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अवसरवादी  - लघुकथा –

अवसरवादी  - लघुकथा –

आज शहर के लोक प्रिय नेताजी का जन्मदिन  बड़े जोर शोर से मनाया जा रहा था। इस बार इतने सालों बाद बहुत खोज बीन के बाद ये पता चला कि नेताजी की असली जन्म तिथि दो अक्टूबर ही है।किसी को कोई आश्चर्य भी नहीं हुआ क्योंकि नेताजी जिस जमाने में पैदा हुए थे उस वक्त स्कूल में दाखिले के समय कोई जन्म तिथि का प्रमाण पत्र माँगता भी नहीं था।बनवाने का रिवाज़ भी नहीं था।मुँह जुबानी जो भी तारीख बोल दी वही लिख दी जाती थी।

कैसा विचित्र संयोग था कि  नेता  जी का जन्म दिन भी  बापू जी और…

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Added by TEJ VEER SINGH on October 2, 2020 at 7:25pm — 4 Comments

बापू की लाठी से ....

 
बापू की लाठी से ....
 
हार गई दम्भी बन्दूक
बापू की लाठी से…
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Added by Sushil Sarna on October 2, 2020 at 1:57pm — 6 Comments

हक़ीक़त का हमेशा सामना करने से डरते हैं (१२४ )

++ग़ज़ल++( 1222 1222 1222 1222 )
हक़ीक़त का हमेशा सामना करने से डरते हैं
मुहब्बत की वो पहले इब्तिदा करने से डरते हैं
मुहब्बत की उन्हें हासिल नहीं होती कभी मंज़िल
जहाँ में जो भी इज़हार-ए-वफ़ा करने से डरते हैं
न उन की कोई सुनता है न अपनी बात कह पाते
जो अक्सर लोग अर्ज़-ए-मुद्दआ करने से डरते हैं
कोई भी इल्म हो काबू में उनके आ नहीं…
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Added by गिरधारी सिंह गहलोत 'तुरंत ' on October 1, 2020 at 1:00pm — 2 Comments

है जिधर मेरी नज़र उसकी नज़र जाने तो दो

2122 2122 2122 212

.

है जिधर मेरी नज़र उसकी नज़र जाने तो दो

कायनात ए इश्क़ को हर सू बिखर जाने तो दो

.

क्या हमें हासिल हुआ इस ज़िन्दगी से दोस्तो

सब बताएंगे मगर जाँ से गुज़र जाने तो दो

.

हम अदालत में करेंगे पैरवी हर झूठ की

शर्म आँखों की ज़रा सी और मर जाने तो दो

.

तर्के निस्बत का भी मातम तुम मना लेना मगर

ताज दिल का टूट कर पहले बिखर जाने तो दो

.

आँख से बहता समंदर बाँध कर रखना ज़रा

कतरा कतरा…

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Added by Rachna Bhatia on September 30, 2020 at 10:30pm — 4 Comments

ग़ज़ल नूर की- तुम्हें लगता है रस्ता जानता हूँ

तुम्हें लगता है रस्ता जानता हूँ

मगर मैं सिर्फ चलना जानता हूँ.

.

तेरे हर मूड को परखा है मैंने

तुझे तुझ से ज़ियादा जानता हूँ.

.

गले मिलकर वो ख़ंजर घोंप देगा

ज़माने का इरादा जानता हूँ.

.

मैं उतरा अपने ही दिल में तो पाया  

अभी ख़ुद को ज़रा सा जानता हूँ.

.

बहा लायी है सदियों की रवानी

मगर अपना किनारा जानता हूँ.

.

बता कुछ भी कभी माँगा है तुझ से?

मैं अपना घर चलाना जानता हूँ.      

.

निलेश…

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Added by Nilesh Shevgaonkar on September 30, 2020 at 1:46pm — 8 Comments

सूखी हुई है आज मगर इक नदी है तू...( ग़ज़ल :- सालिक गणवीर)

221 2121 1221 212

सूखी हुई है आज मगर इक नदी है तू

मैं जानता हूँ रेत के नीचे दबी है तू

मरना है एक दिन ये नई बात भी नहीं

जी लूँ ऐ ज़िंदगी तुझे जितनी बची है तू

आँखों को चुभ रही है अभी तेरी रौशनी

काँटा समझ रहा था मगर फुलझड़ी है तू

ऐ मौत कोई दूसरा दरवाजा खटखटा

आवाज़ मेरे दर पे ही क्यों दे रही है तू

हर बार ये लगा है तुझे जानता हूँ मैं

महसूस भी हुआ है कभी अजनबी है तू

आज़ाद हो रही…

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Added by सालिक गणवीर on September 28, 2020 at 10:00pm — 18 Comments

फ़ितरत से हूँ मैं सब से जुदागाना समझिये (123)

( 221 1221 1221 122 )
फ़ितरत से हूँ मैं सब से जुदागाना समझिये…
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Added by गिरधारी सिंह गहलोत 'तुरंत ' on September 27, 2020 at 10:00pm — 8 Comments

ग़ज़ल नूर की - तर्क-ए-वफ़ा का जब कभी इल्ज़ाम आएगा

तर्क-ए-वफ़ा का जब कभी इल्ज़ाम आएगा

हर बार मुझ से पहले तेरा नाम आएगा.

.

अच्छा हुआ जो टूट गया दिल तेरे लिए

वैसे भी तय नहीं था कि किस काम आएगा.

.

अब रात घिर चुकी है इसे लौट जाने दे

यादों का क़ाफ़िला तो हर इक शाम आएगा.`

`

उर्दू की बज़्म में कभी हिन्दी चला के देख

तेरे कलाम में नया आयाम आएगा.

.

उस सुब’ह धमनियों में ठहर जाएगा ख़िराम  

जिस भोर मेरे नाम का पैग़ाम…

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Added by Nilesh Shevgaonkar on September 27, 2020 at 12:00pm — 10 Comments

ग़ज़ल (वो नज़र जो क़यामत की उठने लगी)

फ़ाइलुन -फ़ाइलुन - फ़ाइलुन -फ़ाइलुन

2 1 2 - 2 1 2 - 2 1 2 - 2 1 2



वो नज़र जो क़यामत की उठने लगी 

रोज़ मुझपे क़हर बनके गिरने लगी

रोज़ उठने लगी लगी देखो काली घटा

तर-बतर ये ज़मीं रोज़ रहने लगी

जबसे तकिया उन्होंने किया हाथ पर

हमको ख़ुद से महब्बत सी रहने लगी

एक ख़ुशबू जिगर में गई है उतर

साँस लेता हूँ जब भी महकने…

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Added by अमीरुद्दीन 'अमीर' बाग़पतवी on September 27, 2020 at 10:31am — 40 Comments

लेडी डॉक्टर(लघुकथा)

माधवी पटना की लेडी डॉक्टर से मिलकर बाहर आते ही पति से बोली,' यह ओवरी वाला क्या चक्कर था मधुप?'
' बकवास ही समझो '
' वाकई दोनों ओवरी बराबर आकार की होती है?छपरा वाली डॉक्टरनी बोली थी।'
' नहीं होती।मैंने अपने दोस्त डॉक्टरों से सलाह की थी।' पति बोला।
' फिर वह मुई ऑपरेशन किस चीज का करती?'
' पता नहीं। डोनेशन वाले डॉक्टर - डॉक्टरनी भी तो होते हैं भई।'
' ऐसा?'
'और क्या? यहां सब चलता है।' पति हिकारत भरे लहजे में बोला।
' मौलिक व अप्रकाशित'

Added by Manan Kumar singh on September 26, 2020 at 1:20pm — 1 Comment

अजीब था यह अनमोल नाता ... अमृता प्रीतम जी

अजीब था यह अनमोल नाता ... अमृता प्रीतम जी

 

कई दशक पहले मैं जब भी प्रिय अमृता प्रीतम जी के उपन्यास पढ़ता था, पुस्तक को रखते एक कसक-सी होती थी, यह इसलिए कि एक बार आरम्भ करके उनकी पुसत्क को रखना कठिन होता था। आज भी ऐसा ही होता है। जब से एक प्रिय मित्र पिंकी केशवानी जी ने अमृता जी की पुस्तक “मन मंथन की गाथा” मुझको भेंट में भेजी, जब भी ज़रा-सा अवकाश मिलता है, यह पुस्तक मुझको झट पास बुलाती है।

मित्र पिंकी ने पुस्तक में लिखा, “एक छोटी-सी भेंट,…

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Added by vijay nikore on September 25, 2020 at 10:51pm — 1 Comment

अपने रूप पर ऐ चाँद तू ........

अपने रूप पर ऐ चाँद तू ........

अपने रूप पर ऐ चाँद तू

क्यों इतना इतराया है

तू तो मेरे चाँद का

बस हल्का सा साया है

केसरिया है रूप तेरा

केसरिया परछाईं है

कौमुदी ने पानी में

प्रीत की पेंग बढ़ाई है

विभावरी का स्वप्न है तू

चांदनी का प्यारा है

पानी में तेरा अक्स

बड़ा हसीँ छलावा है

अक्स नहीं यकीं है वो

इन बाहों को जो भाया है

ख़्वाब है मेरी नींद का वो

हकीकत में हमसाया है

खुदा ने अपने हाथों से

मेरे चाँद को बनाया…

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Added by Sushil Sarna on September 25, 2020 at 5:04pm — No Comments

हमने बाजी मार ली - लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर'

२१२२/२१२२/२१२२/२१२



खेत मन का एक  जोता  हमने बाजी मार ली

तन का सौदा रोक डाला हमने बाजी मार ली।१।

**

रेत पर लिख करके गुस्सा हमने बाजी मार ली

पत्थरों पर  प्यार  साधा  हमने  बाजी मार ली।२।

**

हर नदी की हर लहर पर पार जाना लिख दिया

मोड़ डाला रुख हवा  का  हमने बाजी मार ली।३।

**

छोड़  आये  चाँद  आधा  यूँ   सितारों के लिए

किन्तु  पहलू  में  है  पूरा  हमने  बाजी मार…

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Added by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on September 24, 2020 at 6:30am — No Comments

शूल सम यूँ खुरदरे ही रह गये जीवन में सच-लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर'

२१२२/२१२२/२१२२/२१२



आँख से काजल चुराने का न कौशल हम में था

दूर रह कर  याद आने  का न कौशल हम में था।१।

**

नाम पेड़ों पर तो हम भी लिख ही लेते थे मगर

पुस्तकों में खत छिपाने का न कौशल हम में था।२।

**

दोस्ती  सूरज  सितारों  से   तो  अपनी थी गहन 

चाँद को लेकिन रिझाने का न कौशल हम में था।३।

**

पा  गये  विस्तार …

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Added by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on September 23, 2020 at 7:00am — 12 Comments

ग़ज़ल (मैं जो कारवाँ से बिछड़ गया)

212-122-1212

मैं जो कारवाँ से बिछड़ गया

यूँ तुम्हारे दर पे ही पड़ गया

 

दिल गया ख़ुशी की तलाश में 

साथ उनके हम से बिछड़ गया 

ये गरेबाँ गुल-रू की चाह में 

क्या कहूँ के फिर से उधड़ गया 

वो दुआ थी तेरी या बद् दुआ 

ये नसीब अपना बिगड़ गया 

कोई ज़िन्दगी तो सँवर गई

ग़म नहीं मुझे मैं उजड़ गया

वो तुम्हारी आँखों में चुभ रहा

लो हमारा ख़ेमा उखड़ गया

 

मैं झुका…

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Added by अमीरुद्दीन 'अमीर' बाग़पतवी on September 20, 2020 at 6:30pm — 10 Comments

धुआँ उठता नहीं कुछ जल रहा है..( ग़ज़ल :- सालिक गणवीर)

1222 1222 122

धुआँ उठता नहीं कुछ जल रहा है

मुझे वो आग बन कर छल रहा है

पिछड़ जाउंँगा मैं ठहरा कहीं गर

ज़माना मुझसे आगे चल रहा है

बहुत ख़ुश था मैं तन्हाई में पर अब

ये सूनापन मुुझे क्यों खल रहा है

अंधेरे में उसे दिखता मैं कैसे

मगर फिर भी वो आँखें मल रहा है

बड़ा होकर दुखों में छाँव देगा

जो ये पौधा ख़ुशी का पल रहा है

निगल जाएगा मुझको भी अँधेरा

ये…

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Added by सालिक गणवीर on September 20, 2020 at 1:30pm — 7 Comments

ग़ज़ल (और कितनी देर तक सोयेंगें हम)

पल सुनहरी सुबह के खोयेंगें हम

और कितनी देर तक सोयेंगें हम।

रात काली तो कभी की जा चुकी

अब अँधेरा कब तलक ढोयेंगे हम।

जुगनुओं जैसा चमकना सीख लें 

रोशनी के बीज फिर बोयेंगे…

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Added by अजय गुप्ता 'अजेय on September 19, 2020 at 11:20pm — 16 Comments

कश्ती में है मगर नहीं पतवार हाथ में- गजल

 221 2121 1221  212

कश्ती में है मगर नहीं पतवार हाथ में. 

होता कहाँ किसी के ये संसार हाथ में.

कर लो भला गरीब का कुर्सी पे बैठकर,

तुमको मिला है भाग्य से अधिकार हाथ में. 

ईश्वर की चाह है तो अकेले भजन…

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Added by बसंत कुमार शर्मा on September 19, 2020 at 6:00pm — No Comments

दिल्लगी

जिस इश्क में दिल्लगी नही होती 

उस इश्क की तो जानू  उमर भी नही होती

सिलसिला साँसों का जिस रोज़ थम गया 

रौशनी गई दिये से और प्यार मर गया

धड़कन में अगर खून की लाली नही होती 

उस इश्क की तो जानू  उमर भी नही होती

दिखावा प्यार का तुम खूब कर चुके 

दे दे के तोहफे प्यार में मिरा घर भर चुके

सेंकडो तो आने जाने के बहाने कर चुके 

जोश था जो मिलन का वो आज मर चुका

जिस इश्क में दिल्लगी नही…

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Added by DR ARUN KUMAR SHASTRI on September 19, 2020 at 3:00am — 2 Comments

क्षणिकाएं : जिन्दगी पर

क्षणिकाएं : जिन्दगी पर

जिंदगी

जीती रही

मिट जाने के बाद भी

जिंदगी के लिए

कैद में

निर्जीव फ्रेम के

,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,

लगा देती है

जिन्दगी

आंखों की चौखट पर

सांकल

हर प्रतीक्षा की

सांसो से

अनबन

होने के बाद

,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,

हो गया

गिलास खाली

पानी

बिखर जाने के बाद

थी

फिर भी उसमें

शेष

थोड़ी सी

नमी

अनदेखी

जिन्दगी…

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Added by Sushil Sarna on September 17, 2020 at 8:52pm — 6 Comments

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"प्रिय अशोक कुमार जी,रचना को मान देने के लिए हार्दिक आभार। -- विजय"
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"प्रिय सौरभ भाई, नमस्ते।आपका यह नवगीत अनोल्हा है। कई बार पढ़ा, निहित भावना को मन में गहरे उतारा।…"
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"आ. भाई सौरभ जी सादर अभिवादन। गजल पर उपस्थिति और विस्तृत टिप्पणी से मार्गदर्शन के लिए हार्दिक आभार।…"
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