For any Query/Feedback/Suggestion related to OBO, please contact:- admin@openbooksonline.com & contact2obo@gmail.com, you may also call on 09872568228(योगराज प्रभाकर)/09431288405(गणेश जी "बागी")

All Blog Posts (19,163)


सदस्य टीम प्रबंधन
आज के बाज़ार पर.. (नवगीत) // --सौरभ

बिस्तर-करवट-नींद तक

रिस आया बाज़ार



हर कश से छल्ले लिए

बातें हुई बवण्डरी

मुदी-मुदी सी आँख में

उम्मीदें कैलेण्डरी

गलबहियों के ढंग पर

करता कौन विचार..…

Continue

Added by Saurabh Pandey on January 18, 2014 at 3:30am — 26 Comments


सदस्य कार्यकारिणी
आँखों देखी 10 (जमे समुद्र के ऊपर पैदल)

आँखों देखी 10   जमे समुद्र के ऊपर पैदल

     

      मैं पहले ही कह चुका हूँ कि दो महीने तक अँधेरे में रहने के बाद जुलाई 1986 के अंतिम सप्ताह में हमने पहला सूर्योदय देखा. जैसे-जैसे आसमान में सूर्य की अवस्थिति बढ़ती गयी मौसम खुशनुमा होता गया. अच्छे मौसम का स्वागत करके हम अधिक से अधिक समय स्टेशन के बाहर बिताने लगे थे. मैंने इस बदलते समय के साथ अपने साथियों के अच्छे होते हुए मूड का सदुपयोग करने का निश्चय किया. ‘हिमवात’ की तैयारी में पूरी…

Continue

Added by sharadindu mukerji on January 18, 2014 at 2:00am — 5 Comments

लोकग्राम से आनंदवन - यात्रा वर्णन - रमेश यादव

यात्रा वर्णन -                 लोकग्राम से आनंदवन         

      

     देशाटन का जीवन में अनन्य महत्व है. इससे नई ऊर्जा, नए प्रदेशों की जानकरी, आत्मिक शांति प्राप्त होती है और लोक जीवन का परिचय होता है. कई ऐसे स्थान हैं जहां जाने से अदभूत सुख की प्राप्ति होती है. यात्रा के साथ यदि कुछ काम जुड़ जाए तो सोने पे सुहागा होता है. जिसकी अक्सर मुझे तलाश होती है.

      अवसर था नागपुर जाने का. वहां लोक कलाओं ( खड़ी गम्मत)  का…

Continue

Added by RAMESH YADAV on January 18, 2014 at 1:47am — 5 Comments

हिंदी को रोजगार परख बनाने की जरूरत - रमेश यादव

मुलाकात -            हिंदी को रोजगार परख बनाने की जरूरत

( डॉ. वेद प्रकाश दुबे, संयुक्त निदेशक ( राजभाषा ) भारत सरकार, वित्त मंत्रालय से बातचीत )

 

मोबाइल की घंटी बजी, देखा, तो मेरे मित्र और आई.डी.बी.आई. बैंक के सहायक महाप्रबंधक डॉ. आर. पी.सिंह “ नाहर” जी फोन पर थे. आवाज आई , “ रमेश जी हिंदी और राजभाषा को लेकर आप काम रहे हैं, इस समय डॉ. वेद प्रकाश दुबे जी नीरिक्षण कार्य हेतु मुंबई में आए हैं जो भारत सरकार वित्त मंत्रालय के संयुक्त निदेशक ( राजभाषा…

Continue

Added by RAMESH YADAV on January 18, 2014 at 1:30am — 2 Comments

मगर फिर चार दिन की ये जवानी कौन देता है...

पहले मौत दे, फिर जिंदगानी कौन देता है

मुकम्मल हो सके ऐसी कहानी कौन देता है,

यहां तालाब और नदियां कई बरसों से सूखी हैं

खुदा जाने कि पीने को ये पानी कौन देता है,

हमें तो जिंदगी ठहरी हुई इक झील लगती है

मगर हर वक्त दरिया को रवानी कौन देता है,

जमीं से आसमां तक का सफर हम कर चुके लेकिन

नहीं मालूम मंजिल की निशानी कौन देता है,

परिंदे जानते हैं ये कि पर कटने का खतरा है

इन्हें फिर हौसला ये आसमानी कौन देता…

Continue

Added by atul kushwah on January 17, 2014 at 9:30pm — 15 Comments

नियति

नियति

किसी वी आई पी के

निधन पर -

लोक सभा एवं विधान सभा ने

शोक प्रकट किया है।

शोक अक्सर प्रकट किया जाता है

कोई वी आई पी जब दिवंगत होता है।

तुम क्यूँ रोते हो ?

शायद तुम्हारे घर मे, पड़ोस मे, मुहल्ले मे –

तुम्हारा कोई अज़ीज़ दिवंगत हो गया है।

कलुआ कह रहा था

साहब, नथुवा ने

तीन दिन से खाना नहीं खाया था

बीमार था, ठंड से ठिठुर कर - दम तोड़ दिया बेचारे ने ।

उसकी घरवाली ने लाला से –

अपनी पगार मांगी थी, पर –

लाला…

Continue

Added by S. C. Brahmachari on January 17, 2014 at 3:28pm — 4 Comments

खोटा सिक्का

खोटा सिक्का

चले थे खुद को भुनवाने

दुनिया के इस बाजार में.

पर खोटा सिक्का मान

ठुकरा दिया ज़माने ने

सोचा ! मुझमें ही कमी थी

या, फिर वक्त का साथ न था

समझ न पाये ,और चुप रह गए

पर चैन न आया

और चल पडे दुनिया को

जानने और पहचानने

देखा ! तो जाना ,

दुनिया कितनी अजीब है

झूठ,मक्कारी और खुदगर्ज़ी

के पलड़े में हर रोज

इंसान तुल रहा 

पलड़ा जितना भारी

इंसान उतना ही…

Continue

Added by Maheshwari Kaneri on January 17, 2014 at 1:00pm — 9 Comments

धकेलिए न देश को यूँ अंध-कूप में (गीत).

धकेलिए न देश को यूँ अंध-कूप में 
धकेलिए न देश को यूँ अंध-कूप में
 
क्रांतिकारियों ने जो बलिदान है दिया 
निज देश पे हर बात को कुर्बान कर दिया 
हम छांव में खड़े थे वो चले थे धूप में 
धकेलिए न देश को यूँ अंध-कूप में
 
बयानबाजियों से कभी हल नहीं कोई 
उंगली उठा के दूजे पे सफल नहीं कोई 
फर्क प्रजातंत्र  में न रंक ओ भूप में 
धकेलिए न देश को यूँ अंध-कूप…
Continue

Added by AVINASH S BAGDE on January 17, 2014 at 11:00am — 26 Comments

क्षणिकाएँ

क्षितिज

 

दूर छोर पर

एकाकार होते 

सिन्दूरी आसमान

और हरी धरती

 

उस रेखा का कोई रंग नहीं

 

 

एक स्थिति

 

खाली बाल्टी

और उसमें

नल से

बूँद-बूँद टपकता पानी

 

मैं देख रहा हूँ

किंकर्तव्यविमूढ़

संघर्ष

 

तपते दिनों के बाद

सर्द हवाओं का मौसम

 

कब से बारिश नहीं हुई

बहुत से सपने सूख…

Continue

Added by बृजेश नीरज on January 17, 2014 at 7:29am — 22 Comments

सावन का मौसम आया है............

हाथों से पता चल जायेगा होठों से खबर लग जायेगी

आँखों से नज़र आ जायेगा ,

सावन का मौसम आया है ऄ

कुछ बातें ऐसी वैसी होंगी , होंगीं जिनकी कुछ वज़ह नहीं

कुछ फूल खिलेंगे ऐसे जिनकी , होगी बागों में जगह नहीं

ख़ुश्बू , सबको बतलायेगी

सावन का मौसम आया है

झूलों पे बैठे हम और तुम , धरती से नभ तक हो आयेंगे

मिलन के बरसेंगे घन घोर , विरह के ताप हवन हो जायेंगे

दुनिया सारी जल  जायेगी  

सावन का मौसम आया…

Continue

Added by ajay sharma on January 16, 2014 at 11:30pm — 8 Comments

मज़दूर

(एक)

 

तुम क्या चुकाओगे

मेरी मेहनत की कीमत

मेरी जवानी

मेरे सपने

मेरी उम्मीदें

सब-कुछ तो दफ्न है

तुम्हारी इमारतों में।

 

(दो)

 

जब चलती हैं  

झुलसा देने वाली गर्म हवाएँ

कवच बन जातीं है

यही सूरज की किरणें

हमारे लिए ।

 

मुसलधार बारिश

जब हमारे बदन को छूती है

फिर से खिल उठता है  

हमारा तन

ऊर्जावान हो…

Continue

Added by नादिर ख़ान on January 16, 2014 at 10:30pm — 16 Comments

मेरा अपना गांव (रोला छंद)

मेरा अपना गांव, विश्‍व से न्यारा न्यारा ।

प्रेम मगन सब लोग, लगे हैं प्यारा प्यारा ।।

काका बाबा होय, गांव के बुजुर्ग सारे ।

हर सुख दुख में साथ, सखा बन काम सवारे ।।



अमराई के छांव, गांव के छोरा छोरी ।

खेले नाना खेल, करे सब जोरा जोरी ।।

ग्वाला छेड़े वेणु, धेनु धुन सुन रंभाती ।

मुख पर लेकर घास, उठा शिश स्नेह दिखाती ।।





मोहे पनघट नाद, सखी मिल करे ठिठोली ।

गारी देवे सास, करे बालम बरजोरी ।।

चारी चुगली खास, कथा सा सुने सुनावे ।

सभी… Continue

Added by रमेश कुमार चौहान on January 16, 2014 at 9:54pm — 9 Comments


सदस्य कार्यकारिणी
लोकतंत्र का मुखौटा पहने (अतुकांत)

लोग कहते हैं

ज़माना बदल गया

मै कहता हूँ-

फ़क़त चेहरे बदले हैं,

व्यक्ति परक समाज तब भी था

अब भी है,

रियासतों,

शाही आनो-शान के बीच,

इंसानों के लहू से लिखी गई,

इतिहास की इबारत,

जो आज भी सुर्ख़ है

 

नाम बदले

मगर हालात न बदले

हुक्मरान बदले

मगर

जनता पहले भी ग़ुलाम थी

अब भी ग़ुलाम है

अंग्रेज़ों के पहले भी

अंग्रेज़ों के बाद भी

बेबसी ने ग़ुलाम…

Continue

Added by शिज्जु "शकूर" on January 16, 2014 at 8:30pm — 12 Comments

जाग रे मन !!!

जाग रे मन !

कब तक यूं ही सोएगा

जग मे मन को खोएगा

अब तो जाग रे मन !!

1)

सत्कर्मों की माला काहे न बनाई

पाप गठरिया है  सीस  धराई  

जाग रे !!!!

2)

माया औ पद्मा कबहु काम न आवे

नात नेवतिया साथ कबहु न निभावे

जाग रे !!!!

3)

दिवस निशि सब विरथा ही गंवाई

प्रीति की रीति अबहूँ  न निभाई

जाग रे !!!!!

4)

सारा जीवन यही जुगत लगाई

मान अभिमान सुत दारा पाई

जाग रे…

Continue

Added by annapurna bajpai on January 16, 2014 at 5:30pm — 10 Comments

जीबन :एक बुलबुला

गज़ब हैं रंग जीबन के गजब किस्से लगा करते

जबानी जब कदम चूमे बचपन छूट जाता है

बंगला ,कार, ओहदे को पाने के ही चक्कर में

सीधा सच्चा बच्चों का आचरण छूट जाता है

जबानी के नशें में लोग क्या क्या ना किया करते

ढलते ही जबानी के बुढ़ापा टूट जाता है

समय के साथ बहना ही असल तो यार जीबन है

समय को गर नहीं समझे समय फिर रूठ जाता है

जियो ऐसे कि औरों को भी जीने का मजा आये

मदन ,जीबन क्या ,बुलबुला है, आखिर फुट जाता है

मदन मोहन सक्सेना

मौलिक व…

Continue

Added by Madan Mohan saxena on January 16, 2014 at 1:53pm — 6 Comments

तुम पथिक आए कहाँ से (नवगीत) - कल्पना रामानी

तुम पथिक, आए कहाँ से,

कौनसी मंज़िल पहुँचना?

इस शहर के रास्तों पर,

कुछ सँभलकर पाँव धरना।

 

बात कल की है, यहाँ पर,

कत्ल जीवित वन हुआ था।

जड़ मशीनें जी उठी थीं,

और जड़ जीवन हुआ था।

 

देख थी हैरान कुदरत,

सूर्य का बेवक्त ढलना।

 

जो युगों से थे खड़े

वे पेड़ धरती पर पड़े थे। 

उस कुटिल तूफान से, तुम  

पूछना कैसे लड़े थे।

 

याद होगा हर दिशा को,

डालियों का वो…

Continue

Added by कल्पना रामानी on January 16, 2014 at 10:30am — 26 Comments

किनारा इस सरिता का

तू बहादुर बेटी है पंजाब की

तू शान आन और बान है हमारे घर की

तू झाँसी की रानी है

तुझे क्या डर अकेले

दुनिया के किसी भी कोने में जा सकती हो

हाँ

ऐसे ही तो कहते थे ना हमेशा

जब कहती थी

मेरे साथ कहीं चलने को

आज समझा रहे थे मुझे

पगली क्यों रोती है ?

तेरे अंग संग हूँ हमेशा

तेरे साथ अपनी दोनों भुजाएं

अपने दो बेटे छोड़ आया हूँ

तुम्हे जरुरत नहीं

किसी का मुँह ताकने की

दोस्त जो नहीं पूछते मत कर चिंता

जो साथ हैं उनका कर…

Continue

Added by Sarita Bhatia on January 16, 2014 at 10:01am — 10 Comments

एकलव्य का अंगूठा

संस्कृति का क्रम अटूट

पांच हज़ार वर्षों से

अनवरत घूमता

सभ्यता का

क्रूर पहिया.

दामन में छद्म ऐतिहासिक

सौन्दर्य बोध के बहाने

छुपाये दमन का खूनी दाग,

आत्माभिमान से अंधी

पांडित्य पूर्ण सांस्कृतिक गौरव का

दंभ भरती

सभ्यता.

मोहनजोदड़ो की कत्लगाह से भागे लोगों से

छिनती रही

अनवरत,

उनके अधिकार, 

किया जाता रहा वंचित,

जीने के मूलभूत अधिकार से,

कुचल कर  सम्मान

मिटा दी…

Continue

Added by Neeraj Neer on January 16, 2014 at 9:58am — 11 Comments

कर लो कुछ विचार (दोहावली)

दिल पर रख कर हाथ तुम, कर लो कुछ विचार ।

देश धर्म के रक्षण पर, करते निज उपकार ।।



समय अभाव सभी कहे, समय साथ ना कोय ।

साथ समय का जो चले, निर्धनता ना होय ।।



समय बहुमूल्य रत्न है, मिले सदा बेमोल ।

पर्स रखे जो वक्त को, मगन रहे दिल खोल ।।



हल्ला भ्रष्‍टाचार का, करते हैं सब कोय ।

जो बदलें निज आचरण, हल्ला कैसे होय ।।



घुसखोरी के तेज से, तड़प रहे सब लोग ।

रक्तबीज के रक्त ये, मिटे कहां मन लोभ ।।



मिट रहा अपनापन अब, नही बचा चितचोर…

Continue

Added by रमेश कुमार चौहान on January 16, 2014 at 9:04am — 13 Comments


सदस्य कार्यकारिणी
बहुत गुमसुम सी लगती है ( ग़ज़ल ) गिरिराज भन्डारी

1222  1222  1222   1222

बहुत गुमसुम सी लगती है

 

ज़बाँ खामोश रहती है, निगाहें कुछ नही कहतीं

अगर जज़्बा न हो दिल में, तो बाहें कुछ नही कहतीं

यहाँ के हादसों का सच,…

Continue

Added by गिरिराज भंडारी on January 16, 2014 at 8:30am — 32 Comments

Monthly Archives

2026

2025

2024

2023

2022

2021

2020

2019

2018

2017

2016

2015

2014

2013

2012

2011

2010

1999

1970

कृपया ध्यान दे...

आवश्यक सूचना:-

1-सभी सदस्यों से अनुरोध है कि कृपया मौलिक व अप्रकाशित रचना ही पोस्ट करें,पूर्व प्रकाशित रचनाओं का अनुमोदन नही किया जायेगा, रचना के अंत में "मौलिक व अप्रकाशित" लिखना अनिवार्य है । अधिक जानकारी हेतु नियम देखे

2-ओपन बुक्स ऑनलाइन परिवार यदि आपको अच्छा लगा तो अपने मित्रो और शुभचिंतको को इस परिवार से जोड़ने हेतु यहाँ क्लिक कर आमंत्रण भेजे |

3-यदि आप अपने ओ बी ओ पर विडियो, फोटो या चैट सुविधा का लाभ नहीं ले पा रहे हो तो आप अपने सिस्टम पर फ्लैश प्लयेर यहाँ क्लिक कर डाउनलोड करे और फिर रन करा दे |

4-OBO नि:शुल्क विज्ञापन योजना (अधिक जानकारी हेतु क्लिक करे)

5-"सुझाव एवं शिकायत" दर्ज करने हेतु यहाँ क्लिक करे |

6-Download OBO Android App Here

हिन्दी टाइप

New  देवनागरी (हिंदी) टाइप करने हेतु दो साधन...

साधन - 1

साधन - 2

Latest Activity

Sushil Sarna posted a blog post

दोहा सप्तक. . . . घूस

दोहा सप्तक. . . . . घूसबिना कमीशन आजकल, कब होता है काम ।कैसा भी हो काम अब, घूस हुई है आम ।।घास घूस…See More
yesterday
Sushil Sarna posted a blog post

दोहा सप्तक. . . . प्यार

दोहा सप्तक. . . . प्यारप्यार, प्यार से माँगता, केवल निश्छल प्यार ।आपस का विश्वास ही, इसका है आधार…See More
Monday
लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव महा उत्सव" अंक-183
"आ. भाई चेतन जी, उत्साहवर्धन व स्नेह के लिए आभार।"
Sunday
Sushil Sarna replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव महा उत्सव" अंक-183
"आदरणीय लक्ष्मण धामी जी सृजन के भावों को मान देने का दिल से आभार आदरणीय "
Sunday
Chetan Prakash replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव महा उत्सव" अंक-183
"आ.लक्ष्मणसिह धानी, 'मुसाफिर' साहब  खूबसूरत विषयान्तर ग़ज़ल हुई  ! हार्दिक …"
Sunday
लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव महा उत्सव" अंक-183
"आ. भाई चेतन जी, सादर अभिवादन। प्रदत्त विषय पर सुंदर मुक्तक हुए हैं। हार्दिक बधाई।"
Sunday
लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव महा उत्सव" अंक-183
"आ. भाई सुशील जी, सादर अभिवादन। प्रदत्त विषय पर सुंदर दोहे हुए हैं। हार्दिक बधाई।"
Sunday
लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव महा उत्सव" अंक-183
"आ. भाई जयहिंद जी, सादर अभिवादन। प्रदत्त विषय पर सुंदर गजल हुई है। हार्दिक बधाई।"
Sunday
Jaihind Raipuri replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव महा उत्सव" अंक-183
"ग़ज़ल   बह्र ए मीर लगता था दिन रात सुनेगा सब के दिल की बात सुनेगा अपने जैसा लगता था…"
Saturday
लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' posted a blog post

हरकत हमें तो वैद की रखती तनाव में -लक्ष्मण धामी 'मुसफिर'

बदला ही राजनीति के अब है स्वभाव में आये कमी कहाँ  से  कहो  फिर दुराव में।१। * अवसर समानता का कहे…See More
Saturday
Chetan Prakash replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव महा उत्सव" अंक-183
" दोहा मुक्तक :  हिम्मत यदि करके कहूँ, उनसे दिल की बात  कि आज चौदह फरवरी, करो प्यार…"
Saturday
Sushil Sarna replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव महा उत्सव" अंक-183
"दोहा एकादश. . . . . दिल दिल से दिल की कीजिये, दिल वाली वो बात । बीत न जाए व्यर्थ के, संवादों में…"
Saturday

© 2026   Created by Admin.   Powered by

Badges  |  Report an Issue  |  Terms of Service