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July 2017 Blog Posts

प्रेम ...

प्रेम ...

अनुपम आभास की

अदृश्य शक्ति का

चिर जीवित

अहसास है

प्रेम

मौन बंधनों से

उन्मुक्त उन्माद की

अनबुझ प्यास है

प्रेम

संवादहीन शब्दों की

अव्यक्त अभिव्यक्ति

का असीमित

उल्लास है

प्रेम

निःशब्द शब्दों को

भावों की लहरों पर

मुखरित करने का

आधार है

प्रेम

अपूर्णता को

पूर्णता में परिवर्तित कर

अंतस को

मधु शृंगार से सृजित कर…

Continue

Added by Sushil Sarna on July 4, 2017 at 9:22pm — 10 Comments

ग़ज़ल-रामबली गुप्ता

ग़ज़ल

1222 1222 1222 1222



जो लड़कर आँधियों से जीत का इनआम लेता है

ज़माना फ़ख्र से उसका युगों तक नाम लेता है



सहारा जो यहाँ हर डूबते इन्सां का बन जाये

खुदा भी हाथ उसका मुश्किलों में थाम लेता है



दुआओं की कमी होती नहीं उसको कभी यारों

बज़ुर्गों का यहाँ जो हाल सुबहो-शाम लेता है



पता सबको है मुश्किल की घड़ी होती बहुत छोटी

कहाँ हर आदमी हिम्मत से लेकिन काम लेता है



खुदा को भी शिकायत होगी शायद अपने बन्दे से

कि वो है खुदग़रज़ दुख… Continue

Added by रामबली गुप्ता on July 4, 2017 at 11:30am — 21 Comments

रिम झिम रिम झिम बारिश होने लगती है

फ़ेलुन फ़ेलुन फ़ेलुन फ़ेलुन फ़ेलुन फ़



यारों में जब रंजिश होने लगती है

चुपके चुपके साज़िश होने लगती है



आँखों में जब सोज़िश होने लगती है

रिम झिम रिम झिम बारिश होने लगती है



बाबू जी का साया सर से उठते ही

धरती की पैमाइश होने लगती है



तुम जब मेरे साथ नहीं होते जानाँ

मुझ पर ग़म की यूरिश होने लगती है



मुझसे कोई काम अटक जाता है जब

उनको मेरी काविश होने लगती है



जब जब भी मैं नाम तुम्हारा लिखता हूँ

हाथों में क्यूँ लरज़िश… Continue

Added by Samar kabeer on July 4, 2017 at 12:07am — 39 Comments

तुम्हारे हृदय में ....

तुम्हारे हृदय में ...

ये

समय ठहरा था

या कोई स्मृति

वाचाल बन

मेरी शेष श्वासों के साथ

चन्दन वन की गंघ सी

मुझे

कुछ पल और

जीवित रखने का

उपक्रम कर रही थी

ये

समय का कौन सा पहर था

मैं पूर्णतयः अनभिज्ञ था

अपनी क्लांत दृष्टि से

धुंधली होती छवियों में

स्वयं को समाहित कर

अपने अंत को

कुछ पल और

जीवित रखने का

असफ़ल

प्रयास कर रहा था

शायद किसी के

इंतज़ार में

तुम…

Continue

Added by Sushil Sarna on July 3, 2017 at 6:00pm — 8 Comments

पढ़ा हुआ पाठ

"आ गए साहबजादे!" माँ के चुप रहने के इशारे के बाद भी शाम ढ़ले घर में घुसते ही, उसके पिता का बड़बड़ाना शुरू हो गया। "जाने कहाँ आवारागर्दी करता फिरता है ये लड़का सारा दिन।"



"कुछ गलत न करे है मेरा बेटा, अब किताबों में भी कितनी मगजमारी करे, कुछ देर दोस्तों में गुजार आवे है तो हर्ज ही क्या है?" माँ ने उसकी तरफदारी की कोशिश की।



"तो वही जाहिल लोग रह गए है दोस्ती के लिए।" पिता ने माँ को भी डांट की लपेट में ले लिया।



"पिताजी, अब ऐसे भी जाहिल न है वे लोग।" वह चुप न रह… Continue

Added by VIRENDER VEER MEHTA on July 3, 2017 at 10:39am — 6 Comments

गरीबी - उपचार -- डॉo विजय शंकर

किसी ने गरीब को
एक जोड़ी चप्पल दिला दी
किसी ने भूखे को एक वक़्त
शानदार रेस्त्रां में रोटी खिला दी ,
रेस्त्रां के मालिक ने
खाने के पैसे नहीं लिए
कहा , मानवता के पैसे नहीं लगते ,
कुछ इस तरह एक छोटे गरीब ने
एक बड़े गरीब की गरीबी मिटा दी ।

मौलिक एवं अप्रकाशित

Added by Dr. Vijai Shanker on July 3, 2017 at 10:12am — 12 Comments

हृदय-सम्बन्ध .... क्षणिकाएँ

१.

अर्थहीन प्रश्नों के

चकरदार अर्थ

अर्थहीन न तो क्या होंगे

घेर लेते हैं मुझको

छेड़ी हुई मधुमक्खियों की तरह

अब मुंद जाने दो आँखें

बन्द कर दो किवाड़

             -----

२.

कोमल पत्तों पर अटकी

प्रांजल बूँदें ...

अपनी ही गढ़ी हुई 

वेदना का विस्तार

शायद ... तुम ...

मन के गहरे में कुछ

पल्लवित होना चाहता है

            -----

३.

कभी ऐसा भी तो होता…

Continue

Added by vijay nikore on July 3, 2017 at 8:29am — 14 Comments

किसान /मुक्तक

(1) सूखा हुआ किसान को दाना बना दिया ,
फिर ख़ुदकुशी का एक बहाना बना दिया ,
अब कहते अन्नदाता उसे शर्म आती है ,
भूख और मुफ़लिसी का तराना बना दिया ।
(2) अरमानों को कफ़न में सजाता किसान है,
अब ख़ुद ही अपनी लाश उठाता किसान है,
गोली पुलिस की खाए कि फ़ाकों से वो मरे,
मय्यत का रोज़ जश्न मनाता किसान है ।
मौलिक एवं अप्रकाशित ।

Added by Mohammed Arif on July 2, 2017 at 11:00pm — 10 Comments

रिश्ता (कविता)

प्यार चाहे कोई रिश्ता
कोई चाहे दिखावा

कहीं होता व्यापार रिश्तों का
कहीं ढ़ोल है पीटे जाते

कभी निकल जाता है जीवन
ताना बाना बुनने में

एक शब्द है पर
अर्थ है कितने


रिश्तों की तरह
अद्भुत , अटल सत्य की तरह

मौलिक एवं अप्रकाशित

Added by KALPANA BHATT ('रौनक़') on July 2, 2017 at 11:00pm — 6 Comments

ग़ज़ल

*221 2121 1221 212*



किस्मत ने उस के साथ करिश्मा नहीं किया ।

जिसने कभी वफ़ा से किनारा नहीं किया ।।



रहना पड़ा उसी के बज़्म में तमाम उम्र ।

जिसने हमारा साथ गवारा नहीं किया ।।



कितनी मिली जफ़ा है मुहब्बत के वास्ते ।

तुमने कभी हिसाब पे चर्चा नहीं किया ।।



कानून पास हो चुके मुद्दों के नाम पर ।

किसने कहा करों में इजाफा नहीं किया ।।



लुटती है आबरू जो सरेआम शह्र में ।

कहते हैं लोग हुस्न पे परदा नहीं किया ।।



शायद कोई ख़ता… Continue

Added by Naveen Mani Tripathi on July 2, 2017 at 4:15pm — 8 Comments

कुण्डलिया छंद - (जी एस टी पर)

1-

आया है जी एस टी, ऐसा एक विधान।

सुगम रहेगा टैक्स यह, मिटे सभी व्यवधान।।

मिटे सभी व्यवधान, प्रणाली सरल रहेगी।

फैलेगा व्यापार, चैन की गंग बहेगी।।

कर की दरें समान, हटा जाँचों का साया।

भारत भर में आज, एक ऐसा कर आया।।

2-

सारी जनता खुश हुई, जागी आधी रात।

लगता है जी एस टी, बदलेगा हालात।।

बदलेगा हालात, यही कहकर भरमाया।

ऐसे खुश हैं लोग, लगा जैसे कुछ पाया।।

बना दिया माहौल, प्रचारित करके भारी।

देना होगा टैक्स, मगर खुश जनता… Continue

Added by Hariom Shrivastava on July 2, 2017 at 12:30am — 5 Comments

पिता--लघुकथा

घर के बाहर ही जब उसने अपने चचेरे भाई रग्घू को देखा तो उसका माथा ठनका| आज यह घर क्यों आया था, जरूर कुछ गड़बड़ होगी, वर्ना पिताजी को गुजरे इतने साल हो गए, कभी हाल पूछने भी नहीं आया था| उसकी मुस्कराहट को नजरअंदाज करते हुए वह भागती हुई घर में घुसी|

"माँ, माँ, कहाँ है तू", सामने माँ नजर नहीं आयी तो वह बेचैन हो गयी| जल्दी से उसने पिछले कमरे में प्रवेश किया तो माँ को खाट पर बैठे पाया|

"तू यहाँ बैठी है और जवाब भी नहीं दे रही है, मैं तो घबरा गयी थी| आज रग्घू क्यों आया था घर, तूने तो नहीं…

Continue

Added by विनय कुमार on July 2, 2017 at 12:30am — 4 Comments

आजादी(लघुकथा)

जंगल आजाद हुआ।पशु-पक्षियों को शासन की कमान मिली।आदमी काफी दूर निकल चुके थे। नृत्य-कला की प्रवीणता से मोर को सबसे बड़ी कुर्सी मिली।विभिन्न जानवरों और परिंदों को मंत्री पद मिले।लक्ष्मी जी की सवारी को वित्त का जिम्मा सौंपा गया।खान-पान के सामान और महंगे हो गये।लूट तरक्की का सामान बन गयी।छोटे-छोटे जीवों की बचत बड़े-बड़े दिग्गज जानवर गटकने लगे।माद्दा होता कर्ज लेने का,फिर सारी राशि हड़प जाने का।उधर सरकारी ऐलान होता कि तिजोरी खाली है,जनता सरकार का का सहयोग करे।खर्च कम करे,कर चुकाये।उधर जंगल(देश-जनता) की… Continue

Added by Manan Kumar singh on July 1, 2017 at 9:29pm — 12 Comments

मजाक ( लघुकथा )

‘कहो बिरजू कैसे आये ? वह भी सवेरे-सवेरे’

 बिरजू रैदास हमारे यहाँ हलवाही का कार्य करते थे. खेती के नए उपकरण आ जाने और उम बढ़ जाने से उन्होंने अब यह कार्य छोड़ दिया था.

‘मलकिन, बिटिया की शादी तय कर दी है. अब आप से कुछ मदद होइ जाय ?’

‘अच्छा तो दिविया इतनी बड़ी हो गयी , जरूर-जरूर हमारी भी तो बेटी ही है’ –मैंने सकुचाते हुए उसे तीस ह्जार का चेक दिया.

‘जुग-जुग जियो मलकिन. बिटिया तरक्की करे‘ -वह आशीर्वाद देकर चला…

Continue

Added by डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव on July 1, 2017 at 12:00pm — 8 Comments

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