कोई भी लफ्ज आगे से नहीं सच का निकालेंगे
जुबाँ गर जह्र जो उगले जुबाँ को काट डालेंगे
चलो तनहाई को लेकर यहाँ से दूर चलते हैं
ग़मे दिल के सहारे से नयी दुनिया बसालेंगे
मग़र तरक़ीब तो कोई बतादे बेव़फा हमको
तेरी हो याद ज़ोरों पर भला कैसे सँभालेंगे
कभी भी जुर्म के आगे मेरा सर झुक नहीं सकता
अना के वास्ते अपनी उसी दिन सर कटालेंगे
लगा है देश अब घुटने सियासत कायदे भूली
कभी आवाम के आँसू सियासत को डुबालेंगे
मौलिक व…
Added by umesh katara on November 5, 2014 at 10:00am — 13 Comments
तन्हा प्याला ....
रजकण हूँ मैं प्रणय पंथ का
स्वप्न लोक का बंजारा
हार के भी वो जीती मुझसे
मैं जीत के हरदम ही हारा
नयन सिंधु में छवि है उसकी
वो तृषित मन की मधुशाला
प्रणयपाश एकांत पलों का
मन में जीवित ज्यूँ हाला
गीत कंठ के सूने उस बिन
रैन चांदनी बनी ज्वाला
नयन देहरी पर सजूँ मैं उसकी
हृदय में है ये अभिलाषा
अपने रक्तभ अधरों की मधु बूँद से
जो भर दे मेरा तन्हा प्याला
सुशील सरना
मौलिक एवं अप्रकाशित
Added by Sushil Sarna on November 4, 2014 at 6:52pm — 16 Comments
रामकिशन अपनी फसल से बहुत ज्यादा प्यार करता था. पौधों को अपने बच्चों के जैसा समझता. खेतों की साफ़-सफाई, हर काम शुरू करने से पहले पूजा-पाठ, यहाँ तक की अपनी भावुकता के कारण नन्हें-नन्हें पौधों पर कीटनाशकों का छिडकाव भी नहीं करता था. उसे यही लगता था कि इन मासूमों पर जहर का इस्तेमाल कैसे करूँ..? किन्तु ख़राब मौसम के कारण जन्मे कीट उसकी फसल को चट कर जाते. अपने हाथ कुछ न लगना और गाँव के लोगों द्वारा उसकी हंसी उड़ाना , एक दिन उसे समझ आ गया. अब रामकिशन अपनी फसलों से आमदनी का भरपूर फायदा ले रहा…
ContinueAdded by जितेन्द्र पस्टारिया on November 4, 2014 at 1:05am — 14 Comments
“सुना है शादी के बाद हाथों की लकीरें बदल जाती हैं.“ सुमन ने अपनी छह महीने पहले ब्याही बहन से पूछा
"वो तो तू ही जाने ज्योतिषाचार्या, मुझे तो इतना पता है की सात फेरों के बाद औरत के पाँवों की रेखाएं अवश्य बदल जाती है और ज़िन्दगी चक्र-घिरनी हो जाती है |"
उसने गहरी साँस भरते हुए कहा |
सोमेश कुमार
(मौलिक एवं अप्रकाशित )
Added by somesh kumar on November 3, 2014 at 9:00pm — 9 Comments
"हेलो, हाँ डॉक्टर साहब ! नमस्कार, बिटिया की शादी का निमंत्रण कार्ड भिजवा दिया है, भाभी जी और बच्चो को लेकर अवश्य आइयेगा"
"जी भाई साहब, नमस्कार, कार्ड मिल गया है, श्रीमती जी बच्चो के साथ जायेंगी, मैं न आ सकूँगा, आपको तो पता ही है शहर में डायरिया फैला हुआ है"
"हां, वो तो है, पर आपकी भगिनी की शादी है, कमसे कम दो दिन का भी समय निकालिये"
"माफ़ी चाहूंगा भाई साहब, सीजन चल रहा है यही तो दो पैसे कमाने के दिन हैं"
(मौलिक व अप्रकाशित)
पिछला पोस्ट => …
ContinueAdded by Er. Ganesh Jee "Bagi" on November 3, 2014 at 1:40pm — 26 Comments
सोनू जब सुबह सो के उठा तो माँ को घर में देखे के बोला - "अरे माँ आज ऑफिस नहीं गये आप ??"
माँ ने मुस्करा के "नहीं बेटा आज ऑफिस की सरकारी छुट्टी है .."
"छुट्टी कैसी माँ ?? कल ही तो आप सांता बाई को काम पर न आने के लिए डांट रही थी कि रोज रोज छुट्टी नहीं मिलती है ...
आपको छुट्टी मिल सकती है तो सांता बाई को क्यों नहीं माँ ?"
"फिर सरकार कितनी छुट्टी करती है माँ. "
जवाब तो माँ के पास था नहीं , बस डांट थी सोनू के लिए ....
(मौलिक व अप्रकाशित )…
Added by Alok Mittal on November 3, 2014 at 1:30pm — 13 Comments
रहे अब लाख पेचीदा सफ़र तै कर लिया है
न छोडूंगा मुहब्बत की डगर तै कर लिया है
ज़माना भी खड़ा है हाथ में शमशीरें लेकर
मैंने भी सरफरोशी का इधर तै कर लिया है
गुज़ारिश है रुको कुछ देर तन्हाई मिटादो
चले जाओ कि जाने का अगर तै कर लिया है
उदासी की फटी चिलमन हटाकर फैंक दूंगा
जिऊँगा अब तबस्सुम ओढ़कर तै कर लिया है
हवाओं सब चरागों को बुझादो ग़म नहीं कुछ
अँधेरे में जलाऊंगा जिगर तै कर लिया है
खड़ा…
ContinueAdded by khursheed khairadi on November 3, 2014 at 11:30am — 9 Comments
(गीतिका छंद)
14-14 मात्राए
Added by लक्ष्मण रामानुज लडीवाला on November 3, 2014 at 10:30am — 12 Comments
दिल ये बेईमान सताता है
हर पल भटकना चाहता है
डोरी है प्यार की नाजुक सी
कच्ची है कह धमकाता है
हलकी सी भी हवा मिले तो
हवा के संग बह जाता है
लग जाये ना गैरों की नजर
इस डर से छुपाकर रखा है
मैं लाख सम्हालूँ जतन करूँ
मुझको ही भ्रम दे जाता है
देखूं तो दुनिया…
Added by sarita panthi on November 2, 2014 at 10:00pm — 10 Comments
Added by रमेश कुमार चौहान on November 2, 2014 at 9:35pm — 9 Comments
मुख्यधारा
“ ए रुको,अपना लाइसेंस दो “ट्रैफिक हवलदार ने उसकी मोटर-साईकिल रोकते और चलान मशीन की तरफ देखते हुए कहा |
“ क्यों ,क्या हुआ साहब ? ”
“ पिछली सवारी बिना हेलमेट के है |”
“ नाम-मदन ,गाड़ी न.- - - - “
सर ,कारण क्या देंगें ?
“ पिछली पुरुष सवारी बिना हेलमेट “
पर ये तो - - -
“अच्छा ,स्त्री है ,माफ़ करना,पहनावे और बालों से मालूम नहीं हुआ “
“तो सर ,चालन में स्त्री या पुरुष लिखना जरूरी है ?”
“हूँ |अब जब से औरतों के लिए हेलमेट…
ContinueAdded by somesh kumar on November 2, 2014 at 9:25pm — 5 Comments
Added by ram shiromani pathak on November 2, 2014 at 10:09am — 18 Comments
1222 1222 1222 1222
मुझे ख़त भेज़ता है वो ,कभी मेरा हुआ था जो
गया था छोड़कर मुझको ,मेरा बनकर ख़ुदा था जो
सितारों की कसम उस चाँद को भूला नहीं अब तक
मेरी तन्हा भरी उस रात में सँग सँग ज़गा था जो
परेशाँ तो नहीं होगा,अकेला तो नहीं होगा
मुझे है फिक्र क्यों उसकी, नहीं मेरा हुआ था जो
कभी दिन के उज़ाले में चला था साथ वो मेरे
मगर फिर छोड़कर मुझको अँधेरे में गया था जो
जमाने को शिकायत भी मेरे इन आँसुओं से है
बहुत लम्बा चला…
Added by umesh katara on November 1, 2014 at 8:30pm — 6 Comments
कौन आया है अजनबी देखो !
खुशनुमाँ आज जिन्दगी देखो II
ध्यान देना ज़रा नजर भरके !
बैठ कर खूब सादगी देखो II
देख लो ठोक औ बजा करके I
ठीक सा कोइ आदमी देखो II
प्यार का अब हुआ असर ऐसा !
आप इसकी नई कमी देखो !!
हर तरफ चल रही सफाई है !
पर फिजाओं में गंदगी देखो !!
देखिये बँट रही मिठाई है !
कौन है फिर यहाँ दुखी देखो !!
जीत ली प्यार से मुहब्बत भी !
आज आलोक की ख़ुशी देखो…
Added by Alok Mittal on November 1, 2014 at 4:00pm — 14 Comments
साड़ी में जैसे फाल लगी
डाली में जैसे डाल लगी
मैं भी कुछ खिल जाउंगा
वो आके जब गाल लगी
धीरे से पाती खोल रहीं
तबले पे जैसे ताल लगी
नज़रों की चोली ओढ़ेगी
मालों में जो माल लगी
असीर हैं अनचाहे हम
मछली का वो जाल लगी
इत्र गुलाबी खुशबू फैली
पूजा का वो थाल लगी
अजब सलीके कत्ल किया
चैन की वो ही काल लगी
गाली भी खिल जाएगी
मुखड़े से जब…
ContinueAdded by anand murthy on November 1, 2014 at 1:30pm — 5 Comments
क्षणिकाएँ...
1.घन गरजे घनघोर
तिमिर चहुँ ओर
तृण-तृण से तन बहे
करके सब कुछ शांत
मेह हो गया शांत
..........................
2. सावन की फुहार
सृजन की मनुहार
रंगों का अम्बार
आयी बहार
हुआ धरा का
पुष्पों से शृंगार
.......................
3.बुझ गयी
कुछ क्षण जल कर
माचिस की तीली सी
जंग लड़ती साँसों से
असहाय ये काया
.........................
4.हर शाख पर
शूल ही शूल
फिर भी महके…
Added by Sushil Sarna on November 1, 2014 at 1:15pm — 18 Comments
१२२ १२२ १२२ १२२
नहीं पाँव दिखते जहाँ पर खड़े हो
बताओ जरा क्या तुम इतने बड़े हो?
उड़ाया जिसे ठोकरों से हटाया
उसी ख़ाक के तुम छलकते घड़े हो
जमाना नया है नयी नस्ल आई
पुराने चलन पर अभी तक अड़े हो
झुकी कायनातें झुका आसमां तक
न सोचो खुदी को फ़लक पे जड़े हो
वही रास्ते हैं वही मंजिलें हैं
वही कारवाँ है मगर तुम छड़े हो
जहाँ है मुहब्बत वहीँ हैं उजाले
निहाँ तीरगी है जहाँ गिर पड़े हो…
ContinueAdded by rajesh kumari on November 1, 2014 at 12:45pm — 32 Comments
जी उठा मन” - गीतिका
जी उठा मन आज फिर से रात चंदा देखकर |
थक गई थी प्रीत जग की रीत भाषा देखकर |
इक किरण शीतल सरल सी जब बढ़ी मेरी तरफ ,
झनझनाते तार मन उज्वल हुआ सा देखकर |
छू लिया फिर शीश मेरा संग बैठी देर तक ,
खूब बातें कर रही थी मुस्कुराता देखकर |
प्यार से बोली किरण फिर संग तुम मेरे चलो ,
राह रोशन कर रही थी साथ भाया देखकर |
चांदनी का चीर…
Added by Chhaya Shukla on November 1, 2014 at 10:00am — 19 Comments
1222 1222 1222 1222
मेरी हर शायरी में हर ग़ज़ल में आप ही तो हैं
मेरे हर नज़्म की होती पहल में आप ही तो हैं
मुझे तो ज़िन्दगी के रंग सारे ठीक लगते थे
किसी भी रंग के रद्दोबदल में आप ही तो हैं
मैं कितनी भी रखूँ दूरी हमेशा पास में हो आप
मेरे दिल में बना है उस महल में आप ही तो हैं
ये दुनिया है यहाँ ज़ह्राब भी शामिल है आँसू भी
मेरी आँखों से बहते इस तरल में आप ही तो हैं
अलग कब आप हो…
ContinueAdded by गिरिराज भंडारी on November 1, 2014 at 8:00am — 27 Comments
मेरे हक़ में,खि़लाफ़त में, कोई तू फैसला तो दे
सज़ा-ऐ-मौत ही दे दे ,मेरे मुन्सिफ़ सज़ा तो दे
हुनर तेरा तू ही जाने ,बसाकर घर उज़ाडा है
लगाकर आग़ हाथों से,मेरे घर को ज़ला तो दे
व़फादारी तेरी आँखों में अब ढ़ूँढ़े नहीं मिलती
नज़र गद्दार है तेरी ,ज़रा इसको झुका तो दे
मेरे ही वास्ते तूने सज़ाकर जहर का प्याला
रख़ा है घोलकर कब से जरा मुझको पिला तो दे
चला में छोड़ के दुनिया मुबारक़ हो जहाँ तुझको
तसल्ली मिल गयी होगी, जरा अब मुस्क़रा तो…
Added by umesh katara on October 31, 2014 at 10:03pm — 11 Comments
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