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औरत.....

औरत.....

जाने 

कितने चेहरे रखती है 

मुस्कराहट 

थक गई है 

दर्द के पैबंद सीते सीते 

ज़िंदगी 

हर रात 

कोई मुझे 

आसमाँ बना देता है 

हर सह्र 

मैं पाताल से गहरे अंधेरों में 

धकेल दी जाती हूँ 

उफ़्फ़ ! कितनी बेअदबी होती है 

मेरे जिस्म के…

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Added by Sushil Sarna on June 18, 2019 at 1:07pm — 1 Comment

सूर्यास्त के बाद

निर्जन समुद्र तट

रहस्यमय सागर सपाट अपार

उछल-उछलकर मानो कोई भेद खोलती

बार-बार टूट-टूट पड़ती लहरें ...

प्यार के कितने किनारे तोड़ 

तुम भी तो ऐसे ही स्नेह-सागर में

मुझमें छलक-छलक जाना चाहती थी

कोमल सपने से जगकर आता

हाय, प्यार का वह अजीब अनुभव !

डूबते सूरज की आख़री लकीर

विद्रोही-सी, निर्दोष समय को बहकाती

लिए अपनी उदास कहानी

स्वयँ डूब जा रही है ...

आँसू भरी हँसी लिए ओठों पर

जैसे…

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Added by vijay nikore on June 17, 2019 at 8:30pm — 4 Comments

हो गए - ग़ज़ल

मापनी २१२*4 

चाहते हम नहीं थे मगर हो गए

प्यार में जून की दोपहर हो गए

 

हर कहानी खुशी की भुला दी गई

दर्द के सारे किस्से अमर हो गए

 

खो गए आपके प्यार में इस कदर

सारी दुनिया से हम बेखबर हो…

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Added by बसंत कुमार शर्मा on June 17, 2019 at 11:56am — 6 Comments

लघुकथा

प्रतिफल

चन्द दिनों मे ही पर्याप्त नींद लेकर मैं स्वस्थ सी लगने लगी थी। उसमे करना भी कुछ ना था बस एकाग्रचित्त होकर मंत्र का मानसिक जाप करना था। आज पुनः उनके पास जाना था ।निलय किसी भी सूरत चलने को तैयार ना थे।दरअसल उन्हें विश्वास भी ना था इन बातों पर। मेरे अंदर की लालसा ने, कुछ धर्मगुरुओं द्वारा किये गलत आचरण को भी परे कर दिया था।

" गुरुजी मेरे विवाह को दस वर्ष हो चुके हैं,लेकिन हम संतान सुख से वंचित हैं और इलाज कराते कराते थक गए हैं।"

कुछ गणना के पश्चात , " आपको दवा, दुआ…

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Added by Archana Tripathi on June 17, 2019 at 3:18am — No Comments

जिंदगी के लिए — डॉo विजय शंकर

कभी लगता है ,

वक़्त हमारे साथ नहीं है ,

फिर भी हम वक़्त का साथ नहीं छोड़ते।

कभी लगता है ,

हवा हमारे खिलाफ है ,

फिर भी हम हवा का साथ नहीं छोड़ते l

कभी लगता है ,

जिंदगी बोझ बन गयी है ,

फिर भी हम जिंदगी को नहीं छोड़ते l

कभी लगता है

सांस सांस भारी हो रही है ,

फिर भी हम सांस लेना नहीं छोड़ते l

ये सब जान हैं

और जान के दुश्मन भी l

जिंदगी की लड़ाई हम

जिंदगी में रह कर लड़ते हैं ,

जिंदगी के बाहर जाकर कौन…

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Added by Dr. Vijai Shanker on June 16, 2019 at 10:04pm — No Comments

ग़ज़ल

221 2121 1221 212

ता-उम्र उजालों का असर ढूढ़ता रहा ।

मैं तो सियाह शब में सहर ढूढ़ता रहा ।।

अक्सर उसे मिली हैं ये नाकामयाबियाँ ।

मंजिल का जो आसान सफ़र ढूढ़ता रहा ।।

मुझको मेरा मुकाम मयस्सर हुआ कहाँ ।

घर अपना तेरे दिल में उतर ढूढ़ता रहा ।।…

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Added by Naveen Mani Tripathi on June 16, 2019 at 1:10am — 1 Comment

पर्यावरण पर कुंडलिया

यारो! किस ये राह पर, चला आज इंसान

वृक्ष हीन धरती किया, कहा इसे विज्ञान

कहा इसे विज्ञान, नहीं कुछ ज्ञान लगाया

सूखा बाढ़ अकाल, मूढ़ क्यूँ समझ न पाया

कह विवेक कविराय, नहीं खुद को यूँ मारो

निशदिन बढ़ता ताप, इसे अब समझो यारो।।1

 अभिलाषा प्रारम्भ है, मृगतृष्णा का यार

अंधी दौड़ विकास की, हुई जगत पे भार

हुई जगत पे भार, मस्त फिर भी है मानव

हर कोई है त्रस्त, विकास लगे अब दानव

कह विवेक कविराय, प्रकृति की समझो भाषा

पर्वत नदियाँ झील, नष्ट करती…

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Added by Vivek Pandey Dwij on June 15, 2019 at 9:46am — No Comments

ताज़ा गर दिल टूटा है तो वक़्त ज़रा दीजै (४७ )

ताज़ा गर दिल टूटा है तो वक़्त ज़रा दीजै 

क़ायम रखना रिश्ता है तो वक़्त ज़रा दीजै 

**

सिर्फ़ शनासाई से होता प्यार कहाँ मुमकिन 

इश्क़ मुक़म्मल करना है तो वक़्त ज़रा दीजै 

**

पहले के दिल के ज़ख़्मों का भरना है बाक़ी 

ज़ख़्म नया गर देना है तो वक़्त ज़रा दीजै 

**

ख़्वाब कभी क्या बुनने से ही होता है कामिल 

पूरा करना सपना है तो वक़्त ज़रा…

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Added by गिरधारी सिंह गहलोत 'तुरंत ' on June 13, 2019 at 1:30am — 2 Comments

जिंदगी की तपिश- लघुकथा

ऑफिस से बाहर निकलते ही उसका सर चकरा गया, गजब की लू चल रही थी. अब तपिश चाहे जितनी भी हो, काम के लिए तो बाहर निकलना ही पड़ता है. फोन में समय देखा तो दोपहर के ३.३० बज रहे थे. इस शहर में वह कम ही आना चाहता है, दरअसल मुंबई जैसे शहर में नौकरी करने के बाद ऐसे छोटे शहरों और कस्बों में उसे कुछ खास फ़र्क़ नजर नहीं आता.

सुबह आते समय तो ठीक था, लेकिन अभी उसे जाने के नाम पर ही बुखार चढ़ने लगा. स्टेशन से इस ऑफिस की दूरी बमुश्किल ३० मिनट की ही थी. लेकिन न तो यहाँ कैब थी और न ही किसी ऑटो के दर्शन हो रहे…

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Added by विनय कुमार on June 12, 2019 at 6:58pm — 2 Comments

चंद अशआर

पायलों की खनक में दबा रह गया
दर्द आँखों में तन्हाई का रह गया

वो गया या नहीं, फ़र्क़ क्या रह गया
जहन में एक बस हादसा रह गया

रोकने की बहुत कोशिशें कीं मगर
वो गया और मैं देखता रह गया

अब के बिछड़ो तो दिल तोड़ जाना सनम
फिर न कहना कि इक आसरा रह गया

रात की सिसकिया थक के सोने चली
रौशनी से मेरा राब्ता रह गया

जाम छलके हैं कैसे करूँ इब्तेदा
कुछ मज़ा कुछ नशा यार का रह गया

मौलिक एवं अप्रकाशित 

Added by Anurag Mehta on June 12, 2019 at 2:00pm — 3 Comments

ग़ज़ल

फ़ऊलुन फ़ाइलातुन 1 2 2 2 1 2 2

मुहब्बत हो गई तो ?
क़यामत हो गई तो ?
सनम तू पास मत आ,
मुसीबत हो गई तो ?
कहानी पढ़ रहा हूँ ,
हक़ीक़त हो गई तो ?
मुझे तुम फ़ोन करना,
इबादत हो गई तो ।
सिपाही मैं अकेला ,
बग़ावत हो गई तो ?
खुदा तेरे जहाँ से ,
शिकायत हो गई तो?
- शेख़ ज़ुबैर अहमद मौलिक एवं अप्रकाशित

Added by Shaikh Zubair on June 12, 2019 at 1:41am — 3 Comments

दोहे दो जून के - लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर'

कभी किसी को ना करे, भूख यहाँ बेहाल

रोटी सब दो जून की, पाकर हों खुशहाल।१।



मुश्किल  से  दो जून की, रोटी  आती हाथ

खाने को यूँ आज तो, मिल बैठो सब साथ।२।



रोटी को दो जून की, अजब गजब से खेल

इसकी खातिर जग करे, दुश्मन से भी मेल।३।



रोटी को  दो  जून  की, क्या  ना  करते लोग

झूठ ठगी दैहिक व्यसन, सब इसके ही योग।४।



रोटी बिन दो जून की, बिलखाती है भूख

रोटी  पा  दो  जून  की, ढूँढें  लोग  रसूख।५।



सदा भाग्य ने है लिखा,…

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Added by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on June 11, 2019 at 4:30pm — 6 Comments

कुछ हाइकू

तपती धरा

छिड़क रहा नभ

धूप की बूंद 

 

प्रचंड सूर्य

वीरान पनघट

झुलसी क्यारी

 

सूखे पोखर

जल रहा अंबर

प्यासे पखेरू

 

जलते दिन

भयावह गरमी

प्यासी है दूब

   

बिकता पानी

बढ़ता तापमान

जग बेहाल

   

दहकी धूप

गर्मी के दिन आये

निठुर बड़े

 

.... मौलिक एवं अप्रकाशित

 

Added by Neelam Upadhyaya on June 11, 2019 at 4:00pm — 7 Comments

ग़ज़ल

212 1212 1212 1212



सिर पे पांव रख हमारे,चढ़ रहे हो सीढ़ियाँ

फैंक दलदलों में यार,मांगते हो माफियाँ



जिंदगी में देख लीं,बहुत सी हमने आंधियाँ

खत्म हो चुके हैं अश्क,बंद सी हैं सिस्कियाँ



दास्ताने जिंदगी, सुना सके न हम कभी

दर खुदा के आ खड़े,ले चंद हम भी अर्जि़याँ



छा रही है तीरगी,न रोशनी दिखे कहीं

मौत है बुला रही,दे जिंदगी भी धमकियाँ



चापलूसी बोलती,न महनतों का मोल है

लग रही जगह जगह, इमान की ही बोलियाँ



साथ छोड़ चल… Continue

Added by Rachna Bhatia on June 10, 2019 at 7:55pm — 5 Comments

माहौल का फ़र्क़- लघुकथा

"अरे महमूद भाई, कहाँ हो. आज सोसाइटी की मीटिंग में नहीं जाना क्या", रजनीश ने घर में कदम रखते हुए आवाज लगायी.

"आ रहे हैं भाई साहब, आजकल पता नहीं क्या हो गया है, ऑफिस से आने के बाद खामोश से रहते हैं", भाभीजान ने पानी का ग्लास रखते हुए कहा.

"कुछ परेशानी होगी ऑफिस की, मैं पूछता हूँ उससे. वैसे भी आजकल काम बहुत बढ़ गया है और तनाव भी", रजनीश ने सोफे पर बैठते हुए कहा और पानी का ग्लास उठा लिया.

"चाचू, मेरी चॉकलेट कहाँ है", कहते हुए छोटी आयी और रजनीश की गोद में चढ़ने लगी. रजनीश ने…

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Added by विनय कुमार on June 10, 2019 at 7:30pm — 6 Comments

धारा

“यार बड़ी दिक्कत है आजकल.”

“क्यों क्या हुआ.”

“रोज़ धर्म और देश भक्ति को लेकर बवाल हुआ करता है.”

“जब कुछ करने को न हो तब ऐसी छोटी-छोटी चीज़ें टाइम पास का अच्छा साधन होती हैं.”

“तुम्हारे कहने का मतलब जो कुछ भी आजकल हो रहा, सब टाइम पास है?”

“बिलकुल.”

“परसों जो लड़कों में मारपीट हुई, पुलिस ने लाठीचार्ज किया, मीडिया में बवाल मचा हुआ है, सब टाइम पास है?”

“बिलकुल है भाई. इसके अलावा इस बवाल का मतलब क्या है? तुम्हें कुछ सार्थकता दिखती है? नारे क्या देश…

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Added by बृजेश नीरज on June 9, 2019 at 11:25pm — 8 Comments

अलग अलग कारण- लघुकथा

सुबह का अखबार जैसे खून से सना हुआ था, इतनी वीभत्स खबर छपी थी जिसकी कल्पना करके ही दिमाग सुन्न हो जा रहा था. सामने चाय की प्याली रखी हुई थी लेकिन उसे पीने की इच्छा मर चुकी थी. उसने अपना सर पकड़ा और बिस्तर पर ही निढाल हो गयी.

"क्या हो गया है इस समाज को, अब और कितना नीचे गिरेंगे हम लोग?, उसके मुंह से बुदबुदाहट की शक्ल में आवाज निकली.

कुछ देर बाद कामवाली बाई आयी और उसने देखा कि चाय वैसे ही रखी है तो उसने टोका "मैडम, तबियत ठीक नहीं है क्या? मैं दूसरी चाय बना लाती हूँ और कोई दवा भी ला…

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Added by विनय कुमार on June 9, 2019 at 11:16pm — 10 Comments

किस तरह होते फ़ना प्यार निभाने के लिए (४६ )

कैसे होते हैं  फ़ना प्यार निभाने के लिए 

छोड़ जाऊंगा नज़ीर ऐसी ज़माने के लिए 

**

रूह का हुस्न जिसे दिखता वही आशिक़ है 

जिस्म का हुस्न तो होता है लुभाने के लिए 

**

दरमियाँ गाँठ दिलों के जो पड़ी कब सुलझी 

कौन दीवार उठाता है गिराने के लिए 

**

अच्छे लोगों की कमी रहती है क्या जन्नत में 

क्यों ख़ुदा उनको है तैयार बुलाने…

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Added by गिरधारी सिंह गहलोत 'तुरंत ' on June 8, 2019 at 12:30pm — 4 Comments

शरणार्थी (लघुकथाएं )

शरणार्थी

(1)

---

दो मित्र आपस में बातें कर रहे थे;एक मानवतावादी था, दूसरा समाजवादी।पहले ने कहा-

अरे भई!वो भी आदमी हैं,परिस्थिति के मारे हुए।बेचारों को शरण देना पुण्य-परमार्थ का काम है।

दूसरा:हाँ तभी तक,जबतक यहाँ के लोगों को शरणार्थी बनने की नौबत न आ जाये।



(2)

---

-हाँ,जुझारूपन हमारे खून में है।

-हमारी खातिर तुम क्या करोगे?

-जान भी दे सकते हैं।

-हमें वोट चाहिए।जान…

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Added by Manan Kumar singh on June 8, 2019 at 8:53am — 2 Comments

कुण्डलिया छंद-

1-

तुलसी बाबा कह गए, परहित सरिस न धर्म।

परपीड़ा सम है नहीं, अधमाई का कर्म।।

अधमाई का कर्म, मर्म यह जिसने जाना।

उसको ही नरश्रेष्ठ, जगत ने भी है माना।।

जहाँ प्रेम सौहार्द, वहीं है काशी-काबा।

परहित सरिस न धर्म, कह गए तुलसी बाबा।।

2-

सबको ही यह ज्ञात है, परहित सरिस न धर्म।

किंतु आज वह चैन में, जिसके कुत्सित कर्म।।

जिसके कुत्सित कर्म, उसी के वारे न्यारे।

झूठ कपट छल छिद्र, स्वार्थ ने पैर पसारे।।

मिथ्या पाले दम्भ, आदमी भूला रब को।

रब…

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Added by Hariom Shrivastava on June 7, 2019 at 7:11pm — 3 Comments

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