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मुझ पर भी गिरी है एक बिजली

 

आकाश से

गिरती है बिजली

और एक हरा भरा पेड़

अचानक बदल जाता है

एक काले ठूंठ में

भीतर तक

 

किसी काम नहीं आती

वह जली लकड़ी

सिवाय सुलगने के

धुवां छोड़ने के 

अपने अंतिम सांस तक

और रह जाता है एक

अलिखित शिलालेख

ध्वंस का इतिहास समेटे

मौन स्तब्ध उदास जड़

निर्जीव

 

हमारे पूर्वज

लीपते थे गोबर से

माटी के घर

और उसकी दीवारें

क्योंकि वह मानते…

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Added by डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव on December 12, 2016 at 6:09pm — 4 Comments

चाँद बेनूर वफ़ा शर्म हया के हद में, (ग़ज़ल)

बहरे रमल मुसम्मन मखबून महजूफ,

2122 1122 1122 22,

इश्क तो पाक था बेदाद हुआ जाता है।

कातिले फ़ौज ही आजाद हुआ जाता है। 1

-------

चाँद बेनूर वफ़ा शर्म हया की हद में,

जुल्म कर अब्र ये आजाद हुआ जाता है। 2

------

लाख ही यत्न करो मर्ज बढ़ा ही जाए,

बात बेबात ही जेहाद हुआ जाता है। 3

------

हो रही खाक लगी आग बसारत देखो,

था बशर मोम का बर्बाद हुआ जाता है। 4

------

ऐ खुदा शाद अता रूह को फ़रमा देना,

अब जुदा जीभ से हर स्वाद हुआ जाता है।… Continue

Added by सुनील प्रसाद(शाहाबादी) on December 12, 2016 at 4:00pm — 18 Comments

निशानों में .....

निशानों में .....

आंखें बन्द
मुट्ठियों भिची हुई
अंतस में शोर
अपने रुद्र रूप में
तलाश
बीते लम्हों की
खो गए जो
अपने साथ लिए
जन्मों के वादे
सागर किनारे
गीली रेत पे
छूटे
गीले पाँव के
निशानों में

सुशील सरना
मौलिक एवम अप्रकाशित

Added by Sushil Sarna on December 12, 2016 at 2:29pm — 8 Comments

बड़े होकर मैं - ( लघुकथा ) जानकी बिष्ट वाही

" ऐ भाई ... दे दे ना ..."

"फिर आ गया तू ! चल भाग यहाँ से।"

" भाई ! एक दे दे ना,तुमको तो रोज बहुत मिलता है।"

" तेरी समझ में नहीं आता? ये जगह बच्चों के लिए नहीं ... अरे ! अभी भी यहीं खड़ा है ? लगाऊँ क्या एक ?"

" भाई ! आप बहुत अच्छे हो !एक दे दो, फिर नहीं आऊँगा यहाँ ।" अब उस लगभग बारह साल के बच्चे ने मस्का लगाने की कोशिश की।

" बड़ा ज़िद्दी है।कौन - कौन है तेरे घर में ?"

" माँ,छोटी बहन और मैं ।"

" और तेरा बाप ?"

" वो तो हमें छोड़ कर चला गया।उसने दूसरी शादी कर ली।"…

Continue

Added by Janki wahie on December 12, 2016 at 12:00pm — 21 Comments

अल्फाज से मगर ये छिपाया नही गया

*बह्र 221 2121 1221 212*



था नाम दिल पे दर्ज मिटाया नहीं गया

आँखों से मेरा प्यार छुपाया नहीं गया।।



कल को सँवारने में गई बीत ज़िन्दगी

जो सामने था लुत्फ़ उठाया नही गया।।



कोशिश बहुत की, राज़े मुहब्बत अयाँ न हो।

अल्फाज से मगर ये छिपाया नहीं गया।।



बीवी बहन न कोई मिलेगी बहू तुम्हे

बेटी को कोख में जो बचाया नहीं गया।।



मंदिर में जाके भोज कराने से फायदे?

माँ बाप को तो तुमसे खिलाया नहीं गया।।



पलको से रोकने की हुई… Continue

Added by नाथ सोनांचली on December 12, 2016 at 7:28am — 10 Comments

लघु कथा(गुमान)

#गुमान#(लघु कथा)

***

सुषमा ने तकिया समीर के सिरहाने कर दी थी।अपना सिर किनारे पर रखा था जो कभी ढुलक कर तकिये से उतर गया था।दोनों गहरी निद्रा में निमग्न थे।अचानक समीर ने करवट बदली।दोनों के नथुने टकराये।उसे आभास हुआ कि सुषमा का सिर तकिया पर नहीं, नीचे है।उसने आँखें खोली। उसे महसूस हुआ ,सुषमा दायीं करवट लेटी थी।उसकी उष्ण साँसें समीर को अच्छी लगीं।वह उसे तकिये पर लाने की कोशिश करने लगा।हालांकि वह चाहता था कि काम भी हो जाये और सुषमा की निद्रा भंग भी न हो।पर जैसे उसने उसे बाँहों में लेकर… Continue

Added by Manan Kumar singh on December 11, 2016 at 1:12pm — 11 Comments

एक ग़ज़ल

काफिया: अल ;रदीफ़ :गया

बह्र : २२ २२ २२ २२ २२

नव यौवन चंचल चितवन फिसल गया

यौवन की धूप खिली मन पिघल गया |

तेरे नैनों ने  किया इशारा कुछ

निश्छल मृदु दिल तो मेरा मचल गया |

मखमल सी आवाज़ की तारीफ करूँ

कर्ण प्रवेश से पत्थर दिल पिघल गया |

हम कैसे कह दे के तू  बेवफ़ा है 

तेरा गफलत ही प्यार को कुचल गया |

आक्रोश भरा रूप कभी न दिखाओ

देख रौद्र रूप मेरा दिल दहल गया |

है…

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Added by Kalipad Prasad Mandal on December 10, 2016 at 10:30pm — 8 Comments

ग़ज़ल : दिल के पन्नों पर

2122  2122  2122  212
दिल के पन्नों पर तुम्हारी याद उभरी जाय है,
तुम नहीं तो हर ख़ुशी अब ग़म में ढलती जाय है,
 
मैंने मुठ्ठी में कभी बाँधा नहीं पर जिन्दगी,
रेत की मानिंद हाथों से…
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Added by Anita Maurya on December 10, 2016 at 10:00am — 6 Comments

बुद्धिजीवियों की एक ही हसरत

बुद्धिजीवियों की एक ही हसरत

सुख समृद्धि को देश में है लाना ।

संभालकर रखना अपनी विरासत,

आपसी झगड़ों से सबको बचाना ।   

इसके लिए खुद से करते कसरत

बिना किए कभी कोई भी बहाना ।

कोसों दूर रहती है इनसे मुसीबत 

मिलती इन्हे खुशियों का खजाना ।

सभी लोग जानते इनकी हकीकत

आलसी सदा करते अनेकों बहाना ।

ऐसे लोगों की होती एक फितरत

दूसरों की कमी पर उंगली उठाना ।  

समाज को दिखाते अपनी लियाकत,

समाज के सुधार से सदा मुंह…

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Added by Ram Ashery on December 10, 2016 at 9:30am — 4 Comments

बस यूं ही

बस यूं ही

इत्तेफाक से



कभी हम मिले

कभी वो मिले

कुछ हम चले

कुछ वो चले



बस यूं ही

इत्तेफाक से



कभी हम बोले

कभी वो बोले

कभी हम सुने

कभी वो सुने



बस यूं ही

इत्तेफाक से



कभी हम देखें

कभी वो देखे

कुछ हम खुलें

कुछ वो खुलें



बस यूं ही

इत्तेफाक से



कभी हम सहे

कभी वो सहे

कहीं हम मुड़े

कहीं वो मुड़े



बस यूं ही

इत्तेफाक से



कुछ हम… Continue

Added by chandramauli pachrangia on December 9, 2016 at 12:19pm — 2 Comments

अदृश्य जीत (लघुकथा)

जंगल के अंदर उस खुले स्थान पर जानवरों की भारी भीड़ जमा थी। जंगल के राजा शेर ने कई वर्षों बाद आज फिर खरगोश और कछुए की दौड़ का आयोजन किया था।

 

पिछली बार से कुछ अलग यह दौड़, जानवरों के झुण्ड के बीच में सौ मीटर की पगडंडी में ही संपन्न होनी थी। दोनों प्रतिभागी पगडंडी के एक सिरे पर खड़े हुए थे। दौड़ प्रारंभ होने से पहले कछुए ने खरगोश की तरफ देखा, खरगोश उसे देख कर ऐसे मुस्कुरा दिया, मानों कह रहा हो, "सौ मीटर की दौड़ में मैं सो जाऊँगा क्या?"

 

और कुछ ही क्षणों में दौड़ प्रारंभ…

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Added by Dr. Chandresh Kumar Chhatlani on December 8, 2016 at 6:35pm — 14 Comments

तारीख- लघुकथा

अदालत में बैठे बैठे उनकी आंख लग गयी, अभी तक जज साहब नहीं आये थे और लगता था कि आज भी नहीं आएंगे| लगभग साल होने को आये थे लेकिन मामला पहली सुनवाई के बाद आगे नहीं बढ़ पाया था| पता नहीं और कितने महीने या साल लग जायेंगे इसमें, उनको खुद को समझ में नहीं आ रहा था|

शादी के कुछ ही हफ्ते बाद पत्नी ने शिकायत करना शुरू कर दिया और एक दिन वह अपना सूटकेस लेकर निकल गयी| शाम को जब उन्होंने फोन किया तो उसने साफ़ साफ़ कह दिया कि वह उनके साथ नहीं रह सकती| उन्होंने समझाने की बहुत कोशिश की, उसके घर भी गए लेकिन न…

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Added by विनय कुमार on December 8, 2016 at 6:16pm — 8 Comments

अधूरी तिश्नगी ...

अधूरी तिश्नगी ...

कैसे भूल सकती हूँ

वो रात

वो बात

जो एक चिंगारी से

शुरू हुई थी

वो चिंगारी

मेरी रगों में

धीरे धीरे

आग बनकर फैलती गयी

और मैं

चुपचाप उस आग में

जलती रही

मैं

खामोशियों के बियाबाँ में

गूंगी बनी

अपने जज़्बातों से

तन्हा सी

गुफ़्तगू करती रही

अपने खून में

लगी आग को बुझाना

मुझे कहां आता था

निहारती रही

आसमां की तरफ़

कि शायद कोई अब्र…

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Added by Sushil Sarna on December 8, 2016 at 6:11pm — 12 Comments

मुसाफ़िर थोड़े हूँ, मैं रास्ता हूँ (ग़ज़ल)

1222 1222 122



विरह की ठंड से जब काँपता हूँ।

तेरी यादों की चादर ओढ़ता हूँ।



पहुंचना ही नहीं मुझको कहीं पर

मुसाफ़िर थोड़े हूँ, मैं रास्ता हूँ।



न जाने कौन मुझको मिल गया है

कई दिन से मैं ख़ुद से लापता हूँ



बस इक उम्मीद का आलम है ये, मैं

हर आहट पर उचक कर देखता हूँ।



हुआ है ख़ाक कब का जिस्म मेरा

मैं अब तक उसमें दिल को ढूंढता हूँ।



उफनता है तेरी यादों का दरिया

मैं रफ़्ता-रफ़्ता उसमें डूबता हूँ।



(मौलिक व… Continue

Added by जयनित कुमार मेहता on December 7, 2016 at 5:08pm — 8 Comments

ग़ज़ल.... अजीब मंजर है बेखुदी का

121 22 121 22 121 22 121 22



न वक्त का कुछ पता ठिकाना न रात मेरी गुज़र रही है ।

अजीब मंजर है बेखुदी का , अजीब मेरी सहर रही है ।।



ग़ज़ल के मिसरों में गुनगुना के , जो दर्द लब से बयां हुआ था ।

हवा चली जो खिलाफ मेरे , जुबाँ वो खुद से मुकर रही है ।।



है जख़्म अबतक हरा हरा ये , तेरी नज़र का सलाम क्या लूँ ।

तेरी अदा हो तुझे मुबारक , नज़र से मेरे उतर रही है ।।



मिरे सुकूँ को तबाह करके , गुरूर इतना तुझे हुआ क्यूँ ।

तुझे पता है तेरी हिमाकत , सवाल…

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Added by Naveen Mani Tripathi on December 7, 2016 at 11:00am — 11 Comments

तरही गजल/राणा

बह्र 2122 2122 2122 212

गर मरे उम्मीद फिर कुछ भी यहां बचता नहीं

छोड़ दें उम्मीद को ये फैसला अच्छा नहीं।



गर्दिशों में जी रही आवाम सारी जब यहाँ

ऐश से तब हुक्मरां का टूटता नाता नहीं।



जिंदगी वो डोर है जिससे बँधा इंसान है

साथ उसका भी मगर होता हमेशा का नहीं।



मर मिटा है आज तू जिसकी हिफाज़त के लिए

बेवफा हमदम वो तेरी मौत पे आया नहीं।



कायदा-ए-जिंदगी भी है जरूरी दोस्तो

कायदे को छोड़ दें तो कुछ भी फिर जीना नहीं।



एक मुफ़लिस गर… Continue

Added by सतविन्द्र कुमार राणा on December 7, 2016 at 7:09am — 6 Comments

एक ग़ज़ल

2122 2122 2122 212

प्यार करते हो हमें गर, साथ चलकर देखना।

जल रहे जिस आग में हम, तुम भी जलकर देखना।।



एक गठरी बांधकर, मैंने सवालों की रखी।

दिल में आ जाए कभी, दो एक हल कर देखना।।



रास्ता बाहर का दिखलायेंगे अपने, आपको।

है अगर साहस तो लहरों सा, मचलकर देखना।।



हूँ मैं सोना आग में जलना, ही मेरा काम है।

दर्द मेरा जान जाओगे, पिघलकर देखना।।



जागता है साथ मेरे, ये बिछौना रातभर।

चाहती हूँ एक दिन इसको, बदलकर देखना।।



सामने से… Continue

Added by sarita panthi on December 6, 2016 at 7:12pm — 3 Comments

सांसारिकता (लघुकथा) /शेख़ शहज़ाद उस्मानी

"पढ़-लिख गये हो, अब क्या करोगे सरकारी नौकरी या प्राइवेट?" बुज़ुर्ग पड़ोसी ने युवक से पूछा।



"नहीं, नौकरी तो नहीं करूंगा!" टेढ़ा सा मुँह बनाकर युवक ने कहा।



"तो क्या दुकान खोलोगे, धंधा-व्यापार करोगे? कौन सा?"



"धंधा! धंधा तो कतई नहीं, इसके लिए पर्याप्त धैर्य मुझमें है ही नहीं!"



"तो फिर क्या बाप की छाती पर ही बैठे रहोगे, पढ़ने-लिखने के बाद भी?" बुज़ुर्ग ने उसको घूरते हुए कहा।



"यह कैसी बात कह रहे हैं आप ? पहले तो मैं दुनियादारी सीखूंगा… Continue

Added by Sheikh Shahzad Usmani on December 6, 2016 at 7:04pm — 17 Comments

चौथा बन्दर

एक चौथा बन्दर भी है

जिसने हटवा दिए हैं हाथ

उन तीनों बन्दरों के

आँख, कान और मुँह से

अब

वो सुन सकते हैं

बोल सकते हैं

देख सकते हैं

वह सब

जो चौथा बन्दर

सुनता है

बोलता है

देखता है

साथ ही

तीनों बन्दर

लगे हैं अपने जैसे

और भी बन्दर बनाने में

जो वही सुनें

वही बोलें

वही देखें

जो चौथा बन्दर

चाहता है

और जब

कोई बन्दर

कर देता है इंकार

उन तीनों जैसा

बनने से

तो वो तीनों… Continue

Added by Mahendra Kumar on December 6, 2016 at 3:52pm — 18 Comments

कुण्डलिया छंद - लक्ष्मण रामानुज

कुंडलिया छंद 

=========

सुख-सुविधा से काटते, जीवन उसके साथ,

जब सजनी के काम में, आप बँटाते हाथ। | 

आप बँटाते साथ, ह्रदय में प्रेम बरसता 

करे सभी सहयोग, उसी के घर समरसता 

रहे सभी जब साथ, फिर न जीवन में दुविधा 

पुत्र बहूँ औ पौत्र, मिलें सबको सुख-सुविधा |

(2)

जीवन के संग्राम में, करते जो संघर्ष,

सुगम रह उसकी बने, जीवन हो उत्कर्ष ।

जीवन हो उत्कर्ष, राह में आगे बढ़ता

करे सत्य ही बात,अकारण कभी न अड़ता

स्वार्थ भावना…

Continue

Added by लक्ष्मण रामानुज लडीवाला on December 6, 2016 at 3:50pm — 4 Comments

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