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"थोड़ी अपनी ही ज़वानी कहो"

बच्चे सोयें वो कहानी कहो।
थोड़ी अपनी ही जवानी कहो।।

बुढ़ापे का ज़ख्म अब रफ़ू करो।
आँसुओं को फिर से पानी कहो।।

ये शहर रौशन नहीं वर्षों से।
इक शाम ही सही सुहानी कहो।।

मोहब्बत का महकता ख़त रहा।
कभी बातें वही पुरानी कहो।।

बहुत ख़त लिखे बहुत ख़त पढ़े।
अब दिल की बातें जबानी कहो।।
**********************
राम शिरोमणि पाठक"दीपक"
मौलिक। अप्रकाशित

Added by ram shiromani pathak on November 2, 2014 at 10:09am — 18 Comments

सितारों की कसम उस चाँद को भूला नहीं अब तक--ग़ज़ल उमेश कटारा

1222 1222 1222 1222



मुझे ख़त भेज़ता है वो ,कभी मेरा हुआ था जो

गया था छोड़कर मुझको ,मेरा बनकर ख़ुदा था जो



सितारों की कसम उस चाँद को भूला नहीं अब तक

मेरी तन्हा भरी उस रात में सँग सँग ज़गा था जो



परेशाँ तो नहीं होगा,अकेला तो नहीं होगा

मुझे है फिक्र क्यों उसकी, नहीं मेरा हुआ था जो



कभी दिन के उज़ाले में चला था साथ वो मेरे

मगर फिर छोड़कर मुझको अँधेरे में गया था जो



जमाने को शिकायत भी मेरे इन आँसुओं से है

बहुत लम्बा चला…

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Added by umesh katara on November 1, 2014 at 8:30pm — 6 Comments

ग़ज़ल (आलोक मित्तल)

कौन आया है अजनबी देखो !

खुशनुमाँ आज जिन्दगी देखो II

ध्यान देना ज़रा नजर भरके !

बैठ कर खूब सादगी देखो II

देख लो ठोक औ बजा करके I

ठीक सा कोइ आदमी देखो II

प्यार का अब हुआ असर ऐसा !

आप इसकी नई कमी देखो !!

हर तरफ चल रही सफाई है !

पर फिजाओं में गंदगी देखो !!

देखिये बँट रही मिठाई है !

कौन है फिर यहाँ दुखी देखो !!

जीत ली प्यार से मुहब्बत भी !

आज आलोक की ख़ुशी देखो…

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Added by Alok Mittal on November 1, 2014 at 4:00pm — 14 Comments

पूजा का वो थाल लगी

साड़ी में जैसे फाल लगी

डाली में जैसे डाल लगी

 

मैं भी कुछ खिल जाउंगा

वो आके जब गाल लगी

 

धीरे से पाती खोल रहीं

तबले पे जैसे ताल लगी

 

नज़रों की  चोली ओढ़ेगी

मालों में  जो माल लगी

 

असीर हैं  अनचाहे हम  

मछली का वो जाल लगी

  

इत्र गुलाबी  खुशबू फैली

पूजा का वो थाल लगी

 

अजब सलीके कत्ल किया

चैन की वो ही काल  लगी

 

गाली भी  खिल जाएगी

मुखड़े से जब…

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Added by anand murthy on November 1, 2014 at 1:30pm — 5 Comments

क्षणिकाएँ...

क्षणिकाएँ...

1.घन गरजे घनघोर

तिमिर चहुँ ओर

तृण-तृण से तन बहे

करके सब कुछ शांत

मेह हो गया शांत

..........................

2. सावन की फुहार

सृजन की मनुहार

रंगों का अम्बार

आयी बहार

हुआ धरा का

पुष्पों से शृंगार

.......................

3.बुझ गयी

कुछ क्षण जल कर

माचिस की तीली सी

जंग लड़ती साँसों से

असहाय ये काया

.........................

4.हर शाख पर

शूल ही शूल

फिर भी महके…

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Added by Sushil Sarna on November 1, 2014 at 1:15pm — 18 Comments


सदस्य कार्यकारिणी
बताओ जरा क्या तुम इतने बड़े हो?(ग़ज़ल 'राज' )

१२२ १२२ १२२ १२२

नहीं पाँव दिखते जहाँ पर  खड़े हो

बताओ जरा क्या तुम इतने बड़े हो?

 

उड़ाया जिसे ठोकरों से हटाया

उसी ख़ाक के तुम छलकते घड़े हो

 

जमाना नया है नयी नस्ल आई

पुराने चलन पर अभी तक अड़े हो

 

झुकी कायनातें झुका आसमां तक

न सोचो खुदी को फ़लक पे जड़े हो

 

वही रास्ते हैं वही मंजिलें हैं

वही कारवाँ है मगर तुम छड़े हो 

 

जहाँ है मुहब्बत वहीँ हैं उजाले

निहाँ तीरगी है जहाँ गिर पड़े हो…

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Added by rajesh kumari on November 1, 2014 at 12:45pm — 32 Comments

"जी उठा मन"

जी उठा मन” - गीतिका

 

जी उठा मन आज फिर से रात चंदा देखकर  |

थक गई थी प्रीत जग की रीत भाषा देखकर |



इक किरण शीतल सरल सी जब बढ़ी मेरी तरफ ,

झनझनाते तार मन उज्वल हुआ सा देखकर |



छू लिया फिर शीश मेरा संग बैठी देर तक ,

खूब बातें कर रही थी मुस्कुराता देखकर |



प्यार से बोली किरण फिर संग तुम मेरे चलो ,

राह रोशन कर रही थी साथ भाया देखकर |



चांदनी का चीर…

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Added by Chhaya Shukla on November 1, 2014 at 10:00am — 19 Comments


सदस्य कार्यकारिणी
गज़ल -हर ग़ज़ल में आप ही तो हैं (गिरिराज भंडारी)

1222     1222    1222       1222

मेरी हर शायरी में हर ग़ज़ल में आप ही तो हैं

मेरे हर नज़्म की होती पहल में आप ही तो हैं

 

मुझे तो ज़िन्दगी के रंग सारे ठीक लगते थे

किसी भी रंग के रद्दोबदल में आप ही तो हैं

 

मैं कितनी भी रखूँ दूरी हमेशा पास में हो आप 

मेरे दिल में बना है उस महल में आप ही तो हैं

 

ये दुनिया है यहाँ ज़ह्राब भी शामिल है आँसू भी

मेरी आँखों से बहते इस तरल में आप ही तो हैं

 

अलग कब आप हो…

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Added by गिरिराज भंडारी on November 1, 2014 at 8:00am — 27 Comments

उमेश कटारा-ग़ज़ल

मेरे हक़ में,खि़लाफ़त में, कोई तू फैसला तो दे

सज़ा-ऐ-मौत ही दे दे ,मेरे मुन्सिफ़ सज़ा तो दे



हुनर तेरा तू ही जाने ,बसाकर घर उज़ाडा है

लगाकर आग़ हाथों से,मेरे घर को ज़ला तो दे



व़फादारी तेरी आँखों में अब ढ़ूँढ़े नहीं मिलती

नज़र गद्दार है तेरी ,ज़रा इसको झुका तो दे



मेरे ही वास्ते तूने सज़ाकर जहर का प्याला

रख़ा है घोलकर कब से जरा मुझको पिला तो दे



चला में छोड़ के दुनिया मुबारक़ हो जहाँ तुझको

तसल्ली मिल गयी होगी, जरा अब मुस्क़रा तो…

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Added by umesh katara on October 31, 2014 at 10:03pm — 11 Comments

जो प्रिय है -डा० विजय शंकर.

कोई सच प्रिय है

कोई सच अप्रिय है

कोई कोई तो कटु है |

सच तो सच है ॥

सच है, इसीलिये तो सच है |

और इसीलिये तो, है ॥



झूठ वो है जो नहीं है ,

फिर भी है , क्योंकि

हम मान रहे हैं, कि है,

हम इसलिए मान रहे हैं

क्यों कि वह हमको प्रिय है ॥



हमको क्या प्रिय है,

वो झूठ , जो है नहीं ,

जो है नहीं , कहीं नहीं

वह हमको प्रिय है ॥

जो है नहीं वो हमको

प्रिय कैसे हो सकता है ||



वो क्या है जो हमें

प्रिय है और है… Continue

Added by Dr. Vijai Shanker on October 31, 2014 at 8:09pm — 13 Comments

क्या अब भी // रवि प्रकाश

क्या अब भी पुलिनों तक आते हैं सब धारे,

क्या सूखी सिकता में मोती मिलते होंगे?

अँधियारी रातों में गाते हैं सब तारे,

क्या उथली नींदों में सपने खिलते होंगे?

.

हलचल बढ़ जाती है क्या कुछ पदचापों से,

अपना कोई कोना हाथों से गिरता है?

कटता एकाकीपन अस्फुट आलापों से,

सहसा अब भी कोई सुधियों में तिरता है?

.

रातों की निर्मितियाँ दिन में ढह जाती हैं,

लज्जा की लाली क्या अधरों को सिलती है?

क्या अब भी सीने में टीसें रह जाती हैं,

तृष्णा के छोरों पर… Continue

Added by Ravi Prakash on October 31, 2014 at 12:30pm — 16 Comments

आदत-मजबूरी (लघुकथा)

आदत-मज़बूरी

जाम में फंसी गाड़ी पर उस लड़के ने कपड़ा रगड़ा और मुहँ-पेट की तरफ़ ईशारा किया तो उसने उसकी तरफ़ ध्यान ना देते हुए अपनी 5 मासी गर्भवती पत्नी से कहा –“सालों की आदत है ,भिखमंगे कहीं के “

एक बुढ़ा अगरबत्ती के पैक्ट लेकर पहुँचा और मुँह-पेट की तरफ ईशारा किया – “30 की दो ले लो - - -“

“ऊँह ,भावनाओं के नाम पर लुट रहा है बुड्ढा - - ” उसने पत्नी को देखकर धीरे से कहा |

गजरे बेचने वाली जब वो मलिन औरत आई तो पत्नी की आँखों में आई चमक को देखकर कहा

“बासी फूल हैं और जाने…

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Added by somesh kumar on October 30, 2014 at 9:30pm — 10 Comments

हाइकु

(1)

मोहक वन
सरि की कलकल
बहका मन

(2)

कोयल प्यारी
नित कूँ कूँ करती
जान हमारी

(3)

कार्तिक मास
झूम रही धरती
बुझेगी प्यास

(4)

यात्रा में रेल
दौड़ता सबकुछ
लगता खेल

(5)

मनवा भावे
सुन्दर है नईया
वायु हिलोर

"मौलिक व अप्रकाशित" 

Added by Pawan Kumar on October 30, 2014 at 6:00pm — 12 Comments

मधु पल ....

मधु पल ....

विरह के मारे ये लोचन

नीर कहाँ ले जाएँ

पी को पीर सुनाएँ कैसे

और स्मृति से बतियाएँ

वो स्पर्श एकांत के कैसे

अंग विस्मृत कर जाएँ

कालजयी पल अधर मिलन के

हृदय विचलित कर जाएँ

वायु वेग से सूखे पत्ते

मौन भंग कर जाएँ

बाट जोहते पगले नैना

बरबस भर-भर आएं

साँझ ढले सब पंख पखेरू

अपने नीड़ आ जाएँ

घूंघट में यूँ नैनों को पी

बार बार तरसाएँ …

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Added by Sushil Sarna on October 30, 2014 at 3:00pm — 8 Comments

मैं कफ़न में लिपटी इक तस्वीर मढ़ रहा हूँ

मैं कफ़न में लिपटी इक तस्वीर मढ़ रहा हूँ,

हुकूमत के मुंह पर इक तमाचा जड़ रहा हूँ । 

भूख की कलम से, मैं पेट के पन्नों पर,,

बेबस गरीबी की इक कहानी गढ़ रहा हूँ । 

कानून क्यों है बेबस?यही खुद से बूझते मैं,

इंसाफ की डगर पर ऐड़ी रगड़ रहा हूँ । 

आ जाएगी अमन की दुल्हन मेरे वतन में,

इसी आस में उम्मीदों की घोड़ी चढ़ रहा हूँ । 

इंक़लाब के सफर में ज़ज़्बों की पोटली ले,

हिम्मत की तेज़ आती गाड़ी पकड़ रहा हूँ…

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Added by संदेश नायक 'स्वर्ण' on October 30, 2014 at 12:53pm — 5 Comments

जिक्र तेरा भी करूँ,पर कौनसे हक़ से

लोग हैं सब पत्थरों के आजकल मैं भी
बार करते ख़न्जरों के आजकल मैं भी

लुट गयीं अब तो बहारें, सब शज़र सूखे
गीत लिखता बन्जरों के आजकल मैं भी

मुफलिसी देखी कभी फुटपाथ पर रोती 
लोग देखे बे-घरों के आजकल मैं भी

दर्द को गाते हुये देखा फकीरों को
हो गये जो दर-दरों के आजकल मैं भी

आसमाँ छूने चला हूँ जिद़ पुरानी है
उड़ रहा हूँ बिन परों के आजकल मैं भी
 
उमेश कटारा
मौलिक व अप्रकाशित 


Added by umesh katara on October 30, 2014 at 9:30am — 15 Comments

श्रमिक

जागा श्रमिक अभाव की चादर पीछे कर

चला अपने भाग्य से लड़ने डट कर

रेशमी विस्तर में सोने वालों,

तुमने कभी सुबह उठ कर देखा है ।

 

साहस की ईंटों को चुनता हैं अरमानों के गारे से

फिर भी खुशी चलती है दीवार पर, उसके आगे

संगमरमर के महलों में सुख से रहने वालों,

तुमने उनके भूखे पेटों को कभी देखा है ।

 

तारों की छांव में रोज सबसे आगे उठता

फिर भी जीवन की अरूढ़ाई ना देख पाता

तरुणाई श्रमिकों की पीने वालों,

इनके सिकुड़े…

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Added by kalpna mishra bajpai on October 30, 2014 at 7:30am — 10 Comments

ग़ज़ल- सारथी || बेख़ुदी में पुकारा करेंगे ||

बेख़ुदी में पुकारा करेंगे 

बोल कैसे गुजारा करेंगे /१

आज उनसे निगाहें लड़ीं हैं 

आज जश्ने-बहारा करेंगे /२ 

शोरगुल में कहाँ बात होगी 

कनखियों से इशारा करेंगे /३

बेतहाशा हसीं आप हैं जी 

रोज सदके उतारा करेंगे /४ 

देखना हमसे मिलकर गये हैं 

आईने को निहारा करेंगे /५ 

...........................................
सर्वथा मौलिक व अप्रकाशित

अरकान: २१२ २१२ २१२२

Added by Saarthi Baidyanath on October 29, 2014 at 11:00pm — 21 Comments

साँसों के संबंध का , बस इतना अनुवाद..............

धीरज धर कर जीवन को , पाला होता काश

पुष्प ना बनता मैं भले , बन ही जाता घास 

कितने जमनों का भँवर लिपटा मेरे पाव

धूप भी अब लगती सुखद जैसे ठंडी छाव

प्यासे को पानी मिले , गर भूखे को अन्न

हर गरीब हो जाए इस , धरती पे संपन्न

आकर बैठो पास में मेरे भी , कुछ वक़्त

आगे का लगता सफ़र होने को है सख़्त

मिला मुझे जैसा भी जो , स्वीकारा बे-खोट

इसलिए शायद हृदय , पाया मेरा चोट

नींदे जगती रात भर , सोते रहते…

Continue

Added by ajay sharma on October 29, 2014 at 10:30pm — 8 Comments

काले धन का हल्ला

छन्न पकैया छन्न पकैया, काले धन का हल्ला ।

चोरों के सरदारों ने जो, भरा स्वीस का गल्ला ।।



छन्न पकैया छन्न पकैया, कौन जीत अब लाये ।

चोर चोर मौसेरे भाई, किसको चोर बताये ।।



छन्न पकैया छन्न पकैया, सपना बहुत दिखाये ।

दिन आयेंगे अच्छे कह कह, हमको तो भरमाये ।।



छन्न पकैया छन्न पकैया, धन का लालच छोड़ो ।

होते चार बाट चोरी धन, इससे मुख तुम मोड़ो ।।



छन्न पकैया छन्न पकैया, काले गोरे परखो ।

कालों को दो काला पानी, बात बना मत टरको ।। …

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Added by रमेश कुमार चौहान on October 29, 2014 at 9:30pm — 6 Comments

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