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लघु कथा - मजदूर

क्यों बे साले तेरी ये मजाल ... दो टके का मजदूर हो के मुझसे ज़बान लड़ाता है !

साहेब, गरियाते काहे हैं, मजदूर तो आपौ हैं  

क्या बकता है हरामखोsss

माई बाप ... पिछले हफ्ता एक मई का आपै तो कहे रहेन ,,, "हम सब मजदूर हैं"  

(मौलिक व अप्रकाशित) 

 

Added by वीनस केसरी on October 13, 2013 at 12:00am — 25 Comments


सदस्य कार्यकारिणी
बोलो किसको राम कहूँ मै ( गीत ) गिरिराज भंडारी

बोलो किसको राम कहूँ मै

*********************

सबके दिल मे रावण देखा, बोलो किसको राम कहूँ मै !

 

धृतराष्ट्र से मोह मे अन्धे

अपना अपना बचा रहे है

चौक चौक मे दुर्योधन बन

चौसर द्युत सा…

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Added by गिरिराज भंडारी on October 12, 2013 at 9:30pm — 38 Comments

ग़ज़ल (३) : मुझे लड़की बनाना !

मेरे अल्लाह ! तू लड़की बनाना

मुझे आता नहीं, चोटी बनाना//१

.

बनाना चाहता हूँ ‘आदमी’ को

बुरा है पर, ज़बरदस्ती बनाना//२

.

मुझे इक 'माँ' लगे है, देख लूं जो        

सनी मिट्टी लिए रोटी बनाना//३

.

न डूबेगा समंदर में, लहू के  

शिकारी सीख ले कश्ती बनाना//४

.

चला वो, तीर-भाले को पजाने

सिखाया था जिसे बस्ती बनाना//५

.

उजालों से मुहब्बत है, मुझे भी

सिखा दे माँ मुझे तख्ती…

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Added by रामनाथ 'शोधार्थी' on October 12, 2013 at 5:00pm — 33 Comments

गजल: याद आता है वो धड़कन का सुनाई देना//शकील जमशेदपुरी//

बह्र— 2122/2122/2122/22

थाम के कांधे को हाथों में कलाई देना

याद आता है वो धड़कन का सुनाई देना



प्यार ने जिसके बना डाला है काफिर मुझको

ऐ खुदा उनको जमाने की खुदाई देना



तरबियत आंसू की कुछ ऐसे किया है हमने

अब तो मुश्किल है मेरे गम का दिखाई देना



याद आती है जुदाई की घड़ी जब हमको

तो शुरू होता है चीखों का सुनाई देना

बिन तेरे खुश रहने का इल्जाम था सिर मेरे

काम आया मेरे अश्कों का सफाई देना



जब भी रूठा हूं…

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Added by शकील समर on October 12, 2013 at 3:30pm — 24 Comments

सहारा

सुकुमार के पास और कोई चारा नहीं बचा था, व्यापार में हुए 200 करोड़ रुपये के घाटे वह सहे तो कैसे, अब या तो वह शहर-देश छोड़ कर भाग जाए या फिर काल का ग्रास बन जाए| सुकुमार को कोई राह सुझाई नहीं दे रही थी| सारे बंगले, ज़मीनें, कारखाने बेच रख कर भी इतना बड़े नुकसान की पूर्ति नहीं कर सकता था| फिर भी वो पुरखों की कमाई हुई सारी दौलत और जायदाद का सौदा करने एक बहुत बड़े उद्योगपति मदन उपाध्याय के पास जा रहा था| मदन उपाध्याय देश के जाने-माने उद्योगपति थे, उनके कई सारे व्यवसायों में…

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Added by Dr. Chandresh Kumar Chhatlani on October 12, 2013 at 1:20am — 20 Comments

पराया धन (लघुकथा)

रमाकांत को पचास वर्ष की आयु में सात पुत्रियों के बाद पुत्र रत्न की प्राप्ती हुयी थी | आज बेटे की छठी बड़े धूमधाम से मनाई जा रही थी | मित्रों और रिश्तेदारों से घर भरा हुआ था कहीं तिल रखने की भी जगाह नही थी घर में | महिलाएँ बधाई गीत गा रहीं थीं | रमाकांत सपत्नी खुशी से फूले नही समा रहे थे | बेटियाँ चुपचाप ये सब देख रहीं थीं | सबसे छोटी बेटी जो मात्र तीन वर्ष की थी अपनी सबसे बड़ी बहन की गोद में बैठी थी | सभी बहने देख रहीं थी कि कैसे सभी उसके नन्हें से भाई को गोद में ले कर स्नेह दिखा रहे थे | माँ…

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Added by Meena Pathak on October 11, 2013 at 5:36pm — 24 Comments

-गीत

प्रेम में मगन मैं, होने लगा हूँ

जग से नाता तोड़ चला हूँ,मैं

जग से नाता तोड़ चला हूँ

प्रेम में मगन मैं, होने लगा हूँ

उनसे मिलन की, आस लिए

अंधरों बड़ी प्यास, लिए

दर बदर मैं, भटक रहा हूँ, हाँ

दर बदर मैं, भटक रहा हूँ

प्रेम में मगन मैं, होने लगा हूँ

आएगी कब वह, रात सुहानी

होंगी जब वो,मेरी दीवानी

रात और दिन यही, सोच रहा हूँ, मैं

रात और दिन यही, सोच रहा हूँ

प्रेम में मगन मैं, होने लगा हूँ

हर…

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Added by Devendra Pandey on October 11, 2013 at 3:30pm — 9 Comments

खुश्बू फ़िज़ा मे बिखरी

खुश्बू फ़िज़ा मे बिखरी 

=================

चेहरा तुम्हारा पढ़ लूँ

पल भर तो ठहर जाना 

नैनों की भाषा क्या है 

कुछ गुनगुना सुना-ना 

-------------------------

*आईना जरा मै देखूँ 

क्या मेरी छवि बसी है  

कोमल-कठोर बोल तू 

पलकें उठा , शरमा-ना

------------------------

आँखों मे आँखें डाले 

मै मूर्ति बन गया हूँ

पारस पारस सी हे री !

तू जान डाल जा ना

------------------------

खिलता गुलाब तू…

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Added by SURENDRA KUMAR SHUKLA BHRAMAR on October 11, 2013 at 12:00am — 22 Comments

राम! कहाँ हो!

कैकई के मोह को

पुष्ट करता

मंथरा की

कुटिल चाटुकारिता का पोषण

 

आसक्ति में कमजोर होते दशरथ

फिर विवश हैं

मर्यादा के निर्वासन को

 

बल के दंभ में आतुर

ताड़का नष्ट करती है

जीवन-तप  

सुरसा निगलना चाहती है

श्रम-साधना

एक बार फिर

 

धन-शक्ति के मद में चूर

रावण के सिर बढ़ते ही जा रहे हैं 

 

आसुरी प्रवृत्तियाँ

प्रजननशील हैं

 

समय हतप्रभ

धर्म ठगा सा…

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Added by बृजेश नीरज on October 10, 2013 at 11:30pm — 26 Comments

कविता : नोएडा

चिड़िया के दो बच्चों को

पंजों में दबाकर उड़ गया है एक बाज

 

उबलने लगी हैं सड़कें

वातानुकूलित बहुमंजिली इमारतें सो रही हैं

 

छोटी छोटी अधबनी इमारतें

गरीबी रेखा को मिटाने का स्वप्न देख रही हैं

पच्चीस मंजिल की एक अधबनी इमारत हँस रही है

 

कीचड़ भरी सड़क पर

कभी साइकिल हाथी को ओवरटेक करती है

कभी हाथी साइकिल को

 

साइकिल के टायर पर खून का निशान है

जनता और प्रशासन ये मानने को तैयार नहीं हैं

कि…

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Added by धर्मेन्द्र कुमार सिंह on October 10, 2013 at 7:43pm — 25 Comments

नया बने सम्बन्ध, पकाओ धीमा धीमा-

सीमांकन दूजा करे, मर्यादा सिखलाय |
पहला परवश होय तब, हृदय देह अकुलाय |


हृदय देह अकुलाय, लगें रिश्ते बेमानी |
रविकर पानीदार, उतर जाता पर पानी |


यह परिणय सम्बन्ध, पके नित धीमा धीमा |
करिए स्वत: प्रबन्ध, अन्य क्यूँ पारे सीमा -

मौलिक / अप्रकाशित
(दुर्गा-पूजा / विजयादशमी की मंगल-कामनाएं )

Added by रविकर on October 10, 2013 at 4:00pm — 11 Comments

गजल

2 1 2 2  2 1 2 2   2 2 1 2 

तेरी मैं परछाई , तुम हो मेरी पिया

अब कहीं लागे नहीं तुम बिन यह जिया/

आसमाँ से है उँचा,सागर से गहन

ऐसा सच्चा प्यार हमने तुमको किया/

चाँद तुम मेरे अगर, मैं हूँ चाँदनी

ऐसा है अपना मिलन ओ मेरे पिया/

आइना तुम हो अगर मैं तस्वीर हूँ

अक्स तुझमें मेरा ही है दिखता पिया

तुम अगर दीया हो तो 'बाती' हूँ तेरी

हैं अधूरे एक दूजे बिन ओ पिया/

मैं समाई सिन्धु में जैसे…

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Added by Sarita Bhatia on October 10, 2013 at 11:30am — 9 Comments

दहकता सूरज भी /अंतिम छोर नहीं है.... ब्रह्माण्ड का ....

एक आसमान को छूता

पहाड़ सा / दरक जाता है

मेरे भीतर कहीं ..

घाटियों में भारी भरकम चट्टानें

पलक झपकते

मेरे संपूर्ण अस्तित्व को

कुचल कर

गोफन से छूटे / पत्थर की तरह

गूँज जाती हैं.

संज्ञाहीन / संवेदनाहीन

मेरे कंठ को चीर कर

निकलती मेरी चीखें

मेरे खुद के कान / सुन नहीं पाते

मैं देखता हूँ

मेरे भीतर खौलता हुआ लावा

मेरे खून को / जमा देता है

जब तुम न्याय के सिंहासन पर बैठ कर

सच की गर्दन मरोड़कर

देखते देखते निगल…

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Added by dr lalit mohan pant on October 10, 2013 at 11:00am — 16 Comments

ग़ज़ल - आज तू दर्द को ज़जा कहना । - पूनम शुक्ला

2122 1212 22

खत्म होती नहीं सजा कहना

बेरहम क्यों हुई रज़ा कहना



आशियाना सजा लिया हमने

तीरगी घेरती वज़ा कहना



आज फिर याद खूब आती है

मोतबर दर्द को मज़ा कहना



चाह कर भी सजा नहीं होगी

आज तू दर्द को ज़जा कहना



जान पर खेल कर कभी अपनी

जिन्दगी बाँटना क़जा़ कहना ।



दिन ब दिन बदलियाँ हटेंगी भी

जिन्दगी को न बेमज़ा कहना



कज़ा- ईश्वरीय आदेश

रज़ा - इच्छा

ज़जा - फल

मोतबर=जिसका एतबार किया… Continue

Added by Poonam Shukla on October 10, 2013 at 10:34am — 12 Comments

गीत (जब से अपने जुदा हो गए)

गीत (जब से अपने जुदा हो गए)

.

जब से अपने जुदा हो गए, ख्वाहिशें सब फ़ना हो गईं,

मौत भी जैसे नाराज़ है, ज़िंदगी बेवफा हो गई।

 

दर्द के कुछ थपेड़ों ने आकर के फिर,…

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Added by Sushil.Joshi on October 10, 2013 at 6:00am — 16 Comments

!!! सारांश !!!

!!! सारांश !!!

बह्र - 2 2 2



कर्म जले।

आंख मले।।



धर्म कहां?

पाप पले।



नर्म गजल,

कण्ठ फले।



राह तेरी ,

रोज छले।



हिम्मत को,

दाद भले।



गर्म हवा,

नीम तले।



जीवन क्या?

हाड़ गले।

आफत में,

बह्र खले।



प्रीत करों,

बन पगले।



विव्हल मन,

शब्द टले।



दृषिट मिली,

सांझ ढले।



गर मुफलिस,

बात…

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Added by केवल प्रसाद 'सत्यम' on October 9, 2013 at 8:00pm — 34 Comments

आशीर्वाद ( लघु कथा )

आशीर्वाद !!

 

वह कोई नब्बे के आस पास वृदधा रही होगी जो सामान सहित अपने ही घर के बाहर बैठी थी न जाने क्या अँड बंड बड़बड़ा रही थी । लोग सहनुभूति से देखते और और चल देते किसी ने हिम्मत भी की उससे जानने की तो वह ठीक ठीक नहीं बता पा रही थी । पता नहीं क्रोध की अधिकता थी या ममता और दुःख का मिश्रित भाव था जो शब्द न निकल रहे थे । बेटा कुछ दिनों से बाहर गया हुआ था और घर पर बहू अकेली…

Continue

Added by annapurna bajpai on October 9, 2013 at 7:30pm — 26 Comments

गज़ल -साँस लेने में दखल देता है

2 1 2 2  1 1 2 2   2 2

वो मेरी रूह मसल देता है
साँस लेने में दखल देता है

जाने आदत भी लगी क्या उसको
खुद की ही बात बदल देता है

राज़ की बात उसे मत कहना
बाद में राज़ उगल देता है

मैं  उसे रोज़ दुवायें देती
वो मुझे रोज़ अज़ल देता है


उसको मालूम नहीं, गम में भी
वो मुझे रोज़ ग़ज़ल देता है

संजू शब्दिता मौलिक व अप्रकाशित

Added by sanju shabdita on October 9, 2013 at 4:59pm — 24 Comments

ग़ज़ल : बँधी भैंसें तबेले में

ग़ज़ल
बह्र : हज़ज़ मुरब्बा सालिम
1222 , 1222 ,

बँधी भैंसें तबेले में,
करें बातें अकेले में,

अजब इन्सान है देखो,

फँसा रहता झमेले में,

मिले जो इनमें कड़वाहट,
नहीं मिलती करेले में,

हुनर जो लेरुओं में है,
नहीं इंसा गदेले में,

भले हम जानवर होकर,
यहाँ आदम के मेले में,

गुरु तो हैं गुरु लेकिन,
भरा है ज्ञान चेले में..

(मौलिक एवं अप्रकाशित)

Added by अरुन 'अनन्त' on October 9, 2013 at 4:30pm — 36 Comments


सदस्य कार्यकारिणी
“गजरा” (चुहल) (लघु कथा )

"अरे गप्पू ये तो अपने ही साहब हैं चल चल जल्दी.."

जैसे ही ट्राफिक लाईट पर गाड़ी रुकी, महज दस साल का टिंकू अपने छोटे भाई गप्पू के साथ दौड़ता हुआ कार की दाहिनी ओर आकर बोला,

“अरे साब आज आप इतनी जल्दी ?"

"रावण जलता देखना है ", साहब ने जल्दी से उत्तर दिया |

"अच्छा.. साहब गजरा.. ",

टिंकू के हाथ में गजरा देखते ही बगल में बैठी मेमसाहब बोली, "अरे ले लो,  कितने का है ?"

"चालीस रूपये का..", टिंकू ने तुरंत जबाब दिया ।



सुनते ही साहब तुनक…

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Added by rajesh kumari on October 9, 2013 at 11:00am — 51 Comments

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