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यारों ख़ुदा ये देख के हैरान हो गया....संतोष!!

अरकान:-

मफ़ऊल फ़ाईलात मफ़ाईल फ़ाइलुन



यारों ख़ुदा ये देख के हैरान हो गया,

इंसा जिसे बनाया था हैवान हो गया।।



भेजा था इसको अम्न की ख़ातिर जहान में,

कैसे ख़िलाफ़ अम्न के इंसान हो गया।।



शैतान का भी शर्म से देखो झुका है सर,

इंसान ख़ुद ही आज तो शैतान हो गया।।



चिंता में बेटियों की हर इक बाप है यहाँ,

अब क्या बताऊँ मैं तो परेशान हो गया।।



ढाये यहाँ पे गंदी सियासत ने वो सितम,

लगता है जैसे मौत का सामान हो गया।।…

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Added by santosh khirwadkar on May 11, 2018 at 8:30pm — 6 Comments

अपनत्व की खुशबु (लघुकथा )

शहर के बड़े शिवपुरी में उस कि अंतिम संस्कार की तैयारी चल रही थी, इस शिवपुरी में मैं कई बार अंतिम संस्कारों में शामिल हो चूका था| मगर जिस तरह का हजूम आज राजेंद्र मास्टर के साथ आया था, ऐसा मैंने कभी नहीं देखा था| सभी आंखें नम थी और इधर उधर चारों तरफ चीकें सुनाई दे रही थी किसी को उसके इस तरह जाने पे यकीन नहीं हो रहा था| 

कोई ये कह रहा था, “क्या ऐसा भी हो सकता है, मगर दुर्घटना कब, कहाँ हो जाए कहाँ पता चलता है इसके बारे कोई कुछ नहीं कह सकता”|

“मगर बचातो जा सकता है, इसके लिए प्रबंध तो…

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Added by मोहन बेगोवाल on May 11, 2018 at 3:30pm — 4 Comments

ग़ज़ल

121 22 121 22 121 22 121 22

न वक्त का कुछ पता ठिकाना

न रात मेरी गुज़र रही है ।

अजीब मंजर है बेखुदी का ,

अजीब मेरी सहर रही है ।।

ग़ज़ल के मिसरों में गुनगुना के ,

जो दर्द लब से बयां हुआ था ।

हवा चली जो खिलाफ मेरे ,

जुबाँ वो खुद से मुकर रही है ।।

है जख़्म अबतक हरा हरा ये ,

तेरी नज़र का सलाम क्या लूँ ।

तेरी अदा हो तुझे मुबारक ,

नज़र से मेरे उतर रही है…

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Added by Naveen Mani Tripathi on May 11, 2018 at 1:08pm — 4 Comments

पापनाशिनी

चिड़िया का निवाला खाकर और भालू से डरकर बालक सो गया था। वह जूठे बरतनों से को ऐसे रगड़ रही थी जैसे कोई अपराधी सबूत मिटा रहा हो।



वह बिस्तर पर लेटा उस पंखे को घूर रहा था जिसके डैने बिजली बिल न देने के कारण थम गये थे । आँचल में हाथ पोंछते हुए वह आई और बिना कोई शोर किए बगल में लेट गई ।

उसने करवट लेते हुए उसके बदन पर हाथ रखा तब उसने धीरे से हाथ हटा दिया " सो जाओ कल से मुन्ने का स्कूल सुबह की पाली में है सबेरे उठना होगा।"

हाथ खींचकर उसने तकिया बना लिया " सो गया अपना शेर ।"

वो… Continue

Added by Kumar Gourav on May 11, 2018 at 11:00am — 4 Comments

ग़ज़ल कहते हैं क्यों लोग सताने आया हूँ

22 22 22 22 22 2

जुल्म नहीं मैं उन पर ढाने आया हूँ ।

कहते हैं क्यों लोग सताने आया हूँ ।।1

तिश्ना लब को हक़ मिलता है पीने का ।

मै बस अपनी प्यास बुझाने आया हूँ ।।2

हंगामा क्यों बरपा है मैखाने में ।

मैं तो सारा दाम चुकाने आया. हूँ ।।3

उनसे कह दो वक्त वस्ल का आया है ।

आज हरम में रात बिताने आया हूँ ।।4

है मुझ पर इल्जाम जमाने का यारों ।

मैं तो उसकी नींद चुराने आया हूँ ।।5

फितरत तेरी थी तूने…

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Added by Naveen Mani Tripathi on May 11, 2018 at 1:42am — 7 Comments

ग़ज़ल नूर की -कब है फ़ुर्सत कि तेरी राहनुमाई देखूँ?

कब है फ़ुर्सत कि तेरी राहनुमाई देखूँ?

मुझ को भेजा है जहाँ में कि सचाई देखूँ.

.

ये अजब ख़ब्त है मज़हब की दुकानों में यहाँ

चाहती हैं कि मैं ग़ैरों में बुराई देखूँ.

.

उन की कोशिश है कि मानूँ मैं सभी को दुश्मन

ये मेरी सोच कि दुश्मन को भी भाई देखूँ.

.

इन किताबों पे भरोसा ही नहीं अब मुझ को,   

मुस्कुराहट में फ़क़त उस की लिखाई देखूँ.

.

दर्द ख़ुद के कभी गिनता ही नहीं पीर मेरा  

मुझ पे लाज़िम है फ़क़त पीर-पराई देखूँ.

.

अब कि बरसात में…

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Added by Nilesh Shevgaonkar on May 10, 2018 at 8:43pm — 12 Comments


सदस्य कार्यकारिणी
मेरी ज़मीन मेरा आसमाँ बदल डालो (ग़ज़ल 'राज')

१२१२  ११२२  १२१२  २२

तुम अपने दस्त-ए-हुनर से समां बदल डालो 

अगर पसंद नहीं है जहाँ बदल डालो 



गुबार दिल में दबाने से फ़ायदा क्या है 

सुकून गर  न मिले आशियाँ बदल डालो



उदास गुल हैं जहाँ तितलियों नहीं जाती 

तुम अपने प्यार से वो गुलसितां बदल डालो



जहाँ तलक न पहुँचती ज़िया न बादे सबा 

तो फ़िर ये काम करो वो मकां बदल डालो



भरोसा है तुम्हें तीर-ए-नज़र पे तो जानाँ  

अगर कमाँ है मुख़ालिफ़ कमाँ बदल डालो 



अभी अभी तो हुआ है…

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Added by rajesh kumari on May 10, 2018 at 6:28pm — 20 Comments

कुछ हाइकु

तुम जो आए

पत्ते हरे हो गए

पतझड़ में ।  

 

सूखे गुलाब

किताब में अब भी

खुशबू भरे ।

 

 

माँ तो सहती

एक सा दर्द, पर  

बेटी पराई ?

 

 

बढ़ती उम्र

घटती हुई सांसें

जिये जा रहे ।

 

 

.... मौलिक एवं अप्रकाशित

Added by Neelam Upadhyaya on May 10, 2018 at 2:04pm — 10 Comments

परिंदा रात भर बेशक वही रोता रहा होगा



1222 1222 1222 1222

कफ़स में ख्वाब जब भी आसमाँ का देखता होगा ।

परिंदा रात भर बेशक बहुत रोता रहा होगा ।।1

कई आहों को लेकर तब हजारों दिल जले होंगे ।

तुम्हारा ये दुपट्टा जब हवाओं से उड़ा होगा ।।2

यकीं गर हो न तुमको तो मेरे घर देखना आके ।

तुम्हरी इल्तिजा में घर का दरवाजा खुला होगा ।।3

रकीबों से मिलन की बात मैंने पूछ ली उससे।

कहा उसने तुम्हारी आँख का धोका रहा होगा ।।4

बड़े खामोश लहजे में किया इनकार था जिसने…

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Added by Naveen Mani Tripathi on May 10, 2018 at 6:12am — 4 Comments

अपने सपनों के ताजमहल (लघुकथा)

"अय.. हय .. मेरी ताजमहल... मेरी नाज़महल... !" अपने प्यार की पहली निशानी को नयी पोषाक देकर चूमते हुए डॉक्टर साहिब ने कहा- "अब तो ख़ुश हो जा, तेरी मनपसंद टीवी विज्ञापनों वाली सारी चीज़ें दिला दीं तुझे! मॉडर्न हो गई अब तो मेरी 'महजबीं'!"



"लेकिन पप्पा, चेहरे के इन पिम्पल्ज़ और दागों का क्या होगा? कितने क़िस्म की दवाइयां और क्रीम ट्राइ कर डालीं, चेहरे पर पहले वाली चमक आती ही नहीं!" आइना सोफ़े पर पटकते हुए 'जवानी की दहलीज़ पर खड़ी' बिटिया ने कहा!…

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Added by Sheikh Shahzad Usmani on May 9, 2018 at 8:30pm — 5 Comments

ग़ज़ल(122 122 122 122)

कभी इसके दर पे कभी उसके दर पे।

सियासत की पगड़ी पहनते ही सर पे।।

वही कुछ किताबें वही बिखरे पन्नें।

मिलेगा यही सब अदीबों के घर पे।।

लगे गुनगुनाने बहुत सारे भौरें।

नया फूल कोई खिला है शज़र पे।।

मुझे प्यार से यूँ ही नफरत नहीं है।।

बहुत ज़ख़्म खाएं है जिस्मों जिगर पे।

बहुत कुछ है अच्छा बहुत कुछ हसीं है।

लगाओ न नफरत का चश्मा नज़र पे।।

जिधर देखो लाशें ही लाशें बिछी है।

मुसीबत है आयी ये कैसी नगर…

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Added by ram shiromani pathak on May 9, 2018 at 8:30pm — 4 Comments

संतुलन - लघुकथा

'संतुलन'

"चाय ठंडी हो गयी छोटे, ले न।" भैया के शब्दों से हमारे बीच पसरी ख़ामोशी भंग हो गयी।

हाँ! लेता हूँ भाई साहब, आपको तो पता हैं कि मैं आपकी तरह चाय 'कड़क गर्म' नहीं बल्कि बिलकुल ठंडी करके पीता हूँ।" मैं हल्का सा मुस्करा दिया।

बरसों पहले अपने हिसाब से जीने की चाहत लिये मैं, भैया से जायदाद का हिस्सा ले बच्चों सहित शहर चला गया था। उसके बाद आपसी रिश्ते कब कम होते-होते एक अंतहीन चुप्पी में बदल गए थे, पता ही नहीं चला। आज किसी काम से इधर आया तो अनायास ही घर की ओर कदम उठ गए। लेकिन ढलती… Continue

Added by VIRENDER VEER MEHTA on May 9, 2018 at 7:21pm — 12 Comments

डूब गए ...

डूब गए ...

तिमिर
गहराने लगा
एक ख़ामोशी
सांसें लेने लगी
तेरे अंदर भी
मेरे अंदर भी


तैर रहे थे
निष्पंद से
कुछ स्पर्श
तेरे अंदर भी
मेरे अंदर भी


सुलग रहे थे
कुछ अलाव
चाहतों की
अदृश्य मुंडेरों पर
तेरे अंदर भी
मेरे अंदर भी


डूब गए
कई जज़ीरे
ख़्वाबों के
खामोश से तूफ़ान में
तेरे अंदर भी
मेरे अंदर भी

सुशील सरना
मौलिक एवं अप्रकाशित

Added by Sushil Sarna on May 9, 2018 at 3:21pm — 2 Comments

ग़ज़ल(हुस्न और इश्क़ की कहानी है)

(फ़ा इलातुन--मफाइलुन--फ़ेलुन)

हुस्न और इश्क़ की कहानी है।

एक है आग एक पानी है।

कह रही है वफ़ा जिसे दुनिया

उसको पाने की मैं ने ठानी है।

बन के आए हैं वो तमाशाई

आग घर की किसे बुझानी है।

सोच कर कीजियेगा तर्के वफ़ा

अपनी यारी बहुत पुरानी है।

घिर गए मुश्किलों में और भी हम

आप की बात जब से मानी है।

वो अदावत से काम लेते हैं

हम को जिन से वफ़ा निभानी है।

प्यार को क्या…

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Added by Tasdiq Ahmed Khan on May 9, 2018 at 3:00pm — 17 Comments

ग़ज़ल(चरागे उम्मीद जल गया है)

(मफा इलातुन---मफा इलातुन)

किसी का लहजा बदल गया है।

चरागे उम्मीद जल गया है।

मैं क्यूँ न समझूँ इसे मुहब्बत

वह मेरा शाना मसल गया है

भला खफ़ा क्यूँ हैं आइने पर

था हुस्न दो दिन का ढल गया है।

ख़ुदा मुहाफ़िज़ है अब तो दिल का

निगाह से तीर चल गया है।

वो मिल गए तो लगा है ऐसा

जो वक़्ते गर्दिश था टल गया है।

जो बीच अपने था भाई चारा

उसे त अस्सुब निगल गया है।

मिली है तस्दीक़…

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Added by Tasdiq Ahmed Khan on May 9, 2018 at 3:00pm — 15 Comments

संग दीप के .....

संग दीप के  ... 

जलने दो

कुछ देर तो

जलने दो मुझे

मैं साक्षी हूँ

तम में विलीन होती

सिसकियों की

जो उभरी थी

अपने परायों के अंतर से

किसी की अंतिम

हिचकी पर

मैं साक्षी हूँ

उन मौन पलों की

जब एक तन ने

दुसरे तन को

छलनी किया था

मैं

बहुत जली थी उस रात

जब छलनी तन

मेरी तरह एकांत में

देर तक

जलता रहा

मैं साक्षी हूँ

उस व्यथा की

जो…

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Added by Sushil Sarna on May 9, 2018 at 2:30pm — 4 Comments

आग नई फिर बुन लो ना ( गीत)

क्यों बुझे बुझे से बैठे हो ,

आग नई फिर बुन लो ना |

भटक गए गर राह कहीं तुम ,

राह नई फिर चुन लो ना |

बुझे बुझे से ...........

दुःख सुख तो हैं आते जाते  ,

बात सभी हैं ये ही कहते …

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Added by Maheshwari Kaneri on May 9, 2018 at 1:30pm — 6 Comments

ग़ज़ल नूर की - याद आया है गुज़रा पल कोई

याद आया है गुज़रा पल कोई
लेगी अँगड़ाई फिर ग़ज़ल कोई.
.
कोशिशें और कोई करता है
और हो जाता है सफल कोई.
.
ज़िन्दगी एक ऐसी उलझन है
जिस का चारा नहीं न हल कोई.
.
इश्क़ में हम तो हो चुके रुसवा
वो करें तो करें पहल कोई.
.
हिज्र में आँसुओं का काम नहीं   
ये इबादत में है ख़लल कोई.
.
इक सिकंदर था और इक हिटलर
आज तू है तो होगा कल कोई.
.
निलेश "नूर"
मौलिक/ अप्रकाशित  

Added by Nilesh Shevgaonkar on May 9, 2018 at 7:54am — 11 Comments

ग़ज़ल - हम अपने हिस्से का ही आसमान दे बैठे

बह्र - मफाइलुन फइलातुन मफाइलुन फैलुन

वो किस तरह से मुकरते ज़ुबान दे बैठे।

तभी कचहरी मे झूठा बयान दे बैठे।

तमाम दाग थे दामन में जिसके उसको ही

टिकट चुनाव का आला कमान दे बैठे।

दिखाया स्वर्ग का सपना हमें जो ब्राह्मण ने

तो दान में उसे अपना मकान दे बैठे।

जो बात करते थे कल राष्ट्र भक्ति का साहब,

वो चन्द सिक्कों में अपना ईमान दे बैठे।

जब उनके प्यार को माँ बाप ने नकार दिया,

नदी में डूब के वो अपनी जान दे…

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Added by Ram Awadh VIshwakarma on May 9, 2018 at 5:42am — 10 Comments

आलू सरीखे (लघुकथा)

भीड़-भाड़ वाले सार्वजनिक स्थान के पास सड़क के किनारे दो पानी टिक्की के ठेले वाले सामने की साऊथ-इंडियन होटल में बढ़ती भीड़ से जलते हुए बातचीत में मशगूल थे।



"तू तो अच्छा मुंह चला लेता है! लम्बे भाषण भी दे सकता है! किसी बड़े राजनीतिक दल में शामिल हो जा, पता नहीं कब तेरे भी दिन फिर जायें!" ठेले में चार-पांच तरह के चटपटे पानी की बरनी संभालते पानी-टिक्की वाले ने दूसरे से कहा।



"ऐसी ही बात मैं तेरे लिए कहूं, तो? तू भी तो चतुराई से फूली हुई टिक्की में इतनी तरह के पानी…

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Added by Sheikh Shahzad Usmani on May 9, 2018 at 2:30am — 7 Comments

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