For any Query/Feedback/Suggestion related to OBO, please contact:- admin@openbooksonline.com & contact2obo@gmail.com, you may also call on 09872568228(योगराज प्रभाकर)/09431288405(गणेश जी "बागी")

All Blog Posts (19,163)

रख के गिरवी अपनी जाँ तुम्हें फिर माँग लूँगा मैं

बनके अश्रु जब टपकेगी दिल की बेचैनी

मोहब्बत है तुझे हमसे फिर मान लूँगा मैं |



बयां कर न कर पढ़ के चेहरे की हालत

जरुरत है तुझे मेरी फिर जान लूँगा मैं |



जाके मिल गयी तुम गर सितारों में

देख चमकने की अदा फिर पहचान लूँगा मैं |



पकड़ हाथों में हाथ बनाके दिल की रानी

जहाँ कोई न हो दुश्मन फिर जहान लूँगा मैं |



सुनहरे केश और आँखों पे पलकों का ज़ेबा

बनाके तुझे भेजा उसका फिर एहसान लूँगा मैं |



बुलावा आ गया तेरा गर मुझ से पहले…

Continue

Added by maharshi tripathi on February 26, 2015 at 10:00pm — 14 Comments

ग़ज़ल .........;;;गुमनाम पिथौरागढ़ी

२१२२ २१२२

नीम सी कोई दवा हूँ

आदमी मैं काम का हूँ

भाग से मैं हूँ बुरा पर

शख्स लेकिन मैं भला हूँ

दो घडी रूकता ना कोई

मैं सड़क का हादसा हूँ

स्वार्थ भर को ही जरूरत

क्या मैं कोई देवता हूँ

ढूँढता हूँ अपनी मंजिल

ख़त कोई पर बेपता हूँ

गुमनाम पिथौरागढ़ी

मौलिक व अप्रकाशित

Added by gumnaam pithoragarhi on February 26, 2015 at 6:16pm — 13 Comments


सदस्य टीम प्रबंधन
एक तरही ग़ज़ल - होली है हुलासों की // --सौरभ

221 1222   221 1222

चुपचाप अगर तुमसे अरमान जता दूँ तो !

कितना हूँ ज़रूरी मैं, अहसास करा दूँ तो !

 

संकेत न समझोगी.. अल्हड़ है उमर, फिर भी..

फागुन का सही मतलब चुपके से बता दूँ तो

 

ये होंठ बदन बाहें…

Continue

Added by Saurabh Pandey on February 26, 2015 at 6:00pm — 16 Comments

सीप में बंद मोती .....

सीप में बंद मोती .....

दूर उस क्षितिज पर

रोज इक सुबह होती है

रोज सागर की सूरज से

जीवन के आदि और अंत की बात होती है

जब थक जाता है सूरज

तो सागर के सीने पर

अपना सर रख देता है

और रख देता है

अपने दिन भर के

सफ़र की थकान को

अपने हर सांसारिक

अरमान को

बिखेर देता है

अपनी सुनहरी किरणों की

अद्वितीय छटा को

सागर की शांत लहरों पर

फिर अपने अस्तित्व को

धीरे-धीरे निशा में बदलती

सुरमई सांझ के आलिंगन में…

Continue

Added by Sushil Sarna on February 26, 2015 at 1:07pm — 18 Comments

इस जिस्म में अब पंख लगाना ही पड़ेगा

२२१२ २२११ २२१ १२२

अब हाले दिल ये उनको सुनाना ही पड़ेगा

लगता है अपने ओंठ हिलाना ही पड़ेगा

छत पे खड़े हैं आज वो ऊंचे मकान की 

इस जिस्म में अब पंख लगाना ही पड़ेगा 

लौटे हैं कितने रिंद उन्हें मान के पत्थर 

जल्वा- ग़ज़ल का उनको दिखाना ही पड़ेगा 

छुप छुप के देखें आह भरें होगा न हमसे  

नजरों के तीखे तीर चलाना ही पड़ेगा 

ग़ज़लों पे रखिये आप यकी आज भी अपनी 

जलता हुआ दिल ले उन्हें आना ही…

Continue

Added by Dr Ashutosh Mishra on February 26, 2015 at 10:30am — 15 Comments

माँ हो क्या

एक स्त्री हो तुम

पत्नि नाम है तुम्हारा 

लेकिन कभी कभी 

खुद से अधिक

मेरी चिन्ता में डूब जाती हो

तुम्हारा इतना चिन्तित होना

मेरे अन्तर्मन में भ्रम पैदा करता है

कि तुम मेरी अर्धांगिनी होकर

माँ जैसा व्यवहार करती हो

कैसा बिचित्र संयोजन हो तुम

ईश्वर का 



जीवन के उस समय में 

जब कोई नहीं था सहारे के लिये 

दूर दूर तक

तब एक भाई की तरह 

मेरे साथ खडे होकर 

भाई बन गयी थीं तुम

उस दिन मुझे आश्चर्य हुआ था 

कि स्त्री होकर भी…

Continue

Added by umesh katara on February 26, 2015 at 10:16am — 17 Comments

गीतिका ... ८+८+६ २२-२२-२२-२२-२२-२

आहत युग का दर्द चुराने आया हूं

बेकल जग को गीत सुनाने आया हूं

 

कोमल करुणा भूल गये पाषाण हुये

दिल में सोये देव जगाने आया हूं

 

आँगन आँगन वृक्ष उजाले का पनपे

दहली दहली दीप जलाने आया हूं

 

ग़ालिब तुलसी मीर कबीरा का वंशज

मैं भी अपना दौर सजाने आया हूं

 

दिल्ली बतला गाँव अभावों में क्यूं है

नीयत पर फिर प्रश्न उठाने आया हूं

 

सिस्टम इतना भ्रष्ट हुआ, जिंदा होकर

इसके दस्तावेज़ जुटाने आया…

Continue

Added by khursheed khairadi on February 26, 2015 at 10:09am — 11 Comments

एक प्रश्न (दोहे)



1.    

पावन पवित्र प्रेम को, करते क्यों बदनाम ।

स्वार्थ मोह में क्यों भला, देकर प्रेमी जान ।।

2.    

एक प्रश्न मैं पूछती, देना मुझे जवाब ।

छोरा छोरी क्यो भला, करते प्रेम जनाब ।।

3.    

तेरा सच्चा प्यार है, मेरा है बेकार ।

माॅ की ममता क्यों भला, होती है लाचार ।।

4.    

सोलह हजार आठ में, मिले न राधा नाम ।

सारा जग फिर क्यो भला, जपते राधे श्याम ।।

5.    

मातु पिता के बात पर, जिसने किया विवाह ।

होते उनके भी प्रबल, इक दूजे…

Continue

Added by रमेश कुमार चौहान on February 25, 2015 at 9:30pm — 8 Comments

''साल दंगों का''

लुट रही है फसल-ए-बहार दंगो में..

आराम फरमा रहे हैं वो जंगों में...

दिया किसने ये हक़ इन्हें ए-ख़ुदा

ख़ुदी है सो रही खिश्त-ओ-संगों में..

किसने बनाये हैं ये सनमकदे...

ख़ुदा भी बंट गया बन्दों में...

मेरी इन्ही आँखों ने,नजर में तेरी ए-सनम

देखा है खुद को कई रंगों में..

है किसे तौफ़ीक जो गैरों के चाक सिले?

मै भी नंगा हो गया नंगों में....

‘’मौलिक व अप्रकाशित’’

२०१४ में उ.प्र. में फैले दंगों के…

Added by Krish mishra 'jaan' gorakhpuri on February 25, 2015 at 9:00pm — 2 Comments

कारवां देखते रहे

उम्मीद तो 

मुझे अपने आप से भी थी 

उम्मीद तो 

मुझे अपनों से भी थी ... 

सोचता तो 

अपने के लिए भी था 

सोचता तो 

दूसरों के लिए भी था 

सुधार की गुंजाईश 

अपने आप से भी थी 

सुधार की गुंजाईश 

दूसरों से भी थी 

इन्हीं ... 

उहापाहो में

सफर काटता रहा ... 

जब उम्मीद 

अपनी पूरी नहीं हुयी 

सोच अपनी न रही 

सुधार खुद को न पाया 

तो शिकायत 

अब किससे 

और…

Continue

Added by Amod Kumar Srivastava on February 25, 2015 at 8:58pm — 11 Comments

''कलमा''

तू मेहरबां है के खफा है मुझे पता तो लगे..

गुलशन में बातें सुलग रहीं है..जरा हवा तो लगे..

मोहब्बतों में ऐसा जलना भी क्या?बुझना भी क्या?

जले तो आंच न आये,बुझे तो न धुँआ लगे..

अजब हो गया है अब तो चलन मुहब्बतों का..

मै वफ़ा करूँ तो है उसको बुरा लगे...

वो चाहता है के मै उसके जैसा बन जाऊ...

है जो हमारे दरमियाँ न किसी को पता लगे..

इस साल भी बेटी न ब्याही जाएगी...

गन्ने/गल्ले का दाम देख किसान थका-थका सा…

Continue

Added by Krish mishra 'jaan' gorakhpuri on February 25, 2015 at 8:00pm — 14 Comments

नए कल्प में सागर मंथन

फिर हुआ सागर-मंथन

नए कल्प में

इस बार रत्न निकले तेरह   

देवता व्यग्र ! विष्णु हैरान !

कहाँ गया अमृत-घट ?

 

समुद्र ने कहा

अब वह जल कहाँ

जिसमे होता था अमृत

जिसे मेरी गोद में

डालती थी गंगा

जिससे भरता था घट

 

अब तो शिव ने भी

दो टूक कह दिया है 

नहीं…

Continue

Added by डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव on February 25, 2015 at 5:00pm — 6 Comments

जला बैठे

न देखी थी कभी सूरत मगर अपना बना बैठे

खता कुछ हो गई मुझसे तभी तुझको गवा बैठे

सजा कर माँग तेरी मैं तुझे अपना बनाया था

तुम्हारे साथ मिल कर मैं घरौंदा इक बसाया था

खिले जब फूल आँगन में हुआ पूरा सभी सपना

तुम्हारे बिन नहीं कोई जमाने में लगे अपना

मगर ये भूल थी मेरी जो तुम से दिल लगा बैठे

ख़ता कुछ हो गई मुझसे तभी तुझको गवा बैठे

न देखी थी कभी सूरत मगर अपना बना बैठे

बना कर सेज़ फूलों की उसे सबने सजाया था

उठा कर मैं जमीं से फिर…

Continue

Added by Akhand Gahmari on February 25, 2015 at 2:05pm — 6 Comments

ग़ज़ल--१२२२--१२२२--१२२२--१२२२...मुझे मालूम है यारों

मेरा देहात क्यूँ रोटी से भी महरूम है यारों

कहाँ अटका है रिज़्के-हक़ मुझे मालूम है यारों

 

उठा पेमेंट उसका क्यूँ नरेगा की मज़ूरी से

घसीटाराम तो दो साल से मरहूम है यारों

करें किससे शिकायत हम , कहाँ जायें गिला लेकर

व्यवस्था हो गई ज़ालिम बशर मज़लूम है यारों

सिखाओ मत इसे बातें सियासत की विषैली तुम

मेरा देहात का दिल तो बड़ा मासूम है यारों

लिए फिरता है वो कानून अपनी जेब में हरदम

जो कायम कायदों पर है बशर वो बूम…

Continue

Added by khursheed khairadi on February 25, 2015 at 12:49pm — 22 Comments

ग़ज़ल : मारो बम गोली या पत्थर कलम नहीं मिटती

बह्र : २२ २२ २२ २२ २२ २२ २

 

माना मिट जाते हैं अक्षर कलम नहीं मिटती

मारो बम गोली या पत्थर कलम नहीं मिटती

 

जितने रोड़े आते उतना ज़्यादा चलती है

लुटकर, पिटकर, दबकर, घुटकर कलम नहीं मिटती

 

इसे मिटाने की कोशिश करते करते इक दिन

मिट जाते हैं सारे ख़ंजर कलम नहीं मिटती

 

पंडित, मुल्ला और पादरी सब मिट जाते हैं

मिट जाते मज़हब के दफ़्तर कलम नहीं मिटती

 

जब से कलम हुई पैदा सबने ये देखा है

ख़ुदा मिटा करते…

Continue

Added by धर्मेन्द्र कुमार सिंह on February 25, 2015 at 12:30pm — 29 Comments

ग़ज़ल - निर्मल नदीम

गिरा के अपनी ही आँखों से खून काग़ज़ पर,

तलाश करता रहा दिल सुकून काग़ज़ पर.



जला के खाक ही कर दे जहान को आशिक़,

अगर उतार दे अपना जुनून काग़ज़ पर..

ग़ज़ल का एक भी मिसरा नहीं कहा मैनें,

थिरक रहा है किसी का फुसून काग़ज़…

Continue

Added by Nirmal Nadeem on February 25, 2015 at 12:00pm — 24 Comments

फागुनी दोहे २

 

लहकी कलियाँ डाल पर ,आँगन छिटकी धूप

चौपाले रौशन हुईं ,बाल बृंद सुर भूप ॥

 

सगुन  चिरैया भोर में, देती शुभ संदेश

पीहर आवे लाडली…

Continue

Added by kalpna mishra bajpai on February 25, 2015 at 11:30am — 9 Comments

ग़ज़ल--122--122 / 122 --122 चमन की कहानी

कहूँ आपसे क्या थकन की कहानी

न समझोगे गाफ़िल बदन की कहानी

 

बनाती है ज़र्रे को रोशन सितारा

लुभाती बहुत है लगन की कहानी

 

समझ लो य’ अश्कों का सावन निरख कर

लबों से कहूँ क्या नयन की कहानी

 

जली उँगलियों से ज़रा पूछ आओ

कहेंगे फफोले हवन की कहानी

 

हर इक गम को ढाला ग़ज़ल में मुसल्सल

है झूठी अदीबों ग़बन की कहानी

 

सुनाते मिलेंगे चहकते चहकते

कफ़स में परिंदे चमन की कहानी

 

किरन दर…

Continue

Added by khursheed khairadi on February 25, 2015 at 11:00am — 8 Comments

शेरों की दुनियाँ---डा० विजय शंकर

शेरों की दुनियाँ अजीब ,

जमाना अजीब होता है,

हर शेर अज़ब होता है,

हर शेर गज़ब होता है,

शेर सवाल, शेर जवाब होता है

शेर का जवाब भी शेर होता है

शेर पर शेर , सवा सेर होता है |



हमको भी शौक चर्राया,

हम भी आ गए शेरों के बीच ,

अपने चूहे बिल्ली लेकर ,

उन्होंने वो हंगमा बरपाया

कि शेर शेर घबड़ाया , बोला ,

अरे ,ये कौन शेर के जंगल में चला आया |



शेरों की अपनी एक तहजीब होती है ,

एक अदब , एक तमीज होती है ,

क़यामत होती है , एक… Continue

Added by Dr. Vijai Shanker on February 25, 2015 at 10:55am — 24 Comments

राष्ट्रधर्म: छन्द- दोहा

राष्ट्रधर्म ही सार है, राष्ट्रधर्म ही मूल ,

लेशमात्र सन्देह भी, कर देगा सब धूल !

 

रहे राष्ट्र के प्यार में, मानव का हर कृत्य,

रोम–रोम में राष्ट्रहित, क्या अफसर क्या भृत्य !

 

राष्ट्रघात या द्रोह से, जग में प्रलय दिखाय,

राष्ट्रप्रेम वह शक्ति है, विश्वविजय हो जाय !

 

राष्ट्र इतर अस्तित्व सब, समझो है बेजान ,

राष्ट्र रहे तो सब रहे, आन बान औ शान !

 

लहू बहा दो राष्ट्रहित, और बहा दो स्वेद,

प्राण जाय गर…

Continue

Added by Hari Prakash Dubey on February 25, 2015 at 9:30am — 13 Comments

Monthly Archives

2026

2025

2024

2023

2022

2021

2020

2019

2018

2017

2016

2015

2014

2013

2012

2011

2010

1999

1970

कृपया ध्यान दे...

आवश्यक सूचना:-

1-सभी सदस्यों से अनुरोध है कि कृपया मौलिक व अप्रकाशित रचना ही पोस्ट करें,पूर्व प्रकाशित रचनाओं का अनुमोदन नही किया जायेगा, रचना के अंत में "मौलिक व अप्रकाशित" लिखना अनिवार्य है । अधिक जानकारी हेतु नियम देखे

2-ओपन बुक्स ऑनलाइन परिवार यदि आपको अच्छा लगा तो अपने मित्रो और शुभचिंतको को इस परिवार से जोड़ने हेतु यहाँ क्लिक कर आमंत्रण भेजे |

3-यदि आप अपने ओ बी ओ पर विडियो, फोटो या चैट सुविधा का लाभ नहीं ले पा रहे हो तो आप अपने सिस्टम पर फ्लैश प्लयेर यहाँ क्लिक कर डाउनलोड करे और फिर रन करा दे |

4-OBO नि:शुल्क विज्ञापन योजना (अधिक जानकारी हेतु क्लिक करे)

5-"सुझाव एवं शिकायत" दर्ज करने हेतु यहाँ क्लिक करे |

6-Download OBO Android App Here

हिन्दी टाइप

New  देवनागरी (हिंदी) टाइप करने हेतु दो साधन...

साधन - 1

साधन - 2

Latest Activity

लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' replied to Admin's discussion 'ओबीओ चित्र से काव्य तक' छंदोत्सव अंक 176 in the group चित्र से काव्य तक
"आ. भाई सौरभ जी, सादर अभिवादन। चौपाइयों पर उपस्थिति, स्नेह और मार्गदर्शन के लिए हार्दिक आभार। आपकी…"
9 hours ago

सदस्य टीम प्रबंधन
Saurabh Pandey replied to Admin's discussion 'ओबीओ चित्र से काव्य तक' छंदोत्सव अंक 176 in the group चित्र से काव्य तक
"प्रस्तुति का सहज संशोधित स्वरूप।  हार्दिक बधाई"
15 hours ago

सदस्य टीम प्रबंधन
Saurabh Pandey replied to Admin's discussion 'ओबीओ चित्र से काव्य तक' छंदोत्सव अंक 176 in the group चित्र से काव्य तक
"आदरणीय लक्ष्मण धामी जी, प्रदत्त चित्र को आपने पूरे मनोयोग से परखा है तथा अंतर्निहित भावों को…"
17 hours ago

सदस्य टीम प्रबंधन
Saurabh Pandey replied to Admin's discussion 'ओबीओ चित्र से काव्य तक' छंदोत्सव अंक 176 in the group चित्र से काव्य तक
"आदरणीय अशोक भाईजी, आपने प्रस्तुति के माध्यम से प्रदत्त चित्र को पूरी तरह से शाब्दिक किया है…"
17 hours ago

सदस्य टीम प्रबंधन
Saurabh Pandey replied to Admin's discussion 'ओबीओ चित्र से काव्य तक' छंदोत्सव अंक 176 in the group चित्र से काव्य तक
"आदरणीय चेतन प्रकाश जी, आपकी प्रस्तुति का हार्दिक धन्यवाद  परन्तु, रचना सोलह मात्राओं खे चरण…"
17 hours ago

सदस्य टीम प्रबंधन
Saurabh Pandey replied to Admin's discussion 'ओबीओ चित्र से काव्य तक' छंदोत्सव अंक 176 in the group चित्र से काव्य तक
"आदरणीय अखिलेश कृष्ण भाईजी, चौपाई छंद में आपने प्रदत्त चित्र को उपयुक्त शब्द दिये हैं. सुगढ़ रचना के…"
17 hours ago
लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' replied to Admin's discussion 'ओबीओ चित्र से काव्य तक' छंदोत्सव अंक 176 in the group चित्र से काव्य तक
"आ. भाई अशोक जी, सादर अभिवादन। चौपाइयों पर उपस्थिति और उत्साहवर्धन के लिए आभार। तुकांतता के दोष में…"
18 hours ago
लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' replied to Admin's discussion 'ओबीओ चित्र से काव्य तक' छंदोत्सव अंक 176 in the group चित्र से काव्य तक
"आ. भाई अखिलेश जी, सादर अभिवादन। चौपाइयों पर उपस्थिति, स्नेह और मार्गदर्शन के लिए हार्दिक आभार। आपकी…"
18 hours ago
अखिलेश कृष्ण श्रीवास्तव replied to Admin's discussion 'ओबीओ चित्र से काव्य तक' छंदोत्सव अंक 176 in the group चित्र से काव्य तक
"हार्दिक धन्यवाद आभार आपका लक्ष्मण भाईजी"
19 hours ago
अखिलेश कृष्ण श्रीवास्तव replied to Admin's discussion 'ओबीओ चित्र से काव्य तक' छंदोत्सव अंक 176 in the group चित्र से काव्य तक
"हार्दिक धन्यवाद लक्ष्मण भाई "
19 hours ago
अखिलेश कृष्ण श्रीवास्तव replied to Admin's discussion 'ओबीओ चित्र से काव्य तक' छंदोत्सव अंक 176 in the group चित्र से काव्य तक
"आदरणीय अशोक भाईजी आदरणीय अशोक भाईजी  चौपाई में चित्र का  सम्पूर्ण  चित्रण हुआ है।…"
19 hours ago
Ashok Kumar Raktale replied to Admin's discussion 'ओबीओ चित्र से काव्य तक' छंदोत्सव अंक 176 in the group चित्र से काव्य तक
"चप्पल उसकी सिली न जाती। बिन चप्पल के वह रह जाती।।....वाह ! वाह ! प्रदत्त चित्र की आत्मा का भाव आपने…"
21 hours ago

© 2026   Created by Admin.   Powered by

Badges  |  Report an Issue  |  Terms of Service