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ग़ज़ल- लगा दूँ आग पानी में

1222. 1222. 1222

जरा ठहरो लगा दूँ आग पानी में
कहीं गुम हो न जाए फाग पानी में

कहीं तो डोलती होगी हवा मीठी
पकड़ कर खींच लाऊँ राग पानी में

चले तो थे कदम उसके यहीं शायद
चहकता तो नहीं है काग पानी में

फिज़ाओं में कभी तो रौनकें होंगी
लहकता बोलता है बाग पानी में

न आ जाए कहीं सैलाब उठ जा भी
कहीं तू बह न जाए जाग पानी में
पूनम शुक्ला

मौलिक एवं अप्रकाशित

Added by Poonam Shukla on October 7, 2013 at 1:00pm — 13 Comments

ग़ज़ल- सारथी || ज़िक्र कुछ यार का किया जाये ||

ज़िक्र कुछ यार का किया जाये

ज़िन्दगी आ जरा जिया जाये /१ 

हो चुकी हो अगर सजा पूरी

दर्दे दिल को रिहा किया जाये /२ 

चाँद छूने के ही बराबर है

मखमली हाथ छू लिया जाये /३ 

ज़ख़्म ताजा बहुत जरुरी है

चल कहीं दिललगा लिया जाये /४ 

वक़्त ने मिन्नतें नहीं मानी

माँ को खुलके बता दिया जाये /५ 

हसरतें ईद की अधूरी हैं…

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Added by Saarthi Baidyanath on October 7, 2013 at 11:30am — 30 Comments

गजल

खड़े होकर सभी के सामने अक्सर दुतल्ले से।

जो बातें सच थीं ज्यों की त्यों कहीं हमने धड़ल्ले से।

.

सुना है राह के काँटे भी उसका कुछ न कर पाये,

मग़र पैरों मे छाले पड़ गये जूते के तल्ले से।

.

अकेला ही मैं दुश्मन के मुकाबिल में रहा अक्सर ,

मदद करने नही निकला कोर्इ बन्दा मुहल्ले से।

.

वो इन्टरनेषनल क्रिकेट की करते समीक्षा हैं,

नही निकले कभी भी चार रन तक जिनके बल्ले से।

.

तुम्हारे गाँव के बारे में ये मेरा तजुर्बा है,…

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Added by Ram Awadh VIshwakarma on October 7, 2013 at 10:30am — 17 Comments


सदस्य कार्यकारिणी
सांत्वना (लघु कथा) : अरुण निगम

सांत्वना

अस्पताल से जाँच की रिपोर्ट लेकर घर लौटे द्वारिका दास जी अपनी पुरानी आराम कुर्सी पर निढाल होकर लेट से गये. छत को ताकती हुई सूनी निगाहों में कुछ प्रश्न तैर रहे थे . रिपोर्ट के बारे में बेटे को बताता हूँ तो वह परेशान हो जायेगा.यहाँ आने के लिये उतावला हो जायेगा. पता नहीं  उसे छुट्टियाँ  मिल पायेंगी या नहीं. बेटे के साथ ही बहू भी परेशान हो जायेगी. त्यौहार भी नजदीक ही है.…

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Added by अरुण कुमार निगम on October 7, 2013 at 12:30am — 25 Comments

संवेदना

संवेदन शील मन

बार-बार क्यों

डूबता उतराता है

संवेदना के समंदर में

हजारबार गोते खाता है

प्रश्नों का अम्बार है

आज तो मर्यादा का व्यापार है

वास्तव में संवेदनाहीन हो रहा संसार है

गरीवी ,लाचारी ,बेचारी ,बेरोजगारी और कुछ शब्द थे ,

जिनमें संवेदना का अधिकार व्याप्त था

संवेदनशील मन के लिए इन शब्दों का होना पर्याप्त था

किन्तु संवेदना की परिभाषा बदल गयी

जहाँ संवेदना थी ओ भाषा बदल गयी

आज अत्याचारी ,बलात्कारी, भ्रष्टाचारियों पर…

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Added by दिलीप कुमार तिवारी on October 7, 2013 at 12:30am — 15 Comments

दर्द के समंदर देखे !

दर्द के खूब समंदर देखे 
हमने बाहर नहीं अंदर देखे 

आह को वाह में बदल दें वो 
एक से एक धुरंधर देखे 

देवता के गुनाह देख लिए 
जब कथाओं में चंदर देखे 

लोग उंगली पे उठा लेते है 
कृष्ण देखे हैं ,पुरंदर देखे 

फंस ही जाते हैं अपनी चालों में 
जाल देखे हैं ,मछंदर देखे 
_____________प्रो.विश्वम्भर शुक्ल 

(मौलिक और अप्रकाशित )

Added by प्रो. विश्वम्भर शुक्ल on October 6, 2013 at 10:00pm — 12 Comments

प्रत्युत्पन्नमति [ लघु-कथा ]

तनु और मान्या  दोनों  किचन में नाश्ते  की तैयारी कर रहे  थे  । रवि और अल्पना, तनु के  भैया -भाभी ,  ड्राइंग रूम में बैठे  टी. वी. देख रहे थे।  अचानक किचन से  छनाक की आवाज  सुनकर दोनों किचन की ओर  दौड़ पड़े । देखा टोमेटो केचप का नया बाटल फर्श पर चूर-चूर पड़ा है, सारा केचप बिखर गया था। तनु !!!!!  गरजता हुआ  रवि गुस्से से चिल्ला पड़ा - सम्हालकर काम नहीं कर सकती, पूरा केचप  बर्बाद कर दिया , कल ही लाया था 150 रु. में । घबराहट के  कारण तनु बोली " वो भैया मै मै --- उसके …
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Added by Kapish Chandra Shrivastava on October 6, 2013 at 5:00pm — 35 Comments

जिंदगी मुझे तमाशा बनाकर चल पड़ी --------

किरण से कुहासा बना कर चल पड़ी !

जिंदगी मुझे तमाशा बना कर चल पड़ी !

समझ नही आता अर्थ किसी को मेरा !

कैसी ये परिभाषा बना कर चल पड़ी !

पा लूँ  अर्श को एक ही छलांग में !

कैसी ये अभिलाषा जगाकर चल पड़ी !

चंद दाद पाकर तसल्ली मिलती नही !

शोहरतों का प्यासा बनाकर चल पड़ी !

बड़ी हस्तियों में हो नाम शामिल मेरा !

मन में ये जिज्ञासा उठाकर चल पड़ी !

किरण से कुहासा बना कर चल पड़ी !

जिंदगी…

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Added by डॉ. अनुराग सैनी on October 6, 2013 at 4:26pm — 11 Comments

मेरी प्रिय अमृता जी ... संस्मरण...२

मेरी प्रिय अमृता जी ... संस्मरण...२

 

(अमृता प्रीतम जी से मिलने के सौभाग्य का प्रथम संस्मरण "संस्मरण ... अमृता प्रीतम जीओ.बी.ओ. पर जनवरी में आ चुका है)

कहते हैं, खुशी और ग़म एक संग आते हैं ..…

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Added by vijay nikore on October 6, 2013 at 3:30pm — 30 Comments

ग़ज़ल (२) : क़ब्र के पत्थर !

न ज़िंदगी को सजाना, गड़े खज़ाने से

नसीब ‘राख़’ है, साँसों के रूठ जाने से//१

.

खड़े हैं क़ब्र के पत्थर-से लोग चौखट पर   

जवान बेटी की इज्ज़त को यूँ गंवाने से//२

.

पकड़ के पूँछ कलाई, पे बांध लेता मैं

जो मान जाता कभी वक़्त भी मनाने से//३

.

न आफ़ताब को हो फ़िक्र तो मिटेगा क्यूँ 

कोई न फ़र्क है जुगनूँ के दिल जलाने से//४

.

सुना है अश्क़ दवाई से कम नहीं होता   

तो छोड़ रात में पलकों को यूँ नहाने से //५

.

तुझे…

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Added by रामनाथ 'शोधार्थी' on October 6, 2013 at 1:30pm — 30 Comments

साथी

काश ! कोई साथी होता।

एक अच्छा-सा साथी होता।।

खुशियों में जो साथ निभाता,

दुःख में भी नहीं घबराता।

घिरे होते दुःख में हम,

वो बाँटता हमारे ग़म।

दूर करता दर्द सारे,

आँसू पोंछता हमारे।

होता उसका हमें सहारा,

होता वो एक हमारा।

ऐसा एक साथी होता।

काश ! कोई साथी होता।

ज़िन्दगी की राहें सुनसान,

ख़तरों से हम अनजान।

जब रास्ता जाते भटक,

मुश्किलों में जाते अटक।

थाम लेता हाथ हमारा,

देता फिर हमें सहारा।

भटकने से हमें बचाता,

एक नयी राह…

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Added by Savitri Rathore on October 6, 2013 at 11:38am — 22 Comments

गजल: मेरे तन को ना छुओ तुम तेरा हाथ जल न जाए...

गजल— 1121/2122/1121/2122



तेरे रूप का ये जादू कहीं मुझपे चल न जाए

यूं बिखेरो ना ये जुल्फें कहीं दिल मचल न जाए



मेरे दिल की इस जमीं पे कोई फूल खिल रहा है

तेरे प्यार का ये मौसम कहीं फिर बदल न जाए



तूने खोल दी है जुल्फें लगे दिन चढ़ा है फिर से

'न झुकाओ तुम निगाहें कहीं रात ढल न जाए'



तेरी याद का है जंगल यहां आग सी लगी है

मेरे तन को ना छुओ तुम तेरा हाथ जल न जाए



इसी सोच में हूं डूबा कि…

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Added by शकील समर on October 6, 2013 at 11:12am — 19 Comments

कुण्डलियाँ [मेरा परिचय]

कहते सब सरिता मुझे ,बढती हूँ निष्काम
जीवन के पथ हैं कठिन, चलते रहना काम
चलते रहना काम, नहीं रोके रुक पाती
शत्रु सामने देख , सहज दुर्गा बन जाती
मेरा शील स्वभाव , भाव हैं मुझमें बहते
मैं जीवन का स्रोत मुझे सब सरिता कहते //

....................................................

        मौलिक व अप्रकाशित 

Added by Sarita Bhatia on October 6, 2013 at 10:01am — 23 Comments

माँ तुम हो कितनी महान

माँ

गहरी सागर सी

ऊँची अनन्त सी

घुली पवन में

सुगंध सी

माँ!

हृदय तुम्हारा

कोमल फूलों सा

मिश्री सी वाणीं

लोरी, परियों की कहानी

माँ!

सुन्दर इतनी कि

अप्सराएँ शर्माएँ

आँचल में तुम्हारे

सागर ममता का

लहराये

महानता में ईश्वर भी

पीछे रह जाए

माँ!

स्पर्श में तुम्हारे

मिलता असीम सुख

हृदय से लग के

मिटता संताप, दुःख

माँ!

 तुम मेरी…

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Added by Meena Pathak on October 6, 2013 at 9:30am — 21 Comments

गीत (दूरियाँ जो ये बढ़ सी रही दरमियाँ)

गीत (दूरियाँ जो ये बढ़ सी रही दरमियाँ)

दूरियाँ जो ये बढ़ सी रही दरमियाँ, कोशिशें करके इनको घटा दीजिए,

एक कदम मैं चलूँ, एक कदम तुम चलो, धूल नफरत की दिल से हटा दीजिए।

 

कहना चाहते हो गर तुम तो खुल के कहो,

वरना रिश्ता…

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Added by Sushil.Joshi on October 6, 2013 at 2:30am — 34 Comments

बागबां [लघुकथा]

साथ वाले सहगल साहिब यश जी से बोले घई जी के पिता हस्पताल में हैं यश जी ने कहा कल तो मेरे पास बैठे थे बेचारे परेशान थे ,पूछ रहे थे मुझे यहाँ आए हुए कितने दिन हो गए मैंने कहा मालूम नहीं उन्होंने फिर जिद्द करके पूछा फिर भी अंदाजा मुझे आए हुए कितना समय हो गया है ,मैंने कहा लगभग एक महीना हुआ होगा तो बोले फिर वो [छोटा बेटा] मुझे लेने क्यों आ रहा है? अभी दो महीने तो नहीं हुए हैं यह क्यों भेज रहे हैं मुझे इसी उधेड़बुन में शायद वो सुबह तक उठ ही नहीं पाए ,उनके एक हिस्से ने काम करना बंद कर दिया था और…

Continue

Added by Sarita Bhatia on October 5, 2013 at 11:30pm — 20 Comments

चले आओ जहां हो तुम

दर्द रह-रह के बढ़ता है

और दिल डूबा जाता है

नब्ज़ थम-थम के चलती है

दिल ज़ोरों से धड़कता है

बीमारी बढती जाती है

फ़िक्र है खाए जाती है

सलाहें खूब मिलती हैं

दवाएं बदलती जाती हैं

दुआएं काम नही आतीं

करें क्या ऐसे में हमदम

कहाँ से चारागर पायें

मत्था किस दर पर टेंकें

कहाँ से तावीजें लायें

तुम्हे मालुम है फिर भी

छुपा कर रक्खे हो नुस्खे

न लो अब और इम्तेहाँ

चले आओ जहां हो तुम

तुम्हारे आते ही हमदम …

Continue

Added by anwar suhail on October 5, 2013 at 9:30pm — 12 Comments

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