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कन्या दान

कन्या दान के बाद से बिदाई तक लगातार रोती रही । रोते रोते सोफे पर बेसुध सी पडी़ रही।सभी बिदाई में व्यस्त जो थे।

दादा जी ने गोदी में उठाया,"उठ बिट्टो खाना खा ले, बुआ तो गई।"

तुनक कर गुस्से से बोली "नहीं कुछ नहीं खाउंगी आपने मेरी कल्लो बुआ और लाली बछिया दोनों को दान में दे दिया।बुआ को दूल्हा अपने साथ ले गया।"

"बुआ की शादी हुई है बिट्टो,बे तुम्हारे फूफा जी है।"

"कोई फूफा जी नहीं, मैं और बुआ दोनों रोते रहे फिर भी बुआ को साथ ले गए।"

"अगले हफ्ते ले आयेगे बुआ को।"

"अब…

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Added by Pawan Jain on April 17, 2016 at 7:30am — 5 Comments

ग़ज़ल

22 22 22 22

मुझसे रोज़ कहा करता है।
दिल में इक दरिया रहता है।।

बे मौसम बारिस भी होगी।
आँखों का काज़ल कहता है।।

सूरज शायद गुस्से में है।
गर्मी में ज्यादा तपता है।।

उसकी भी मज़बूरी होगी।
अंदर ही अंदर घुटता है।

मुझको पूछ रहा था वो।
आँखों से ये क्या बहता है।।

राम शिरोमणि पाठक
मौलिक/अप्रकाशित

Added by ram shiromani pathak on April 16, 2016 at 2:25pm — 2 Comments

पुल बने हैं कागजों पर कागजों पर ही नदी -ग़ज़ल

2122 2122 2122 212

खोटा सिक्का हो गया है आज अय्यारों का फन

हर तरफ  छाया  हुआ है  आज बाजारों का फन

कर रही है अब समर्थन पप्पुओं की भीड़ भी

क्या गजब ढाने लगा है आज गद्दारों का फन

हौसला  देते  जरा  तो  क्या  गजब  करती  सुई

आजमाने में लगे सब किन्तु तलवारों का फन

पुल  बने  हैं  कागजों  पर  कागजों पर ही नदी

क्या गजब यारो यहा आजाद सरकारों का फन

पास जाती नाव है जब साथ नाविक छोड़ता

आपने देखा न होगा यार…

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Added by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on April 16, 2016 at 11:21am — No Comments

ग़ज़ल -- ख़बर कहाँ थी मुझे पहले इस ख़ज़ाने की ( दिनेश कुमार )

1212--1122--1212--22





ख़बर कहाँ थी मुझे पहले इस ख़ज़ाने की

ग़मों ने राह दिखाई .........शराबख़ाने की



चराग़े--दिल ने की हसरत जो मुस्कुराने की

तो खिलखिला के हँसी आँधियाँ ज़माने की



मैं शायरी का हुनर जानता नहीं ....बेशक

अजीब धुन है मुझे क़ाफ़िया मिलाने की



वजूद अपना मिटाया किसी की चाहत में

बस इतनी राम कहानी है इस दिवाने की



वो घोसला भी बनाएगा बाद में ...अपना

अभी है फिक्र परिन्दे को आबो-दाने की



मैं अश्क बन… Continue

Added by दिनेश कुमार on April 15, 2016 at 6:08pm — 4 Comments

बाबा हम शर्मिंदा

चिंचोली की दशा देखकर बाबा हम शर्मिंदा हैं

छद्म भेष में प्रतिद्वंदी समाज को धोखा देता है

स्ंग्रहालय के संरक्षण मे करते कितना खोट

कुर्सी के लालच में फंस समाज पे करते चोट  

जर-जर होकर फट रही आज तेरी टाई कोट

तेरी निशानी मिटती देख बाबा हम शर्मिंदा है

चिंचोली की दशा देखकर बाबा हम शर्मिंदा हैं

छद्म भेष में प्रतिद्वंदी समाज को धोखा देता है

टंकण मशीन धूल खा रही मेरे कर्मो में खोट

भारत का संविधान लिख बाबा ने किया भेंट

तेरी धरोहर आज…

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Added by Ram Ashery on April 15, 2016 at 3:30pm — No Comments

तुम तो जिगरी यार हो

तुम तो जिगरी यार हो

==================

दोस्त बनकर आये हो तो

मित्रवत तुम दिल रहो

गर कभी मायूस हूँ मैं

हाल तो पूछा करो ..?

-------------------------------…

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Added by SURENDRA KUMAR SHUKLA BHRAMAR on April 15, 2016 at 1:00pm — 4 Comments

दिनरात चिरागों सा जला अपने वतन में

बह्र:-221-1221-1221-122



रुतबा -ए-उजाला है मिया अपने वतन में।

अब चैन मुहब्बत ओ मजा अपने वतन में।



अनपढ़ सा अंधेरा है मिटा अपने वतन में।

जैसे कोई खलिहान सजा अपने वतन में।।



वो रोज मुझे याद है वो ख़ूनी नजारा।

जब जुल्म से इन्सान लड़ा अपने वतन में।।



मुश्किल से हवा देश में लौटी है अमन की।

मजहब की न अब आग लगा अपने वतन में।।



बस चैन मुहब्बत -ओ-दुआ फर्ज के खातिर।

दिन रात चिरागों को जला अपने वतन में।।



आमोद… Continue

Added by amod shrivastav (bindouri) on April 15, 2016 at 12:00am — 9 Comments

जहाँ में पाप जो पर्वत समान करते हैं (ग़ज़ल)

बह्र : 1212 1122 1212 22

 

जहाँ में पाप जो पर्वत समान करते हैं

वो मंदिरों में सदा गुप्तदान करते हैं

 

लहू व अश्क़, पसीने को धान करते हैं

हमारे वास्ते क्या क्या किसान करते हैं

 

कभी मिली ही नहीं उन को मुहब्बत सच्ची

जो अपने हुस्न पे ज़्यादा गुमान करते हैं

 

गरीब अमीर को देखे तो देवता समझे

यही है काम जो पुष्पक विमान करते हैं

 

जो मंदिरों में दिया काम आ सका किसके?

नमन उन्हें जो सदा रक्तदान करते…

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Added by धर्मेन्द्र कुमार सिंह on April 14, 2016 at 10:10pm — 14 Comments

तुम गए तो प्राण का जाना लिखा

तुम गए तो प्राण का जाना लिखा

बिन तेरे निःश्वांस हो जाना लिखा।

देखिये ना प्रेम की जादूगरी

स्वयं को मीरा तुम्हें कान्हा लिखा।।1।।

जब कभी भी पूर्णिमा का चाँद निकला

खिडकियों से झांककर आगे चला।

भाग कर छत पर गया देखा तुम्हें

और झट से तेरा आ जाना लिखा।।।।2।।

एक भीनी सी सुरभि जब भी कभी

मेरे कमरों की हवाओं में घुली।

मैंने खुद को फिर मचलता देखकर

रात रानी का महक जाना लिखा।।3।।

जब कभी अवसाद सागर में मेरी



नाव मन की…

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Added by Pankaj Kumar Mishra "Vatsyayan" on April 14, 2016 at 6:35pm — 10 Comments

सेल्फी विद डाॅटर

दोपहर का समय था।सूर्य की प्रचंड किरणें आग के गोले बरसा रही थी।रश्मि अभी-अभी काॅलेज से आई थी, जबकि रूपेश अपने आॅफिस से पहले ही आ चुका था।



परंतु आते ही आज फिर वही बात हो गई जो प्रायः इस समय घटित होती थी।प्रतिदिन लडाई जूते-चप्पलों को सही जगह पर रखने को लेकर होती थी।ज्योंही रश्मि ने रूपेश के जूतों को बैडरूम में देखा तो वह भडक उठी।

"अपने आप को एक मैनेजिंग डायरेक्टर कहते हुए शर्म नहीं आती, न जाने अपने जूतों को भी सही जगह पर मैनेज करना सिखोगे_ _ _ _।"

"तुम किसलिए हो? इतना भी…

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Added by सुरेश कुमार 'कल्याण' on April 14, 2016 at 9:30am — 10 Comments

अतुकांत-तुम तो न जानते थे न महात्मन्!

हे महात्मन्!

हे वयोवृद्ध!

तेरी मृतात्मा सुने!

राम-गौतम की इस भूमि पर

अब वटवृक्ष छोड़,

उसकी टहनियों को

पूजा जायेगा।

तूने जो किये थे,

निः स्वार्थ कृत्य,

कर विस्मृत उन्हें,

बस तेरी कमियों को ही

उकेरा जायेगा।

इस सत्य-भूमि पर,

सत्यता को झुठलाकर

इतिहास को ही

तोड़ा मरोड़ा जायेगा,

तेरी रीतियों-नीतियों की

प्रबुद्ध आवाज को

अब अहिंसात्मक असहिष्णुता

बोला जायेगा।

जिन घटितों का तुझसे

दूर तक रिश्ता… Continue

Added by रामबली गुप्ता on April 13, 2016 at 2:15pm — 2 Comments

जलेबी बाई और जलेबियां (लघुकथा) / शेख़ शहज़ाद उस्मानी

जलेबी चौक पर प्रसिद्ध चाट वाले की दुकान पर कॉलेज की कुछ लड़कियाँ समोसा-कचौड़ी के मज़े लेते हुए बगल की लोकप्रिय दुकान में जलेबियां बनते हुए ग़ौर से देख रहीं थीं।



"क्या देख रही हो बहनों, हमारी-तुम्हारी ही कथा सुनाती हैं जलेबियां!"



"क्या? क्या मतलब?" - एक ख़ूबसूरत चंचल लड़की ने पूछा।



"ये देखो, ये वाली कड़ाही है जलेबी का मायका। यहाँ माँ-बाप की पोटली से निकल कर रूप-रंग और सांचे में ढलकर गरम तेल में तली जाती हैं जलेबियां!" -यह कहकर शहर की मशहूर जलेबी बाई ने कड़ाही में… Continue

Added by Sheikh Shahzad Usmani on April 13, 2016 at 8:28am — 7 Comments

अहिल्या के लिए मत सोचना

प्राण तो प्राण हैं दृष्टि के गुलाम हैं
वजह नहीं हैं कदापि ,वजह के अंजाम हैं  
कभी प्रेम पुचकार प्रगाढ़ से
पाषाणी अजन्ता युगवाणी  बना गए
कभी तिरस्कार का तीर भेद  
प्रेयसी अहिल्या को पाषाणी बना गए
अहिल्या के लिए
कभी भी मत सोचना
जैसे ऋषिवर ने नहीं सोचा
परमात्मा ने तो हरगिज़ नहीं  
कि प्रतिलांच्छित पतिव्रता
निरपराध ,निराश्रय अहिल्या
आदतन नारी -धर्म तो…
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Added by amita tiwari on April 12, 2016 at 11:06pm — 4 Comments

आईने तो आईने हैं ...

आईने तो आईने हैं ...

क्यूँ ,आखिर क्यूँ

आईनों से बात करते हो

ये करीबियां ये दूरियां

सब फ़िज़ूल हैं

कांच के टुकड़ों की तरह

टूटे हुए ज़ज़्बात

कब जुड़ पाते हैं

गर्द की आंधियां

ज़र्द पत्तों पर ही कहर ढाती हैं

बेज़ान जिस्मों पर

कब कोई तरस खाता है

बेमन से ही सही

हर कोई उसे ख़ाके सुपुर्द कर जाता है

कुछ भी तो हासिल न होगा

यूँ अपने अक्स से बात करके

हर सवाल मुंह चिढ़ाएगा

हर जवाब मुहं मोड़ जाएगा

आँखों का भीगापन…

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Added by Sushil Sarna on April 12, 2016 at 9:49pm — 2 Comments

मैं तो भुला चुका था,मगर याद आ गया (ग़ज़ल)

22 1212 1122 1212



मैं तो भुला चुका था,मगर याद आ गया

आखिर में ऐ ख़ुदा,तेरा दर याद आ गया



दुनिया की ख़ाक छान के जब ठोकरें मिलीं

जो छोड़ के गया था,वो घर याद आ गया



जब फूल हर डगर पे ही मुझको बिछे मिले

काँटों पे जो किया,वो सफ़र याद आ गया



पतझड़ के रुत में भी था हरा एक वो दरख़्त

किसकी दुआओं का था असर, याद आ गया



पल-भर की बेखुदी ने सफीना डुबो दिया

साहिल पे नैनों का वो भँवर याद आ गया



तूफ़ाँ में मुझको थाम के अविचल खड़ा… Continue

Added by जयनित कुमार मेहता on April 12, 2016 at 8:50pm — 3 Comments

निगाहें- ग़ज़ल

22 122 22 122
जबसे हैं तुमसे, उलझीं निगाहें।
इक दूसरे में, डूबीं निगाहें।।

मौका लबों को देती नहीं हैं।
बातें करें खुद, अपनीं निगाहें।।

दुनिया की कोई परवा नहीं है।
मिलकर झपकना, भूलीं निगाहें।।

जब भी हुई हैं, तुमसे जुदा ये।
तूफ़ाँ उठा औ' बरसीं निगाहें।।

अब छोड़कर के, जाना नहीं तुम।
बस ये ही तुमसे, कहतीं निगाहें।।

मौलिक-अप्रकाशित

Added by Pankaj Kumar Mishra "Vatsyayan" on April 12, 2016 at 3:44pm — 2 Comments

कुछ लम्हे ....

कुछ लम्हे ....

वो कुछ लम्हे

जो हमने मिलकर

अपनी झोली फैलाकर

ख़ुदा की हर चौखट पर

सर झुकाकर

मांगे थे //

वो कुछ लम्हे

जो हमारे ज़हन में

आज तक

इक दूसरे के वास्ते

वक्ते इज़हार के इंतज़ार में

ज़िंदा हैं //

वो कुछ लम्हे

जो हम दोनों ने

दो जिस्म इक जां

हो जाने के लिए मांगे थे

अब जब वो लम्हे

हमें नसीब हुए

तुम उनसे विमुख होने का सोच रही हो

अपनी ही आरज़ुओं का

अजन्मे ही गला घोंट…

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Added by Sushil Sarna on April 12, 2016 at 2:01pm — 2 Comments

गजल(मनन)

2122 2122 212
कुर्सियों के खेल में माहिर हुए
भेद सारे आपके जाहिर हुए।1

ख्वाब लोगों को दिखाकर सुनहरे
आप तो पलकें नचा साहिर हुए।2

हो गये सब ही गुनाहों से बरी
वे जले फिर आप तो ताहिर हुए।3

हों भले कितने बड़े ही हाथ पर
आप तो कानून से बाहिर हुए।4

हारता अबतक मुआ यह तंत्र है
बिन किये कुछ आप तो काहिर हुए।5
मौलिक व अप्रकाशित@मनन

Added by Manan Kumar singh on April 12, 2016 at 12:55pm — 2 Comments

छोटे भगवान्

अदभुत अकथनीय वातावरण

आज भगवान स्वयं घर पधारे हैं ,

चारों –ओर खुशियाँ ही खुशियाँ लाये है

भगवान् या देवी जो भी हों

घर को खुशियों से भर दिया है 

आज अम्बर भी ,देव वियोग में आसूं बहा रहा है

हवायें भी व्याकुल हो

प्रभु को ढूढने चली आ रही हैं

इससे अनभिज्ञ ,अंजान हैं

हमारे छोटे भगवान् जी

घरवालों के प्रान जी

पर क्या इनकी पूजा होगी ?

क्या इनकी किलकारियां ,नटखट अदाएं यूँ ही रहेंगी ?

ऐसा प्रश्न क्यूँ आया

आना…

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Added by maharshi tripathi on April 12, 2016 at 10:39am — 2 Comments

तेरा इंतजार करते-करते (कविता)

ए हसीन लम्हे

जरा आहिस्ता गुजर,

बहुत बरस बिताए हैं

तेरा इंतजार करते-करते।



बहुत तडपे हैं

बहुत रोए हैं

आंसू भी खूब बहाए हैं

हमने आहें भरते-भरते।

बहुत बरस_ _ _ _।



हठ किया है हमने

बादलों से निकलते

चांद की तरह

यहां तक पहुंचे हैं हम

जमाने की नजरों से

डरते- डरते।

बहुत बरस_ _ _ _।



जाने क्या तडप थी

जाने क्या एहसास था

जिंदगी जी आज तक

हमने यूंही मरते-मरते।

बहुत बरस_ _ _ _।



मौलिक… Continue

Added by सुरेश कुमार 'कल्याण' on April 12, 2016 at 9:27am — 2 Comments

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