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December 2012 Blog Posts

लघु कथा : परिवर्तन

ये लो महारानी जी आज नदारद हो गयीं , इन लोगों के मिजाज का कोई ठिकाना ही नहीं है..सुबह सुबह "गौरम्मा" के ना आने से मन खिन्न हो गया , गौरम्मा हमारी काम वाली 

हमेशा तो कह कर जाती थी , माँ ( दछिन भारत में येही संबोधन आदर में देते हैं ) हम कल नहीं आ पायेगा , मगर आज सुबह के ११ बज रहे हैं कोई खबर ही नहीं . दो तीन दिन से मैं उसे कुछ बुझी बुझी देख रही थी , मगर मेहमानों की…

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Added by SUMAN MISHRA on December 14, 2012 at 1:00am — 15 Comments

दूरियों की दूरी

मंज़िल की ओर बढ़ने से सदैव

दूरियों की दूरी ...

कम नहीं होती।

 

बात जब कमज़ोर कुम्हलाय रिश्तों की हो तो

किसी "एक" के पास आने से,

नम्रता से, मित्रता का हाथ बढ़ाने से,

या फिर भीतर ही भीतर चुप-चाप…

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Added by vijay nikore on December 14, 2012 at 12:00am — 4 Comments

आज मसले खत्म सारे हो गए

आज मसले खत्म सारे हो गए 
हम तुम्हारे तुम हमारे हो गए (1)
दोस्ती पे नाज़ था जिनकी हमें 
लो वही दुश्मन हमारे हो गए (2)
 
मुझको तनहा छोड़कर मझधार में 
धीरे धीरे सब किनारे हो गए  (3)
 
ले लिया जबसे  सहारा आपने मुझसे मेरा  
लग रहा हम बे-सहारे हो गए  (4)  
था यकीं इतना उन्हें मेरी वफ़ा…
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Added by ajay sharma on December 13, 2012 at 10:30pm — 5 Comments

उन्मुक्त

हसरते, अरमान

तिरस्कार, अपमान

इन्हें लक्ष्मण रेखा को न पार करने दो

या फिर इन्हें कैद करो ऐसे

यह सांस भी न ले पाए जैसे

और चाबी ऐसे दफनाओ

के खुद भी न ढुंढ पाओ

फिर उड़ो ,पंख फैलाओ…

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Added by Anwesha Anjushree on December 13, 2012 at 10:00pm — 6 Comments

ऐतबार नहीं है

दुश्मन न सही काबिल-ए -ऐतबार नहीं है 
कोई भी हो वतन से जिसे प्यार नहीं है 
-------------------------------------------
गैरों से भी अपनों से भी खाता है ठोकरें 
वो शख्स जिसे खुद पे अख्तियार नहीं है 
--------------------------------------------
ज़ालिम वही गुनाह जो करता नहीं कुबूल 
पाता सजा वही जो गुनाहगार…
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Added by ajay sharma on December 13, 2012 at 10:00pm — 3 Comments

या फिर सागर मंथन होगा ???

या फिर सागर मंथन होगा ???

बात सत्य लगती खारी जब 
गरल उगलते नर नारी तब 
छुप कर बैठे विष धारी सब 

इस पर शिव से चिंतन होगा
या फिर सागर मंथन होगा ???

कितना किसको तुमने बांटा
सुख की माला दुःख का काँटा
नमक दाल और चावल आटा

पास किसी के अंकन होगा
या फिर सागर मंथन होगा ???..................

संदीप पटेल "दीप"

Added by SANDEEP KUMAR PATEL on December 13, 2012 at 6:02pm — 4 Comments

शब्द दर शब्द बोलती हैं कुछ खामोश चीखें

शब्द दर शब्द बोलती हैं कुछ खामोश चीखें  



मैंने माना कोई नहीं अपना 

तोड़ डाला है आज हर सपना

रखे गैरत मिला है क्या मुझको

सोच में इसकी भला क्यूँ खपना 



सुन लूँ बिसरी हुई सी ऊँघती बेहोश चीखें

शब्द दर शब्द बोलती हैं कुछ खामोश…

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Added by SANDEEP KUMAR PATEL on December 13, 2012 at 3:45pm — 4 Comments

खुदगर्जी

खुदगर्जी



मेरा जन्म, हर्सौल्लास, जलसा

मां बाबू जी मुराद पूरी, खुशियाँ, चर्मोत्कर्ष

लालन पालन, उत्कर्ष

हर ख़ुशी, मुहैया

हट पूरी ,हर हाल में

मां कई रातें जागी, में सोया

मां सोते से जागी, में रोया

बाबू जी नई स्फूर्ति, उत्साह से ओतप्रोत

में प्रेरणास्रोत

सने सने मेरी बढती काया, बुद्धि,सोच…

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Added by Dr.Ajay Khare on December 13, 2012 at 1:00pm — No Comments

लघुकथा : राष्ट्रीय वन निगम

(पूर्णतया काल्पनिक, वास्तविकता से समानता केवल संयोग)

बहुत समय पहले की बात है। जंगल में शेर, लोमड़ी, गधे और कुत्ते ने मिलकर एक कंपनी खोली, जिसका नाम सर्वसम्मति से ‘राष्ट्रीय वन निगम’ रखा गया । गधा दिन भर बोझ ढोता। शाम को अपनी गलतियों के लिए शेर की डाँट और सूखी घास खाकर जमीन पर सो जाता।  कुत्ता दरवाजे के बाहर दिन भर भौंक भौंक कर कंपनी की रखवाली करता और शाम को बाहर फेंकी हड्डियाँ खाकर कागजों के ढेर पर सो जाता। लोमड़ी दिन भर हिसाब किताब देखती। हिसाब में थोड़ा बहुत इधर उधर करके…

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Added by धर्मेन्द्र कुमार सिंह on December 13, 2012 at 12:13pm — 16 Comments

लघुकथा : संवेदनहीन

सड़क पर पड़े, उस दुर्घटना ग्रस्त व्यक्ति को अपनी गाड़ी में लेकर रमेश अभी-अभी अस्पताल पहुंचा था ! उससे नहीं देखा गया कि हजारों की भीड़ में से एक आदमी भी उस तड़पते व्यक्ति के लिए आगे नही आ रहा है ! वो समझ नही पा रहा था कि लोग इतने संवेदनहीन कैसे हो सकते हैं ? और बस इसीलिए वो उस व्यक्ति को अपनी कार में डालकर अस्पताल ले आया था ! अभी उस व्यक्ति का ऑपरेशन चल रहा था ! कुछ देर बाद....! ओटी के बाहर जलता बल्ब बंद हुवा और डॉक्टर बाहर निकले !

“क्या हुवा डॉक्टर? सब ठीक तो है न ?” रमेश ने पूछा…

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Added by पीयूष द्विवेदी भारत on December 13, 2012 at 8:30am — 18 Comments

अब हाथ उनका थाम लें

बचपन की देहरी लांघ कर

सच्चे हुए जज्बात जब

रस्ते जो थे अनजान तब

अब मंजिलों का नाम दें

अब हाथ उनका थाम लें .

जिनकी वजह जीवन मिला

इश्वर तुम्हारा शुक्रिया

अब कर्म की दुनिया में हम

अपना भी योगदान दें

अब हाथ उनका थाम लें

थोड़ी हंसी मासूम सी

मेरी वजह रंगीन सी

माँ से थी जिद्द थोड़ी सुलह

जीवन के मसले हल करें

अब हाथ…

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Added by SUMAN MISHRA on December 13, 2012 at 1:30am — 9 Comments

लघु कथा : "घमंडी"

शानू उठो, देखो पापा शहर से आ गए हैं,,मगर नीद थी की उसे उठने ही नहीं दे रही थी , आज उसे गाँव आये हुए १५ दिन हो गए थे, नंगे पाँव बागों में फिरना कच्चे, अधपके आमों की लालच में , धुल मिटटी से गंदी हुयी फ्रॉक की कोई परवाह नहीं , पूरी आजादी, और फ़िक्र हो भी क्यों उसने अपना इम्तिहान बहुत मन लगाकर दिया था, प्रथम आयी तो ठीक मगर उस सुरेश को नहीं आने देना है , येही मलाल लिए गर्मी की…

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Added by SUMAN MISHRA on December 12, 2012 at 7:00pm — 13 Comments

चाह है उसकी मुझे पागल बनाये

चाह है उसकी मुझे पागल बनाये,

बेवजह उड़ता हुआ बादल बनाये,

 

लोग देखेंगे जमीं से आसमां तक,…

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Added by अरुन 'अनन्त' on December 12, 2012 at 6:05pm — 8 Comments

ईमानदारी

दिन रात सरकारी सिस्टम और तथाकथित भ्रष्टाचारियों को कोसते कोसते एक दिन कोसू राम भगवान् के घर को विदा हुए जी हाँ जिन्दगी भर ईमानदारी से जिए कोसू राम जी जैसे ही ऊपर पहुंचे, भीड़ लगी हुई थी चौंककर पूछा ये क्या हो रहा है !! आवाज आई पंक्ति में खड़े हो जाओ फिर बताते हैं, कोसू राम जी पंक्ति में खड़े हो गए आगे वाले सज्जन ने बताया वो दरवाजे देख रहे हो उनसे हमें पंक्तिबद्ध अन्दर जाना है शुक्रिया अदा कर कोसूराम जी सोचने लगे, चलिए आज कुछ तो अच्छा हुआ यहाँ कुछ तो ईमानदारी है अपना नंबर आ ही जायेगा । थोड़ी देर…

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Added by SANDEEP KUMAR PATEL on December 12, 2012 at 6:00pm — 1 Comment

दूरियों की दूरी

दूरियों की दूरी

मंज़िल की ओर बढ़ने से सदैव

दूरियों की दूरी ...

कम नहीं होती।

बात जब कमज़ोर कुम्हलाय रिश्तों की हो तो

किसी "एक" के पास आने से,

नम्रता से, मित्रता का हाथ बढ़ाने से,

या फिर भीतर ही भीतर चुप-चाप

अश्रुओं से दामन भिगो लेने से

रिश्ते भीग नहीं जाते,

उनमें पड़ी चुन्नटें भी ऐसे

कभी कम नहीं होतीं।

रिश्तों में रस न रहा जब शेष हो

तो पतझड़ के पेड़ों की सूखी टहनियों की तरह

टूट-टूट जाते हैं वह

ज़मीन पर गिरे सूखे पत्तों की…

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Added by vijay nikore on December 12, 2012 at 5:30pm — 4 Comments

मानव धर्म हमारा

समरसता की पले भावना सबका हो यह नारा

यह मानव धर्म हमारा शुभ मानव धर्म हमारा..



जन-जन में फैले विश्व शांति आपस में भाईचारे

मंदिर बांटा मस्जिद बांटी  अब बांटों ना गुरूद्वारे.

राम नाम भव तारेगा सदगुरू का एक इशारा..

यह मानव धर्म हमारा................



सुख दुःख आपस में बांटों बन व्योम,चन्द्र औ तारे

लहर दौड़ समता की जाये बचें कहर से  सारे .

अमन शांति और विश्व एकता यह शुभ कर्म हमारा ..

यह मानव धर्म…

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Added by CA (Dr.)SHAILENDRA SINGH 'MRIDU' on December 12, 2012 at 5:30pm — 4 Comments

कवि का आक्रोश

कवि का आक्रोश



में भी आप सभी सा हूँ

बस थोडा सा बीसा हूँ

बाहर से में फौलादी हूँ

अंदर से में शीशा हूँ

ह्रदय से में कवि सा हूँ

जन्म हुआ तभी से हूँ

बहर से जुगनू लगता हूँ

अंदर से रवि सा हूँ

मेरी कविताओं में वो दम है 

जो लोहे को पिघला देंगी

मेरी जोशीली रचनाएँ

मुर्दे को जिला देगीं

कविता पाठ से में

धरती को हिला दूंगा

अपने मार्मिक छंदों से,

कुम्भकर्ण को जगा दूंगा

रोक…

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Added by Dr.Ajay Khare on December 12, 2012 at 4:00pm — 3 Comments

लघु कथा - "हिम्मत"

आज सुबह से सौरभ उदास था, आज कहाँ जाएगा नौकरी के लिए, घर में किसी को पता नहीं था की उसके नौकरी छूट गयी है, माँ, पिता की दवा लानी है आज और जेब पूरी खाली, अगर सौरभ अपने नौकरी छूटने की बात बता दे,,तो शायद घर में बीमारी और बढ़ जायेगी,,,आखिर नयी चिंता का जन्म हो जाएगा...येही सोचते सोचते जाने कबतक सड़क के किनारे वो भ्रमित सा खडा रहा,,उसे कुछ समझ में नहीं…

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Added by SUMAN MISHRA on December 12, 2012 at 3:00pm — 13 Comments

हे देह लता

हे देह लता बन शरद घटा

पर देख जरा यह ध्‍यान रहे

पथ है अपार भीषण तुषार

हे पथिक पंथ का ज्ञान रहे

मन भेद भरे नित चरण गहे

तन मूल धूल यह भान रहे

यौवन सम्‍हार छलना विचार

निर्लिप्‍त दीप्‍त बस प्राण रहे

 

यह नृत्‍य गान भींगा विहान

छाया प्रमाण खम ठोंक कहे

'गढ़ नेह-मोह रच दूं विछोह

जो लेश मात्र अंजान रहे'

 

तज दर्प दंभ हैं ये भुजंग

आभा अनूप नित तूम रहे

दस द्वार ज्‍वार करता…

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Added by राजेश 'मृदु' on December 12, 2012 at 2:54pm — 5 Comments

पता तो चले

और कितनी है जुदाई पता तो चले

वो मेरी है या पराई, पता तो चले



यूं बहारों पे कब्ज़ा यूं फिजाओं पे हुक्म

अदा ये किसने सिखाई पता तो चले



कँवल खिलने लगे अब्र जलने लगे

किसने ले ली अंगडाई पता तो चले



ये किसने छुआ है, ये किसका नशा है

ये कली क्यों बलखाई पता तो चले



चाँद खिलने लगा गुल महक से गये

मेहँदी किसने रचाई पता तो चले



खोलकर आज गेसू वो मुस्कुरा गये

मौत किसपे है आई पता तो चले



गनीमत यही उन्हें मुहब्बत तो हुई

कुछ उन्हें भी…

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Added by Pushyamitra Upadhyay on December 12, 2012 at 2:21pm — 10 Comments

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