Added by pooja yadav on November 12, 2014 at 1:00pm — 10 Comments
खेतों की हरियाली गुम है
गाँवों की खुशहाली गुम है
बंद जहाँ है खुशियाँ सारी
उस ताले की ताली गुम है
जाने किस जंगल में गुम हूं
दुनिया देखी भाली गुम है
कैसी फ़सलें बोयी माधो
बूटे गायब बाली गुम है
शहरों में मजदूरी करते
बागों के सब माली गुम है
झूलों वाला सावन गुमसुम
अमुवे वाली डाली गुम है
क्यूं पलकें ‘खुरशीद’ हुई नम
वो अलकें घुँघराली गुम है
मौलिक व…
ContinueAdded by khursheed khairadi on November 12, 2014 at 9:30am — 7 Comments
एक छईण्टी आलू
बात पुरानी है , गाँव से जुड़ी हुई । बटेसर के काका यानि पिताजी विद्या बोले जाते थे । सब उनको बाबा कहते तथा बटेसर को काका । लिखने –पढ़ने के नाम पर बाबा का बस अंगूठे के निशान से ही काम चल जाता था , पर अच्छे –अच्छों को बातों में धूल चटा देना उनके बायें हाथ का खेल था ।बथान में बैलों को सानी (खाना –पानी ) दे रहे बटेसर से बात करते –करते भोला को कुछ याद आया, तो वह कुएँ से पानी निकलते बाबा की ओर मुड़कर बोला , ‘ बाबा ! उ महेसर भाई के आलू…
ContinueAdded by Manan Kumar singh on November 12, 2014 at 9:00am — 7 Comments
“बेटा, 20 हज़ार में क्या होगा ? कुछ और कोशिश कर, आखिर तेरी दीदी की शादी है !“
“सुना है भईया ने 5 हज़ार देकर हाथ खड़े कर लिए हैं | वो उनकी बहन नहीं है क्या ?“
वो बढ़ते बोझ और थकान से टूटने लगा था |
“बेटा ! लंगड़े और बिदकने वाले घोड़ो को रेस में नहीं रखा जाता |“
पक्षपात माँ की बेबसी थी |
.
सोमेश कुमार (मौलिक एवं अप्रकाशित)
Added by somesh kumar on November 12, 2014 at 9:00am — 6 Comments
ठूँठ
था हराभरा मेरा संसार
खुशियाँ लगती थी मेरे द्वार
हरी हरी मेरी शाखायें
फूल पत्ते भरकर इठलाये||
मेरा जीवन उनसे था और
उन सब से ही में जीता था
छांव पथिक सुस्ता लेता था
थकन अपनी बिसरा देता था||
समय ने ऐसा खेल दिखाया
दूर हो गयी मेरी ही छाया
छोड़ गये सब मुझको मेरे
एक एक कर देर सबेरे||
कद मेरा यूँ हुआ बढ़ा
रह गया आज अकेला खड़ा
रूप…
ContinueAdded by sarita panthi on November 12, 2014 at 7:49am — 10 Comments
तुम
मेरी प्रतीक्षा करना
उस मोड़ पर
मुड जाता है जो
मेरे घर की ओर
मैं दौड़ कर पहुचुंगा
तब भी
जबकि मैं जानता हूँ
सड़क भी अब…
ContinueAdded by Hari Prakash Dubey on November 11, 2014 at 9:00pm — 18 Comments
"अरे वो पेड़ कहा गया , गिर गया क्या ?"
"नहीं चाची , ठूँठ था तो काट दिया लोगों ने "|
बेऔलाद चाची को कुछ चुभा और वो तेजी से आगे बढ़ गयीं |
.
( मौलिक एवम अप्रकाशित )
Added by विनय कुमार on November 11, 2014 at 7:30pm — 14 Comments
2122 2122 2122 212
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तंग सी तेरी गली की याद वो जाती नहीं
मुद्दतों से वो तेरी तस्वीर धुँधलाती नहीं
..
बे-जबाबी हो चुके हैं ला-ज़बाबी ख़त मेरे
क्या मेरी चिट्ठी तेरे अब दिल को धड़काती नहीं
..
खत्म होने को चला है सिलसिला तेरा मेरा
बेव़फाई पर तेरी क्यों आके पछताती नहीं
..
झूठ से तकदीर लिखना खूब आता है तुझे
लूटकर तू दिल किसी का लौट कर आती नहीं
..
खौफ़ हावी हो चुका है आज तेरा शहर में
कत्ल करके भी तेरी…
Added by umesh katara on November 11, 2014 at 6:45pm — 8 Comments
परिचय हुआ जब दर्पण से ….
परिचय हुआ जब दर्पण से
तो चंचल दृग शरमाने लगे
अधरों में कंपन होने लगी
अंगड़ाई के मौसम .छाने लगे
परिचय हुआ जब दर्पण से ….
ऊषा की लाली गालों पर
प्रणयकाल दर्शाने लगी
पलकों को अंजन भाने लगा
भ्रमर आसक्ति दर्शाने लगे
परिचय हुआ जब दर्पण से …
पलकों के पनघट पर अक्सर
कुछ स्वप्न अंजाने आने लगे
बेमतलब नभ के तारों से…
Added by Sushil Sarna on November 11, 2014 at 1:30pm — 8 Comments
दिल्ली के दावेदारों तुम , देहातों में जाकर देखो
तकलीफ़ों की लहरें देखो ,गम का गहरा सागर देखो
सूरज अंधा चंदा अंधा , दीप बुझे हैं आशाओं के
रातें काली हैं सदियों से , और दुपहरें धूसर देखो
निर्धन की झोली में है दुख ,मौज दलालों के हिस्से में
कुटिया देखो दुखिया की तुम ,वैभव मुखिया के घर देखो
मोती निपजाने वाले तन ,धोती को तरसे बेचारे
गोदामों में सड़ता गेंहूं , भूखे बेबस हलधर देखो
आँसू गाँवों के भरते हो ,…
ContinueAdded by khursheed khairadi on November 11, 2014 at 9:00am — 8 Comments
जलावन
शहर की सरकारी डिस्पेंसरी में छांटे गए पेड़ो की टहनियों ने उसकी आँखों में चमक पैदा की |हर चौथे रोज़ वो छोटे सिलिंडर में 100 रुपया की गैस भराती थी और अगर काम मिले तो एक रोज़ की मजूरी थी-250 रुपया | यानि इतना जलावन मतलब 800 रुपया |तीनों बच्चों के सरदी के पुराने कपड़े वो नए पटरी बज़ार से खरीद लेगी यानि कि उनकी दिवाली |वैसे भी उसका बेवड़ा-निठल्ला पति रोज़ उसकी गरिमा को तार-तार करता था फिर चौकीदार को तो उन जलावन का हिसाब भी देना होता है आखिर सर्दीयां आ रही थीं |
सोमेश कुमार (मौलिक एवं…
ContinueAdded by somesh kumar on November 11, 2014 at 8:00am — 5 Comments
महज 12 वर्ष की कच्ची उम्र मेँ ही परिस्थितियोँ मेँ ढल गया था वो। जिस उम्र मेँ बच्चोँ को खेल खिलौनोँ सैर सपाटोँ का शौक होता है उस उम्र मेँ मोहन को बस एक ही शौक था- पढ़ने का। पढ़ाई मेँ तेज मोहन बड़ा ही महत्वाकांक्षी बालक था। लेकिन वक्त की ये टेढी-मेढी गलियाँ कब, किसे, ज़िन्दगी का कौन सा मोड़ दिखा देँ कौन जाने ? ऐसी ही किसी गली के मोड़ पर मोहन ने वो गरीबी देखी जिसमेँ दो जून का भोजन भी मुश्किल होता था और स्कूल तो दूर-दूर तक दिखाई न पड़ता था। पर मोहन भला कैसे हार मानता ? उसे तो बड़ा आदमी बनना था। इस सुखद…
ContinueAdded by pooja yadav on November 11, 2014 at 1:00am — 15 Comments
मुक्त हो गयी आत्मा !
अपने शरीर के बन्धनों से !!
स्तब्ध रह गयी निशा
मृत शरीर के क्रन्दनो से
मुक्त हो गयी आत्मा !
अपने शरीर के बन्धनों से !!
दूर हो गयी आत्मा
अतीत के स्पन्दनो से
राख हो गया शरीर
जलते हुये चन्दनों से
मुक्त हो गयी आत्मा !
अपने शरीर के बन्धनों से !!
शरीर आसक्त हो गया
प्रिया में अंतर्नयनों से
आत्मा छल गयी उसे
अनासक्ति के प्रपंचों से
मुक्त हो गयी आत्मा…
ContinueAdded by Hari Prakash Dubey on November 10, 2014 at 7:00pm — 6 Comments
पीतल और ऐलुमिनियम के बर्तनों में वर्चस्व की लड़ाई होने लगी, आखिर तय हुआ कि चाँदी महाराज से निर्णय करवाया जाये कि कौन श्रेष्ठ है । पीतल ने कहा कि उसके बर्तनों में देवों को भोग लगाया जाता है, कुलीनजनों के पास उसका स्थान है जबकि ऐलुमिनियम के बर्तनों में झुग्गी-झोपड़ी के लोग खाते हैं और तो और इसका कटोरा भिखमंगे लेकर घूमते रहते हैं ।
ऐलुमिनियम अपने पक्ष में कोई विशेष दलील नहीं दे सका…
Added by Er. Ganesh Jee "Bagi" on November 10, 2014 at 4:21pm — 31 Comments
रहस्य-भावानुभूति
पा लेने की प्यास
खो देने की तड़प
ज्वालामुखी अग्नि हैं दोनों
बिछोह के धुँए को आँखों में सहते
गहरापन ओढ़े
गुज़र जाते हैं एक के बाद एक
खुशिओं के त्योहार
खुशियों में शून्यताओं की पीड़ाएँ अपार
नहीं ठहरती है हाथों में
खुशी, मुठ्ठी में रेत-सी
पर मौसम कोई भी हो
अकुलाती रहती है पैरों के तलवों के नीचे
तपती रेत की अग्नि-सी…
ContinueAdded by vijay nikore on November 10, 2014 at 3:30pm — 12 Comments
दीनों का बस एक गुज़ारा ठाकुरजी
कष्टनिवारक नाम तुम्हारा ठाकुरजी
जग ने हमको दुत्कारा है हर युग में
रखना तुम तो ध्यान हमारा ठाकुरजी
साख भराऊं तुमरे सूरज चंदा से
देहातों में है अँधियारा ठाकुरजी
युगों युगों से खोज रहा हूं मैं ख़ुद को
दर दर भटकूं मारा मारा ठाकुरजी
सप्त सिंधु है बेबस तेरी अँजुरी में
मेरे होठों पर अंगारा ठाकुरजी
बीच भँवर में नैया डोले टेर सुनो
टूटा चप्पू दूर…
ContinueAdded by khursheed khairadi on November 10, 2014 at 2:30pm — 7 Comments
ऐ दिल
ख्वाबोँ की बस्ती से
निकल चल तो अच्छा हो
ये वो रँग हैँ
बिगाड देँगे जो
जिंदगी की तस्वीर
को तेरी
ले समझ
उस क्षितिज से आगे
है और भी दुनिया
सरकती जाती है सीमायेँ
और राहेँ साथ चलती हैँ
हर सजग राही की
बन चेरी
है गम
हार का अच्छा
न जश्न
किसी जीत का बेहतर
हवाओँ के रुख के साथ
बदलती रह्ती है
मरु मेँ रेत की
ये ढेरी
मौलिक…
ContinueAdded by Mohinder Kumar on November 10, 2014 at 12:30pm — 4 Comments
छंद- गीतिका
लक्षण – इसके प्रत्येक चरण में (14 ,12 )पर यति देकर 26 मात्रायें होती हैं I इसकी 3सरी, 10वीं, 17वीं और 24वीं मात्रा सदैव लघु होती है I चरणांत में लघु –दीर्घ होना आवश्यक है I
मिट चुकी अनुकूलता सब अब सहज प्रतिकूल हूँ I
मर चुका जिसका ह्रदय वह एक बासी फूल हूँ II
किन्तु तुम संजीवनी हो ! प्राणदा हो ! प्यार हो !
हो अलस संभार…
ContinueAdded by डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव on November 10, 2014 at 12:00pm — 24 Comments
क़सम ले लो उन्हें फिर भी न मैं बुरा कहता
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१२१२ ११२२ १२१२ २२ /११२
वो मेरे दिल में न होते तो मैं ज़ुदा कहता
क़सम ले लो उन्हें फिर भी न मैं बुरा कहता
वो जिसकी ताब ने ज़र्रे को आसमान किया ( ओ बी ओ को समर्पित )
उसे न कहता तो फिर किसको मैं ख़ुदा कहता
रहम दिली पे मुझे खूब है यकीं उनकी
करूँ क्या ? वक़्त मिला ही न मुद्दआ कहता
तवील …
ContinueAdded by गिरिराज भंडारी on November 10, 2014 at 8:57am — 24 Comments
दिल ये मेरा फ़क़ीर होना चाहे
घर फूँके बिन कबीर होना चाहे
तकसीम मज़हबों में करके हमको
तू बस्ती का वज़ीर होना चाहे
किस्मत में न सही तू ,पर तेरे ही
हाथों की वो लकीर होना चाहे
माँ की बराबरी करना छोडो तुम
गो ,खिचड़ी आज खीर होना चाहे
शोख नज़र दिलनशी अदा ये रूखसार
देख तुझे दिल शरीर होना चाहे
मौलिक व अप्रकाशित
गुमनाम पिथौरागढ़ी
Added by gumnaam pithoragarhi on November 10, 2014 at 7:00am — 5 Comments
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