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चोरी करता है - लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' (गजल)

२२२२/२२२२/२२२२/२२२



खेतीहर का ध्यान बँटाकर दाना चोरी करता है

मल्लाहों से नौका लेकर नदिया चोरी करता है।१।

*

बात उजाले की  नित  कर के तारा चोरी करता है

मन्दिर मस्जिद रटकर सबकी पूजा चोरी करता है।२।

*

मन्जिल पास बड़ी है अब तो राहत पाँवों को देदो

ऐसा कह कर सब के  पग से रस्ता चोरी करता है।३।

*

ये कैसा राजा  आया  है  आज  हमारी नगरी में

सन्तों  जैसे  पहरावे  में …

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Added by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on December 16, 2020 at 7:04am — 9 Comments

भाई-एक विश्वास

एक भ्रात है भरत के जैसा,

जिसमें कुछ पाने का भाव नहीं

समर्पित करता भ्रात चरण में,

राज्य संग सुख, चैन सभी ||

 

तिलभर भी छल ना मन में,

जग भी उसके साथ नहीं

कठोरता/ताने सहता सारे जन की,

मातृ की करनी उसकी सभी ||

 

विभीषण भी एक भ्रात उधर है

सिंहासन पर जिसकी आँख लगी

कठिन समय में भ्रात छोड़ता,

शत्रुओं को बताता भेद सभी ||

 

ना अंतक्रिया भी भ्रात की करता

सुख-भोग से भी इंकार…

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Added by PHOOL SINGH on December 15, 2020 at 6:58pm — 2 Comments

उसने आज़ाद कब किया है मुझे (ग़ज़ल)

2122 1212  22/122

क़ैद नज़रों में ही रखा है मुझे

उसने आज़ाद कब किया है मुझे  (1)

इससे बहतर तो था अदू मेरा

यार दीमक सा खा रहा है मुझे  (2)

 रात की नींद उड़ गई मेरी

ख़्वाब में जब से वो दिखा है मुझे  (3)

सुब्ह तक होश में नहीं आया

रात इतनी पिला चुका है मुझे  (4)

मंज़िलों तक पँहुच नहीं पाया

पर वो रस्ता बता गया है मुझे  (5)

वो शिकायत कभी नहीं करता

उससे इतना ही अब गिला है मुझे …

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Added by सालिक गणवीर on December 14, 2020 at 11:00pm — 6 Comments

अन्नदाता के लिए -लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर'(गजल)

२१२२/२१२२/२१२२/२१२२/२१२



बाढ़-सूखा सूदखोरी  हर  समय  डर अन्नदाता के लिए

कौन सी सरकार चिन्तित है यहा पर अन्नदाता के लिए।१।

**

हर समय उद्योगपतियों की उन्हें चिन्ता सताती है मगर

खोज पाये संकटों का हल न अफसर अन्नदाता के लिए।२।

*

कर के उद्यम से यहा तैयार उसको नित्य बोता है उपज

मायने रखता नहीं कुछ  खेत  ऊसर अन्नदाता के लिए।३।

*

नित्य भूखे पेट सोता  है  उपज  को वो बचाने खेत…

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Added by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on December 14, 2020 at 8:00am — 12 Comments

ग़ज़ल

2122 2122 212

.

1

अपनी हर लग़्ज़िश छिपा ली जाएगी

हाँ क़सम झूठी भी खा ली जाएगी

2

जिंदगी की शान-ओ-शौकत के लिए 

बात कुछ भी अब बना ली…

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Added by Rachna Bhatia on December 11, 2020 at 11:30am — 10 Comments

गीत-लोचन लोचन अश्रु बावरे बहते हैं अविराम (सरसी छंद)

विधान – 27 मात्रा, 16,11 पर यति, चरणान्त में 21 लगा अनिवार्य l कुल चार चरण, क्रमागत दो-दो चरण तुकांत l

ह्रदय बसाये देवी सीता

वन वन भटकें राम

लोचन लोचन अश्रु बावरे

बहते हैं अविराम

सुन चन्दा तू नीलगगन से

देख रहा संसार

किस नगरी में किस कानन में

खोया जीवन सार

हे नदिया हे गगन,समीरा 

ओ दिनकर ओ धूप

तृण तृण से यूँ हाथ जोड़कर

पूछ रहे…

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Added by बृजेश कुमार 'ब्रज' on December 10, 2020 at 7:00pm — 8 Comments

मोल भाव मत करना

नंगे पाँव

ठंड मे ठिठुरते

फुला फुला के गुब्बारे बेचते

किसी शहरी बचपन को देखो

तो मोल भाव मत करना

शुक्र मनाना

कि तुम्हारे पास गाँव है

गरीब सही पर सुरक्षित पाँव हैं

ठंड मे ठिठुरते

नंगे पाँव गुब्बारे बेचते

किसी शहरी बचपन को देखो

तो मोल भाव मत करना

 

इसी उम्र के अपने नौनिहालों को याद करना

उनके लिए शुक्र मनाना

कि तुम्हारे पास बल है बलबूते हैं

उनके पास पाँव हैं

पाँव…

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Added by amita tiwari on December 10, 2020 at 2:30am — 5 Comments

थाली खाली लघु -कथा

    मेरे छोटे से बेटे तक  ने थाली सरका दी । कहा नहीं खाऊँगा  । इस खाने को उगाने वाले अन्नदाता यदि  भूखे  हैं ,बेघर  हैं उनकी आवाज़ गले मे घुट रही है  तो नैतिकता की मांग है कि मुझे ये खाना खाने का हक़  नहीं है । नहीं जानता हूँ कि कौन कितना गलत है या सही है  लेकिन इतना ज़रूर जानता हूँ कि ऐसे मौसम मे घर छोडने का ,सड़कों पर बैठने का  और  सर पर कफन बांधने का  शौक किसी को नहीं हो सकता । जब    भविष्य  अंधकारमय लगता  है तभी  वर्तमान  ऐसे कदम उठाता है  तब जीवन और मौत मे कोई अंतर नहीं रह जाता  है । एक आम…

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Added by amita tiwari on December 9, 2020 at 1:43am — 8 Comments

सामने आ तू कभी ख़्वाब में आने वाले....( ग़ज़ल :- सालिक गणवीर)

2122 1122 1122 22

सामने आ तू कभी ख़्वाब में आने वाले

क्या मिला तुझको मेरी नींद उड़ाने वाले (1)

ऐसा लगता है कि आने का इरादा ही नहीं

वर्ना महशर में भी आ जाते हैं आने वाले (2)

चंद लम्हे भी अगर बंद हुई हैं पलकें

आ ही जाते हैं नये ख़्वाब दिखाने वाले (3)

क्या ग़जब है कि नये लोग चले आए हैं

घर में पहले से ही थे आग लगाने वाले (4)

मैं इस उम्मीद में बस आज तलक ज़िंदा हूँ

लौट आएँगे कभी छोड़ के जाने वाले…

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Added by सालिक गणवीर on December 8, 2020 at 9:20am — 10 Comments

ग़ज़ल-हर बात अपने दिल की बताई नहीं जाती।

221 2121 1221 212



हर बात अपने दिल की बताई नहीं जाती

करके कोई दुआ भी यूँ गाई नहीं जाती।1

दिल आपकेे है बस में ये अब जानते हैं हम

जादूगरी ऐसी भी दिखाई नहीं जाती।2

हैं दर्द-ओ-ग़म भरे हुए इतने कि क्या कहें

ये दास्तान दिल की सुनाई नहीं जाती।3

ये बदगुमानी आपकी आई है बीच में

बिगड़ी है इतनी बात बनाई नहीं जाती।4

फिर साथ होगी होली दीवाली की धूम भी

हमसे अकेले ईद मनाई नहीं जाती।5

दिल आपका दुखा तो…

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Added by Richa Yadav on December 7, 2020 at 1:29pm — 4 Comments

योग क्षेम नाशित ना हो

किसी समय मानवी सनक से

यह धरणी शापित ना हो

करे ध्वंस क्षण में अवनी का

वह कुशस्त्र चालित ना हो

ज्ञान,शक्ति,आनन्द त्रिवेणी

की धारा बाधित ना हो

जाति-धर्म की सीमाओं में

बंध कोई त्रासित ना हो

रहे सदा वसुधा का आँचल 

हरा - भरा तापित ना हो

फैले नव प्रकाश जीवन में

योग क्षेम नाशित ना हो

मौलिक एवं अप्रकाशित

Added by Usha Awasthi on December 6, 2020 at 9:43am — 2 Comments

ग़ज़ल

221 1221 1221 122

.

आग़ाज मुहब्बत का वो हलचल भी नहीं है

आँखों में इजाज़त है हलाहल भी नहीं है।

क्या हिन्दू मुसलमाँ बना फिरता है ज़माने

इन्सान बनेगा कोई अटकल भी नहीं है ।

आसान नहीं होता जहाँ रोटी जुटाना,

तू मौज मनाता दुखी बेकल भी नहीं है |

क़मज़र्फ बने मत कि कमाना नहीँ पड़ता

मुँहजोर है औलाद उसे कल भी नहीं है |

है एक मुसीबत वो निभाने हैं मरासिम,

अब वक्त बचा क़म है, वो दल-बल भी नहीं…

Continue

Added by Chetan Prakash on December 5, 2020 at 7:30am — 2 Comments

आका (लघुकथा)

फसल की बालियां,डालियां और पत्तियां आपस में बातें कर रही थीं।

' हम फल हैं।जीवन का पर्याय हैं।' बालियां इतरा कर कह रही थीं।

' हम भोजन  न बनाएं,तो सारी हेकड़ी धरी की धरी रह जायेगी।' पत्तियों ने आंखें तरे ड़ कर कहा।

' वाह वाह! क्या कहने! गर हम तुम्हें न संभालें तो फिर क्या हो?' डालियां जरा  मौज में झूमकर बोलीं।

' ठहरो,ठहरो।हमें असमय सूखने पर मजबूर न करो।हम अभी नाजुक दौर में हैं।' बालियों और पत्तियों की सम्मिलित आर्त ध्वनियां गूंजने लगीं।

जड़ और तने एक दूसरे को…

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Added by Manan Kumar singh on December 4, 2020 at 11:00pm — 2 Comments

सृष्टि का संगीत

उस असीम , विराट में 
इस सृष्टि का संगीत
ताल,लय,सुर से सुसज्जित 
नित्य नव इक गीत

नृत्य करती रश्मियाँ 
उतरें गगन से भोर
मृदु स्वरों की लहरियों पर
थिरकतीं चँहु ओर

गगन पर जब विचरता 
आदित्य , ज्योतिर्पुंज
विसहँते सब वृक्ष,पर्वत,
नदी ,पाखी , कुन्ज

.

मौलिक  एवं अप्रकाशित

Added by Usha Awasthi on December 4, 2020 at 7:30pm — 3 Comments

कौन हो तुम — डॉo विजय शंकर

ओजस्वी तेजस्वी

से दिखाई देते हो ,

अपनी जयकार से

आत्म मुग्ध लगते हो।

आईने में खुद को

रोज ही देखते हो ,

क्या खुद को

कुछ पहचानते भी हो।

बड़े आदमी हो , बहुत बड़े ,

लोग तुम्हें जानते हैं ,

बच्चे सामान्य ज्ञान के लिए

तुम्हारा नाम रटते और जानते हैं ,

रोज कितने ही लोग तुम्हारी ड्योढ़ी

पर खड़े रहते हैं , टकटकी लगाए ,

कितने आदमी तुमसे रोज ही

मिलने के लिए आते रहते हैं ,

तुम भी कभी किसी से

आदमी की तरह मिलते हो…

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Added by Dr. Vijai Shanker on December 4, 2020 at 11:28am — 8 Comments

सब्र दशकों से किये है -लक्ष्मण धामी'मुसाफिर' (गजल)

२१२२/२१२२/२१२२/२१२



कौन कहता है कि उनसे और वादा कीजिए

है निवेदन जो किया था वो ही पूरा कीजिए।१।

*

सब्र दशकों से किये  है  आमजन इस देश का

अब गरीबी भूख का कुछ तो सफाया कीजिए।२।

*

बस चुनावों में विरोधी बाद उस के सब सखा

मूर्ख जनता को समझ ऐसे न साधा कीजिए।३।

*

जल रहा कश्मीर तुमको फिक्र अपने कुनबे की

सिर्फ  कुर्सी  के  लिए …

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Added by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on December 4, 2020 at 7:30am — 10 Comments

ग़ज़ल

2 2 1 1 2 2 1 1 2 2 1 1 2 2

आग़ाज़ मुहब्बत का वो हलचल भी नहीं है

आँखों में इज़ाज़त है तो हलचल भी नही हैं

क्या हिन्दू मुसलमाँ बना फिरता है, ज़माने

ऐसी तो खुदाया यहाँ हलचल भी नहीं है

आसान नहीं होता जहाँ  रोटी का कमाना

इस ओर तो तेरी कहीं हलचल भी नहीं है

क़मज़र्फ बने मत कि कमाना नहीं आता

औलाद ने उस ओर की हलचल भी नहीं है

है एक मुसीबत वो निभाने हैं, मरासिम

सुन वक़्त बचा क़म है वो हलचल भी…

Continue

Added by Chetan Prakash on December 3, 2020 at 7:00pm — 5 Comments

धूप-छांव

कब रुका जो आज रुकेगा, वक़्त है ये तो चलता रहेगा

वक्त पर हकूमत कर सके ऐसा, नहीं जन्मा जो अब जन्मेगा ||

 

संग में इसके हँसना-रोना, सबको संग में इसके चलना पड़ेगा

अटल होकर चल रहा जो, उसे, वक़्त के आगे झुकना पड़ेगा ||

 

बेदर्दी ये वक़्त बड़ा है, घाव-क्लेश तो देता रहेगा

खुशियों के पल छोटे करके, दशा पर तेरी हँसता रहेगा ||

 

आस बांधता, विश्वास दिलाता, विश्वासघात भी करता रहेगा

गिरगिट जैसा रूप बदल कर, अनुभव खट्टे-मीठे देता रहेगा…

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Added by PHOOL SINGH on December 3, 2020 at 2:30pm — 2 Comments

रोटी

गोल -गोल होती है रोटी

 गाँव-गाँव से शहर आता

आकर अपना खून बेचता

वो गँवार आदमी देखो तुम

रोटी खातिर महल बनाता |

गोल- गोल होती है रोटी...!

सच्चा कर्म-योगी वही है

प्याज-हरी धर खाता रोटी,

धरती माँ का पुत्र वही है

मोटी- मोटी उसकी रोटी |

गोल-गोल होती है रोटी..!

दुनिया बनी ये काज रोटी

बाल-ग्वाल कमा रहे रोटी

सारा शहर रचा हे, रोटी,

गाँव- गाँव बना है रोटी |

गोल-गोल होती है…

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Added by Chetan Prakash on December 3, 2020 at 7:26am — 3 Comments

रफ़्तारे ज़िन्दगी

बड़ी तेज़ रफ़्तार है ज़िन्दगी की,मुट्ठी से फिसलती चली जा रही है 

उम्र की इस दहलीज़ पर जैसे,ठिठक सी गयी है,सिमट सी गयी है 

बीते हुए पुराने मौसम याद आ रहे हैं,हासिल क्या किया तूने समझा रहे हैं 

ऐ ज़िन्दगी तू ज़रा तो ठहर जा,जीने की कोई राह बता जा 

बचे जो पल हैं चंद ज़िन्दगी के,कैसे संवारूँ ज़रा तू बता जा 

जिन्दगी ने कहा कुछ यूँ मुस्कुरा कर,प्यार ख़ुद से तू कर ले दुनिया भुला कर 

परमात्मा से लौ तू लगा ले,जीवन का सच्चा आनन्द पा ले 

स्वर्णिम ये पल मत…

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Added by Veena Gupta on December 2, 2020 at 2:37am — 2 Comments

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