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ग़म ज़िंदगी में देख के रोया नहीं कभी

ग़म ज़िंदगी में देख के रोया नहीं कभी।

अश्क़ों से अपने गाल भिगोया नही कभी॥

 

हर सिम्त है धुआं यहाँ हर सिम्त आग है,

इस खौफ़ से ही चैन से सोया नही कभी॥

 

दिल में जिगर में था वही साँसों में…

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Added by डॉ. सूर्या बाली "सूरज" on May 28, 2012 at 9:30pm — 17 Comments

विश्वासघात [कहानी ]

देवभूमि हिमाचल प्रदेश में एक छोटा सा गाँव सुन्नी  ,हिमालय की गोद में प्राकृतिक सौन्दर्य से भरपूर इस गाँव के भोले भाले लोग ,एक दूसरे के साथ मिलजुल कर प्यार से रहते थे | इसी गाँव की दो सहेलियाँ प्रीतो और मीता,बचपन से ले कर जवानी तक का साथ ,लेकिन आज प्रीतो गौने के बाद ,पहली बार अपने ससुराल दिल्ली जा रही थी |मीतो दूर खड़ी अपनी जान से भी प्यारी सहेली को कार में बैठते  हुए देख़ रही थी ,उसके आंसू थमने का नाम ही नही ले रहे थे और यही हाल प्रीतो का भी था ,उसकी  नम आँखें अपनी सहेली मीता को ढूंढ़…

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Added by Rekha Joshi on May 28, 2012 at 9:10pm — 27 Comments

दिल का मेरे घर जलने वाले...

फरियाद करती हूँ तुझे गमे ए दिल न मिले 

जख्म ए जिगर मुझको दिलाने वाले...
कल तुझको भी कहीं रोना न पड़ जाये 
ऐ  मुझ पे  आज  मुस्कराने  वाले... 
दिल का तेरे चैन  बर्बाद हो न  जाये 
रातों की  नीद  मेरी  उड़ने  वाले... 
जग में अपना नाम तो बचाए रखना 
जग को  मुझ पे यूँ  हंसाने  वाले...
फिर कभी किसी से इश्क न करना 
इश्क का आइना मुझको…
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Added by Ajay Singh on May 28, 2012 at 6:40pm — 3 Comments


सदस्य टीम प्रबंधन
वंशी बना गया

एक सूख कर टूटी हुई डाली थी ज़मीं पर,
वो आया और पतझड़ को भी सावन बना गया I
 
यूँ थाम अपने हाथ डाली मुस्कुरा उठा,
वो स्वप्न ज़िन्दगी के मौत में जगा गया I
 
पपड़ी थी तिरस्कार की डाली पे जो जमी,
नेह की शबनम से वो उसको हटा गया I
 
हक मान अपने हाथ डाली जिस्मों जान के,
ज्ञान बाण भेद वो कन्दरा गढा…
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Added by Dr.Prachi Singh on May 28, 2012 at 12:31pm — 14 Comments

दो कवितायेँ किसान भाईयों के लिए

किसान भाईयों के लिए जो निरंतर आत्महत्याओं के लियें विवश हो रहे हैं ...
.
१.मैं किसान हूँ  
मैं बोता हूँ
गन्ने , चावल , आलू
सब्जियां और ना जाने
कितनी फसलें
खोदता हूँ मिटटी
प्यार से रोपता हूँ
देता हूँ स्नेह
इंच दर इंच बढ़ना
 रोज ताकता हूँ
और नाच उठता हूँ
बढ़ता देख
गाता हूँ…
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Added by MAHIMA SHREE on May 27, 2012 at 5:00pm — 22 Comments

भारत बंद

खुल जा सिम सिम बंद हो जा सिम सिम –दुकान हो या कार्यालय बंद करना,कराना,या खुलवाना,यह तमाशा ‘भारत बंद’ के मौके पर देखने या दिखाने का मधुर दृश्य दृष्टिगोचर होता है|

                भारत बंद हम भारतीयों का राष्ट्रिय त्यौहार है. पीने वालों को पीने का बहाना चाहिए, और हमें तो भारत बंद कराने के लिए एक सरकार की टेढ़ी चाल का इंतजार रहता है|यह त्यौहार प्रति वर्ष किसी भी महीने में मनाया जा सकता है|सरकार को भारत बंद को…

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Added by UMASHANKER MISHRA on May 27, 2012 at 2:00pm — 6 Comments

इस मुकम्मल जहाँ में

यादों में जी कर उसकी खुद को परेशान  कर रहें है
अब यही काम सरे आम कर रहे हैं 
होते थे पहले औरों से,
 मगर अब खुद ही को बर्बाद कर रहे हैं 


आँखों में उसकी जीते थे 
सांसों को उसकी छुते थे
राहों से उनकी गुज़रते थे
चाहों में…
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Added by Rohit Dubey "योद्धा " on May 27, 2012 at 12:30am — 6 Comments


सदस्य टीम प्रबंधन
मैं ही हूँ

मैं ही हूँ (5.04.2012)

चक्षु पटल भींच

एक अक्स उभरता है...

जो गहन तिमिर में

कोटिशः सूर्य सा चमकता है...

स्मरण जिसका महका देता है

सम्पूर्ण जीवन...

ख़ामोशी में गूंजती है

जिसकी प्रतिध्वनि अन्तः करणों में

और उन अनकहे शब्दों की

झंकृत स्वर तरंगें

नस नस में दौढ़ती हैं

सिहरन बन कर...

और बेसुध मन बावरा

तय कर लेता है

मीलों के फांसले

एक क्षण…

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Added by Dr.Prachi Singh on May 26, 2012 at 11:00am — 10 Comments

प्रियतम जब से मैंने प्रेम का आवाहन किया

प्रियतम जब से मैंने प्रेम का आवाहन किया 

करुण वेदना , विरह अश्रु , और मौन ने मेरा श्रृंगार किया 

कितनी संवेदना ,कितनी आह

कितने अश्रु , कितनी चाह

कितने आलाप , कितने गान

मिल कर भी

संतॄप्त न कर पाती

उर अरमनों में छिपे स्पंदन को,

प्रियतम जब से मैंने प्रेम का आवाहन किया 

सावन रिक्त , शशि सुप्त

सूरज न उग्र , रौद्र नयन हैं रुष्ट

प्रियतम जब से मैंने प्रेम का आवाहन किया 

करुण वेदना , विरह अश्रु , और मौन ने मेरा…

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Added by arunendra mishra on May 25, 2012 at 11:56pm — 9 Comments


सदस्य कार्यकारिणी
तिश्नगी में

चश्मे  तो हमने राह में पाये हैं बेशुमार

तेरी ही तिश्नगी में  आये हैं बार- बार

  

 प्यार से बिठाया  और खुशियाँ लूट ली 

 धोखे यूँ जिंदगी में खाये हैं कई हजार

  

 सीमाएं मेरे दर्द की   वो नाप के गए 

 अश्क जब काँधे पे बहाये हैं ज़ार-ज़ार

 

 बता गमजदा दिल अब  कैसे ढकें बदन 

 खुशियों के पैरहन कर लाये हैं तार-तार

 

 वादियों में  बुलबुलें अब चहकती नहीं  

  जब दर्द…

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Added by rajesh kumari on May 25, 2012 at 3:00pm — 26 Comments

कुछ तो

खबर:-तलवार दम्पति पर अपनी ही  बेटी के क़त्ल का मुकदमा चलेगा I
कुछ तो 
आरुषी जिगर का टुकड़ा थी 
फिर ऐसा क्यों कर डाला 

कुछ तो ऐसा हुआ होगा 

जो बेटी को मार डाला
उनके दर्द को देखों यारो 
जो रो भी नहीं सकते
ज़ख्म उनके भी ऐसे होंगे 
जो कभी नहीं भर सकते 
इलज़ाम लगाना आसाँ है 
पर हकीकत कड़वी होती है
ऐसे…
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Added by Deepak Sharma Kuluvi on May 25, 2012 at 11:00am — 14 Comments

वो सिर्फ बदनाम है

बेवफाई तेरी का ये अंजाम है
गूंजता महफ़िलों में मेरा नाम है |


क्या मिला पूछते हो, सुनो तुम जरा
इश्क का अश्क औ' दर्द इनाम है…
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Added by dilbag virk on May 24, 2012 at 7:42pm — 10 Comments

हाँ वो मेरी बेटी है

हाँ  वो  मेरी   बेटी  है  

जो  बगल  में  लेटी है  

मेरा  प्यार  है  वो  

जीवन  की  बहार  है  वो 

हमारे प्यार की   निशानी 

एक अनकही   कहानी   

खिलखिलाहट   उसकी  

दीवाना  करती  है  

जाएगी …

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Added by PRADEEP KUMAR SINGH KUSHWAHA on May 24, 2012 at 6:29pm — 28 Comments

आल्हा - एक प्रयास

दुनिया यही सिखाती हरदम, सीख सके तो तू भी सीख।  

आदर्शों पर चलकर हासिल, कुछ ना होगा, मांगो भीख।

 

तीखे कर दांतों को अपने, मत रह सहमा औ…

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Added by Sanjay Mishra 'Habib' on May 24, 2012 at 4:00pm — 20 Comments

2 मुक्तक

1

बिन जाने ह्रदय की पीड़ा पिया , दिल तोड़ के ऐसे जाते हो

मैं बैठी राह को तकती यहाँ, मुह मोड़ के ऐसे जाते हो

क्यूँ रूठे हो जरा हमसे कहो, बिन बात के कैसे जानूं मैं

प्रिय मेरे साथ में तुम थे चले, अब छोड़ के ऐसे जाते हो

2…

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Added by SANDEEP KUMAR PATEL on May 24, 2012 at 12:30pm — 9 Comments

मेरी बेटी...

तू मेरे लिए परियों का रूप है जैसे,

कड़कती ठंड मे सुहानी धूप हैं जैसे,

तू हैं सुबह चिड़ियो की चहचहाहट जैसी,

या फिर कोई निश्छल खिलखिलाहट जैसी।

तू हैं मेरी हर उदासी के मर्ज की दवा जैसी,

या उमस मे चली शीतल हवा जैसी।

तू मेरे आँगन मे फैला कोई उजाला है जैसे,

या मेरे गुस्से को लगा कोई ताला है जैसे।

वो पहाड़ की चोटी पे सजी सूरज की किरण है जैसे,

या चाँदनी बन करती वो सारी ज़मीन रोशन हैं जैसे

मेरी आँख मे आँसू आते ही मेरे संग संग वो भी…

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Added by Vasudha Nigam on May 24, 2012 at 12:19pm — 9 Comments

मुहब्बत कर लें

मुहब्बत कर लें

आओ मिल जुल के इस दुनियाँ से मुहब्बत कर लें

अमन-ओ-चैन का हर दिल में इक जज़्बा भर दें
गर तेरे शहर मंदिर नहीं कोई बात नहीं
हमको ले चल तू मस्जिद में इबादत कर लें
फर्क मज़हब में गर होता तो रंग-ए-खूँ भी अलग होता
तेरा पीला उसका नीला कहाँ लाल होता
तेरे अल्ला मेरे भगवान में कोई फर्क नहीं 
हो न ऐतवार तो चल उनसे ही शिकायत कर लें …
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Added by Deepak Sharma Kuluvi on May 24, 2012 at 11:16am — 9 Comments

बस्तियाँ हो गईं वीरान कहीं और चलें

शहर ये हो गया शमशान कहीं और चलें॥

बस्तियाँ हो गईं वीरान कहीं और चलें॥



कोई हिन्दू कोई मुस्लिम कोई ईसाई यहाँ,  

है नहीं कोई भी इंसान…

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Added by डॉ. सूर्या बाली "सूरज" on May 24, 2012 at 7:30am — 11 Comments

ऐसे थम थम के जो चलोगी क़यामत होगी

तेरी चाहत में डूब रब की इबादत होगी

मेरे इस दिल पे अगर तेरी इनायत होगी



तेरे क़दमों की आहटों पे मिटे बैठे हैं…

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Added by SANDEEP KUMAR PATEL on May 23, 2012 at 10:30pm — 7 Comments

===========|| नैन ||==========

===========|| नैन ||==========



मन भावन है गोरी तेरे नैनो की प्यारी भाषा

इन गहरे नैनो में अब तो बसने की है अभिलाषा

देखा जबसे इन नैनो को किस दुनिया में डूबा हूँ

डूबा डूबा सोचे ये मन इन नैनो की परिभाषा



इन नैनो से होती वर्षा चाहत वाले तीरों…

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Added by SANDEEP KUMAR PATEL on May 23, 2012 at 4:37pm — 3 Comments

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