुआ न दे।

अपनी सनम थोड़ी सी वफ़ा न दे

मुझको बेवफ़ाई की अदा न दे।

गुजरा वख्त लौटा है कभी क्या?

सुबहो शाम उसको तू सदा न दे।

कलमा नाम का तेरे पढ़ा करूँ

गरतू मोहब्बतों में दगा न दे।

इनसानियत को जो ना समझ सके

मुझको धर्म वो मेरे खुदा न दे।

रखके रू लिफ़ाफे में इश्क़ डुबो

ख़त मै वो जिसे साकी पता न…

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Added by Krish mishra 'jaan' gorakhpuri on March 10, 2015 at 4:35pm — 25 Comments

हास्य-व्यंग्य (गीत)

हास्य-व्यंग्य गीत,

==============



बड़ॆ गज़ब का झॊल, रॆ भैया,,,बड़ॆ गज़ब का झॊल,

बड़ॆ गज़ब का झॊल, रॆ भैया,,,बड़ॆ गज़ब का झॊल !!



बन्दर डण्डॆ लियॆ हाँथ मॆं,अब शॆरॊं कॊ हाँकॆं,

भूखी प्यासी गाय बँधी हैं, गधॆ पँजीरी फाँकॆं,

कॊयल कॊ अब कौन पूछता,कौवॆ हैं अनमॊल !! रॆ भैया,,,,

बड़ॆ गज़ब का झॊल,

बड़ॆ गज़ब का झॊल,,रॆ भैया,,बड़ॆ गज़ब का झॊल,,,,,



साँप नॆवलॆ मिल कर खॆलॆं, दॆखॊ आज कबड्डी,

पटक पटक कर गीदड़ तॊड़ी,आज बाघ की हड्डी,

ताक-झाँक मॆं लगी…

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Added by कवि - राज बुन्दॆली on March 10, 2015 at 2:00pm — 21 Comments

फासला - लघुकथा

" फासला " (लघुकथा)

                "कादिर मियाँ आप होश में तो है शेख सादी को रिहा करवाना चाहते है, वतन की अमन परस्ती का भी ख्याल करो।" वसीम साहब कुछ तेज आवाज में हैरानी से बोले। जबाब में कादिर मियाँ का लहजा भी उखड़ गया। "वसीम साहब। 'शेख' के रिहा होने से हमारा कारोबारी फायदा होगा, उसकी नजरबंदी से हम पहले ही बहुत नुक्सान उठा चुके है। रही बात हालात की तो उस पर नजर रखना आपकी हुकूमत का काम है।"

                 "ठीक है कादिर मियाँ मगर दहशतगर्दी का क्या जो फिर से..........।" वसीम साहब की…

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Added by VIRENDER VEER MEHTA on March 10, 2015 at 1:01pm — 16 Comments


सदस्य कार्यकारिणी
मिटा दूँ या मिट जाऊँ -- अतुकांत ( गिरिराज भण्डारी )

मिटा दूँ या मिट जाऊँ

-----------------------

कब से भटक रहा हूँ

कभी पानी हुये

तो कभी खुद को नमक किये 

कोई तो मिले घुलनशील

या घोलक

घोल लूँ या घुल जाऊँ ,

समेट लूँ

अपने अस्तित्व में या

एक सार हो जाऊँ , किसी के अस्तित्व संग

विलीन कर दूँ ,

खुद को उसमें

या कर लूँ ,

उसको खुद में

भूल कर अपने होने का अहम

और भुला पाऊँ किसी को

उसके होने को   

ख़त्म हो जाये दोनों का ठोस…

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Added by गिरिराज भंडारी on March 10, 2015 at 10:44am — 23 Comments

आतंकवादी (लघुकथा)

दिन भर खाक छान कर वो वापस घर लौट रहा था | चारो तरफ अँधेरा , सुनसान गलियां और गूंजती हुई बूटों की आवाज़ एक अजीब सा माहौल पैदा कर रहीं थीं | आज भी निराशा हाथ लगी थी उसे , कई जगह उसे रिजेक्ट कर दिया गया था | गली में घुसते ही घर के सामने उसे भीड़ दिखाई पड़ी , उसका दिल जोर जोर से धड़कने लगा | लगभग दौड़ते हुए वो घर में घुसा , देखा एक किनारे माँ ज़मीन पर निढाल पड़ी थी |

उसने झकझोरते हुए पूछा " क्या हुआ माँ ", तभी पड़ोसी चाचा की आवाज़ आई " तुम्हारे भाई को पुलिस पकड़कर ले गयी है "|

उलटे पांव भागा…

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Added by विनय कुमार on March 10, 2015 at 2:30am — 16 Comments

क्यों कहते हो कुछ नहीं हो सकता है--- डॉo विजय शंकर

तुम बता रहे हो ,

मैं जानता हूँ , कुछ नहीं हो सकता ,

सदियों से झेलते आ रहे हैं ,

कुछ हुआ , अचानक अब क्या हो जाएगा।

पर , आओ हम कहें , तुम कहो , सब कहें कि

कुछ नहीं हो सकता , तय तो कर लें कि

क्या कुछ हो नहीं सकता।

वो जो पुरोधा बन के बैठे हैं ,

वह भी यही कह रहें हैं ,

वैसे वो जो चाहतें हैं , वह सब हो जाता है,

भाव बढ़ जाते हैं , मंहगाई बढ़ जाती है ,

उनकीं तारीफ़ , यशोगान हो जाता है ,

बस यही नहीं हो पाता है ,

हम ही दुनिया में अनूठे… Continue

Added by Dr. Vijai Shanker on March 9, 2015 at 8:43pm — 26 Comments

हे ईश्वर

किस तरह रच रहे हो तुम ये संसार

हे ईश्वर...

तुम भी तो पुरुष ही हो...

जानते हो तुमसे, हम पुरुषों से

किस कदर खौफ खाती हैं स्त्रियाँ

एक अप्रत्याशित आक्रमण

कभी भी हो सकता है उन पर

इस डर से भयभीत होकर

रखती हैं पर्स में हथौड़ी

कोई सलाह देता तो रख लेतीं मिर्च-पाऊडर

और बाज़ार बनाकर बेचता

कोई स्प्रे, कोई धारदार छोटा चाकू

कोई करेंट पैदा करने वाला यंत्र

या सरकारें ज़ारी करतीं ढेर सारे हेल्पलाइन…

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Added by anwar suhail on March 9, 2015 at 7:30pm — 5 Comments

खोज

हर जिंदगी मे एक गीत है प्रीति है

पीड़ा है प्यार है

विरह है साथ है

संगीत है साज है

आक्रोश है संतोष है

संतुष्टि है विरोध है

तूफान है स्रोत है

संयम है क्रोध है

पहाड़ है पौंध है

कविता है कहानी है

पर हर जिंदगी सामने कहाँ आ पाती है

कही भाषा नहीं कहीं कलम नहीं है

कहीं हाथ नहीं कही पावँ नहीं हैं

कहीं आँखें नहीं कहीं कान नहीं हैं

कहीं बेबशी  मे  जबान नहीं है.

मौलिक व अप्रकाशित

श्याम…

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Added by Shyam Mathpal on March 9, 2015 at 4:00pm — 6 Comments

तू हमेशा ही मुझमें रमी सी रही

जिन्दगी भर खुशी की कमी सी रही
इक परत सी गमों की जमी सी रही
....
ढोल बजते रहे शहर में हर तरफ
पर मेरे आशियाँ में गमी सी रही
....
चाहकर भी न भूला तेरे प्यार को
तू हमेशा ही मुझमें रमी सी रही
....
नींद आती भी आँखों में कैसे भला
आँखों में आसुओं की नमी सी रही
....
कोई दस्तक बजेगी मेरे द्वार पर
सोचकर साँस मेरी थमी सी रही

उमेश कटारा
मौलिक व अप्रकाशित

Added by umesh katara on March 9, 2015 at 9:00am — 22 Comments

शिकार (विश्व महिला -दिवस पर विशेष)

कैसा यह ---

जिसे विश्व कहता है

बलात्कारो का देश

जिसकी राजधानी को

रेप सिटी कहते हैं

जिस देश में आंकड़े बताते है

हर बीस मिनट पर

होता है एक रेप

जहां के सांसद और विधायक

अभियुक्त है

अनेक हत्या और बलात्कार के

जिन पर होती नहीं कोई कार्यवाही

जहां बलात्कार के बाद होती है हत्या

जहाँ तंदूर में जलाई जाती है नारी

जहाँ रेप के बाद निकली जाती है आँखे

जहाँ निर्भया की चीखती है अतडियाँ

जहा प्रतिबन्धित…

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Added by डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव on March 8, 2015 at 6:30pm — 26 Comments

बला-ए-इश्क़ ‘’जान गोरखपुरी’’

१२२२ १२२२ १२२२ १२२२

कुम्हलाए हम तो जैसे सजर से पात झड़ जायें

यु दिल वीरां कि बिन तेरे चमन कोई उजड़ जायें

मिरी आव़ाज में है अब चहक उसके आ जाने की

सितारों आ गले लूँ लगा कि हम तुम अब बिछड़ जायें

कि बरसों बाद मिलके आज छोड़ो शर्म एहतियात

लबों से कह यु दो के अब लबों से आ के लड़ जायें

न मारे मौत ना जींस्त उबारे या ख़ुदा खैराँ

बला-ए-इश्क़ पीछे जिस किसी के हाय पड़ जायें

बना डाला…

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Added by Krish mishra 'jaan' gorakhpuri on March 8, 2015 at 5:30pm — 26 Comments

ये कैसा भय है

दुनिया हँसेगी 

ये कैसा भय है

मात्र इस भय से

तुम उस रिश्ते पर

पूर्ण विराम लगाना चाहते हो

जिसका जन्म हुआ है

पावन भावनाओं के गर्भ से

क्या हँसी बाँटना पाप है 

नहीं ! 

तो फिर दुनिया के हँसने से

क्या परहेज है तुम्हें

हँसने से 

ईश्वर प्रसन्न होता है

आत्मा प्रसन्न होती है

अगर तुम्हारे और मेरे मिलन से

दुनिया हँसती है 

तो इससे भली बात क्या होगी 

तुम्हारे और मेरे लिये

आओ हम मिल जाते हैं 

हमेशा के लिये

और दुनिया को हँसा देते…

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Added by umesh katara on March 8, 2015 at 4:08pm — 16 Comments

कुण्डलिया छंद (अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस पर विशेष_

नारी अब चेतन हुई ,बदला उसका रूप 

हर मौसम हर समय वो ,लेती नए स्वरूप 

लेती नए स्वरूप ,आसमां पर छा जाती 

सहती हर संघर्ष ,दिलेरी खूब दिखाती 

स्वाभिमान को जान,स्वयं पर जाती वारी

खूब कमाती मान ,आज कीशिक्षित नारी ॥ 

अप्रकाशित व मौलिक 

कल्पना मिश्रा बाजपेई 

Added by kalpna mishra bajpai on March 8, 2015 at 4:00pm — 12 Comments

महिला दिवस: लघुकथा- हरि प्रकाश दुबे

“आज स्त्री दिवस है भाई, अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस, ८ मार्च है ना, समझे कुछ !”

“किस लिए मना रहें हैं भईया, और कबसे ?”

“ अरे यार एकदम बकलोल हो क्या ? अरे महिलाओं के लिए, उनकी क्षमता, सामाजिक, राजनीतिक व आर्थिक तरक़्क़ी दिलाने और उन महिलाओं को याद करने के लिए जिन्होंने महिलाओं के लिए प्रयास किए, अरे १९०९ से मना रहें हैं १०० साल से जयादा हो गए मनाते हुए, कुछ पढ़ते नहीं हो क्या ? !”

“तब भइया, रोज क्यों नहीं मनाते, देखिये न सभी स्त्रीयां सुबह से रात तक घर, परिवार,समाज का कितना…

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Added by Hari Prakash Dubey on March 8, 2015 at 3:16pm — 27 Comments

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