For any Query/Feedback/Suggestion related to OBO, please contact:- admin@openbooksonline.com & contact2obo@gmail.com, you may also call on 09872568228(योगराज प्रभाकर)/09431288405(गणेश जी "बागी")

All Blog Posts (19,173)


सदस्य कार्यकारिणी
ज़िन्दगी के साथ चल कर देखिये-ग़ज़ल

2122/ 2122/ 212

घर से बाहर तो निकल कर देखिये

ज़िन्दगी के साथ चल कर देखिये

 

आपको अंधा न कर दे वो चमक

शम्स को थोड़ा सँभल कर देखिये

 

आजमाया है मुझे ही अब तलक

इक दफा खुद को बदल कर देखिये

 

चार सू बस आप ही होंगे जनाब

शम्अ की मानिन्द जल कर देखिये

 

आसमाँ के है मुकाबिल हस्ती क्या

देखना हो तो उछल कर देखिये

 

तर्क़े ताल्लुक तो बहुत आसान है

कालिबे निस्बत में ढल कर…

Continue

Added by शिज्जु "शकूर" on August 23, 2014 at 7:00pm — 17 Comments

हे री ! चंचल

  • हे री ! चंचल

----------------

जुल्फ है कारे मोती झरते

रतनारे मृगनयनी नैन

हंस नैन हैं गोरिया मेरे

'मोती ' पी पाते हैं चैन

आँखें बंद किये झरने मैं

पपीहा को बस 'स्वाति' चैन

लोल कपोल गाल ग्रीवा से

कँवल फिसलता नाभि मेह

पूरनमासी चाँद चांदनी

जुगनू मै ताकूँ दिन रैन

धूप सुनहरी इन्द्रधनुष तू

धरती नभ चहुँ दिशि में फ़ैल

मोह रही मायावी बन रति

कामदेव जिह्वा ना बैन

डोल रही मन 'मोरनी'…

Continue

Added by SURENDRA KUMAR SHUKLA BHRAMAR on August 23, 2014 at 6:14pm — 16 Comments

हाईकू

ताप प्रचण्ड
उफनाई नदियाँ
तपता भादों |

पथिक भूला
अंतर्मन व्यथित
तिमिर घना |

पथ ना सूझे
पिए नित गरल
कंठ भुजंग |

अल्हड़ नदी
मदमस्त लहरें
नईया डोले |

भजन राम
बसे छवि मन में
नित निहारू |

मनमोहिनी
चंदा सा मुख देख
खुशी मन में |
 
मीना पाठक 
मौलिक /अप्रकाशित 

Added by Meena Pathak on August 23, 2014 at 1:45pm — 25 Comments

अदाओं से उसका लुभाना गया - ग़ज़ल ( लक्ष्मण धामी ‘मुसाफिर’ )

2122    1221     2212

************************

नीर पनघट  से  भरना, बहाना गया

चाहतों का वो दिलकश जमाना गया

***

दूरियाँ  तो  पटी  यार  तकनीक  से

पर अदाओं से उसका लुभाना गया

***

पेड़  आँगन  से  जब  दूर  होते गये

सावनों  का  वो मौसम सुहाना गया

***

आ  गये  क्यों  लटों  को बिखेरे हुए

आँसुओं  का  हमारे  ठिकाना  गया

***

नाम  उससे  हमारा  गली  गाँव  में

साथ  जिसके हमारा  जमाना  गया

***

गंद शहरी जो गिरने…

Continue

Added by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on August 23, 2014 at 10:00am — 25 Comments

हिन्दी ज़िन्‍दाबाद

ज़िन्‍दाबाद--ज़िन्‍दाबाद।

राष्‍ट्रभाषा-मातृभाषा हिन्‍दी ज़िन्‍दाबाद।।

ज़िन्‍दाबाद- जि़न्‍दाबाद।

हिन्द की है शान हिन्दी

हिन्द की है आन हिन्दी

हिन्द का अरमान हिन्दी

हिन्द की पहचान हिन्दी

इसपे न उँगली उठे रहे सदा आबाद।

ज़िन्‍दाबाद-ज़िन्‍दाबाद।

वक्‍़त जन आधार का है

हिन्दी पर विचार का है

काम ये सरकार का है

जीत का न हार का है

हिन्दी से ही आएगा…

Continue

Added by Dr. Gopal Krishna Bhatt 'Aakul' on August 23, 2014 at 8:22am — 9 Comments

आज जो भी है वतन

आज जो भी है वतन, आज़ादी की सौगात है।

क्या दिया हमने इसे, ये सोचने की बात है।

कितने शहीदों की शहादत बोलता इतिहास है।

कितने वीरों की वरासत तौलता इतिहास है।

देश की खातिर जाँबाज़ों ने किये फैसले,

सुन के दिल दहलता है, वो खौलता इतिहास है।

देश है सर्वोपरि, न कोई जात पाँत है।

आज जो भी है वतन, आज़ादी की सौगात है।

आज़ादी से पाई है, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता।

सर उठा के जीने की, कुछ करने की प्रतिबद्धता।

सामर्थ्य कर…

Continue

Added by Dr. Gopal Krishna Bhatt 'Aakul' on August 22, 2014 at 9:00pm — 7 Comments

दीप आंधी में जलाना इतना आसाँ है नहीं

२१२२      २१२२     २१२२     २१२  

राह पर्वत पर बनाना इतना आसाँ है नहीं 

दीप आंधी में जलाना  इतना आसाँ है नहीं 

सरहदों पे जान देते आज माँ के लाडले 

गीत आजादी के गाना इतना आसाँ है नहीं 

दोस्ती का हाथ लेकर फिर खड़े अहबाब हैं 

जो दफ़न उसको जगाना इतना आसाँ है नहीं 

बस्तियां चाहें जला लें आप कितनी भी यहाँ 

है हकीकत घर बनाना इतना आसाँ है नहीं 

हाथ हाथों से मिलाये हर किसी ने बज्म में 

दिल से…

Continue

Added by Dr Ashutosh Mishra on August 22, 2014 at 1:30pm — 24 Comments

क्रांति का बिगुल ही अब नव चेतना जगाएगा

लोकतंत्र कब तलक यूँ जनता को भरमाएगा।

स्वतंत्रता का जश्न अब न और देखा जाएगा।

भ्रष्टाचार दुष्कर्मों से घिरा हुआ है देश देखलो,

इतिहास कल का नारी के नाम लिखा जाएगा।

क्रांति का बिगुल ही अब नव-चेतना जगाएगा।

आ गया है फि‍र समय जुट एक होना ही पड़ेगा।

दुष्ट नरखांदकों से फि‍र दो चार होना ही पड़ेगा।

गणतंत्र और स्वतंत्रता की शान की खातिर हमें,

बाँध के सिर पे कफ़न घर से निकलना ही पड़ेगा।

सिर कुचलना होगा साँप जब भी फन…

Continue

Added by Dr. Gopal Krishna Bhatt 'Aakul' on August 21, 2014 at 9:00pm — 6 Comments

कि तेरी याद आती है

चले आओ कभी आगोश में,

सब छोड़ के जालिम!

ये रातें कट रही तन्हा,

कि तेरी याद आती है।

बताऊँ फिर तुझे कैसे,

दिल-ए-नादाँ की बातें!

मैं खुद में हो गया आधा,

कि तेरी याद आती है।

कभी रहती थी पलकों पे,

हुस्न-ए-नूर बनकर तुम!

वही बनके तूँ फिर आजा,

कि तेरी याद आती है।

समय बदला, फिजा बदली,

अभी ये दिल नही बदला!

समय के साथ तूँ बदली,

कि तेरी याद आती है।

सोचता हूँ समेटूँगा,

तेरी यादों…

Continue

Added by Pawan Kumar on August 21, 2014 at 3:30pm — 20 Comments

गांधी नोट

अपनी आबरू बेच जब

हाथ में नोट आया

लड़की ने नोट पर

अंकित गांधी के चित्र पर

अपनी बेबस नजरों को गड़ाया

गांधी बहुत ही शर्मिंदा हुए

अपनी खुद की नजरों को

जमीं में गड़ता पाया

नहीं मिला पायें नजर

आंसुओं से डबडबाई नजरों से

देश के हालत पर चीत्कार से…

Continue

Added by savitamishra on August 21, 2014 at 1:00pm — 24 Comments

गिरने पे चोट नहीं लगती--डा० विजय शंकर

आजकल गिरने पे चोट नहीं लगती , तभी तो

लोग कहीं भी कितना भी गिरने को तैयार रहते हैं

चोट लगेगी भी कैसे , जब भी कोई गिरता है ,

कहीं भी गिरता है , पहले से वहां

काफी गिरे हुए लोग होते हैं ,

जो उसको गिरते ही हाथों हाथ ले लेते हैं ,

उसे चोट लगने ही नहीं देते हैं

उसके बाद तो और गिरने का डर भी नहीं रहता

गिरे को और क्या गिरने का डर होगा

बस गिरे रहिये , पड़े रहिये , रेंगते रहिये

ऊंचाई में, थोड़ा ऊपर जाने में

हमेशा गिरने का डर बना रहता है

कौन कब,… Continue

Added by Dr. Vijai Shanker on August 20, 2014 at 11:17pm — 20 Comments

माँ की महिमा

कविता गीत ग़ज़ल रूबाई।

सबने माँ की महिमा गाई।।

जल सा है माँ का मन निर्मल

जलसा है माँ से घर हर पल

हर रँग में रँग जाती है माँ

जल से बन जाता ज्‍यों शतदल

माँ गंगाजल, माँ तुलसीदल

माँ गुलाबजल, माँ है संदल

जल-थल-नभ, क्‍या गहरी खाई।

माँ की कभी नहीं हद पाई।

कविता गीत----------------

माँ फूलों की बगिया जैसी

रंगों में केसरिया जैसी

माँ भोजन में दलिया जैसी

माँ गीतों में रसिया जैसी

माँ…

Continue

Added by Dr. Gopal Krishna Bhatt 'Aakul' on August 20, 2014 at 11:04pm — 12 Comments

बेगानों की महफिल में तो - ग़ज़ल ( लक्ष्मण धामी ‘मुसाफिर’ )

2222    2222    2222    222

*******************************

देता  है  आवाजें  रूक-रूक  क्यों मेरी खामोशी को

थोड़ा तो मौका दे मुझको गम से हम आगोशी को

***

कब  मागे  मयखाने  साकी  अधरों ने उपहारों में

नयनों के दो प्याले काफी जीवन भर मदहोशी को

***

देखेगी  तो  कर  देगी  फिर  बदनामी  वो तारों तक

अपना आँचल रख दे मुख पर दुनियाँ से रूपोशी को

***

बेगानों  की  महफिल  में  तो चुप रहना मजबूरी थी

अपनों  की  महफिल  में  कैसे अपना लूँ बेहोशी…

Continue

Added by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on August 20, 2014 at 11:21am — 24 Comments


सदस्य कार्यकारिणी
( ग़ज़ल ) जलाने को तुम्हारे हौसले तैयार बैठे हैं (गिरिराज भंडारी )

१२२२  १२२२ १२२२ १२२२

करेंगे होम ही, लेकर सभी आसार बैठे हैं

जिगर वाले जला के हाथ फिर तैयार बैठे हैं

ज़रा ठहरो छिपे घर में अभी मक्कार बैठे हैं

जलाने को तुम्हारे हौसले तैयार बैठे हैं

 

बहारों से कहो जाकर ग़लत तक़सीम है उनकी

कोई खुशहाल दिखता है , बहुत बेज़ार बैठे हैं

 

समझते हैं तेरे हर पैंतरे , गो कुछ नहीं कहते

तेरे जैसे अभी तो सैकड़ों हुशियार बैठे हैं

 

तुम्हें ये धूप की गर्मी नहीं लगती यूँ ही…

Continue

Added by गिरिराज भंडारी on August 20, 2014 at 9:30am — 32 Comments

तमाचा (लघुकथा)

" कितने गंदे लोग हैं , छी , सब तरफ गन्दगी ही गन्दगी , उधर किनारे चलते हैं " कहते हुए लड़का बड़े प्यार से हाथ पकड़ कर उसे किनारे ले गया और आँखों में आँखें डाल कर खो गए दोनों |

" साहब मूंगफली ले लो , टाइम पास " |

" ठीक है , दे दो " , और फटाफट पैसे देकर रुखसत किया उसको |

पता ही नहीं चला , कब मूंगफली ख़त्म हो गयी और अँधेरा हो गया | दोनों उठ कर चलने लगे |

लेकिन जैसे ही लड़की ने झुक कर छिलके उठाये , लड़के का हाथ अपने गाल पर चला गया |  

मौलिक एवम अप्रकाशित

Added by विनय कुमार on August 20, 2014 at 2:00am — 23 Comments

कमाई...(लघुकथा)

मंदबुद्धि और भोला रामदीन वर्षों से अपने परिवार व् गाँव  से  दूर , दूसरे गाँव  में काम करके अपने परिवार में अपनी पत्नी व् बेटे का पालन करते-करते, विगत कुछ महीनों से बहुत थक चुका है. शरीर से बहुत कमजोर भी हो गया है , आखिर उम्र भी पचपन-छप्पन के लगभग जो हो गई.  अब तो कभी-कभी खाना ही नही खा पाता. पहले कई वर्षों तक रामदीन का मालिक उसके परिवार तक उसकी पगार पंहुचा दिया करता था. अब रामदीन का बेटा बड़ा हो गया है, कमाने भी लगा है अपने ही गाँव में. कुछ महीनों से उसकी पगार लेने भी आता जाता…

Continue

Added by जितेन्द्र पस्टारिया on August 20, 2014 at 1:12am — 42 Comments


सदस्य कार्यकारिणी
अगर तुम टूटने के दर्द को महसूस कर जाते (ग़ज़ल 'राज'

१२२२    १२२२    १२२२  १२२२

अगर तुम टूटने के दर्द को महसूस कर जाते

तो क्या खुद एक पल में टूटकर इतना बिखर जाते

 

रिदाएँ गर्द की जब तब हटाते आइनों से तुम

दिलों के फासले मिटते कई रिश्ते सँवर जाते

 

झुलसते जिस्म फसलों के उमड़ती प्यास धरती की

चिढ़ाते बेवफ़ा बादल इधर जाते उधर जाते

 

पहेली सी बने फिरते बड़े मदमस्त ये बादल

कहीं ख़ाली गरजते उफ़ कहीं हद से गुजर जाते

 

तुम्हारे झूठ के छाले लगे रिसने सफ़र…

Continue

Added by rajesh kumari on August 19, 2014 at 9:18pm — 31 Comments

नाम हो जाये

मिले है आज हम दोनो हसीं इक शाम हो जाये

कसम दो तोड़ तुम उसकी चलो इक जाम हो जाये

पड़ा सूखा मरे भ्‍ूाखो नहीं कोई हमें पूछे

कही ऐसा न हो यारो कि कल्‍लेआम हो जाये

नहीं रखते कभ्‍ाी धीरज किसी भी काम में यारो

बचा लो नाम तुम मेरा न वो बदनाम हो जाये

तुम्‍हारे प्‍यार में जानम मरेगें डूब कर सुन लो

मरा पागल दिवाना है न चरचा आम हो जाये

मिलेगा अब नहीं जीवन मिला इक बार जो तुमको

करो कुछ काम अब ऐसा तुम्‍हारा नाम हो…

Continue

Added by Akhand Gahmari on August 19, 2014 at 8:16pm — 15 Comments

दिल की सच्चाई

हे प्रभु, सुन !

कर दें अँधेरा

चारों तरफ.. .  

उजाले काटते हैं / छलते है !

लगता है अब डर

उजालें से

दिखती हैं जब

अपनी ही परछाई -

छोटी से बड़ी

बड़ी से विशालकाय होती हुई.

भयभीत हो जाती हूँ !

मेरी ही परछाई मुझे डंस न ले,

ख़त्म कर दे मेरा अस्तित्व !

जब होगा अँधेरा चारों ओर

नहीं दिखेगा

आदमी को आदमी !

यहाँ तक कि हाथ को हाथ भी.

फिर तो मन की आँखें

स्वतः खुल जाएँगी !

देख…

Continue

Added by savitamishra on August 19, 2014 at 2:00pm — 20 Comments

प्रिय मोहन

प्रिय मोहन तेरे द्वार खड़ी मैं,

कबसे से रही पुकार!

कान्हा मुझको शरण में ले लो,

विनती बारम्बार।

मैं तो अज्ञानी, अभिलाशी,

तेरे दरश की प्यारे!

जीवन पार लगा दो मेरा,

बस मन यही पुकारे।

खुशियों से भर दो ये झोली,

ओ मेरे साँवरिया!

तेरे पीछे दौड़ी आऊँ,

बन के मैं बाँवरिया।

मोह रहे हैं मन को मेरे,

श्याम तेरे ये नयना!

दिन में सुकून ना पाऊँ तुम बिन,

रात मिले ना चैना।

मुझ अबला को सबला कर दो,

जग…

Continue

Added by Pawan Kumar on August 19, 2014 at 1:14pm — 8 Comments

Monthly Archives

2026

2025

2024

2023

2022

2021

2020

2019

2018

2017

2016

2015

2014

2013

2012

2011

2010

1999

1970

कृपया ध्यान दे...

आवश्यक सूचना:-

1-सभी सदस्यों से अनुरोध है कि कृपया मौलिक व अप्रकाशित रचना ही पोस्ट करें,पूर्व प्रकाशित रचनाओं का अनुमोदन नही किया जायेगा, रचना के अंत में "मौलिक व अप्रकाशित" लिखना अनिवार्य है । अधिक जानकारी हेतु नियम देखे

2-ओपन बुक्स ऑनलाइन परिवार यदि आपको अच्छा लगा तो अपने मित्रो और शुभचिंतको को इस परिवार से जोड़ने हेतु यहाँ क्लिक कर आमंत्रण भेजे |

3-यदि आप अपने ओ बी ओ पर विडियो, फोटो या चैट सुविधा का लाभ नहीं ले पा रहे हो तो आप अपने सिस्टम पर फ्लैश प्लयेर यहाँ क्लिक कर डाउनलोड करे और फिर रन करा दे |

4-OBO नि:शुल्क विज्ञापन योजना (अधिक जानकारी हेतु क्लिक करे)

5-"सुझाव एवं शिकायत" दर्ज करने हेतु यहाँ क्लिक करे |

6-Download OBO Android App Here

हिन्दी टाइप

New  देवनागरी (हिंदी) टाइप करने हेतु दो साधन...

साधन - 1

साधन - 2

Latest Activity

आशीष यादव replied to Admin's discussion अति आवश्यक सूचना : कृपया अवश्य अवगत हों .....
"जिस प्रकार हम लाइव तरही मुशायरा, चित्र से काव्य तक, obo लाइव महा उत्सव इत्यादि का आयोजन करते हैं…"
16 hours ago
सतविन्द्र कुमार राणा replied to Admin's discussion अति आवश्यक सूचना : कृपया अवश्य अवगत हों .....
"मैं लगभग 10 वर्ष पहले इस मंच से जुड़ा, बहुत कुछ सीखने को मिला। पारिवारिक व्यस्तता के कारण लगभग सोशल…"
16 hours ago
Tilak Raj Kapoor replied to Admin's discussion अति आवश्यक सूचना : कृपया अवश्य अवगत हों .....
"अगर हमारे समूह में कोई व्यवसायी हैं और उनके पास कॉरपोरेट सोशल रिस्पांसिबिलिटी फंड्स हों तो वे इसके…"
19 hours ago
Tilak Raj Kapoor replied to Admin's discussion अति आवश्यक सूचना : कृपया अवश्य अवगत हों .....
"सदस्यों में रुचि के अभाव ने इसे बंद करने के विचार का सूत्रपात किया है। ऐसा लगने लगा था कि मंच को…"
19 hours ago

सदस्य टीम प्रबंधन
Saurabh Pandey replied to Admin's discussion अति आवश्यक सूचना : कृपया अवश्य अवगत हों .....
" एक दुखद स्थिति बन रही है. लेकिन यह नई नहीं है. जब आत्मीयजनों और ओबीओ के समृद्ध सदस्यों की…"
19 hours ago
आशीष यादव replied to Admin's discussion अति आवश्यक सूचना : कृपया अवश्य अवगत हों .....
"मै मंच के प्रारंभिक दिनों से ही जुड़ा हुआ हूं। इसका बंद होना बहुत दुखद होगा। मुझे लगता है कि कुछ…"
23 hours ago
अजय गुप्ता 'अजेय replied to Admin's discussion अति आवश्यक सूचना : कृपया अवश्य अवगत हों .....
"आदरणीय गणेश जी, जितना कष्ट आपको यह सूचना देते हुए हो रहा है, उतना ही कष्ट हम सब को यह सुनने में हो…"
23 hours ago
Nilesh Shevgaonkar replied to Admin's discussion अति आवश्यक सूचना : कृपया अवश्य अवगत हों .....
"दु:खद "
23 hours ago
Admin posted a discussion

अति आवश्यक सूचना : कृपया अवश्य अवगत हों .....

प्रिय सदस्य गण / प्रबंधन समिति के सदस्य गण / ओ बी ओ के सभी पाठक एवं शुभचिंतक गणसादर प्रणामआप सभी…See More
yesterday
Sheikh Shahzad Usmani replied to Admin's discussion "ओबीओ लाइव लघुकथा गोष्ठी" अंक-133 (विषय मुक्त)
"हाड़-मॉंस स्ट्रेट (लघुकथा) : "नेता जी ये क्या हमें बदबूदार सॅंकरी गलियों वाली बस्ती के दौरे…"
Thursday
Sheikh Shahzad Usmani replied to Admin's discussion "ओबीओ लाइव लघुकथा गोष्ठी" अंक-133 (विषय मुक्त)
"सादर नमस्कार आदरणीय मंच। इंतज़ार है साथियों की सार्थक रचनाओं का, सहभागिता का। हम भी हैं कोशिश में।"
Thursday
Admin posted a discussion

"ओबीओ लाइव लघुकथा गोष्ठी" अंक-133 (विषय मुक्त)

आदरणीय साथियो,सादर नमन।."ओबीओ लाइव लघुकथा गोष्ठी" में आप सभी का हार्दिक स्वागत है।प्रस्तुत…See More
Tuesday

© 2026   Created by Admin.   Powered by

Badges  |  Report an Issue  |  Terms of Service