For any Query/Feedback/Suggestion related to OBO, please contact:- admin@openbooksonline.com & contact2obo@gmail.com, you may also call on 09872568228(योगराज प्रभाकर)/09431288405(गणेश जी "बागी")

March 2016 Blog Posts (173)

जब जब तुम्हारे पाँव ने रस्ता बदल दिया (ग़ज़ल)

बह्र : २२१२ १२११ २२१२ १२

 

जब जब तुम्हारे पाँव ने रस्ता बदल दिया

हमने तो दिल के शहर का नक्शा बदल दिया

 

इसकी रगों में बह रही नफ़रत ही बूँद बूँद

देखो किसी ने धर्म का बच्चा बदल दिया

 

अंतर गरीब अमीर का बढ़ने लगा है क्यूँ

किसने समाजवाद का ढाँचा बदल दिया

 

ठंडी लगे है धूप जलाती है चाँदनी

देखो हमारे प्यार ने क्या क्या बदल दिया

 

छींटे लहू के बस उन्हें इतना बदल सके

साहब ने जा के ओट में कपड़ा बदल…

Continue

Added by धर्मेन्द्र कुमार सिंह on March 31, 2016 at 11:36pm — 20 Comments

बस मैं जानूं या तुम जानो ......

बस मैं जानूं या तुम जानो ......



पीर पीर   को    क्या    जाने

नैन   विरह   से      अनजाने

वो दृग स्पर्श की अकथ कथा

बस   मैं   जानूं या तुम जानो ....... 



पल बीता  कुछ  उदास  हुआ

रुष्ट श्वास से  मधुमास   हुआ

क्यूँ दृगजल से घन बरस पड़े

बस  मैं  जानूं  या  तुम जानो ....... .

तुम   हर   पल   मेरे साथ थे

मेरी   श्वास   के  विशवास थे

क्यूँ   शेष   बीच  अवसाद रहे

बस  मैं   जानूं  या तुम जानो…

Continue

Added by Sushil Sarna on March 31, 2016 at 5:00pm — 12 Comments

रोग जैसे लग रही है।

बह्र:-2122-2122-2122-212



क्या कहेगे लोग आखिर मेरी गजलें देखकर।

मैं किसानों की तरह ही खुश हुँ फसलें देखकर।।



जिनके घर छप्पर पड़े हैं आदमी क्या वो नहीं।

रो रहे है कुछ अमीराँ अपनी नस्लें देखकर।।



कांपते होठों से मेरे सुगबुगाती बात सा।

जैसे कोई लिख रहा हो आज शक्लें देख कर।।



कुछ न होगा वक्त की जुल्मी हवा की जीत से।

कुछ गरीबाँ ही रहेगे पिछली नक्लें देखकर।।



रोग जैसे लग रही है आज की यह सभ्यता।

काँपने लगती है रूहें भी मिसालें… Continue

Added by amod shrivastav (bindouri) on March 31, 2016 at 1:11pm — 5 Comments

समय की मार से दो चार होंगे

1222/1222/122



समय की मार से दो चार होंगे।।

मेरे बच्चे तभी तैयार होंगे।।



मुहब्बत के खुले बाजार होंगे।

हमारे शेर तब अख़बार होंगे।।



न समझो दुश्मनों को काम जवानों।

नकाबों में छिपे ऐय्यार होंगे।।



जो मजहब की रही ऐसी ही हालत।

तो सच कहता हूँ हम बीमार होंगे।।



लगा की दीप रौशन कर मुहब्बत।

मेरा जुगनू सा सब परिवार होंगे।।



वो घूँघट में छिपा कर रुख मिले हैं।

लगा था इश्क में दीदार होंगे।।



जरा समझो हयाती इस… Continue

Added by amod shrivastav (bindouri) on March 31, 2016 at 9:12am — 6 Comments

ये जमीं से या जाँ से उठता है

फाइलुन फाइलुन मुफाईलुन

(212 212 1222)



ये जमीं से या जाँ से उठता है

जो धुआँ है कहाँ से उठता है



ये जो गर्दो गुबार है क्या है

क्यों ये फिर कारवाँ से उठता है



हर तरफ शोर सा ये है कैसा

क्यों सदा आसमाँ से उठता है



जख्म सीने में पल रहा कोई

दर्द दिल के मकाँ से उठता है



दो कदम साथ क्या चले रहबर

अब धुआँ आँ-जहाँ से उठता है

 

इश्क को उम्र लग गयी शायद

दर्द अब जिस्मो जाँ से उठता है



दर्द को आह से सुकूँ…

Continue

Added by Hem Chandra Jha on March 31, 2016 at 12:00am — 4 Comments

जाने कितना प्रश्न करती

2122 2122 2122 2122

जाने कितना प्रश्न करती, और हरदम खिलखिलाती।

अपने मन में पीर जाने, कौन सी वो है छिपाती।।



जब मिली ज़िंदा हुआ हूँ, जब मिली मैं गुनगुनाया।

हर दफ़ा कागज़-कलम, की राह मुझको है दिखाती।।



उसके शब्दों से कोई कागज़ कभी भी जब सजाया।

खूब है हर बार ही वो तो ग़ज़ल बनकर रिझाती।



चूमती नज़रों से जब, मदहोश हो जाता हूँ मैं।

क्या कहूँ पगली वो लड़की, मुझको पागल है बनाती।।



कोई उसको बोल भी दो, ठीक ये बिल्कुल नहीं है।

प्यास सदियों की… Continue

Added by Pankaj Kumar Mishra "Vatsyayan" on March 30, 2016 at 6:38pm — 8 Comments

कर्जा

कर्जा

दूर तक सुनहरा रंग चमक रहा है गेहूं की फसल पककर तैयार है। दूर दूर तक जहाँ तक नजर जाती है बस वो बूढा बरगद ही हरियाली का परचम उठाये है वरना हर तरफ सुनहरी चमक से आंखे चुंधिया जाए । मंद मंद बहती पुरवा के साथ गेहूं की बालियां लयबद्ध होकर झूम रही है । सूरज एकदम सर पर सवार है गरमी से बदन जल रहा है । लेकिन रामसुख को तनिक भी परवाह नहीं ,उसका हाथ एकदम तेजी से चल रहा है मानो हाथ में मोटर फिट हो सिर्फ हंसिया की कचर कचर ही गूंज रही है ।

चेहरे के पसीने को गमछे से पोंछकर सर पर रख लिया उसने और… Continue

Added by kumar gourav on March 30, 2016 at 5:43pm — 6 Comments


सदस्य टीम प्रबंधन
हार कर भी जीत जाने का भला क्या अर्थ है? ....ग़ज़ल// डॉ. प्राची

राज़ हर दिल में छुपाने का भला क्या अर्थ है ?

गैर पर हासिल लुटाने का भला क्या अर्थ है ?



हो बहुत विद्वान तुम, पर ये न समझोगे कभी

हार कर भी जीत जाने का भला क्या अर्थ है ?



प्यार में तकरार होना कर लिया मंज़ूर, पर

अजनबी सा पेश आने का भला क्या अर्थ है ?



देह मन का साथ छोड़े, स्वर जुदा हों सत्य से,

इस तरह रिश्ते निभाने का भला क्या अर्थ है ?



सच कहो जब खिलखिलाए एक अरसा हो गया,

जश्न खुशियों का मनाने का भला क्या अर्थ है ?



जम चुके… Continue

Added by Dr.Prachi Singh on March 30, 2016 at 11:32am — 6 Comments

रिश्तों की भाषा

"रिश्तों की भाषा"



"नहीं समीर, इतना आसान कहां होता है सब कुछ भूल पाना।" वर्षो पहले एक रात अचानक उसे छोड़ कर चले जाने वाला पति आज फिर सामने खड़ा सब भूलने की बात कर रहा था।

"तान्या ! मैं मानता हूँ कि मैं तुम्हारे प्रेम को नकारकर 'उसके' साथ चला गया था लेकिन अब मेरा उससे अलगाव हो चुका है और मैं हमेशा के लिए तुम्हारे पास लौट आना चाहता हूँ।" उसकी आवाज और आँखे दोनों में अधिकार भरी याचना नज़र आ रही थी।

"आज तुम लौटना चाहते हो लेकिन उस समय तुमने एक बार भी नहीं सोचा कि मेरा क्या होगा ?… Continue

Added by VIRENDER VEER MEHTA on March 29, 2016 at 7:06pm — 8 Comments

मोरे पिया

हाथों को मेरे तुम थाम लो

मेरा ही बस तुम नाम लो

कानों में अमृत रस घोलो

मैं सुनती रहूँ बस तुम बोलो|

 

केशों को मेरे तुम सहलाओ

बातों से मेरा जी बहलाओ

बादल तुम नेह के बरसाओ

नैनों में छिपा लूँ आ जाओ|

 

नज़रों से मुझे तुम पढ़ते रहो

नित स्वप्न सुरीले गढ़ते रहो

आगे ही आगे बढ़ते रहो

सोपान ह्रदय के चढ़ते रहो|

 

जीवन की मुझे तुम आस दो

नेह का अपने विश्वास दो

यौवन का मुझे मधुमास दो…

Continue

Added by sarita panthi on March 29, 2016 at 6:52pm — 5 Comments

बेवफाई ....

बेवफाई ....

एक जानवर

अपने मालिक को

इंसान समझने की

गलती कर बैठा

उसे अपना खुदा समझ बैठा

वक्त बेवक्त उसकी रक्षा करने को

अपना फर्ज समझ बैठा

उसके हर इशारे पर

जानवर होते हुए भी

खुद को न्योछावर कर बैठा

डाल दिये टुकड़े तो खा लिए

वरना खामोशी से

अपने पेट से समझोता कर बैठा

अपने दर्द को

अपने कर्मों की सजा समझ बैठा

जगता रहा वो रातों को

ताकि मालिक चैन से सो सके

इक जरा सी गलती ने

मालिक ने उसकी पीठ पर

जानवर का…

Continue

Added by Sushil Sarna on March 29, 2016 at 2:53pm — 2 Comments

ज़िंदगी ही हो गयी क़ातिल करूँ तो क्या करूँ

हो गया दिल इश्क़ में बिस्मिल करूँ तो क्या करूँ

ज़िंदगी ही हो गयी क़ातिल करूँ तो क्या करूँ



इक तेरे दर के सिवा लगता नहीं है दिल कहीं

रास आती है नहीं महफिल करूँ तो क्या करूँ



तू ही साँसों में है धड़कन मे ख़यालों में है तू

बस तुम्ही को चाहता है दिल करूँ तो क्या करूँ



लीक से हटकर अलग चलने की है फ़ितरत मिरी

भीड़ में होता नहीं शामिल करूँ तो क्या करूँ



इक तेरे जाने से रस्ते हो गए मुश्किल मिरे

दूर अब लगने लगी मंज़िल करूँ तो क्या… Continue

Added by डॉ. सूर्या बाली "सूरज" on March 29, 2016 at 10:00am — 8 Comments

ग़ज़ल - सबके चेहरों को देखते आये

आज बस में खड़े खड़े आये
सबके चेहरों को देखते आये ।

पिछली यादें तलाश करते हुए
हम तेरे शहर में चले आये ।

और कुछ काम भी नहीं मुझको,
आज मिलने ही आपसे आये ।

जैसे कुछ खो गया था मेरा यहाँ
हर गली मोड़ देखते आये ।

मेरी औक़ात क्या महब्बत में
इस जहाँ में बड़े बड़े आये ।

मौलिक व अप्रकाशित

Added by सूबे सिंह सुजान on March 28, 2016 at 11:00pm — 5 Comments

कौन सी कौम उसे फिर से दुशाला देगी - ग़ज़ल

212         2112          2112     222



सोच अच्छी हो तो मस्जिद या शिवाला देगी

तंग  हो  और अगर  खून का  प्याला देगी।1।



लाख  अनमोल  कहो  यार  ये हीरे लेकिन

पर हकीकत  है कि मिट्टी  ही निवाला देगी।2।



जब हमें भोर में आँखों ने दिया है धोखा

कौन कंदील जो  पावों  को  उजाला देगी।3।



आशिकी यार तबायफ की करोगे गर जो

स्वर्ग से घर में नरक सा ही बवाला देगी।4।



आप हम खूब लडे़ खून बहाना मकसद

राहेरौशन तो जमाने  को  मलाला देगी।5।…

Continue

Added by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on March 28, 2016 at 3:00pm — 3 Comments

पद्य-शृंगारिक एवं कृष्ण-स्तुति

(1)

चंद्रमुखी! हे मृगनयनी! क्या यौवन-रूप सजाया है।
ओष्ठ-अरुण मधुरस के प्याले, सुंदर कंचन-काया है।
लोच कमरिया-इंद्रधनुष, लट-केश घटा की छाया है।
कटि गगरी धर जाने वाली, तूने हृदय चुराया है।

(2)

मुरलीधर धर मुरली अधरन, ग्वालिंन को नचावत हो।
विश्वम्भर भर प्रेम हृदय में, राधा को रिझावत हो।
चक्रपाणि पाणि चक्र धर, अधर्म को मिटावत हो।
दामोदर दर-दर भटकूँ मैं, क्यों न मोहि उबारत हो?

-रामबली गुप्ता
मौलिक एवं अप्रकाशित

Added by रामबली गुप्ता on March 28, 2016 at 3:00pm — 6 Comments


सदस्य टीम प्रबंधन
भ्रम भुला दो तुम ज़रा...ग़ज़ल// डॉ. प्राची

2122,2122,2122,212



ताज है या एक सूली ये बता दो तुम ज़रा।

इश्क के हर राज़ से पर्दा उठा दो तुम ज़रा।



होश में हूँ अब तलक इस बात पर हैराँ हो क्यों?

इश्क है गर नीँद तो मुझको सुला दो तुम ज़रा।



फूल की हर सेज पर तो चल चुके अब तक बहुत,

है चुभन गर इश्क तो, काँटे बिछा दो तुम ज़रा।



मेरी हस्ती आज भी मुझमें बची ज़िंदा कहीं,

इश्क है मिटना अगर, मुझको मिटा दो तुम ज़रा।



मेरी इन वीरानियों में चित्र कोई बन सके,

ख्वाब कुछ रंगीन पलकों पर सजा दो… Continue

Added by Dr.Prachi Singh on March 28, 2016 at 1:26pm — 6 Comments

जहाँ हो मुहब्बत वहीं डूब जाना (ग़ज़ल)

१२२ १२२ १२२ १२२

 

मेरी नाव का बस यही है फ़साना

जहाँ हो मुहब्बत वहीं डूब जाना

 

सनम को जिताना तो आसान है पर

बड़ा ही कठिन है स्वयं को हराना

 

न दिल चाहता नाचना तो सुनो जी

था मुश्किल मुझे उँगलियों पर नचाना

 

बढ़ा ताप दुनिया का पहले ही काफ़ी

न तुम अपने चेहरे से जुल्फ़ें हटाना

 

कहीं तोड़ लाऊँ न सचमुच सितारे

सनम इश्क़ मेरा न तुम आजमाना

 

ये बेहतर बनाने की तरकीब उसकी

बनाकर मिटाना…

Continue

Added by धर्मेन्द्र कुमार सिंह on March 28, 2016 at 9:49am — 16 Comments

अमासी रात मेरे घर के तारे ..

बह्र:-1222-1222-1222-1222

अमासी रात मेरे घर के तारे छीन लेती है।।

तूफानी रात आये तो गुजारे छीन लेती है।।



मैं आँखें बन्द रखता हूँ मेरी यादें छुपा कर के।

खुला पाती है जब भी वो नज़ारे छीन लेती है।।



मेरी किस्मत को ऐ मालिक कभी उम्दा भी लिख्खा कर।

ये हसरत जिन्दगानी के सहारे छीन लेती है।।



नशा जिनको है दौलत का उन्हें कोई ये समझाए।

ये लत हमसे जरुरत में हमारे छीन लेती है।।



नहीं है हमजुबां कोई मेरा इस दौर हाजिर में।

कसक इतनी मेरे… Continue

Added by amod shrivastav (bindouri) on March 27, 2016 at 3:58pm — 10 Comments

गीत-प्रीतम सपने में आये थे

प्रीतम सपने में आये थे।

सखि! मुझको बड़ा सताये थे।।

सुंदर वसन सजा तन पर,

वे मंद-मंद मुस्काये थे।

प्रीतम सपने में आये थे।

स्नेह-सेज पर सोई थी।

यादों मे उनके खोई थी।

नयनों ने पट ज्यों बंद किये।

उनके ही दर्शन पाये थे।

प्रीतम सपने में आये थे।

साँवली सूरत नैन विशाल।

लख छवि सखि! मैं हुई बेहाल।।

मणियों की माला साजे उर।

कंदर्प-रूप धरि आये थे।

प्रीतम सपने में आये थे।

प्यारी-प्यारी बातें कीन्हां।

बाहों में मुझको भर… Continue

Added by रामबली गुप्ता on March 27, 2016 at 2:51pm — 5 Comments


सदस्य कार्यकारिणी
उड़नेवाले इक परिंदे का मुकद्दर देखिये- ग़ज़ल

2122 2122 2122 212

नातवाँ जिस्म और ये बिखरे हुये पर देखिये

उड़ने वाले इक परिन्दे का मुकद्दर देखिये



बीज मैंने बो दिया है हसरतों के खेत में

मुझको कब होती है फ़स्ले गुल मयस्सर देखिये



किस तरफ़ ले जा रहा है आपको ये रास्ता

रुकिये थोड़ा, और नज़रों को घुमाकर देखिये



दिल हुआ जाता है मेरा आइने सा पुरख़ुलूस

फूल मिलते हैं मुझे या कोई पत्थर देखिये



दूसरों में ऐब कोई ढूँढते हैं आप गर

मशविरा है मेरा पहले अपने अंदर देखिये



ये… Continue

Added by शिज्जु "शकूर" on March 27, 2016 at 7:00am — 11 Comments

Monthly Archives

2018

2017

2016

2015

2014

2013

2012

2011

2010

1999

1970

कृपया ध्यान दे...

आवश्यक सूचना:-

1-सभी सदस्यों से अनुरोध है कि कृपया मौलिक व अप्रकाशित रचना ही पोस्ट करें,पूर्व प्रकाशित रचनाओं का अनुमोदन नही किया जायेगा, रचना के अंत में "मौलिक व अप्रकाशित" लिखना अनिवार्य है । अधिक जानकारी हेतु नियम देखे

2-ओपन बुक्स ऑनलाइन परिवार यदि आपको अच्छा लगा तो अपने मित्रो और शुभचिंतको को इस परिवार से जोड़ने हेतु यहाँ क्लिक कर आमंत्रण भेजे |

3-यदि आप अपने ओ बी ओ पर विडियो, फोटो या चैट सुविधा का लाभ नहीं ले पा रहे हो तो आप अपने सिस्टम पर फ्लैश प्लयेर यहाँ क्लिक कर डाउनलोड करे और फिर रन करा दे |

4-OBO नि:शुल्क विज्ञापन योजना (अधिक जानकारी हेतु क्लिक करे)

5-"सुझाव एवं शिकायत" दर्ज करने हेतु यहाँ क्लिक करे |

6-Download OBO Android App Here

हिन्दी टाइप

New  देवनागरी (हिंदी) टाइप करने हेतु दो साधन...

साधन - 1

साधन - 2

Latest Activity

Nilesh Shevgaonkar commented on Nilesh Shevgaonkar's blog post ग़ज़ल नूर की- बहुत आसाँ है दुनिया में किसी का प्यार पा लेना,
"धन्यवाद आ. समर सर,मैंने अपनी प्रति में  सुधार कर लिया है सादर "
1 hour ago
Samar kabeer commented on डॉ छोटेलाल सिंह's blog post अतुकांत
"जनाब डॉ.छोटेलाल सिंह जी आदाब,बहुत बढ़िया अतुकान्त कविता लिखी आपने,इस प्रस्तुति पर बधाई स्वीकार करें ।"
1 hour ago
Samar kabeer commented on Nilesh Shevgaonkar's blog post ग़ज़ल नूर की- बहुत आसाँ है दुनिया में किसी का प्यार पा लेना,
"जनाब निलेश 'नूर' साहिब आदाब,बहुत उम्दा ग़ज़ल हुई है,दाद के साथ मुबारकबाद पेश करता हूँ । 4थे…"
1 hour ago
Samar kabeer commented on Kumar Gourav's blog post क्षितिज
"जनाब कुमार गौरव जी आदाब,सुंदर प्रस्तुति हेतु बधाई स्वीकार करें ।"
1 hour ago
Samar kabeer commented on TEJ VEER SINGH's blog post तन की बात - लघुकथा –
"जनाब तेजवीर सिंह जी आदाब,बहुत बढ़िया लघुकथा,इस प्रस्तुति पर बधाई स्वीकार करें ।"
1 hour ago
vijay nikore commented on vijay nikore's blog post गुलज़ार प्यार का
"आपका हार्दिक आभार, आदरणीय आशुतोष जी"
1 hour ago
vijay nikore commented on vijay nikore's blog post गुलज़ार प्यार का
"आपका हार्दिक आभार, आदरणीय शेख शहजाद उस्मानी जी"
1 hour ago
Samar kabeer commented on Nand Kumar Sanmukhani's blog post ग़ज़ल
"'वो पहले भी दोस्त नहीं था' इस मिसरे को बदलने का प्रयास करें ।"
1 hour ago
Nilesh Shevgaonkar commented on Nilesh Shevgaonkar's blog post ग़ज़ल नूर की- बहुत आसाँ है दुनिया में किसी का प्यार पा लेना,
"धन्यवाद आ, तेजवीर सिंह जी आभार"
1 hour ago
Nilesh Shevgaonkar commented on Nand Kumar Sanmukhani's blog post ग़ज़ल
"आदरणीय नंद कुमार जी, एक ग़ज़लकार होने के नाते मैं भी इसी दुविधा से दोचार होता हूँ। मुझे लगता है कि…"
1 hour ago
TEJ VEER SINGH commented on Kumar Gourav's blog post क्षितिज
"हार्दिक बधाई आदरणीय कुमार गौरव जी।बेहतरीन प्रस्तुति।आज की ज्वल्लंत समस्या को आइने में उतारती लघुकथा।"
2 hours ago
Nand Kumar Sanmukhani commented on Nand Kumar Sanmukhani's blog post ग़ज़ल
"आदरणीय Nilesh Shevgaonkar जी, सादर नमस्कार । मेरे ग़ज़ल के बारे में आपका जो भी मत बना है, उसका मैं…"
2 hours ago

© 2018   Created by Admin.   Powered by

Badges  |  Report an Issue  |  Terms of Service