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ग़ज़ल - आज तू दर्द को ज़जा कहना । - पूनम शुक्ला

2122 1212 22

खत्म होती नहीं सजा कहना

बेरहम क्यों हुई रज़ा कहना



आशियाना सजा लिया हमने

तीरगी घेरती वज़ा कहना



आज फिर याद खूब आती है

मोतबर दर्द को मज़ा कहना



चाह कर भी सजा नहीं होगी

आज तू दर्द को ज़जा कहना



जान पर खेल कर कभी अपनी

जिन्दगी बाँटना क़जा़ कहना ।



दिन ब दिन बदलियाँ हटेंगी भी

जिन्दगी को न बेमज़ा कहना



कज़ा- ईश्वरीय आदेश

रज़ा - इच्छा

ज़जा - फल

मोतबर=जिसका एतबार किया… Continue

Added by Poonam Shukla on October 10, 2013 at 10:34am — 12 Comments

गीत (जब से अपने जुदा हो गए)

गीत (जब से अपने जुदा हो गए)

.

जब से अपने जुदा हो गए, ख्वाहिशें सब फ़ना हो गईं,

मौत भी जैसे नाराज़ है, ज़िंदगी बेवफा हो गई।

 

दर्द के कुछ थपेड़ों ने आकर के फिर,…

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Added by Sushil.Joshi on October 10, 2013 at 6:00am — 16 Comments

!!! सारांश !!!

!!! सारांश !!!

बह्र - 2 2 2



कर्म जले।

आंख मले।।



धर्म कहां?

पाप पले।



नर्म गजल,

कण्ठ फले।



राह तेरी ,

रोज छले।



हिम्मत को,

दाद भले।



गर्म हवा,

नीम तले।



जीवन क्या?

हाड़ गले।

आफत में,

बह्र खले।



प्रीत करों,

बन पगले।



विव्हल मन,

शब्द टले।



दृषिट मिली,

सांझ ढले।



गर मुफलिस,

बात…

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Added by केवल प्रसाद 'सत्यम' on October 9, 2013 at 8:00pm — 34 Comments

आशीर्वाद ( लघु कथा )

आशीर्वाद !!

 

वह कोई नब्बे के आस पास वृदधा रही होगी जो सामान सहित अपने ही घर के बाहर बैठी थी न जाने क्या अँड बंड बड़बड़ा रही थी । लोग सहनुभूति से देखते और और चल देते किसी ने हिम्मत भी की उससे जानने की तो वह ठीक ठीक नहीं बता पा रही थी । पता नहीं क्रोध की अधिकता थी या ममता और दुःख का मिश्रित भाव था जो शब्द न निकल रहे थे । बेटा कुछ दिनों से बाहर गया हुआ था और घर पर बहू अकेली…

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Added by annapurna bajpai on October 9, 2013 at 7:30pm — 26 Comments

गज़ल -साँस लेने में दखल देता है

2 1 2 2  1 1 2 2   2 2

वो मेरी रूह मसल देता है
साँस लेने में दखल देता है

जाने आदत भी लगी क्या उसको
खुद की ही बात बदल देता है

राज़ की बात उसे मत कहना
बाद में राज़ उगल देता है

मैं  उसे रोज़ दुवायें देती
वो मुझे रोज़ अज़ल देता है


उसको मालूम नहीं, गम में भी
वो मुझे रोज़ ग़ज़ल देता है

संजू शब्दिता मौलिक व अप्रकाशित

Added by sanju shabdita on October 9, 2013 at 4:59pm — 24 Comments

ग़ज़ल : बँधी भैंसें तबेले में

ग़ज़ल
बह्र : हज़ज़ मुरब्बा सालिम
1222 , 1222 ,

बँधी भैंसें तबेले में,
करें बातें अकेले में,

अजब इन्सान है देखो,

फँसा रहता झमेले में,

मिले जो इनमें कड़वाहट,
नहीं मिलती करेले में,

हुनर जो लेरुओं में है,
नहीं इंसा गदेले में,

भले हम जानवर होकर,
यहाँ आदम के मेले में,

गुरु तो हैं गुरु लेकिन,
भरा है ज्ञान चेले में..

(मौलिक एवं अप्रकाशित)

Added by अरुन 'अनन्त' on October 9, 2013 at 4:30pm — 36 Comments


सदस्य कार्यकारिणी
“गजरा” (चुहल) (लघु कथा )

"अरे गप्पू ये तो अपने ही साहब हैं चल चल जल्दी.."

जैसे ही ट्राफिक लाईट पर गाड़ी रुकी, महज दस साल का टिंकू अपने छोटे भाई गप्पू के साथ दौड़ता हुआ कार की दाहिनी ओर आकर बोला,

“अरे साब आज आप इतनी जल्दी ?"

"रावण जलता देखना है ", साहब ने जल्दी से उत्तर दिया |

"अच्छा.. साहब गजरा.. ",

टिंकू के हाथ में गजरा देखते ही बगल में बैठी मेमसाहब बोली, "अरे ले लो,  कितने का है ?"

"चालीस रूपये का..", टिंकू ने तुरंत जबाब दिया ।



सुनते ही साहब तुनक…

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Added by rajesh kumari on October 9, 2013 at 11:00am — 51 Comments

बुत शहर में बोलते इंसान भी तो हैं!//गज़ल//कल्पना रामानी

2122212221222

 

ज़िन्दगी जीने के कुछ, सामान भी तो हैं!

बुत शहर में बोलते, इंसान भी तो हैं!

 

भीड़ से माना कि घर, सिकुड़े बने पिंजड़े,

साथ में फैले हुए, उद्यान भी तो हैं!

 

और अधिक के लोभ में, नाता घरों से तोड़,

मूढ़ गाँवों ने किए, प्रस्थान भी तो हैं।

 

गाँव ही आकर अकारण हैं मचाते भीड़

यूँ शहर में बढ़ गए व्यवधान भी तो हैं!

 

क्यों नहीं हक माँगते, शासन से आगे बढ़?

जानकर ये बन रहे, नादान भी तो…

Continue

Added by कल्पना रामानी on October 9, 2013 at 10:30am — 33 Comments

बचपन तब का और था, अब का बचपन और

(1)

बचपन तब का और था, अब का बचपन और |

दादी की गोदी मिली, नानी हाथों कौर |



नानी हाथों कौर, दौर वह मस्ती वाला |

लेकिन बचपन आज, निकाले स्वयं दिवाला |



आया की है गोद, भोग पैकट में छप्पन |

कंप्यूटर के गेम, कैद में बीते बचपन ||

(2)

संशोधित रूप-

तब का बचपन और था, अब का बचपन और |

तब दादी गोदी मिली, नानी से दो कौर |

नानी से दो कौर, दौर वह मस्ती वाला |

लेकिन बचपन आज, महज दिखता दो साला…

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Added by रविकर on October 9, 2013 at 9:00am — 15 Comments

कुण्डलिया (हाय री किस्मत्)

हाय री किस्मत्

देखो सारे कर रहे, दूजा इन्क्रीमैंट,

अपना पिछले वर्ष का, बाकी है पेमैंट।

बाकी है पेमैंट, करो मत जल्दी-जल्दी,

कई ‘अटल’ हैं हाय, चढ़ानी जिनको हल्दी।

कह ‘जोशी’ कविराय, सभी किस्मत के…

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Added by Sushil.Joshi on October 9, 2013 at 6:43am — 24 Comments

दिल्ली

एक शहर

अत्यधिक आधुनिक टापुओ का है

जहाँ गरीवी बहुत बौनी दिखती है

हर गली में अमीरी गुलजार है

वहाँ गरीवो से अप्रत्यासित घ्रणा

अमीरों के अमीरी से बेशुमार प्यार है

वह "ग़ालिब "का शहर प्रेम से कितनी दूर हो गया है

हैवानियत ,दरिन्गीं ,लफ्फाजियो  के लिए मशहूर हो गया है

इस शहर में रहते है भारत के कर्णधार

जिनका प्रिय पेशा है भ्रस्टाचार

ओ किसी भी काम में अपने को शिद्ध पुरुष मानते है

तोप ,प्याज ,अनाज से लेकर चारा तक खाने में माहिर है …

Continue

Added by दिलीप कुमार तिवारी on October 8, 2013 at 11:30pm — 13 Comments

थेथर

जुग की मांग 

समय की डिमांड 

बात मेरी मान 

बन जाएँ थेथर श्रीमान....



सलीकेदार लोगों को 

जीने नही देगा समाज 

भले से अच्छा था विगत 

लेकिन बहुत क्रूर है आज 



जीने की ये कला 

जिसे सीखने में सबका भला 

वरना रह जाओगे तरसते 

आपका हिस्सा ये थेथर 

झटक लेंगे हँसते-हस्ते...



हम जिस समय में जी रहे हैं 

उसमे बदतमीज़,…

Continue

Added by anwar suhail on October 8, 2013 at 10:05pm — 8 Comments


सदस्य कार्यकारिणी
" एक इशारा अधूरा सा "-- अतुकांत ( गिरिराज भंडारी )

एक इशारा अधूरा सा

********************

छू कर

पहन कर

चख कर

देख लेते हैं

कभी खरीदते हैं

कभी यूँ ही लौट आते हैं

सब…

Continue

Added by गिरिराज भंडारी on October 8, 2013 at 8:30pm — 30 Comments

बेटी (कुंड़ली)

बेटी सुहाती मोहे, जस हो चंदन भाल ।
पाकर बेटी तुझे मै, हो गया हूं निहाल ।।
हो गया हूं निहाल, परी सी पंख लगाऊ ।
शिक्षा व संस्कार दे, सारा गगन घूमाऊ ।
तू करना सब काम, जग में हो मेरा नाम।
दुनिया कहे ऐसा, बेटा बन गया बेटी ।।

.............................................
मौलिक अप्रकाशित

Added by रमेश कुमार चौहान on October 8, 2013 at 8:05pm — 7 Comments

हाइकू

हाइकू 
******
भूख मरी है 
दो चित्र जीवन के 
भुखमरी है 
-----
पेपर पढ़ा 
भूखा उस पे सोया 
पेपर बिछा 
---------
धरा पे भेज 
भरे जीवन - रंग 
वो रंगरेज 
--------
भजन कर 
सर्व शक्तिमान का 
नमन कर 
------
अविनाश बागडे 
---------------------
(मौलिक/अप्रकाशित…
Continue

Added by AVINASH S BAGDE on October 8, 2013 at 7:09pm — 13 Comments

माँ शारदा !!! ( वंदना )

हे! कमल पर बैठने वाली सुंदरी भगवती सरस्वती को मेरा प्रणाम । तुम सब दिशाओं से पुजजीभूत हो । अपनी देह लता की आभा से ही क्षीर समुद्र को अपना दास बनाने वाली , मंद मुस्कान से शरद ऋतु के चंद्रमा को तिरस्कृत करने वाली............  

    माँ शारदा !!!

मार्ग प्रशस्त करो माँ अम्ब जगदम्ब हे !

आपकी शरण  हम है माँ अम्ब जगदम्ब हे ! ........

श्वेत कमल विराजती वीणा कर धारती हे !

श्वेत हंस वाहिनी माँ श्वेताम्बर धारणी हे !

कमल सदृश नयन माँ भाग्य अनूपवती हे…

Continue

Added by annapurna bajpai on October 8, 2013 at 6:00pm — 14 Comments

ये दिल मांगत मोर-

दुर्मिल सवैया 

पुरबी उर-*उंचन खोल गई, खुट खाट खड़ी मन खिन्न हुआ |

कुछ मत्कुण मच्छर काट रहे तन रेंगत जूँ इक कान छुआ |

भडकावत रेंग गया जब ये दिल मांगत मोर सदैव मुआ  |

फिर नारि सुलोचन ब्याह लियो शुभचिंतक मांगत किन्तु दुआ  |

उंचन=खटिया कसने वाली रस्सी , उरदावन 

मत्कुण=खटमल 

अप्रकाशित / मौलिक 

Added by रविकर on October 8, 2013 at 4:00pm — 6 Comments

अथ श्री मुर्गा-पुराण,,,

अथ श्री मुर्गा-पुराण,,,

================

हमारॆ शिक्षा काल मॆं छात्रॊं की बड़ी व्यथा थी,

उन दिनॊं स्कूलॊं मॆं मुर्गा बनानॆ की प्रथा थी,

अध्यापक महॊदय कक्षा मॆं शान सॆ आतॆ थॆ,

और तुरंत छात्रॊं पर प्रश्नॊं कॆ तीर चलातॆ…

Continue

Added by कवि - राज बुन्दॆली on October 8, 2013 at 3:00pm — 41 Comments

चोका..................

चाँद जो आया
रात के आँगन में
तारे चमके
चांदनी की गोद में
ठंडी सी हवा
मन को लहराए
ख्वाबो  के साये
नींदों को हैं जगाये
सोच रही हूँ
ख़ामोशी इतनी क्यों
मीठी सी लागे
जो  गीत धरा गाये
रात गुदगुदाए .........सविता अगरवाल 

Added by savita agarwal on October 8, 2013 at 2:21pm — 9 Comments

मजाक नहीं है

मैं शाम

ढलने का इंतज़ार करता हूँ

सूरज !!!

जिसकी तपिश से

घबराया सा

झुलसा सा

मुरझाया सा

खींच लेना चाहता हूँ

रात की विशाल

छायादार चादर

जिसमें जड़े हैं

चाँद तारे

और बिखरे से

सफ़ेद रुई के फोहों से

मखमली दूधिया बादल

थकान मिटाने

को होता है

सन्नाटों का गीत

.........................................

सन्नाटों का गीत

अद्भुत है अद्वितीय है

इसकी लय…

Continue

Added by SANDEEP KUMAR PATEL on October 8, 2013 at 1:30pm — 14 Comments

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