रति भी तू,कामना भी तू,
कवि की सुंदर कल्पना है,
प्रेम से भरी मूरत है तू,
कुदरत का कोई करिश्मा है ...
सांवली रंगत,सूरत मोहिनी,
कातिलाना तेरी अदाएं है,
सात सुरों की सरगम तू,
फूलों की महकती डाली है....
नयन तेरे काले कज़रारे है,
लब ज्यूँ मय के प्याले है,
जिन पर हम दिल हारे है,
उल्फ़ते-राज़ ये गहरे है ....
हुस्नों-हया की मल्लिका…
ContinueAdded by Aarti Sharma on February 12, 2014 at 12:30am — 15 Comments
टिकती है क्या झूठ पर, रिश्ते की बुनियाद
झूठ बोल हर बात में, करते सदा विवाद |
करते सदा विवाद, सवाल पूछ कर देखे
मुखड़ा करे बयान, होंठ व ननन जब निरखे
कहते है कविराय. कभी न सत्यता छिपती
रिश्ते की बुनियाद कभी न झूठ पर टिकती ||
(2)
डाली डाली में जहाँ,फूलों की मुस्कान,
मेरा देश अखंड वह, भारतवर्ष महान
भारतवर्ष महान,छटा है मोहक न्यारी
दुल्हन जैसा रूप,जहां खिलती हर क्यारी
लक्ष्मण…
Added by लक्ष्मण रामानुज लडीवाला on February 11, 2014 at 7:30pm — 11 Comments
दोहा...........पूजा सामाग्री का औचित्य
रोली पानी मिल कहें, हम से है संसार।
सूर्य सुधा सी भाल पर, सोहे तेज अपार।।1
चन्दन से मस्तक हुआ, शीतल ज्ञान सुगन्ध।
जीव सकल संसार से, जोड़े मृदु सम्बन्ध।।2
अक्षत है धन धान्य का, चित परिचित व्यवहार।
माथे लग कर भाग्य है, द्वार लगे भण्डार।।3
हरी दूब कोमल बड़ी, ज्यों नव वधू समान।
सम्बन्धों को जोड़ कर, रखती कुल की शान।।4
हल्दी सेहत मन्द है, करती रोग-निरोग।
त्वचा खिले…
Added by केवल प्रसाद 'सत्यम' on February 11, 2014 at 6:28pm — 12 Comments
मन – पाँच दोहे
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मन को मत कमजोर कर , फिर से होगी भोर
फिर से गुनगुन धूप में , नाचेगा मन मोर
मन, आखें मीचे अगर , खूब मचाये शोर
आँख अगर हो देखती , मन…
ContinueAdded by गिरिराज भंडारी on February 11, 2014 at 6:00pm — 28 Comments
दायरा...
सोच का,
मन की उड़ान के
परिचित आसमान का,
अंतर्भावनाओं के विस्तार का,
अनुभूतियों के सुदूर क्षितिज का,
समयानुरूप
स्वतः विस्तारित हो, तो कैसे ?
तन मन बुद्धि अहंकार की
लोचदार चारदीवारी मैं कैद...
संकुचन के बल-प्रतिबल
से संघर्षरत,
होता क्लिष्ट से क्लिष्टतर
जटिल से दुर्भेद फिर अभेद
कर्कश कट्टर असह्य
आखिर
कौन सचेत, पहचानता है…
ContinueAdded by Dr.Prachi Singh on February 11, 2014 at 1:00pm — 15 Comments
मंदिर मस्जिद द्वार
बैठे कितने लोग
लिये कटोरा हाथ
शूल चुभाते अपने बदन
घाव दिखाते आते जाते
पैदा करते एक सिहरन
दया धर्म के दुहाई देते
देव प्रतिमा पूर्व दर्शन
मन के यक्ष प्रश्न
मिटे ना मन लोभ
कौन देते साथ
कितनी मजबूरी कितना यथार्थ
जरूरी कितना यह परिताप
है यह मानव सहयातार्थ
मिटे कैसे यह संताप
द्वार पहुॅचे निज हितार्थ
मांग तो वो भी रहा
पहुॅचा जो द्वार
टेक रहा है माथ
कौन भेजा उसे यहां पर
पैदा…
Added by रमेश कुमार चौहान on February 11, 2014 at 12:08pm — 6 Comments
सुना है मैने वसंत आ गया है। पेडों पे नये पत्ते बौर और आम्रकुजों मे अमराइंया आ गयी है। कोयलें कभी मुंडेर पे तो कभी डालियों पे कुहुकने लगी हैं। विरहणियां सजन के बिना एक बार फिर हुमगने लगी हैं। सखियां हाथों मे मेहंदी लगा के झूला झूलने लगी हैं। कवियों के मन मे भावों के नव पल्लव लहलाहाने लगे हैं। हवाएं इठलाने लगी हैं। घटाएं मचलने लगी है। साजिंदे अपने साज सजाने लगे हैं गवइये कभी राग विरह तो कभी राग सयोंग गाते हुए कभी उठान पे तो कभी सम पे आने लगे हैं। हर तरफ लोग हर्षों उल्लस मनाने लगे है। ऐसा ही सब…
ContinueAdded by MUKESH SRIVASTAVA on February 11, 2014 at 12:00pm — 4 Comments
इस विधा में मेरा प्रथम प्रयास(1से 10)
1)
रखती उसको अंग लगाकर।
चलती उसके संग लजाकर।
लगे सहज उसका अपनापन।
क्या सखि, साजन?
ना सखि, दामन!
2)
दिन में तो वो खूब तपाए।
रात कभी भी पास न आए।
फिर भी खुश होती हूँ मिलकर।
क्या सखि साजन?
ना सखि, दिनकर!
3)
वो अपनी मनमानी करता।
कुछ माँगूँ तो कान न धरता।
कठपुतली सा नाच नचाता।
क्या सखि साजन?
नहीं, विधाता!
4)…
ContinueAdded by कल्पना रामानी on February 11, 2014 at 10:30am — 38 Comments
एक पुरानी रचना प्रस्तुत कर रहा हूँ ,इस रचना का जन्म उस समय हुआ जब कारगिल में युद्ध चल रहा था |
" एक कवि की पाती वीर जवानों के नाम "
देश के वीर जवानों प्यारे , मेरी पाती नाम तुम्हारे |
नहीं पहुँचती कलाम ये मेरी , वहाँ खड़ी बन्दूक तुम्हारी ||
नहीं लिखी है ये शाही से , लिखी गई है जिगर लहू से |
जमी हमारी है ये थाती , हो इस दीपक की तुम बाती ||
देश के दुश्मन आए तो , खून उनका तुम बहा देना |
गोली आए दुश्मन की तो , छाती मेरी भी ले लेना ||
कतरा-कतरा…
Added by chouthmal jain on February 10, 2014 at 11:30pm — 6 Comments
रह जाएगा धन यहीं,जान अरे नादान!
इसकी चंचल चाल पर,मत करिये अभिमान!!
सत्कर्मों से तात तुम,कर लो ह्रदय पवित्र!
उजला उजला ही दिखे,सारा धुँधला चित्र!!
सागर में मोती सदृश,अंधियारे में दीप!
पाना है यदि राम को,जाओ तनिक समीप!!
मन गंगा निर्मल रखें,सत्कर्मों का कोष!
ऐसे नर के हिय सदा,परम शांति संतोष!!
जाग समय से हे मनुज,सींच समय से खेत!
समय फिसलता है सदा,ज्यों हाथों से रेत!!
मन करता फिर से चलूँ,उसी…
ContinueAdded by ram shiromani pathak on February 10, 2014 at 10:30pm — 19 Comments
बह्र : १२१२ ११२२ १२१२ २२
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सभी से आँख चुराकर सम्हाल रक्खा है
नयन में प्यार का गौहर सम्हाल रक्खा है
कहेगा आज भी पागल व बुतपरस्त मुझे
वो जिसके हाथ का पत्थर सम्हाल रक्खा है
तेरे चमन से न जाए बहार इस खातिर
हृदय में आज भी पतझर सम्हाल रक्खा है
चमन मेरा न बसा, घर किसी का बस जाए
ये सोच जिस्म का बंजर सम्हाल रक्खा है
तेरे नयन के समंदर में हैं भँवर, तूफाँ
किसी के प्यार ने लंगर सम्हाल…
ContinueAdded by धर्मेन्द्र कुमार सिंह on February 10, 2014 at 8:13pm — 25 Comments
बहर - 2122, 2122, 2122, 212
प्रेम का मै हू पुजारी, प्रेम मेरा आन है ।
प्रेम का भूखा खुदा भी, प्रेम ही भगवान है ।।
वासना से तो परे यह, शुद्ध पावन गंग है ।
जीव में जीवन भरे यह, प्रेम से ही प्राण है ।।
पुत्र करते प्रेम मां से, औ पिता पु़त्री सदा ।
नींव नातो का यही फिर, प्रेम क्यो अनुदान है ।।
बालपन से है मिले जो, प्रेम तो लाचार है ।
है युवा की क्रांति देखो, प्रेम आलीशान है ।।
गोद में तुम तो रहे जब , मां पिता कैसे…
Added by रमेश कुमार चौहान on February 10, 2014 at 7:30pm — 1 Comment
मैं तेरी याद को सीने में चल दिया लेकर,
मेरा भी दिल था जो तूने मसल दिया लेकर।
किसी के वास्ते खुद को तबाह कर लेना,
खुदा किसी को न अब तू ये हौसला देना।
सज़ा मैं कौन से जुर्मों की जाने सहता हूँ,
किसी हुजूम में रहकर भी आज तन्हा हूँ।
क्यों मेरे दिल का ठिकाना बदल दिया लेकर,
मेरा भी दिल था जो तूने मसल दिया लेकर।
न जाने आग में कब तक जला करूँगा मैं,
यूँ किस तरह से भला और जी सकूँगा मैं।
मिटाऊंगा…
ContinueAdded by इमरान खान on February 10, 2014 at 6:43pm — 4 Comments
2122 2122 2122 212
बंदरों को फिर मिला शायद मसलने के लिये
फूल ने मंसूबा कल बान्धा था खिलने के लिये
बह के पानी की तरह अब दूर तक वो जायेगा
दर्द को मैने रखा था कल पिघलने के लिये
…
ContinueAdded by गिरिराज भंडारी on February 10, 2014 at 6:30pm — 16 Comments
जागो प्यारे भोर में मन में ले विश्वास
आस जगाती जिन्दगी करना है कुछ ख़ास /
करना है कुछ ख़ास मन में जगा लो चाहत
करो वक्त पे काम मिले तनाव से राहत
सरिता कहे पुकार नहीं मुश्किल से भागो
पड़े बहुत हैं काम भोर हुई अभी जागो //
..................................................
...........मौलिक व अप्रकाशित...........
Added by Sarita Bhatia on February 10, 2014 at 4:37pm — 13 Comments
परती धरती और पहली बारिश
बारिश की हल्की हल्की बूंदो के गिरते ही लगा बरसों की परती पडी धरती थरथरा उठी हो। माटी की पोर पोर से भीनी भीनी सुगंध चारों ओर अद्रष्य रुप से व्याप्त हो गयी थी। लॉन से आ रही हरसिंगार, मोगरा, गुड़हल और चमेली की खुषबू को संध्या अपने नथूनों में ही नही महसूस कर रही थी बल्कि अपनी संदीली काया के रोम रोम में सिहरन सा महसूस कर रही थी। बेहद तपन के बाद बारिष के मौसम की तरह वह अपने अंदर आये इस बदलाव से वह अंजान नही थी। पर उम्र के इस…
Added by MUKESH SRIVASTAVA on February 10, 2014 at 2:00pm — 1 Comment
सूरज
जब छाए मन में निराशा,
तब सोचो उस सूरज को,
जो रोज डूबता है पर,
उगता फिर नई सुबह है ।
नई ऊर्जा ,नए उत्साह से,
बाँटता है खुशी अपनी,
मिट जाए दुनिया का अंधकार,
प्रकाश इसीलिये फैलाता है ।
तेज आभा ,प्रसन्न मुख ,
मजबूती की शिक्षा देते हैं,
खड़े हो जाओ,डटकर के,
कर्म का पाठ पढ़ाता है ।
न हारो और न रुको…
ContinueAdded by akhilesh mishra on February 10, 2014 at 1:00pm — 7 Comments
दें बिदाई आज तुम्हे, है परीक्षा की घड़ी ।
सीख सारे जो हमारे, तुम्हरे मन में पड़ी ।।
आज तुम्हे तो दिखाना, काम अब कर के भला ।
नाम होवे हम सबो का, हो सफल तुम जो भला ।।
हर परीक्षा में सफल हो, दे रहे आशीष हैं।
हर चुनौती से लड़ो तुम, काम तो ही ईश है ।।
कर्म ही पूजा कहे सब, कर्म पथ आगे बढो ।
जो बने बाधा टीलाा सा, चीर कर रास्ता गढ़ो ।।
----------------------------------------------------
मौलिक अप्रकाशित
Added by रमेश कुमार चौहान on February 10, 2014 at 8:00am — 12 Comments
हमारी अंटार्कटिका यात्रा – 12 वह अनोखा आतिथ्य
पिछली कड़ी में आपने पढ़ा कि रोमांचकारी 58 घंटे की समाप्ति के बाद हम सभी सुरक्षित अपने स्टेशन के अंदर थे. अगले दिन से ही हम लोग फिर से मंसूबे बनाने लगे रूसी स्टेशन जाने के लिए. सौभाग्य से दो दिन बाद मौसम कुछ अनुकूल होता दिखने लगा. हमने बाहर जाकर अपनी गाड़ियों का हाल देखा तो दंग रह गए. पिस्टन बुली के ऊपर ढेर सारा बर्फ़ तो था ही, भीतर भी पाऊडर की तरह बर्फ़ के बारीक कण हर कोने में…
ContinueAdded by sharadindu mukerji on February 10, 2014 at 3:03am — 9 Comments
उनके आते ही यहाँ,खिले ह्रदय में फूल!
कोयल भी गानें लगी,पवन हुआ अनुकूल!!
मंद मंद चलने लगी,देखो प्रेम बयार!
कानों में आ कह रही,कर लो थोड़ा प्यार!!
अधरों के पट खोलकर,की है ऐसी बात !!
शब्द शब्द में बासुँरी,फिर मधुमय बरसात!!
कह न सका जब मैं उन्हें,तुम हो मन के मीत!
शायद तब से कवि बना,लिख लिख गाता गीत!!
फिर से मै घायल हुआ,पता नहीं वह कौन!
मुझे व्यथित करके सदा,हो जाती है मौन!!
बजा बाँसुरी प्रेम की,डालो…
Added by ram shiromani pathak on February 9, 2014 at 5:30pm — 24 Comments
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