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प्रधान संपादक
तुम क्या हो? (अतुकांत कविता)

तुम क्या हो?    

किसी समुद्री मछली के उदर में

किसी ब्रह्मचारी के पथभ्रष्ट शुक्राणु का अंश मात्र

किन्तु उसका निषेचन?

अभी बहुत समय बाकी है उसमे  

बहुत.....

हे प्रिये!

बुरा नहीं स्वयं को सर्वश्रेष्ठ समझना

अमरत्व का दिवा-स्वप्न भी बुरा नहीं

किन्तु समझना आवश्यक है

यह जान लेना आवश्यक है कि

अमर होने ने लिए मरण आवश्यक है

मरण हेतु जन्म अति आवश्यक

फिर तुम्हें तो अभी जन्म लेना है

जन्म लेने से पूर्व…

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Added by योगराज प्रभाकर on December 14, 2016 at 12:42pm — 7 Comments

गजल(आँधियों से बेखबर पत्ते बहुत..)

2122 2122 212

आँधियों से बेखबर पत्ते बहुत

रह गये जो झेलते सहमे बहुत।1



मौन हो बहती हवा,पुचकारती,

अनकहे सब राज हैं गहरे बहुत।2



बेसबर खुद में समंदर डूबता

तैरते हैं बेधड़क तिनके बहुत।3



बह रहा पानी बना सब देखिये,

जो सँजोये लुट गये सपने बहुत।4



डर गये अपना जताने से यहाँ,

वाकये ऐसे हुए अब के बहुत।5



भागते फिरते अँधेरे रात के

रोशनी के जा रहे सदके बहुत।6



सींचने का अब समय तो आ गया

जड़ कटी है पेड़ की पहले… Continue

Added by Manan Kumar singh on December 14, 2016 at 9:08am — 6 Comments

रेशम से रिश्ते ...

रेशम से रिश्ते ....

न हवा

न आंधी

धूप का कहर

तमतमाई वसुधा

शज़र के शीर्ष से

गिरा

बे-दम सा

एक

ज़र्द पत्ता

इतना भी

क्या अफ़सोस

बोली

नयी कोपल

दर्द पे

शज़र के



एक हल्की सी ज़ुब्मिश

शज़र बोला

बाद गुज़रने के

इतनी लंबी उम्र

अब

रिश्तों की

समझ आयी है



तू

अभी नयी है

तू

मुझे भी कहाँ जान पायी है

छोड़ के देख

मेरी उंगली को

तुझे दर्द की…

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Added by Sushil Sarna on December 13, 2016 at 9:06pm — 4 Comments


सदस्य कार्यकारिणी
पूंजियों की सीरतें भी काली गोरी देखिये(ग़ज़ल 'राज '

2122  2122  2122  212

कर की चोरी देखिये जी धन की चोरी देखिये

लूटकर पकड़े गये तो जब्रजोरी देखिये

 

नोट्बंदी देखिये जी नोट खोरी देखिये

पूंजियों की सीरतें  भी काली गोरी देखिये

 

नोट्बंदी का हथौड़ा ऐसा बैठा पीठ पर

भ्रष्टता की सरबसर टूटी तिजोरी देखिये

 

बह रहे हैं नोट सारे वो पुराने हर जगह

क्या समन्दर क्या नदी तालाब मोरी देखिये

 

लूटखोरी की बदौलत खत्म पैसे बैंक में

 लाइनों की टूटती अब आस…

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Added by rajesh kumari on December 13, 2016 at 12:08pm — 19 Comments

वागीश्वरी सवैये

वागीश्वरी सवैये सूत्र : यगण X 7 + ल गा



अभी तो अकेले चले हैं मियाँ जी ,न कोई वहां है न कोई यहां ।

यहां कौन है जो बताये जहां को,कि बाबू चले हैं अकेले कहां ।



जहाँ जा रहे हैं रहेंगे अकेले,मिलेगा न साथी उन्हें तो वहाँ ।

पता है हमें ख़ूब यारों यक़ीं है, करेगा उन्हें याद सारा जहाँ ।।

_________



निगाहें उठाके ज़रा देख तो लो ,बताओ यहाँ क्यूँ अकेले खड़े ।

हमें ये बता दो बिना बात के ही,भला जान देने यहाँ क्यूँ अड़े।



जहाँ में न कोई हमें तो मिला…

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Added by Samar kabeer on December 12, 2016 at 11:30pm — 18 Comments

ग़ज़ल - हो सके तो ऐ ख़ुदा एहसान कर

2122 2122 212



मौत का मेरे नया फरमान कर ।

हो सके तो ऐ खुदा एहसान कर ।।



जिंदगी तो काट दी मुश्किल में, अब

रास्ता जन्नत का तो आसान कर ।।



जी रहा है आदमी किस्तों में अब ।

धड़कनो की बन्द यह दूकान कर ।।



टूट जाती हैं उमीदें सांस की।।

खत्म तू बाकी बचा अरमान कर ।।



हसरतें सब बेवफा सी हो गईं ।

आसुओं के दौर से अनजान कर ।।



हार जाता है यहां हर आदमी।

क्या करूँगा मौत को पहचान कर ।।



है गरीबी से मेरा रिश्ता…

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Added by Naveen Mani Tripathi on December 12, 2016 at 11:30pm — 14 Comments

ख़ुदा की खोज में निकले जो, राम तक पहुँचे (ग़ज़ल)

बह्र : 1212 1122 1212 22

 

प्रगति की होड़ न ऐसे मकाम तक पहुँचे

ज़रा सी बात जहाँ कत्ल-ए-आम तक पहुँचे

 

गया है छूट कहीं कुछ तो मानचित्रों में

चले तो पाक थे लेकिन हराम तक पहुँचे

 

वो जिन का क्लेम था उनको है प्रेम रोग लगा

गले के दर्द से केवल जुकाम तक पहुँचे

 

न इतना वाम था उनमें के जंगलों तक जायँ

नगर से ऊब के भागे तो ग्राम तक पहुँचे

 

जिन्हें था आँखों से ज़्यादा यकीन कानों पर

चले वो भक्त से…

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Added by धर्मेन्द्र कुमार सिंह on December 12, 2016 at 11:28pm — 13 Comments

यादों का सफर ...

यादों का सफर ...

मैं

चलता रहा

हर उस रास्ते पर

जहां पर आज

खिजाओं के डेरे थे



मैं

चलता रहा

हर उस रास्ते पर

जहां आज

उजालों में अंधेरे थे



मैं

चलता रहा

हर उस रास्ते पर

जहां आज

सिर्फ

यादों के घेरे थे



मैं

रुक गया

चलते चलते

जहां मंज़िल ने

मुँह मोड़ा था



मैं

हंस पड़ा

उस खार की अदा पर

जिसके दर्द में

यादों के डेरे थे



मैं…

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Added by Sushil Sarna on December 12, 2016 at 9:00pm — 6 Comments

ग़ज़ल (हमें गुज़रा ज़माना याद आया ) -----------------------------------------------



ग़ज़ल (हमें गुज़रा ज़माना याद आया )

-----------------------------------------------

मफाईलुन---मफाईलुन---- फऊलन

मुहब्बत का फसाना याद आया |

हमें गुज़रा ज़माना याद आया |

बनी है जान की दुश्मन शबे गम

कोई साथी पुराना याद आया |

शबे गम चैन भी आएगा कैसे

वो फिर ज़ालिम यगाना याद आया |

न जब इज़्ज़त मिली परदेस जा कर

वतन का आब दाना याद आया |

मिलीं जब ठोकरें हर एक दर से

मुझे उनका ठिकाना याद आया…

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Added by Tasdiq Ahmed Khan on December 12, 2016 at 7:21pm — 12 Comments

मुझ पर भी गिरी है एक बिजली

 

आकाश से

गिरती है बिजली

और एक हरा भरा पेड़

अचानक बदल जाता है

एक काले ठूंठ में

भीतर तक

 

किसी काम नहीं आती

वह जली लकड़ी

सिवाय सुलगने के

धुवां छोड़ने के 

अपने अंतिम सांस तक

और रह जाता है एक

अलिखित शिलालेख

ध्वंस का इतिहास समेटे

मौन स्तब्ध उदास जड़

निर्जीव

 

हमारे पूर्वज

लीपते थे गोबर से

माटी के घर

और उसकी दीवारें

क्योंकि वह मानते…

Continue

Added by डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव on December 12, 2016 at 6:09pm — 4 Comments

चाँद बेनूर वफ़ा शर्म हया के हद में, (ग़ज़ल)

बहरे रमल मुसम्मन मखबून महजूफ,

2122 1122 1122 22,

इश्क तो पाक था बेदाद हुआ जाता है।

कातिले फ़ौज ही आजाद हुआ जाता है। 1

-------

चाँद बेनूर वफ़ा शर्म हया की हद में,

जुल्म कर अब्र ये आजाद हुआ जाता है। 2

------

लाख ही यत्न करो मर्ज बढ़ा ही जाए,

बात बेबात ही जेहाद हुआ जाता है। 3

------

हो रही खाक लगी आग बसारत देखो,

था बशर मोम का बर्बाद हुआ जाता है। 4

------

ऐ खुदा शाद अता रूह को फ़रमा देना,

अब जुदा जीभ से हर स्वाद हुआ जाता है।… Continue

Added by सुनील प्रसाद(शाहाबादी) on December 12, 2016 at 4:00pm — 18 Comments

निशानों में .....

निशानों में .....

आंखें बन्द
मुट्ठियों भिची हुई
अंतस में शोर
अपने रुद्र रूप में
तलाश
बीते लम्हों की
खो गए जो
अपने साथ लिए
जन्मों के वादे
सागर किनारे
गीली रेत पे
छूटे
गीले पाँव के
निशानों में

सुशील सरना
मौलिक एवम अप्रकाशित

Added by Sushil Sarna on December 12, 2016 at 2:29pm — 8 Comments

बड़े होकर मैं - ( लघुकथा ) जानकी बिष्ट वाही

" ऐ भाई ... दे दे ना ..."

"फिर आ गया तू ! चल भाग यहाँ से।"

" भाई ! एक दे दे ना,तुमको तो रोज बहुत मिलता है।"

" तेरी समझ में नहीं आता? ये जगह बच्चों के लिए नहीं ... अरे ! अभी भी यहीं खड़ा है ? लगाऊँ क्या एक ?"

" भाई ! आप बहुत अच्छे हो !एक दे दो, फिर नहीं आऊँगा यहाँ ।" अब उस लगभग बारह साल के बच्चे ने मस्का लगाने की कोशिश की।

" बड़ा ज़िद्दी है।कौन - कौन है तेरे घर में ?"

" माँ,छोटी बहन और मैं ।"

" और तेरा बाप ?"

" वो तो हमें छोड़ कर चला गया।उसने दूसरी शादी कर ली।"…

Continue

Added by Janki wahie on December 12, 2016 at 12:00pm — 21 Comments

अल्फाज से मगर ये छिपाया नही गया

*बह्र 221 2121 1221 212*



था नाम दिल पे दर्ज मिटाया नहीं गया

आँखों से मेरा प्यार छुपाया नहीं गया।।



कल को सँवारने में गई बीत ज़िन्दगी

जो सामने था लुत्फ़ उठाया नही गया।।



कोशिश बहुत की, राज़े मुहब्बत अयाँ न हो।

अल्फाज से मगर ये छिपाया नहीं गया।।



बीवी बहन न कोई मिलेगी बहू तुम्हे

बेटी को कोख में जो बचाया नहीं गया।।



मंदिर में जाके भोज कराने से फायदे?

माँ बाप को तो तुमसे खिलाया नहीं गया।।



पलको से रोकने की हुई… Continue

Added by नाथ सोनांचली on December 12, 2016 at 7:28am — 10 Comments

लघु कथा(गुमान)

#गुमान#(लघु कथा)

***

सुषमा ने तकिया समीर के सिरहाने कर दी थी।अपना सिर किनारे पर रखा था जो कभी ढुलक कर तकिये से उतर गया था।दोनों गहरी निद्रा में निमग्न थे।अचानक समीर ने करवट बदली।दोनों के नथुने टकराये।उसे आभास हुआ कि सुषमा का सिर तकिया पर नहीं, नीचे है।उसने आँखें खोली। उसे महसूस हुआ ,सुषमा दायीं करवट लेटी थी।उसकी उष्ण साँसें समीर को अच्छी लगीं।वह उसे तकिये पर लाने की कोशिश करने लगा।हालांकि वह चाहता था कि काम भी हो जाये और सुषमा की निद्रा भंग भी न हो।पर जैसे उसने उसे बाँहों में लेकर… Continue

Added by Manan Kumar singh on December 11, 2016 at 1:12pm — 11 Comments

एक ग़ज़ल

काफिया: अल ;रदीफ़ :गया

बह्र : २२ २२ २२ २२ २२

नव यौवन चंचल चितवन फिसल गया

यौवन की धूप खिली मन पिघल गया |

तेरे नैनों ने  किया इशारा कुछ

निश्छल मृदु दिल तो मेरा मचल गया |

मखमल सी आवाज़ की तारीफ करूँ

कर्ण प्रवेश से पत्थर दिल पिघल गया |

हम कैसे कह दे के तू  बेवफ़ा है 

तेरा गफलत ही प्यार को कुचल गया |

आक्रोश भरा रूप कभी न दिखाओ

देख रौद्र रूप मेरा दिल दहल गया |

है…

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Added by Kalipad Prasad Mandal on December 10, 2016 at 10:30pm — 8 Comments

ग़ज़ल : दिल के पन्नों पर

2122  2122  2122  212
दिल के पन्नों पर तुम्हारी याद उभरी जाय है,
तुम नहीं तो हर ख़ुशी अब ग़म में ढलती जाय है,
 
मैंने मुठ्ठी में कभी बाँधा नहीं पर जिन्दगी,
रेत की मानिंद हाथों से…
Continue

Added by Anita Maurya on December 10, 2016 at 10:00am — 6 Comments

बुद्धिजीवियों की एक ही हसरत

बुद्धिजीवियों की एक ही हसरत

सुख समृद्धि को देश में है लाना ।

संभालकर रखना अपनी विरासत,

आपसी झगड़ों से सबको बचाना ।   

इसके लिए खुद से करते कसरत

बिना किए कभी कोई भी बहाना ।

कोसों दूर रहती है इनसे मुसीबत 

मिलती इन्हे खुशियों का खजाना ।

सभी लोग जानते इनकी हकीकत

आलसी सदा करते अनेकों बहाना ।

ऐसे लोगों की होती एक फितरत

दूसरों की कमी पर उंगली उठाना ।  

समाज को दिखाते अपनी लियाकत,

समाज के सुधार से सदा मुंह…

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Added by Ram Ashery on December 10, 2016 at 9:30am — 4 Comments

बस यूं ही

बस यूं ही

इत्तेफाक से



कभी हम मिले

कभी वो मिले

कुछ हम चले

कुछ वो चले



बस यूं ही

इत्तेफाक से



कभी हम बोले

कभी वो बोले

कभी हम सुने

कभी वो सुने



बस यूं ही

इत्तेफाक से



कभी हम देखें

कभी वो देखे

कुछ हम खुलें

कुछ वो खुलें



बस यूं ही

इत्तेफाक से



कभी हम सहे

कभी वो सहे

कहीं हम मुड़े

कहीं वो मुड़े



बस यूं ही

इत्तेफाक से



कुछ हम… Continue

Added by chandramauli pachrangia on December 9, 2016 at 12:19pm — 2 Comments

अदृश्य जीत (लघुकथा)

जंगल के अंदर उस खुले स्थान पर जानवरों की भारी भीड़ जमा थी। जंगल के राजा शेर ने कई वर्षों बाद आज फिर खरगोश और कछुए की दौड़ का आयोजन किया था।

 

पिछली बार से कुछ अलग यह दौड़, जानवरों के झुण्ड के बीच में सौ मीटर की पगडंडी में ही संपन्न होनी थी। दोनों प्रतिभागी पगडंडी के एक सिरे पर खड़े हुए थे। दौड़ प्रारंभ होने से पहले कछुए ने खरगोश की तरफ देखा, खरगोश उसे देख कर ऐसे मुस्कुरा दिया, मानों कह रहा हो, "सौ मीटर की दौड़ में मैं सो जाऊँगा क्या?"

 

और कुछ ही क्षणों में दौड़ प्रारंभ…

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Added by Dr. Chandresh Kumar Chhatlani on December 8, 2016 at 6:35pm — 14 Comments

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