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ग़ज़ल-रो पड़ेगा....बृजेश कुमार 'ब्रज'

1222     1222      122   

मिलेगा और  मिल  कर रो पड़ेगा

मुझे  देखेगा  तो  घर  रो  पड़ेगा



न जाने क्यों कहाँ खोया रहा हूँ

मेरी  आहट पे ही दर   रो पड़ेगा



मुझे  वो  भूल  जाने  के  लिये ही

करेगा  याद  अक़्सर  रो  पड़ेगा



हँसी मुस्कान होंठों  पे  सजाकर

कोई  इंसान  अंदर  रो  पड़ेगा



भले  ही  मौत  दे  देगा  मुझे पर

वो क़ातिल और खंज़र रो पड़ेगा



तुम्हारी आँख  से आँसू बहे गर

यहाँ  'ब्रज' में समंदर रो…
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Added by बृजेश कुमार 'ब्रज' on October 5, 2021 at 3:00pm — 10 Comments

श्रध्दांजलि

बेमौसम पतझड़ आया हो जैसे

पेड़ से झड़ते पत्तों-सी थर्राती

परिक्लांत पक्षी की पुकार

बींधती कराह-सी

सारी हवा में घुल गई

शोक समाचार को सुनते ही

आज अचानक

हवा जहाँ कहीं भी थी

वहीं की वहीं रूक गई

कि जैसे वह दिवंगत आत्मा

मेरे मित्र

केवल तुम्हारी माँ ही नहीं, वह तो

सारी सृष्टि की माँ रही

पेड़, पत्ते, पक्षी, मुझको, तुमको

एक संग सभी को

आज अनाथ कर गई

 

पुनर्जन्म सच है यदि तो कैसे कह…

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Added by vijay nikore on October 3, 2021 at 3:00pm — 4 Comments

ग़ज़ल नूर की - जिस दिन से इकतरफ़ा रिश्ता टूट गया

जिस दिन से इकतरफ़ा रिश्ता टूट गया 

सुनते हैं वो पागल लड़का टूट गया.

.

थामा ही था हाथ तुम्हारा मैंने बस

और अचानक मेरा सपना टूट गया.

.

अब ये आँखें कोई ख्वाब नहीं बुनतीं

पिछली नींद में मेरा करघा टूट गया.

.

अपने लालच को तुम काबू में रक्खो

वो देखो इक और सितारा टूट गया.

.

एक ज़रा सी बात से बातें यूँ बिगडीं

फिर तो जैसे हर समझौता टूट गया.

.

आप अदू से दूर हुए ये नेमत है

बिल्ली की क़िस्मत से छींका टूट गया.

.

कह…

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Added by Nilesh Shevgaonkar on October 3, 2021 at 9:30am — 16 Comments

कैसे कैसे लोग यहाँ -(गजल)-लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर'

२२२२/२२२२/२२२२/२२२



छीन के उनका पूरा बचपन कैसे कैसे लोग यहाँ

काट रहे हैं  अपना  जीवन  कैसे कैसे लोग यहाँ।२।

*

पाने को यूँ नित्य शिखर को साथी देखो दौड़े जो

कर बैठे औरों  को  साधन  कैसे  कैसे लोग यहाँ।२।

*

स्वार्थ सधे तो अपनों से भी झूठ छिपाने साथी यूँ

कीचड़ को कह  देते  चन्दन कैसे कैसे लोग यहाँ।३।

*

साध न पाये यार सियासत उस खुन्नस में देखो तो

बाँट रहे हैं मन का …

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Added by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on October 3, 2021 at 6:30am — 12 Comments

शास्त्री जी

अगर राष्ट्रपिता के नाम से महात्मा गांधी को याद किया जाता है वही उजास की लकीर बिखेरने। वाले नैतिक मूल्यों को स्थापित करने में शास्त्री जी को याद किया जाता है। संपूर्ण भारतीयता का उदाहरण शास्त्री जी के विषय में राम मनोहर लोहिया जी ने कहा था कि भारतीयता को जो तीन कसौटियाँ भाषा भूसा और भवन बांधी थी, शास्त्री जी उसका स्पष्ट प्रतिबिंब हैं। सादगी प्रिय शास्त्री जी करूणामयी अग्रगामी सोच वाले ऐसे दार्शनिक प्रधानमंत्री थे जिनके संस्कार व नैतिकता व्यक्तिवाद और परिवारवाद से परे थी। अपने पद व प्रतिष्ठा…

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Added by babitagupta on October 2, 2021 at 3:28pm — 3 Comments

ग़ज़ल-घर बसाना था

2122 / 1212 / 22





1

दिल का रिश्ता यूँ भी निभाना था

फिर से रूठा ख़ुदा मनाना था

2

चार ईंटें टिका के निस्बत की

आदमीयत का घर बसाना था…

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Added by Rachna Bhatia on October 2, 2021 at 12:23pm — 6 Comments

दर्द से यारी

हर संगदिल को दिल का पता बता दिया

जितने बेवफा मिले सबको घर दिखला दिया

सभी ने छोड़ दिया जिस ग़म को खुशी के खातिर

हमे जहाँ भी दिखा,उसे हंसके गले लगा लिया

साथ हो दर्द तभी जीने का मज़ा आता है

ग़म जुदाई का हो तो पीने का मज़ा आता है

छुपा के रख सके जो दर्द को जहन मे अपने

ज़ख्मों को सीने का मज़ा बस उसी को आता है

खुशी है बुलबुला एक दिन फूट जाएगा

हंसाया इसने जितना, उतना ही रुलाएगा

हमसफर है सच्चा ग़म ही अपना यारों

जो…

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Added by AMAN SINHA on October 1, 2021 at 11:30am — 1 Comment

तो रो दिया .......

तो रो दिया .......

मौन की गहन कंदराओं में

मैनें मेरी मैं को

पश्चाताप की धूप में

विक्षिप्त तड़पते देखा

तो रो दिया ।

खामोशी के दरिया पर

मैंने मेरी मैं को

तन्हा समय की नाव पर

अपराध बोध से ग्रसित

तिमिर में लीन तीर की कामना में लिप्त

व्यथित देखा

तो रो दिया

क्रोध के अग्नि कुण्ड में

स्वार्थघृत की आहूति से परिणामों को

जब धू- धू कर जलते देखा

तो रो दिया

सच , क्रोध की सुनामी के बाद जब…

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Added by Sushil Sarna on September 30, 2021 at 10:41pm — 12 Comments

ग़ज़ल - सदफ़ के गौहर

वज़्न-2122 1122 1122 22/112

 

अज़्म से जो भी समेटेगा हदफ़* के गौहर                                             [ हदफ़ - लक्ष्य

ज़िंदगी में वही पाएगा शरफ़* के गौहर                                                [ शरफ़ - सम्मान 

 

इश्क़ है उनको भी हमसे ये हमें है मालूम

हमने देखे हैं उन आँखों में शग़फ़* के गौहर                                           [शग़फ़ - दिलचस्पी

  

हाथ में हाथ ले तुमने जो उठाए थे कभी

मेरे दिल में हैं अभी तक वो…

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Added by Anjuman Mansury 'Arzoo' on September 30, 2021 at 5:00pm — 12 Comments

जुनून

रगो मे खून बनकर तेरे, यूँ “जुनून” बहता है

बिना मंज़िल के ना रुकना, ये सुकून कहता है

हुआ क्या राहों मे तेरे, जो बस पत्थर ही पत्थर है

चूमेंगे पाँव वो तेरे ये “जुनून” तुझसे कहता है

 

है मुश्किल सफर तेरा ये, गलियां तुझसे कहती है

चुनी ये राह जिसने भी, गुमान दुनिया करती है

तू देख कर चट्टानों को कभी हिम्मत नहीं खोना

पल भर की नाकामी पर तू भूल कर भी नहीं रोना

 

पहाड़ो मे सुराख कर दे, ये हिम्मत बस तुझी मे…

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Added by AMAN SINHA on September 30, 2021 at 10:00am — 7 Comments

ग़ज़ल - कैसे कोई ख़ुश रहे जब दिल ही में आज़ार हो तो

2122 2122 2122 2122



इक भी आंसू क्यों गिरे जब आंख शोला-बार हो तो

कैसे कोई ख़ुश रहे जब दिल ही में आज़ार हो तो



आपसे है जंग तो मंज़ूर है ये सरफ़रोशी

क्या करें जब आपके ही हाथ में तलवार हो तो



लग रही है ज़िंदगी भी कुछ दिनों से अजनबी सी

लौट आना तुमको मुझसे थोड़ा सा भी प्यार हो तो



क्या किसी के सामने अब राज़े-ज़ख़्मे-पिन्हां खोलें

आपका ग़म-ख़्वार ही जब दुश्मनों का यार हो तो



तूने गरचे तोड़ डाले सारे नाते एक पल में

एक वहशी…

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Added by Zaif on September 29, 2021 at 7:30pm — 2 Comments

तरही ग़ज़ल - (अब तुमसे दिल की बात कहें क्या ज़बाँ से हम)

221 2121 1221 212



भागें कहाँ तलक ग़मे-आहो-फ़ुगाँ से हम

जाऐंगे तेरे इश्क़ में इक रोज़ जाँ से हम



बोला था सच, पलट नहीं पाए बयाँ से हम

अब तंग आ चुके हैं ख़ुद अपनी ज़बाँ से हम



लो देखते ही देखते सब सफ़्हे जल पड़े

क्या लिख गए सियाही-ए-सोज़े-निहाँ से हम!



इक फूल था कि मुरझा गया सर-ए-गुलसिताँ

इक उम्र थी कि गुज़रे थे दौरे-ख़िजाँ से हम



आओ सिखा दूं तुमको निगाहों की गुफ़्तगू

अब तुमसे दिल की बात कहें क्या ज़बाँ से… Continue

Added by Zaif on September 28, 2021 at 6:46pm — 8 Comments

क्षणिकाएं (२०२१ -१ )- डॉo विजय शंकर

जो समझते हैं

वे जमे पड़े हैं ,

ये ख्याल है उनका ,

सच में तो वे

केवल पड़े हैं। .........1 .

छत पड़ी भी नहीं

और बुनियाद खिसक रही है ,

वो महल बनाने चले थे

कितनों की झोपड़ी भी उजड़ गई ,

लोग फिसल रहे हैं या उनके

पैरों के नीचे जमीन खिसक रही है। ......... 2 .

यूँ ही सफर में ही गुजर जाए , जिंदगी

अच्छा है ,

जिनकी तलाश हो

वो मंजिलों पे मिला नहीं करते ll ......... 3 .

मौलिक एवं…

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Added by Dr. Vijai Shanker on September 27, 2021 at 8:30pm — 13 Comments

भय

पहाड़ की ऊंची चोटी पर

अपने चारों तरफ

हरियाले वृक्षों से घिरा

मैं ठूँठ सा तन्हा खड़ा हूँ ।

कुछ वर्ष पूर्व

आसमानी बिजली ने

हर ली थी मेरी हरियाली

यह सोच कर कि

वो मेरे तन-बदन को

जर्जर कर मेरे अस्तित्व को

नेस्तनाबूद कर देगी ।

मगर

वक्त के साथ

अपने नंगे बदन पर

मैं मौसम के प्रहार सहते-सहते

एक मजबूत काठ में

परिवर्तित होता गया ।

आज मैं

आसमान से

अपनी विध्वंसक शक्ति का डंका…

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Added by Sushil Sarna on September 27, 2021 at 1:30pm — 8 Comments

क्षितिज

वो जहां पर असमा और धरा मिल जाते है

छोर मिलते ही नहीं पर साथ में खो जाते है

है यही वो स्थान जिसका अंत ही नहीं

मिल गया या खो गया है सोचते है सब यही



सबको है चाह इसकी पर राह का पता नहीं

बिम्ब या प्रतिबिम्ब है ये भ्रम सभी को है यही

कामना को पूर्ण करने श्रम छलांगे भरता है

मरीचिका के जाल में जैसे मृग कोई भटकता है



है धरा का अंत वही जिस बिंदु से शुरुआत है

यात्रा अनंत इसकी कई युगों की बात है

ओर ना है छोर इसका शुन्य सा आकाश है

जिसका जग को…

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Added by AMAN SINHA on September 27, 2021 at 10:36am — 3 Comments

स्वयं को तनिक एक बच्चा बना-लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर'

१२२/१२२/१२२/१२



न दे साथ जग  तो अकेला बना

नया अपने दम पर जमाना बना।१।

*

थका हूँ जतन कर यहाँ मैं बहुत

कि घर मेरा तू ही शिवाला बना।२।

*

तुझे अपना कहते बितायी सदी

न  ऐसे तो पल  में  पराया बना।३।

*

यहाँ सच की बातें तो अपराध हैं

यही सोच खुद को न झूठा बना।४।

*

बड़ों के दिलों में भरा दोष अब

स्वयं को तनिक एक बच्चा बना।५।

*

बहुत दम है साथी कहन में मगर

नहीं अपने…

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Added by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on September 27, 2021 at 6:45am — 7 Comments

जो इजाजत हो

122  2122  2122  2122  2

तेरी तस्वीर होठों से लगा लूँ, जो इजाजत हो। 

उसे आगोश में लूँ, चूम डालूँ, जो इजाजत हो।

बहुत नायाब दौलत है तुम्हारे हुस्न की दौलत 

तुम्हारा हुस्न तुमसे ही चुरा लूँ जो इजाजत हो ।

नशीले नैन लाली होंठ की यूँ मुझ पे छाई…

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Added by आशीष यादव on September 24, 2021 at 3:30pm — 8 Comments

वक्त के सिरहाने पर ......

वक्त के सिरहाने पर .........

वक्त के सिरहाने पर बैठा

देखता रहा मैं देर तक

दर्द की दहलीज पर

मिलने और बिछुड़ने की

रक्स करती परछाइयों को

जाने कितने वादे

कसमों की चौखट पर

चरमरा रहे थे 

अरसा हुआ बिछड़े हुए

मगर उल्फ़त के

ज़ख्म आज भी हरे हैं

तुम्हारी बात

शायद ठीक ही थी कि

मोहब्बत अगर बढ़ नहीं पाती

माहताब की मानिंद घटते-घटते

एक ख़्वाब बनकर रह जाती है

और

वक्त…

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Added by Sushil Sarna on September 22, 2021 at 8:30pm — 7 Comments

ग़ज़ल

1222 1222 1222



मिला था जो हमें पल खो दिया हमने

मुलायम नर्म मखमल खो दिया हमने ।

*

बचा रख्खे हैं यादों के नुकीले शर

मज़े से झूमता कल खो दिया हमने ।

*

उड़ा दी खुशबुएँ जो साथ रहती थीं

गँवा दी उम्र संदल खो दिया हमने ।

*

मुहब्बत नाम से हर दिन जिहालत की

सुकूँ था एक आँचल खो दिया हमने ।

*

सवालों पर सवालों की थीं बौछारें

जवाब आए तो संबल खो…
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Added by Ashok Kumar Raktale on September 22, 2021 at 8:00pm — 9 Comments

कुछ बदला सा

कुछ बदला-बदला सा ये जहां नज़र आता है, 

राह अब भी है वही पर, अजनबी सा नज़र आता है

तन तो हमेशा ही अपना था मगर,

न जाने क्यों अब पराया सा नज़र आता है

 

ज़िंदगी को हमने कुछ यूं गुज़रते देखा

जैसे रेत को बंद मुट्ठी से फिसलते देखा

ज़ोर जितना भी लगाया रोकने मे उसे

छोटे से छेद से जिंदगी को निकलते देखा

एक आहट सी हुई किसी के आने की जैसे

साँसो मे घुल सी गयी किसी की खुशबू जैसे

इस खुशबू से मेरा वास्ता एक अरसे से रहा

रूह…

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Added by AMAN SINHA on September 22, 2021 at 10:00am — 5 Comments

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