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आकाश ( कविता)

यह आकाश सबको बुलाता

दूर से ही सबको लुभाता

अपने में बहुत कुछ समेटे

आकर्षित खुद ही बन जाता ।

यह आकाश सबको बुलाता ।

बादलों में कभी छुप जाता

रंग बदलता ,मेघ बरसाता

चाँद सितारों के संग रहता

धरा को अपनी छाँव देता

कभी इठलाता कभी बिखरता

यह आकाश सबको बुलाता

इंद्रधनुष की चादर ओढ़े

जब कभी भी है यह आता

कहीं कोई तराना है गाता

करता है अठखेलियां बहुत

कभी आग यह बरसाता ।

ख्वाबों को सजाता

आकाश अपना हो जाता ।



मौलिक एवं… Continue

Added by KALPANA BHATT ('रौनक़') on December 16, 2016 at 9:13pm — 4 Comments

ग़ज़ल: जुबाँ से वक्त भी मुकरा हुआ है

1222 1222 122

बहुत खामोश सा चेहरा हुआ है ।

वो अपने दर्द में उलझा हुआ है ।।



दिखा है आँख में हिलता समंदर ।

किसी के इश्क़ पर पहरा हुआ है ।।



जो सुनता है तुम्हारी धड़कनो को ।

कहा किसने ख़ुदा बहरा हुआ है ।।



मिली जब से नज़र बेहोश है वो ।

यकीनन जख़्म कुछ गहरा हुआ है ।।



तुम्हारे जश्न की चर्चा हुई क्यों।

सुना कुछ रात का सौदा हुआ है ।।



बड़ा अदना समझ रक्खा है मुझको।

तमाशा क्यूँ मेरे घर का हुआ है ।।



हुआ बदनाम तेरी… Continue

Added by Naveen Mani Tripathi on December 16, 2016 at 2:00pm — 5 Comments

इंतज़ार ....

इंतज़ार ....

भोर की पहली किरण
सर्द हवा
आधी जागी
आधी सोयी
तू गर्म शाल में लिपटी
बालकनी के कोने में
हाथों में
कॉफी का कप लिए
यक़ीनन
मेरे आने का
इंतज़ार करती होगी
कितना
रुमानियत भरा होगा
वो मंज़र
तेरी आँखों में
मेरे आने के
इंतज़ार का

सुशील सरना
मौलिक एवम अप्रकाशित

Added by Sushil Sarna on December 16, 2016 at 1:01pm — 8 Comments

ग़ज़ल- जुबाँ से वक्त तक मुकरा हुआ है

1222 1222 122

बहुत खामोश सा चेहरा हुआ है ।

वो अपने दर्द में उलझा हुआ है ।।



दिखा है आँख में हिलता समंदर ।

किसी के इश्क़ पर पहरा हुआ है ।।



जो गिनता है तुम्हारी धड़कनो को ।

कहा किसने ख़ुदा बहरा हुआ है ।।



मिली जब से नज़र बेहोश है वो ।

यकीनन जख़्म कुछ गहरा हुआ है ।।



तुम्हारे जश्न की चर्चा शहर में ।

सुना कुछ रात का सौदा हुआ है ।।



बड़ा अदना समझ रक्खा है मुझको।

तमाशा क्यूँ मेरे घर का हुआ है ।।



हुआ बदनाम तेरी… Continue

Added by Naveen Mani Tripathi on December 16, 2016 at 12:39pm — 6 Comments

मंजिल की चाह ने हमें रस्ते पे ला दिया (ग़ज़ल)

221 2121 1221 212



किसने मेरी उदासी पे ये क़ह्र ढा दिया

इक पल को मेरे लब पे तबस्सुम सजा दिया



तन्हाइयां, उदासियां, हैरत में पड़ गयीं

मुश्किल घड़ी जब आई तो मैं मुस्कुरा दिया



यूं सोचने पे रस्ते भी दुश्वार लगते थे

चलने लगे, पहाड़ों भी ने रास्ता दिया



हद से ज़ियादा बढ़ने लगा चाँद का ग़रूर

क़ुदरत को ग़ुस्सा आया तो धब्बा लगा दिया



मुद्दत हुई अंधेरों से टकरा रहा है वो

किसका है जाने मुन्तज़िर इक काँपता दिया



घर से निकल के आज ये… Continue

Added by जयनित कुमार मेहता on December 16, 2016 at 6:47am — 8 Comments

नये साल का नया सूरज

नये साल का नया सूरज   
बहुत चाह है कि …
Continue

Added by amita tiwari on December 15, 2016 at 11:17pm — 2 Comments

बड़ी अच्छी लगती है...

बड़ी अच्छी लगती है ...

हिज़्र में

तन्हाई

बड़ी अच्छी लगती है

यादों की

परछाई

बड़ी अच्छी लगती है

कभी कभी

रुसवाई भी

बड़ी अच्छी लगती है

आँखों की

गहराई

बड़ी अच्छी लगती है

साँसों की

गरमाई

बड़ी अच्छी लगती है

हुस्न की

अंगड़ाई

बड़ी अच्छी लगती है

दिल में

दिल की

समाई

बड़ी अच्छी लगती है

मगर

हक़ीक़ी ज़िन्दगी…

Continue

Added by Sushil Sarna on December 15, 2016 at 9:19pm — 6 Comments

गजल(कोई पहले आज बताये..)

नोट नया भी अब हकलाये
कब तक चलना कौन सुझाये?1

सीमाएँ जब हैं निर्धारित
बोलो कौन धता बतलाये?2

ढूँढ रही हैं रोज कतारें,
तहखाने में क्यूँ रिरियाये?3

छोटे-छोटे नोट चहकते
बंद गुलाबी क्यूँ मुरझाये?4

छापा पड़ता लाला के घर
कलुआ बैठ बड़ा मुसुकाये।5

नोट पुराना जलता-बुझता
ढ़ेर घरों में आग लगाये।6

गदहे खाते खेत फिरें सब
मार जुलाहे के सर आये।7
मौलिक व अप्रकाशित@मनन

Added by Manan Kumar singh on December 15, 2016 at 8:00pm — 5 Comments

आईना (कविता)

कहतें हैं सच बोलता है आईना
अपने आपकी पहचान करवाता है

देखते हैं जो बार बार इसमें
क्या रंग बदलता है आईना !

सज संवर कर देखें गर इसमें
खूबसूरत मूर्त दिखाता है आईना

गर पहचानने के लिए देखें इसमें
अहँकारी कर पुकारता है आईना ।

मौलिक एवं अप्रकाशित

Added by KALPANA BHATT ('रौनक़') on December 15, 2016 at 5:16pm — 3 Comments

तरही गजल/सतविन्द्र कुमार राणा

बह्र:22 22 22 22

चाहत यार बढाने निकले

दिलको आज कमाने निकले।



जिनको समझ रहे थे अपना

आज वही बेगाने निकले।



घर छोड़ा अपनों को छोड़ा

बन कर बस अनजाने निकले।



तनहा राहें अपनी साथी

हमसे दूर जमाने निकले।



लब पर ले मुस्कान बताओ

कैसा दर्द छुपाने निकले।





जिनको समझा सबने पागल

देखो यार सयाने निकले।



अपना आपा ठीक नहीं है

गैरों को समझाने निकले।



दर्द नया यूँ ही लगता है

लेकिन जख्म पुराने… Continue

Added by सतविन्द्र कुमार राणा on December 15, 2016 at 4:30pm — 6 Comments

इक लफ्ज़ मुहब्बत का ....

इक लफ्ज़ मुहब्बत का ....

लम्हों की गर्द में लिपटा
इक साया
ओस में ग़ुम होती
भीगी पगडंडी के
अनजाने मोड़ पर
खामोशियों के लबादे ओढ़े
किसी बिछुड़े साये के
इंतज़ार में
इक बुत बन गया


धुल न जाएँ
सर्दी की बारिश में
कहीं लंबी रातों के
पलकों के लिहाफ़ में
अधूरे से ख़्वाब
वो धीरे धीरे
कोहरे की लहद में
खो गया
इक लफ्ज़
मुहब्बत का
खामोश ही सो गया

सुशील सरना
मौलिक एवम अप्रकाशित

Added by Sushil Sarna on December 14, 2016 at 9:03pm — 8 Comments


प्रधान संपादक
तुम क्या हो? (अतुकांत कविता)

तुम क्या हो?    

किसी समुद्री मछली के उदर में

किसी ब्रह्मचारी के पथभ्रष्ट शुक्राणु का अंश मात्र

किन्तु उसका निषेचन?

अभी बहुत समय बाकी है उसमे  

बहुत.....

हे प्रिये!

बुरा नहीं स्वयं को सर्वश्रेष्ठ समझना

अमरत्व का दिवा-स्वप्न भी बुरा नहीं

किन्तु समझना आवश्यक है

यह जान लेना आवश्यक है कि

अमर होने ने लिए मरण आवश्यक है

मरण हेतु जन्म अति आवश्यक

फिर तुम्हें तो अभी जन्म लेना है

जन्म लेने से पूर्व…

Continue

Added by योगराज प्रभाकर on December 14, 2016 at 12:42pm — 7 Comments

गजल(आँधियों से बेखबर पत्ते बहुत..)

2122 2122 212

आँधियों से बेखबर पत्ते बहुत

रह गये जो झेलते सहमे बहुत।1



मौन हो बहती हवा,पुचकारती,

अनकहे सब राज हैं गहरे बहुत।2



बेसबर खुद में समंदर डूबता

तैरते हैं बेधड़क तिनके बहुत।3



बह रहा पानी बना सब देखिये,

जो सँजोये लुट गये सपने बहुत।4



डर गये अपना जताने से यहाँ,

वाकये ऐसे हुए अब के बहुत।5



भागते फिरते अँधेरे रात के

रोशनी के जा रहे सदके बहुत।6



सींचने का अब समय तो आ गया

जड़ कटी है पेड़ की पहले… Continue

Added by Manan Kumar singh on December 14, 2016 at 9:08am — 6 Comments

रेशम से रिश्ते ...

रेशम से रिश्ते ....

न हवा

न आंधी

धूप का कहर

तमतमाई वसुधा

शज़र के शीर्ष से

गिरा

बे-दम सा

एक

ज़र्द पत्ता

इतना भी

क्या अफ़सोस

बोली

नयी कोपल

दर्द पे

शज़र के



एक हल्की सी ज़ुब्मिश

शज़र बोला

बाद गुज़रने के

इतनी लंबी उम्र

अब

रिश्तों की

समझ आयी है



तू

अभी नयी है

तू

मुझे भी कहाँ जान पायी है

छोड़ के देख

मेरी उंगली को

तुझे दर्द की…

Continue

Added by Sushil Sarna on December 13, 2016 at 9:06pm — 4 Comments


सदस्य कार्यकारिणी
पूंजियों की सीरतें भी काली गोरी देखिये(ग़ज़ल 'राज '

2122  2122  2122  212

कर की चोरी देखिये जी धन की चोरी देखिये

लूटकर पकड़े गये तो जब्रजोरी देखिये

 

नोट्बंदी देखिये जी नोट खोरी देखिये

पूंजियों की सीरतें  भी काली गोरी देखिये

 

नोट्बंदी का हथौड़ा ऐसा बैठा पीठ पर

भ्रष्टता की सरबसर टूटी तिजोरी देखिये

 

बह रहे हैं नोट सारे वो पुराने हर जगह

क्या समन्दर क्या नदी तालाब मोरी देखिये

 

लूटखोरी की बदौलत खत्म पैसे बैंक में

 लाइनों की टूटती अब आस…

Continue

Added by rajesh kumari on December 13, 2016 at 12:08pm — 19 Comments

वागीश्वरी सवैये

वागीश्वरी सवैये सूत्र : यगण X 7 + ल गा



अभी तो अकेले चले हैं मियाँ जी ,न कोई वहां है न कोई यहां ।

यहां कौन है जो बताये जहां को,कि बाबू चले हैं अकेले कहां ।



जहाँ जा रहे हैं रहेंगे अकेले,मिलेगा न साथी उन्हें तो वहाँ ।

पता है हमें ख़ूब यारों यक़ीं है, करेगा उन्हें याद सारा जहाँ ।।

_________



निगाहें उठाके ज़रा देख तो लो ,बताओ यहाँ क्यूँ अकेले खड़े ।

हमें ये बता दो बिना बात के ही,भला जान देने यहाँ क्यूँ अड़े।



जहाँ में न कोई हमें तो मिला…

Continue

Added by Samar kabeer on December 12, 2016 at 11:30pm — 18 Comments

ग़ज़ल - हो सके तो ऐ ख़ुदा एहसान कर

2122 2122 212



मौत का मेरे नया फरमान कर ।

हो सके तो ऐ खुदा एहसान कर ।।



जिंदगी तो काट दी मुश्किल में, अब

रास्ता जन्नत का तो आसान कर ।।



जी रहा है आदमी किस्तों में अब ।

धड़कनो की बन्द यह दूकान कर ।।



टूट जाती हैं उमीदें सांस की।।

खत्म तू बाकी बचा अरमान कर ।।



हसरतें सब बेवफा सी हो गईं ।

आसुओं के दौर से अनजान कर ।।



हार जाता है यहां हर आदमी।

क्या करूँगा मौत को पहचान कर ।।



है गरीबी से मेरा रिश्ता…

Continue

Added by Naveen Mani Tripathi on December 12, 2016 at 11:30pm — 14 Comments

ख़ुदा की खोज में निकले जो, राम तक पहुँचे (ग़ज़ल)

बह्र : 1212 1122 1212 22

 

प्रगति की होड़ न ऐसे मकाम तक पहुँचे

ज़रा सी बात जहाँ कत्ल-ए-आम तक पहुँचे

 

गया है छूट कहीं कुछ तो मानचित्रों में

चले तो पाक थे लेकिन हराम तक पहुँचे

 

वो जिन का क्लेम था उनको है प्रेम रोग लगा

गले के दर्द से केवल जुकाम तक पहुँचे

 

न इतना वाम था उनमें के जंगलों तक जायँ

नगर से ऊब के भागे तो ग्राम तक पहुँचे

 

जिन्हें था आँखों से ज़्यादा यकीन कानों पर

चले वो भक्त से…

Continue

Added by धर्मेन्द्र कुमार सिंह on December 12, 2016 at 11:28pm — 13 Comments

यादों का सफर ...

यादों का सफर ...

मैं

चलता रहा

हर उस रास्ते पर

जहां पर आज

खिजाओं के डेरे थे



मैं

चलता रहा

हर उस रास्ते पर

जहां आज

उजालों में अंधेरे थे



मैं

चलता रहा

हर उस रास्ते पर

जहां आज

सिर्फ

यादों के घेरे थे



मैं

रुक गया

चलते चलते

जहां मंज़िल ने

मुँह मोड़ा था



मैं

हंस पड़ा

उस खार की अदा पर

जिसके दर्द में

यादों के डेरे थे



मैं…

Continue

Added by Sushil Sarna on December 12, 2016 at 9:00pm — 6 Comments

ग़ज़ल (हमें गुज़रा ज़माना याद आया ) -----------------------------------------------



ग़ज़ल (हमें गुज़रा ज़माना याद आया )

-----------------------------------------------

मफाईलुन---मफाईलुन---- फऊलन

मुहब्बत का फसाना याद आया |

हमें गुज़रा ज़माना याद आया |

बनी है जान की दुश्मन शबे गम

कोई साथी पुराना याद आया |

शबे गम चैन भी आएगा कैसे

वो फिर ज़ालिम यगाना याद आया |

न जब इज़्ज़त मिली परदेस जा कर

वतन का आब दाना याद आया |

मिलीं जब ठोकरें हर एक दर से

मुझे उनका ठिकाना याद आया…

Continue

Added by Tasdiq Ahmed Khan on December 12, 2016 at 7:21pm — 12 Comments

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